विदेशी क्यों तय करे हमारी धार्मिक स्वतंत्रता ?
पूरे विश्व का पंच बनने की अमेरिकी प्रवृत्ति को भारतीय चर्च नेताओं ने पंख लगा दिये है। `अतंरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग´ (यूएससीआइआरएफ) जिसे अमेरिका की विधायिका ने 1998 में स्थापित किया था, पहली बार भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर सुनवाई/ जांच करने के लिए जून माह में भारत आने का जोरदार प्रयास कर रहा है। अगर नवगठित सरकार ने उसे भारत आने की अनुमति दी तो आयोग के सदस्य उड़ीसा, गुजरात एवं कर्नाटक का दौरा कर सकते है। 18 सिंतबर 2000 को आयोग ने पहली बार भारत के धार्मिक मामलों पर हस्तक्षेप करते हुए `ईसाइयों पर तथाकथित हमलों´ के मामलों पर अमेरिका में सुनवाई की थी।
उस सुनवाई में भारतीय चर्च की तरफ से प्रवासी शिक्षाविद सुमित गांगुली, कैथोलिक यूनियन के उपाध्यक्ष जॉन दयाल एवं मंगलूर के मुमताज अली खान ने हिस्सा लिया था। उक्त तीनों व्यक्तियों ने वहां ऐसा महौल बनाया कि पूर्व भारतीय प्रधानमत्रीं अटल बिहारी वाजपेयी को अपने अमेरिका प्रवास के दौरान `अल्पसंख्यक विशेषकर ईसाइयों´ की सुरक्षा के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सफाई देनी पड़ी।
वर्ष 1998 से ही आयोग भारत का दौरा करने का दबाव बनाये हुए है। लेकिन भारतीय सरकार ने उसे ऐसा करने की अनुमति प्रदान करने से इंकार कर दिया। क्योंकि `अतंरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग´ के भारत दौरे पर पहले विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी नराजगी जता चुके है। किसी भी देश की सार्वभौमिकता, एकता और अखण्डता के साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान भी जुड़ा होता है। भारत की यह नीति रही है कि हमारे घरेलू मामलों में कोई भी देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन हस्तक्षेप नही कर सकता। इसी नीति का पालन करते हुए राजग सरकार के मुखिया पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वाजपेयी (1999-2004) एवं संप्रग के प्रधानमंत्री डा. मनमहोन सिंह (2004-2009) ने बनाये रखा। वैसे भी भारत की यह नीति रही है कि वह अपने अंदरुनी मामलों का समाधान खुद करेगा। इसके लिए देश में ही न्यायपालिका, विधयिका, कार्यपालिका मौजूद है।
`अतंरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग´ (यूएससीआइआरएफ) बात तो भले ही मनाव अधिकारों की करे लेकिन उसका मुख्य कार्य चर्च के साम्राज्वाद को मजबूत बनाना है। इसी रणनीति के तहत दुनिया के देशों को तीन विभिन्न विभिन्न श्रेणियों में बांट कर यह आयोग कार्य करता है। आयोग की नजर में जहां धार्मिक स्वतंत्रता एवं मानव अधिकारों का सबसे ज्यादा खतरा है उनमें बर्मा, चीन, ईरान, इराक, वियतनाम, नार्थ कोरिया, क्यूबा, उजबेकिस्तान आदि देश है। दूसरी श्रेणी में बेलारुस, तुर्की, सोमालिया जैसे देश है। आयोग की तीसरी श्रेणी में भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, कजाकिस्तान जैसे देश है जहां धार्मिक स्वतंत्रता को कभी भी खतरा पैदा हो सकता है। इस तरह का संदेश कुछ समय पूर्व पोप बेनेडिक्ट 16वें भी दे चुके है जब उन्होनें वेटिकन स्थित भारतीय राजदूत को बुलाकर भारत में कुछ राज्य सरकारों द्वारा `धर्मांतरण विरोधी´ बिल लाने पर अपनी नराजगी जाहिर की थी। उनका मानना था कि इस तरह के बिल लाने से चर्च के `मानव उत्थान´ कार्यक्रम में रुकावट आती है। निसंदेह `अतंरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग´ (यूएससीआइआरएफ) उन्ही देशों में हस्तक्षेप करने की योजना बनाता है जहां चर्च को आगे बढ़ने में रुकावट दिखाई देती हो।
अब प्रश्न खड़ा होता है कि क्या भारत में चर्च या ईसाई समुदाय के सामने ऐसी स्थिति आ गई है कि वह अपने धार्मिक कर्म-कांड, पूजा-पद्वति तक नही कर पा रहा? क्या ईसाइयों की जान/माल की सुरक्षा करने में देश का तंत्र असफल हो गया है? क्या विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका में इनकी सुनवाई नही हो रही? क्या विदेशी सरकारों एवं अंतराश्ट्रीय संगठनों के सामने जाने के अलावा और कोई मार्ग नही बचा? यह कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उतर चर्च नेताओं को विदेशी आयोग के सामने जाने से पहले भारतीय समाज को देना चाहिए। अगर हम कर्नाटक, उड़ीसा में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को ही देखें तो वहां कि राज्य सरकारे, केन्द्र सरकार, न्यायपालिका सभी ने पीड़ितों का पक्ष लिया है। यहां तक कि देश के सर्वोच्च न्यायायलय ने हिंसा के दोरान मारे गये लोगों के उचित मुआवजे एवं क्षतिग्रस्त हुए चर्चों तक के पुनानिर्माण के आदेश दिये है।
भारतीय जनता पार्टी की सरकारे ही धर्मातरण का विरोध करती है या इसे राष्ट्र के लिए खतरा मनाती है ऐसा नही है। विगत कुछ वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी की हिमाचल प्रदेश सरकार ने सर्वसमति से `धर्मांतरण विरोधी´ कानून राज्य में लागू किया है। यह अलग बात है कि वह भाजपा सरकारों द्वारा लाए जाने वाले इस तरह के कानूनों का अपने राज्यपालों के माध्यम से विरोध करती आ रही है। भारत में चर्च को कार्य करने की कितनी स्वतंत्रता है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में वेटिकन के राजदूत कितनी तेजी से नये डायसिसों का निर्माण एवं बिशपों की नियुक्तियाँ कर रहे है। हालाकि उन्हे ऐसी स्वतंत्रता हमारे पड़ौसी देशों चीन, बर्मा, भूटान, नेपाल, पकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान आदि में नही है। भारत में `अल्पसंख्यक अधिकारों´ की आड़ में चर्च लगातार अपना विस्तार कर रहा है। हालाकि उसके अनुयायी आज भी दयनीय स्थिति में है। भारत में चर्चो के पास अपार संपत्ति है। जिसका उपयोग वह अपने अनुयायियों की स्थिति सुधारने की उपेक्षा अपना साम्राज्वाद बढ़ाने के लिए कर रहा है। धर्म-प्रचार के नाम पर चलाई जा रही गतिविधियों के कारण होने वाले तनाव में क्या चर्च की कोई भूमिका नही होती?
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