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भाषा और धर्म

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संस्कृत के मामले में मैं बहुत बड़ा आलोचक हूं. मुझे 'श' या 'स' में अंतर या फर्क मालूम पड़ता है. संस्कृत में मैंने काफी अध्ययन किया है. फिर अपनी भाषा भी संस्कृत है. अंग्रेजी मैं बोलता हूं तो गलती करता हूं, लेकिन संस्कृत बोलूंगा तो गलती नहीं करूंगा. मगर संस्कृत कोई सुनता ही नहीं है. फिर भी इस भाषा का उदय होगा. अभी नहीं. यह जो कम्प्यूटर युग आ रहा है उसमें अभी जिस भाषा का उपयोग कर रहे हैं वह नकारात्मक है, अगर सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो उनकी बहुत सी अड़चने दूर हो जाएंगी.

हम लोगों ने संस्कृत भाषा का संबंध धर्म के साथ जोड़ दिया है. लेकिन भाषा और धर्म का कोई संबंध नहीं है. देखा जाए तो भाषा अलग है और धर्म अलग. उर्दू का मुसलमानों के साथ, लैटिन का अंग्रेजों के साथ, संस्कृत का हिन्दुओं के साथ संबंध जोड़ दिया गया है. इसकी वजह से भाषा को नुकसान पहुंच रहा है. संस्कृत का धर्म से क्या संबंध है? अपनी भाषा को सरल और स्पष्ट बनाने के लिए, लिखने के लिए इसका उपयोग है. हम लोग अंग्रेजी में P लिखते हैं. पर उसका उच्चारण करते हैं प. इसमें ध्वनि ही वही है. जब ध्वन्यात्मक अंतर आगे जाकर सुधरेगा जब कंम्प्यूटर वैज्ञानिकों को यह पता चलेगा कि ऐसी ध्वनि व्यवस्था है. हमारे यहां ध्वनि, वर्ण, अक्षर, शब्द, मात्रा, नाद ये सभी अलग-अलग हैं.

इनमें से दो चीजें पकडेंगे नाद और वर्ण. क का कि की जो पढ़ते हैं ये वर्ण हैं. यह जो ध्वनि क है यह वर्ण नहीं, नाद है. बोलते हैं न दृष्टांत, कुदांत ये वर्ण नहीं, नाद हैं. यह ध्वनि कहां से उत्पन्न होती है? कण्ठ से, नाक से, होठ से, मूर्धा से, तालू से होती है. कंम्पूटर में जो ध्वनि पहचान की बात हो रही है अगर यह ध्वनि की पहचान सरल हो जाए तो कंम्प्यूटर की कार्यक्षमता दस-बीस गुना बढ़ जाएगी. आपने बटन दबाया और जवाब मिल जाएगा. जैसे हम हिन्दी बोल रहे हैं तो आपको समझने में समय लग रहा है क्या? नहीं, मगर हम लैटिन में बोंलेगे तो समझने में समय लगेगा कि क्या बोल रहे हैं.

अंग्रेजी या रोमन जो है वह कंप्यूटर की अपनी भाषा नहीं है. फ्रेंच रोमन में लिखी जाती है. रोमन अक्षर में जो ध्वनि प्रणाली है वह वर्णात्मक है, ध्वन्यात्मक नहीं. K लिखो तो क हो जाएगा, P लिखो तो प हो जाएगा और A लिखो तो अ हो जाएगा. Circus में एक c होता है 'स' और दूसरा होता है 'क'. अंग्रेजी में टेक, टुक, टेकेन होता है लेकिन मेक, मुक और मेकेन नहीं होता. मगर यह प्रभुत्वशाली राजाओं की भाषा है तो हमें तो मानना ही पड़ेगा. यही तो दुनिया का रिवाज है कि जिसके पास वह शक्ति होगी वह जबर्दस्ती बाजार में आ जाएगा.

परंतु विज्ञान के सामने अब सब चीजें नंगी होंगी. विज्ञान ने बहुत सी चीजों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है. जिसे इन लोगों ने धर्म के नाम पर पीछे कर दिया था उसे विज्ञान ने स्वीकार किया है. पहले योग को लोग धर्म समझते थे लेकिन विज्ञान ने उसे स्वीकार किया है. आयुर्वेद को भी स्वीकृति मिल रही है क्योंकि आयुर्वेद प्राकृतिक चीजों पर आधारित है. उसमें औषधि बनाने की जो पद्धति है, रसायन बनाने की जो पद्धति है वह बहुत उत्तम कोटि की है. मगर अब सब पर हिन्दू धर्म की छाप है. किसी भी विज्ञान पर धर्म की छाप नहीं होनी चाहिए और न ही राजनीति पर क्योंकि विज्ञान इत्यादि किसी धर्म से मतलब नहीं रखते. क्या जीव विज्ञान ईसाई है या फिर भौतिकी ईसाई है? विज्ञान का धर्म के साथ कोई संबंध नहीं है.

संस्कृत का हिन्दू धर्म से क्या संबंध हो सकता है भला? फारसी का इस्लाम से क्या संबंध हो सकता है? कोई संबंध नहीं है. सही बात बता रहा हूं. अब धीरे-धीरे संस्कृत और आयुर्वेद का उद्धार होगा. जिन वैज्ञानिकों का दिमाग खुल रहा है वे अब नयी-नयी पद्धतियां ले रहे हैं. हजारों वर्षों से हम लोगों के यहां नीम पूजा जाता है, अब उन लोगों ने नीम से एंटिसेप्टिक बनाना शुरू किया है. आज तुलसी के जंगल उगाये जा रहे हैं. अब तुलसी का हिन्दू धर्म से क्या संबंध है? वह तो औषधि है और औषधि तो परमात्मा का रूप होती है, क्योंकि उसमें परमात्मा की शक्ति होती है. अब चूंकि तुलसी का संबंध हिन्दू धर्म से है इसलिए ईसाई उसे नहीं मानेंगे. पर एक जमाना आयेगा जब वे भी तुलसी से बनी एटीबायोटिक लेंगे. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो विज्ञान से संबंधित हैं और धीरे-धीरे उसी रूप में लोगों के सामने आ रही हैं.

यहां पण्डित लोग संस्कृत का पाठ कर रहे हैं. आप लोगों ने सुना? आप लोगों ने भ्रमरनाद सुना होगा. कभी ध्यान दिया है जब भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर जाता है. तब जो आवाज करता है वह भ्रमरनाद है. भ्रामरी करने का एक तरीका वह भी है. केवल उसके सुनने से मष्तिष्क में तरंगे पैदा होती हैं. इसी प्रकार मंत्र नहीं भी समझते हो तो केवल उसके सुनने से मष्तिष्क में तरंगे पैदा होती है जिसकी रासायनिक और विद्युतीय प्रतिक्रियाएं होती है. स्कूलों में बहुत पढ़ा होगा अल्फा-बीटा तरंग. इसके अलावा एक और चीज है आध्यात्मिक तरंग. वह दिखती नहीं लेकिन वह होती है जिसे हम लोग आत्मा कहते हैं. आत्मा में, चेतना में जो परिवर्तन होता है उसे नापने का कोई यंत्र नहीं है. लेकिन क्या आपने महसूस किया है? धोखा खाने पर, मरने पर, सुख के आने पर कोई परिवर्तन नहीं होता है क्या? इसे महसूस किया जा सकता है.

(सन २००० में रिखिया में किये गये सत्संग में ये बातें सत्यानंद जी ने लोगों से कही थीं. आज कम्प्यूटर में यूनिकोड के कारण बढ़ता देवनागरी लिपी का दबदबा उनके संभावनाओं को सच कर रहा है) 

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ghughutibasuti on 23 November, 2008 02:08;41
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रोचक व सोचने वाली जानकारी है ।
घुघूती बासूती
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Vivek on 23 November, 2008 07:23;50
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स्वामी जी, आपके रोचक एंड वैज्ञानिक सोच वाले विचार जान कर अति प्रसनता हुई... आप से एस तरह के और लेखो की आपेक्षा है... आप जैसे वैज्ञानिक सोच वाले गुरु समाज मैं व्याप्त कई धारणाओं को बदल सकते है...! पुनः लेख के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद..!
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अशोक पाण्‍डेय on 23 November, 2008 07:26;06
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सही बात है। भाषा का कोई धार्मिक आधार नहीं होता। यही बात तो कल मैंने अपनी पोस्‍ट में लिखी, जो किन्‍हीं को नहीं भायी। उनके लिए हिन्‍दी हिन्‍दुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है। इस नकारात्‍मक सोच में वे महाकवि अमीर खुसरो की हिन्‍दवी को भी सिर्फ उर्दू मानने की जिद पर अड़ जाते हैं।
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संगीता पुरी on 23 November, 2008 11:36;15
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वास्‍तव में संस्‍कृत बहुत ही अच्‍छी भाषा है , पर शायद इस के अच्‍छे शिक्षकों की कमी से ही समाज में इसका प्रचार प्रसार ढंग से नहीं हो पाया। वास्‍तव में , किसी भाषा या विज्ञान को किसी धर्म से जोडना बहुत ही गलत है , जिसकी रूचि हो उसे अवश्‍य अध्‍ययन करना चाहिए। बहुत सही कहना है आपका।
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on 23 November, 2008 14:07;23
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"कंम्पूटर में जो ध्वनि पहचान की बात हो रही है अगर यह ध्वनि की पहचान सरल हो जाए तो कंम्प्यूटर की कार्यक्षमता दस-बीस गुना बढ़ जाएगी. आपने बटन दबाया और जवाब मिल जाएगा."

बहुत आनन्द आयेगा । और इसे आने से कैसे रोका जा सकता है? अब तो यह किसी तरह से असम्भव नहीं है। इससे भारतीय भाषाओं को अधिक लाभ होगा और रोमन पर आधअरित भाषाओं को असुविधा होगी।
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ummed Singh Baid Saadhak on 24 November, 2008 00:28;21
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संस्कृत भाषा में गुंथी, सांस्कृतिक पहचान.
युगों-युगों से संकलित, है भारत का ज्ञान.
है भारत का ज्ञान, विश्व का मंगल-कर्ता.
सारे ही प्रश्नों का समाधान शुभ करता.
कह साधक कवि,सुगम-सरल-सुललिता भाषा.
सांस्कृतिक पहचान से पगी, संस्कृत भाषा.
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image परमहंस सत्यानंद अंतरराष्ट्रीय योग मित्र मंडल, बिहार योग विद्यालय, शिवानंद मठ, योग रिसर्च फाउण्डेशन, बिहार योग भारती के संस्थापक परमहंस सत्यानंद पिछले कई वर्षों से क्षेत्र सन्यास धारण कर रिखिया(झारखण्ड) में निवास कर रहे हैं. लोकहित में हम यहां उनकी विभिन्न पुस्तकों से समसामयिक लेखों/प्रवचनों के अंश प्रकाशित कर रहे हैं.
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