अल्लाह के नाम पर
क्या यह तथ्य हैरान परेशान और पशेमाान करने वाला नहीं है कि 121 वर्ष से स्थापित एक इस्लामिक मूवमेंट जमायत अहमदिया को पाकिस्तान में खुद को मुस्लिम कहने से रोकने के लिये बाकायदा एक कड़ा कानून काम कर रहा है। पाकिस्तान में अहमदिया लोग मुस्लिम जगत में मिलने पर प्रयोग होने वाले इस्लामावालेकुम - वालेकुम इस्लाम अभिवादन करते हुए पकड़े जायें तो तीन साल तक कैद व जुर्माना लगने का कानून है।
जमात अहमदिया पाकिस्तान में 26 अप्रैल 1984 में बाकायदा संविधान की धारा 295-सी में संशोधन करके तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक द्वारा गैर-इस्लामिक व इस्लाम विरोधी करार दी जा चुकी है। और इस कानून को पूरी तरह से स्थापित करने के लिये 5 अक्टूबर 1986 को संविधान की धारा 198 में संशोधन करके हजरत मोहम्मद साहिब व उनके परिवार के सदस्यों के प्रति अशोभनीय टिप्पणी करने के जुर्म में सजाये मौत का प्रावधान किया गया था।
इस नये कानून को पाकिस्तान में ईश निन्दा कानून कहा जाता है। इन सबके तहत कोई भी अहमदी अपने धार्मिक स्थल को मस्जिद नहीं कह सकता। 3 साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है धार्मिक स्थल को मस्जिद कहने में। मुस्लिम धर्म में नमाज से पहले अज़ान देने का प्रावधान है परन्तु अहमदी मुसलमान को अज़ान देने का भी अधिकार नहीं है और न ही अज़ान शब्द को इस्तेमाल करने का। यह शब्द अहमदियों को लिये लिखने, बोलने यहां तक कि विचारों से जुबान पर लाने पर भी प्रतिबंध है। अहमदी मुसलमानों के खिलाफ इन कानूनों के संशोधनों को इस आधार पर सही ठहराया गया है कि यह जमात खुद को मुस्लिम कहती है व प्रस्तुत करती है। परन्तु यह अपनी विचारधारा का प्रचार करके आम मुसलमानों का धर्मान्तरण करा कर इस्लाम जगत से तोड़ कर अपने रास्ते पर लाती है। इसलिये इनकी हर गतिविधि को गैर इस्लामी करार दिया जा चुका है। ऐमनेस्टी इंटरनेशनल पाकिस्तान के प्रधान फैज-उल-रहमान की रिपोर्ट में यह साफ लिखा है कि वर्ष 1974 तक बड़ी संख्या में अहमदी वर्ग के लोग पाकिस्तान के प्रशासन में बड़ी कुर्सियों पर विराजमान रहे हैं। जिनमें पाकिस्तान के प्रथम विदेश मंत्री सर जफर उल्ला खान और नोबेल प्राइज जीतने वाले भौतिक शास्त्री प्रोफैसर अब्दुस सलाम। उसके बाद अहमदिया लोगों को सरकार के बड़े पदो व प्रशासनिक अधिकारियों के पदों पर रखे जाने को लगभग प्रतिबंधित ही कर दिया गया।
आज की ताजा स्थिति यह है कि उच्च शिक्षा व सरकारी नौकरियों में यदि कोई अहमदिया मिलेगा तो सबसे नीचे पायदान के पदों पर ही बैठा देखा जा सकेगा। वोट बनवाने,पासपोर्ट, ड्राईविंग लाईसेंस, पानी और बिजली का कुनैक्शन, शिक्षा, नौकरी, जमीन का खरीदना व बेचना तथा अस्पताल की सेवाएं इन सभी मामलों में जो फार्म हर पाकिस्तानी को भरना पड़ता है उस पर लिखा है कि मैं मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी को झूठा व उनकी शिक्षाओं को इस्लाम विरोधी मानता हूं। इस इबारत पर कोई भी अहमदी हस्ताक्षर नहीं करता। जिसके चलते इन सेवाओं में भेदभाव का लिखित और अलिखित कानून चलाया जाता है पाकिस्तान में। वोट बनाने से लेकर सभी मामलों में। सरकार ने इन लोगों के वोट के हक को नहीं छीना पर फार्म पर लिखित सामग्री जो इनके मत के संस्थापक के खिलाफ है उस पर अहमदिया हस्ताक्षर नहीं करता और सरकार उस फार्म को अधूरा मानते हुए वोट नहीं बनाती।
आवाज पर भी पहरा
अहमदी लोगों की दया युक्त हालात से हमदर्दी रखने वाला एक अखबार भी है पाकिस्तान में जिसका नाम है अल फज़ल। इस अखबार को 25 जुलाई 2002 से प्रकाशित किये जाने पर पाकिस्तान के अंतरिक मंत्रालय द्वारा पत्र संख्या 1-2-एच-एसपीएल-3/2002 दिनांक 25 जुलाई 2002 के अनुसार प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रतिबंधित पत्र में मंत्रालय ने अहमदियों की गतिविधियों को बढ़ावा देकर प्रचार दे रहे इस अखबार के प्रकाशन पर व उसकी जिला मियावाली व सरगोधा में बढ़ रही प्रसार संख्या पर बेहद हैरत व गुस्से से भरी प्रतिक्रिया दर्ज की है। इस प्रतिबंध के बाद अल फज़ल के दफ्तर में मारे गये छापे के दौरान जो भी मिला उसे तीन से लेकर आठ साल के लिये जेल में डाल दिया गया जिसकी न तो कोई दलील और न ही कोई अपील सुनी गई। प्रैस की आजादी पर हुये इस हमले पर पाकिस्तान में किसी ने आंसू नहीं बहाये। जबकि अहमदियों को आंसू बहाने की इजाजत नहीं दी गई। और वर्ष 2006 में अल फज़ल को पूरी तरह बंद करने का आदेश जारी कर दिया गया। अल फज़ल के अलावा पांच अन्य पत्रिकायें भी ऐसी है जो जमात अहमदिया की भावनाओं को समझती है। जिनमें मासिक मिस्बाह, मासिक अंसरुला, मासिक खालिद, मासिक तस्हीरजुल अजान, मासिक तहरीक-ए-जायदाद। इन पत्रिकाओं के सभी संपादकों व प्रकाशकों पर धारा 298 बी व सी के तहत बार-बार केस दर्ज किये जाते रहे। अल फज़ल पर सरकार ने चौबीस केस दायर किये जिनमें 73 लोगों को लपेटा गया। विरोधियों द्वारा अल फजल के खिलाफ 14 मुकदमें करवाए गये जिनमें 48 लोगों को जिम्मेवार बनाया गया। अंसरुला के खिलाफ सरकार ने 12 विरोधियों ने 7 मामले दर्ज कराये जिनमें 37 व 27 लोगों को शामिल किया गया। मिस्बाह के खिलाफ सरकार द्वारा 7 व विरोधियों द्वारा एक केस दर्ज कराया गया जिनमें 23 व 3 लोगों को पार्टी बनाया गया। खालिद के खिलाफ सरकार की तरफ से 10 व विरोधियों की तरफ से एक मामला दर्ज हुआ। जिनमें 30 व 6 लोग लपेटे गये। तस्हीरजुल अजान के विरोध में 10 सरकारी मामले दर्ज किये जिनमें 31 लोगों को पार्टी बनाया गया। अलबदर के विरुद्ध एक केस में तीन लोगों को। दैनिक अल फज़ल के संपादक नसीम सैफी के खिलाफ 42 विभिन्न मुकदमें दायर हुये। विभिन्न अहमदिया पत्रिकाओं के प्रकाशक काज़ी मुनीर अहमद के खिलाफ 93 केस दर्ज किये गये। अल फज़ल के प्रकाशक आगा सैफ उल्ला 28 मुकदमों को झेल रहे हैं। इसी प्रकार अंसरुल्ला के ऐम इब्राहिम 17 मामले झेल रहे हैं। इन सभी अहमदी रसालों को 400 बार जब्त किया गया है। 1984 से पहले छपी अहमदिया समुदाय की 62 किताबों पर पाकिस्तानी सरकार ने प्रतिबंध लगाया है।
अल्लाह के नाम पर
सरकारी संशोधनों से अहमदिया समुदाय को कई तरफ से मार पड़ी। जिनमें 105 अहमदियों की हत्या हुई। 120 पर हत्या की कोशिश हुई। 22 मस्जिदों को तोड़ा गया। 28 मस्जिदों को सरकारी अर्थारिटी ने सील कर दिया। 11 मस्जिदों को आग लगा दी गई। 14 मस्जिदों पर कब्जे कर लिये गये। 41 मस्जिदों को निर्माण के दौर में ही प्रतिबंधित कर दिया गया। 28 अहमदियों की कब्रों को तोड़ दिया गया व शवों की बेअदबी की गई। 47 अहमदियों को दफनाने पर मनाही कर दी गई। ''केवल अल्लाह का सही रास्ता दिखाने वाले मोहम्मद ही हुये हैं जिनकी इबादत की जानी चाहिये। इनके अलावा इबादत के लायक दूसरा कोई नहीं।" यह शब्द कह कर अल्लाह की इबादत करने का प्रयास करके कलमा पढऩे वाले 764 अहमदियों को जेल की सलाखें देखनी पड़ी। अज़ान देने के कारण 38 जेल में गये। खुद को मुस्लिम बताने वाले 434 लोगों को 3 साल की कैद बामुशक्त। 161 अहमदी मुसलमानों की तरह व्यवहार करने के जुर्म में जेल गये। 93 को इबादत करने की कोशिश में जेल जाना पड़ा। 719 को अपने धर्म की शिक्षा बताने के इल्जाम में जेल मिली। 27 अहमदियों को अपने मत की 100वीं वर्षगांठ मनाने के जुर्म में सज़ा मिली। 50 लोग इसी 100 वीं वर्षगांठ में इमाम मेहंदी को याद करने के जुर्म में जेल गये। अहमदी समुदाय की एक पुस्तक मुबाहला को रखने के जुर्म में व पम्पलैट बांटने के जुर्म में 175 के खिलाफ मामले दर्ज हुये। 27 को पवित्र कुरान जलाने की इल्जाम में सजा मिली। 938 अहमदियों पर धारा 298-बी व सी के तहत मामले दर्ज हुये। ईश निंदा के आरोप में 295 अहमदियों को आरोपी बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख रहे अहमदिया समुदाय के एक न्यायधीश जो लंदन में रह रहे हैं उनकी गैरमौजूद में उनके खिलाफ 16 केस दर्ज किये गये हैं। पाकिस्तान स्थित अहमदियों के मुख्यालय रब्बाह के सभी नागरिकों (आबादी 60 हजार से अधिक) के खिलाफ 15 दिसंबर 1989 व दोबारा 8 जून 2008 में धारा 298-सी के तहत मामले दर्ज किये गये।
फिर भी कोई अहमदिया पाकिस्तान के खिलाफ नहीं बोलता
''आप लोगों पर इतना जुर्म हो रहा है फिर भी आप पाकिस्तान को अपना मुल्क भी मानते हैं व उस मुल्क के खिलाफ कभी नहीं जाते। इसका क्या कारण है?" यह सवाल मैंने दिसंबर महीने में कादियां स्थित होने वाले जलसा सलाना के एक मौके पर पाकिस्तान से आए अहमदी विद्वान (जिन्होंने आधा दर्जन के करीब विषयों पर एम.ए. बाद में पी.एच.डी. किया) डॉ. दोस्त मोहम्मद शाहिद से किया। देवदूतों जैसी काया के मालिक शाहिद साहिब का कहना था कि उनके मत के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी ने अपने हर मानने वाले को यह शिक्षा पूरी शिद्दत से दी है कि जिस मुल्क में रहो उसकी मिट्टी के प्रति वफादार रहो। यही कारण है कि हम जुल्मोसितम सह कर भी पाकिस्तान को ही अपना मुल्क मानते हैं। मुल्क का निजाम चलाने वाले नफरत की भावना व गफलत का शिकार हो सकते हैं लेकिन मुल्क का इसमें कोई कसूर नहीं।
असल में अहमदी समुदाय के साथ पाकिस्तान के कट्टरपंथी मुस्लिम वर्ग का यह गिला है कि मिर्जा गुलाम अहमद कादियान ने हिंदू देवी देवताओं के प्रति सदा आदर की भावना रखी तथा किसी की भी निंदा नहीं की। अहमदिया जमात आदतन पढ़े-लिखे विद्वान, समझदार व सहनशील लोगों की जमात है। क्या यह तथ्य काबिलगौर नहीं कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के घिनौने खेल में कभी भी कोई अहमदिया शामिल नहीं हुआ। यह लोग शांति व अमन पसंद है। धर्म के नाम पर कट्टरता तो जैसे इस समुदाय से निकाल कर बाहर की गई है। जिला गुरदासपुर स्थित कादियां इनके मूल से जुड़ी है। और 1889 में कादियां में ही अहमदिया संप्रदाय की नींव मिर्जा गुलाम अहमद कादियान द्वारा रखी गई थी। बस इनका कसूर इतना ही है कि यह अल्लाह पर ईमान रखते हैं तथा मुस्लिम धर्म को सही मायनों में जानते हैं। उन कट्टरपंथी लोगों से कहीं ज्यादा जिन्हें धर्म का मतलब इस्लाम का मतलब केवल नफरत फैलाने वाला एक हथियार ही समझ में आता है। इन शांत व ईश्वर के बच्चों पर पाकिस्तान में बहुत जुल्म नाजिर हो रहे हैं। हाल ही में लाहौर में दो अहमदिया मस्जिदों पर हमले चाहे आतंकवादी कार्यवाही जैसी दिखते हैं पर उनकी जड़ों में वो सच है जिसका खुलासा पहले किया गया है।
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