ईसाईयों पर तालिबान का कहर
इस महीने की 19 तरीख को पाकिस्तान के कराची शहर में `ईसाइयों की एक बस्ती´ में तालिबान ने इस्लाम के नाम पर नंगा नाच खेला। स्थानीय ईसाइयों द्वारा प्रशासन से अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर किये गये शांतिमार्च से बौखलाये तालिबान ने पुन: 21 तरीख को तशीर टाउन में रात के समय हमला बोल दिया और वहशियाना तरीके से लोगों के सामने दो ईसाइयों को मौत के घाट उतार दिया गया और औरतों को बालों से पकड़कर घसीटा गया। धमकी दी गई कि वह `इस्लाम´ ग्रहण करें। तालिबान कराची एवं पूरे सिंध में शरीया लागू करना चाहता है।
इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आया पाकिस्तान आज अपने ही फैलाये हुए धार्मिक कट्टरपन के भंवर में फंस गया है। वहां अल्पसंख्यक समुदाय जिस डर और खौफ के साये में जी रहे है उसकी कल्पना से भी रुह कांप जाती है। कट्टरपंथी गुप्रों के बाद अब वहा इस्लाम का तथाकथित रक्षक `तालिबान´ खड़ा हो गया है जो बंदूक की ताकत से पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर हर हलात में `इस्लाम´ थोपने पर आमदा है। हिन्दुओं, ईसाइयों एवं सिख समुदाय का वहा जीना दुश्वार हो गया है।
पाकिस्तान में रहने वाले डेढ़ करोड़ ईसाइयों की स्थिति बेहद खराब है। पिछले छ:ह दशकों से उन पर अत्याचार एवं धार्मिक उत्पीड़न का सिलसला जारी है। ईश निंदा के नाम पर कई बेगुनाह ईसाइयों को अब तक मौत की सजा दी जा चुकी है और कई वहा की जेलों में आज भी सड़ रहे है। 1994 में अंतराष्ट्रीय पत्रिका `न्यूज वीक´ ने पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें मसीह समुदाय की दयनीय स्थिति का जिक्र करते हुए कहा गया था कि किस प्रकार आज भी वहा अधिक्तर मसीह परिवार वुडेरो (जमीदारों) के हारी (बंधुवा मजदूर) के रुप में काम कर अपना जीवन यापन करते है। हारी होने का अर्थ है कि खाने लायक अनाज और कुछ रुपयों के बदले एक तय समय के लिए अपने जीवन को जमींदारों के पास गिरवी रख देना या उनका दास हो जाना।
आज भी ईसाई समुदाय पाकिस्तान में गरीबी रेखा के नीचे है। कट्टरपंथी गुप्रों द्वारा उनके घरों को तोड़ा जाना, लूटपाट करना, अमानवीय स्थिति में रखना आम बात है। बड़ी संख्या में मसीह परिवार वहां ईट के भट्टों में ही काम करते है। ईट भट्टों में काम करने वाले लोगों को ठेकेदारों द्वारा खरीदा और बेचा जाना आम बात है। जिसे वहां की भाषा में `पेशगी´ की संज्ञा दी जाती है। इस बुराई के विरुद्ध पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने भी रोष जताया है। विडम्बना यह कि वहां का चर्च नेतृत्व स्थानीय मसीहियों की समास्याओं की अनदेखी कर अपना धंधा करने में व्यस्त है। वैटिकन और गैर कैथोलिक चर्च नेतृत्व पाकिस्तान के विरुद्ध विश्व जनमत बनाने के मामले में एक कदम आगे और दो कदम पीछे चलता है।
भारत के मामले में जिस तरह वैटिकन एवं अन्य यूरोपीय देश `ईसाई´ मामलों को लेकर दखलअंदाजी करते है वह स्थिति पाकिस्तान के मामले में नही है। हालाकि भारत में हिन्दू एवं अन्य धर्मावलम्बी ईसाइयत के प्रति हमेशा से `सहज´ ही रहे है। हिन्दू संगठनों विशेषकर `राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ´ (आर.एस.एस.) का नजरिया भी अच्छा है। यहां संघ या अन्य धर्मावलम्बी ईसाइयों को `ईसाईयत´ छोड़ने की बात नही कहते। उड़ीसा या देश के अन्य हिस्सों में छुट-पुट टकराव की नौबत तब आती है जब चर्च/मिशनरी दूसरे धर्मों के अदरुनी मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज नही आते। यहा कुछ ईसाई नेताओं ने विश्व पटल पर भारत को एवं हिन्दू समुदाय को बदनाम करने का ठेका उठा रखा हैं और इन लोकसभा चुनावों में यह कार्य और भी योजना-बद्ध तरीके से किया जा रहा है कि मानों भारत में ईसाइयों का नर-संहार हो रहा हो। ऐसे नेताओं को पाकिस्तान के हलातों से सबक लेते हुए देश में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों को बंद करना चाहिए।
भारत की स्वतंत्रा के पूर्व व बाद में भी चर्च नेतृत्व स्थानीय ईसाइयों को महज अपना संख्या बल ही मानता आया है। 19वी सदी के मध्य तक चर्च समुद्र तटीय इलाकों से आगे बढ़कर पंजाब में पहुंचा। पंजाब में पहले चर्च की स्थापना 1834 में हुई। उसी के साथ स्कूल और प्रिंटिग प्रैस लगाया गया। फिर 1855 में वहां स्कॉटलैंड का चर्च आया। धीरे-धीरे पंजाब और उत्तर-पिश्चमी इलाके पर मिशनरियों का असर बढ़ता गया। 1880 आते-आते इस इलाके की अछूत जाति `चूड़ा´ का जबरदस्त धर्मांतरण शुरु हो गया। इस आदोंलन की ताकत ने हिंदु समाज को झकझोर दिया। जनगणना की हर रिर्पोट हिंदुओं के लिए चौंकाने वाली होती थी। चूड़ा भी महारों की तरह लड़ने वाली जाति मानी जाती थी। अपने संत लाल बेग के नाम पर लाल बेगी कहे जाने वाले पंजाब के `चूड़ाओं´ ने भारी पैमाने पर ईसाई धर्म ग्रहण किया। मिशनरियों ने नये ईसाइयों को लहोर, कराची, मुलतान, लायपुर, मांटगुमरी वगैरह की कंलोनियों में बसाया। यह लोग विभाजन के बाद पाकिस्तान में ही रह गये। और आज भी यह वहां अमानवीय जीवन जी रहे हैं।
वैटिकन द्वारा संचालित कैथोलिक एवं वर्ल्ड चर्च कौंसिल के दिशा-निर्देशों के तहत कार्य कर रहे प्रोटेस्टेंट चर्चों की विशाल संपति पाकिस्तान, बांग्लादेश में खड़ी है। और इन दोनों ही देशों में इस्लामी कानून लागू है। यहा भारत की तरह चर्च के हाथ खुले हुए नहीं है। उसके कार्य करने की एक सीमा हैं। स्थानीय ईसाइयों को वह अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है। वैटिकन की कौशिश इस क्षेत्र में अपने पैर जमाए रखनी की है इसलिए वह पाकिस्तानी नेतृत्व को ज्यादा नाराज नही करना चाहता। इसलिए आने वाले समय में इस अमानवीय व्यवहार से पाकिस्तान के ईसाइयों को छुटकारा मिलेगा इसकी आशा कम ही दिखाई देती है।
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सत्य वचन. बहुत कम यह साहस है कहने का.
lakin bandhu yaha india me jo ho raha hai jaise kandhmal me jo hua uske badle me to indian militry ya police ne ek 315 bore ki goli bhi nahi chalai yehi phark hai shayad.
ek bat aur pakistan se hindustan ki tulna kabhi na karna . sari kamiyo ke bawajud sari dunia yeh janti hai ki hindustan me aaj bhi kuch values hai jo pakistan me kabhi nahi the ....
घुघूती बासूती
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