Home | धर्म-अधर्म | अथ श्री शनि शिंगणापुर कथा

अथ श्री शनि शिंगणापुर कथा

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जिस दिन हम शिरडी पहुंचे वह शनिवार था। तय हुआ कि शनि शिंगणापुर के शनिदेव का दर्शन आज ही कर लिया जाए। शनिवार के दिन शनिदेव के दर्शन। शिरडी में टैक्सी वाले चिल्ला रहे थे - शनि शिंगणापुर शिंगणापुर। हर टैक्सी का किराया अलग। 85 रूपए से लेकर 150 रूपए तक। जो ग्राहक जितने में फंस जाए। यह आने-जाने का किराया था। खैर 85 रूपए सवारी पर बात तय हुई।

हम पहुंच गए शनि शिंगणापुर। मंदिर निकल गया। सौ मीटर दूर टैक्सी मुड़ी और बदबूदार रास्ते से होकर एक जगह रूकी। बताया गया कि टैक्सी स्टैंड है। लेकिन वहां मजमा लगा था। किनारे-किनारे धर्म की सजी हुई दुकानें। टैक्सी रूकी और हम लोग जैसे ही बाहर निकले, दुकान के बाहर खड़े लोगों ने पीतांबर पकड़ा दिया। बताया कि जो वस्त्र हम लोग पहनकर आए हैं, उनमें दर्शन नहीं कर सकते। महिलाएं शनिदेव का दूर से दर्शन करेंगी और जो पुरूष हैं पहले अपने सारे कपड़े निकालेंगे, पीतांबर पहनेंगे। बगल में टंकी के पानी से नहाएंगे और भीगे बदन जाएंगे मंदिर में। धर्म के उन ठेकेदारों ने यह भी बताया कि बगैर पीतांबर के आप मंदिर में घुस भी नहीं सकते। पीतांबर बिल्कुल मुफ्त है। पहनिए और जाइए नहाइए। फिर आइए प्रसाद लीजिए और मंदिर में जाकर पुण्य कमाइए।

एक टंकी में टोटियां लगी थीं, उसी में नहाना था। आसपास भयानक बदबू। खैर, नहाया और गीले बदन वापस वहीं पहुंच गए जहां टैक्सी खड़ी थी। धर्म का ठेकेदार खुश हो गया। बोला- अब प्रसाद ले लो। अगर पहली बार आए हो तो तीन सौ रूपए का प्रसाद लो। पहले आ चुके हो तो डेढ़ सौ रूपए का प्रसाद। प्रसाद में क्या था, बस गिनती के चार-पांच फूल, एक पैकेट में लाई, एक रूपए वाली दो अगरबत्ती, छोट-सा काला कपड़ा वगैरह। कुल लागत पांच रूपए से ज्यादा नहीं। दाल में काला नहीं था, दाल ही काली थी, मुझे दिख गया। मैंने प्रसाद लेने से इनकार कर दिया। धर्मधिकारी मेरे पीछे पड़ गए। पहली बार आए हो, शनिदेव को खुश करके जाओ।

इसी बीच एक मोटा-तगड़ा आदमी बाहर निकला। काला बदन। पूरा डीलडौल बॉलीवुड के विलेन रामी रेड्डी जैसा। उसने कहा- प्रसाद नहीं लेना तो इस गमच्छे के सौ रूपए दो। यहां ज्यादा गुंडागर्दी दिखाने का नहीं। टैक्सी के बाकी साथी इस बीच गमछे में आ चुके थे। प्रसाद ले चुके थे। उनकी तरफ उसने इशारा करते हुए कहा- तुम अकेले होशियार हो! देखो इन्हें, ये तो बहस नहीं कर रहे। चलो खिटपिट छोड़ो, डेढ़ सौ का प्रसाद ले लो। नहीं तो मंदिर के भीतर नहीं घुस पाओगे। मैं हथियार डाल चुका था। खैर, प्रसाद लेकर आगे बढ़ा, तो एक और इम्तिहान बाकी था। यहां तेल का खेल था। पन्नियों में तेलनुमा चीज थी। सौ ग्राम के आसपास। दाम साठ रूपए। दो सौ ग्राम के आसपास की थैली के एक सौ दस रूपए। बोला- पहली बार आए हो तो बड़ा वाला लो। मैंने छोटी वाली थैली ली। आगे बढ़ा। मंदिर में प्रसाद की लाई बाहर ही रखवा ली गई। जिस गार्ड ने उसे रखा, वह खीझकर बोला- ये कहां पीतांबर के चक्कर में पड़ गए? पूरे कपड़ों में आना चाहिए था।

मंदिर के अहाते में एक कमरे में अफसर के नाम पर सिक्योरिटी अफसर था। मैंने उससे पूरा हाल सुनाया और सवाल भी पूछा कि क्या बिना पीतांबर पहने कोई मंदिर में नहीं घुस सकता। उसने बिना लाग-लपेट बता दिया कि ऐसा नहीं है। बाहर बेवकूफ बनाते हैं। मैंने कहा कि अगर बेवकूफ बनाते हैं तो आप लोग यहां क्यों बैठे हैं? दूरदराज से आए लोग ठगे जा रहे हैं। खैर, उसने मेरे साथ एक सिक्योरिटी गार्ड भेज दिया। मैंने पूछा कि ये क्या करेगा, तो वह बोला- जो आप कहोगे वो करेगा। मैं गार्ड के साथ पूरे जोश से वापस मौकाए वारदात पर पहुंचा। गार्ड को देखते ही वहां थोड़ी खलबली मची। मोटा-तगड़ा आदमी फिर सामने था। गार्ड से उसकी बात हुई।

मोटे ने पूछा- तुझे किना देना है, ये बता।

मैं-एक तो बातचीत का लहजा ठीक करो। मेरा एतराज प्रसाद की कीमत पर नहीं, उससे पहले ठगी के इस खेल पर है।

मोटा- ठीक है तू सौ रूपए ही दे।

गार्ड ने सिर हिलाया। मैंने सौ रूपए दे दिए।

गार्ड अचानक गायब हो गया। मोटे के नथुने गुस्से से फूले हुए थे।

मोटा- तू गार्ड को लेकर यहां क्यों आया? तेरे को मालूम है? यह महाराष्ट्रा है महाराष्ट्रा। तेरा यूपी, दिल्ली नहीं है। यहां गुंडागर्दी करने आया है।

मैं- गुंडागर्दी कौन कर रहा है भाई।

मोटा- तेरे को बताऊं मैं। अबी तेरे को शिरडी जाने का है कि नई। बीवी बच्चों के साथ आया है, लौट के शिरडी नहीं जाएगा।

मैं- क्या करोगे तुम?

मोटा- तू बहुत खिटपिट करता है। नेता है तू, गुंडा है तू? तेरा दिमाग ठिकाने लगा देगा। समझा क्या? तूने बहुत बड़ी गलती कर दी है। ऐसी गलती करने का नई। चल निकाल सौ रूपए।

मैं- ये बात गार्ड के सामने क्यों नहीं बोले।

मोटा-वो तो चला गया। क्या कर लिया। उसे 50 रूपए देने पड़े। जब भी यहां गार्ड आता है, 50 का नोट ले जाता है। गार्ड तो चला गया। अब बता क्या कर लेगा तू? सौ रूपए दे और कपड़े पहन। गाड़ी में बैठ लेने का। चुपचाप निकल जाने का।

इसी बीच मेरी पत्नी बोली- तुम लोगों को लूटना ही है तो बंदूक लेकर क्यों नहीं लूटते! धर्म के नाम पर धोखाधड़ी क्यों कर रहे हो?

मोटा बोला- तू गाड़ी में बैठ। चुप रह। अबी तेरे आदमी से बात हो रही है। हां, चल तू सौ रूपए निकाल।

मेरा मन घिन से भर गया। गुस्सा भी था, तो परिवार के नाते थोड़ा डर भी लगा। एक बात और थी कि आठ साल का मेरा बेटा भी मेरे साथ था। उसकी नजर में पापा हीरो हैं और विलेन ने हीरो का बुरा हाल बना रखा था। खैर, मैंने सौ रूपए निकालकर उसे दे दिया। उसके चेहरे पर विजयश्री की चमक तो दिखी, लेकिन बुझ भी गई। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं इतनी जल्दी सरेंडर कर जाऊंगा। मोटा चला गया।

मैंने कपड़े पहने। गुस्से से दिमाग फट रहा था। इस बीच दुकान से एक और आदमी निकला। वो लगा समझाने-देखो यहां खिटपिट नहीं करने का। ये महाराष्ट्रा है। यहां का आदमी डेंजर है। यहां पंगा नहीं लेने का। इस बीच मोटा लौट आया था। वो इतनी जल्दी क्लाइमेक्स के मूड में नहीं था।

मोटा- तूने बड़ी गलती की है। ऐसा गलती करने का नई। अब दोबारा आएगा तो चुपचाप रहने का। पंगा लिया तो फंसेगा तू।

मेरे मन में दौड़ती-भागती ट्रेन की तरह कई खयाल आ जा रहे थे। उस मोटे का खून कर देने का खयाल भी आ रहा था, तो गांधीगिरी का भी खयाल आया। बाबा भारती और खड़ग सिंह का किस्सा भी याद आया।

आखिरकार हिम्मत करके मैंने उससे कहा - तुम्हें ये कैसे लग रहा है कि मैं दुबारा यहां आऊंगा? दिल्ली में बड़ा नाम सुना था शिंगणापुर का। शनिदेव का। लेकिन यहां आकर तसल्ली हो गई। एक बात तो तय है कि चाहे जो हो जाए मैं दुबारा यहां नहीं आऊंगा। अगर मेरा बेटा मर रहा हो, बीवी मर रही हो और खुद शनिदेव भी आकर कह दें कि शिंगणापुर में दर्शन कर लो तो मैं बीवी और बच्चे को मरने दूंगा, पर यहां नहीं आऊंगा। (प्रप्र)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों न्यूज 24 में सीनियर प्रोड्यूसर हैं। उनसे vikas.mishra@bagnetwork.inके जरिए संपर्क किया जा सकता है।)

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विवेक रस्तोगी on 12 March, 2009 22:00;25
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बिल्कुल सही कहा आपने सब कहते हैं कि यहाँ शनि महाराज रहते हैं और यहाँ घरों में दरवाजे नहीं होते क्योंकि जो भी व्यक्ति यहाँ चोरी करता है वह शनि शिंगणापुर गांव से निकल नहीं पाता है और भी अनेकों प्रकार के किस्से यहाँ प्रचलित हैं। लगता है शनि महाराज का गुस्सा केवल चोरों के लिये है जो कि ताले तोड़ कर लूटते हैं न कि इन डाकुओं पर जो खुलेआम डाका डालते हैं।
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marwa t k on 12 March, 2009 23:17;32
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Sirf shignapur hi kyon, bharat main har hindu dharmkik sthan par isse bhi bura hall he sirf gurudwara masjid aur church ko chodkar, jab ki shani maharaj ko nyaydish ka darja prapt he kaha jata he , ab kaisa nyay ho raha he padhe likhe ko ishara kafi he.
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Abhimanyu on 13 March, 2009 02:43;08
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हिन्दू संस्कृति आत्म घाती है, हमें किसी और ने नहीं तोडा है, हम खुद ही अपनों को तोड़ते है, बिगाड़ते है, नहीं तो आज हम कही और होते.

आपने सही कहा ये हाल सवी धरम स्थलों का है, आप जहा भी चले जाये, सभी जगह ये कुत्ते मिल जायेंगे.
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Deepak on 13 March, 2009 07:56;52
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main Itane Sal se vaha ja raha hoon. Aaj tak mere Satha Aisa nahi huaa. Tel ki Panni 10 rs. ki li hai... 20 rs se jyada ka maine Prasad nahi liya.. na hi kisi ne koi jor jabardasti ki hai... man to Apana Saman (Suitcase) etc. bhi Prasad bechane wali dukanon main hi Rakhata hoon. Free of Cost.... aur kabhi kisi ne yae nahi kaha ki pitambar bapas do ya pitambar ke 150 rs.... main aaj pahali bar Aisa Pad-sun raha hoon. aap Aatmanthan karen ki Aisa aapake sath kyon huaa.
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jp shukla on 13 March, 2009 13:26;18
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vivek ji, aap ko kast hua iska mujhe bhi kast hai. but aap dobara shani mandir jao. mai aap ko tip deta hu. koi kast nahi hoga.
1. any gari se mandir ke pas tak jao.
2. mandir ke paas ke parisar me jeep khadi kare.
3. samne vali ANY 4-5 shop me pahle MOLE-BHAV KARE. MIN-51Rs. me souda ho jayega. 51 me pooja samgri melegi. isi 51 me lal-pila gamcha bhi milega. oil 21Rs. aap only 100 me nipat jage.
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Sunil on 13 March, 2009 18:19;47
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Sirf Hindu Religion ki baat Kyun Ki Jaye. Dusre Jagaho ka bhi yehi haal hai. Mai august 2006 me Sharadhpurvak Ajmer Sharif ke Dargah par gaya tha. Pahnave se saaf tha ki main Hindu hun. Uske bad waha Ke thekedaro ne forcly mujhe Matha Tekne ke liye 500 rupye mangne laga. Maine Dene se mana kar diya to wah Gali Galouj Ki bhasha par utar aaya. Dhaka Mukki Shuru kar di. Uparwale ka shukra hai ki ek Sajjan mil gaye aur usne mujhe apne kurte ki jeb ko pakad kar rakhne ko kaha jis se mera pocket saaf na kar le we log. Sajjan ne mujhe dargah ke Darshan karaye. Maine apne kan padad liye ki ab main yahan Dubara kabhi nahi aaunga.
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anil sharma on 14 March, 2009 15:45;28
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It is shameful.U have done great job.We all love shani dev but not at this kind of humiliation.I also feel bad.
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kanaya on 18 March, 2009 15:27;50
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mujhe lagta hain baat choti si hoghi par use bahut bada chadakad bataya hein, shirdi aur shanishignapur ko badnam mat karo, yeh sab aastha ka sawal hein , kisi ki koi jabardasti nahi hein...
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sanjay swadesh on 22 March, 2009 15:25;37
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kanaya ji
ho sakta hain aapke sat aisa anubhaw nahi huwa ho. par hakita wahi hain jo vikash mishra ji ne likha hain.
culcutta ke kalighat ho ya phir bihar ka thawe me devi mandir, pandey lutne se baj nahi aate hain. pahli bar jane wala thaga hi jata hai. jyad bade sthal par jyada lut, choti mandir me jyada lut.
patna railway stain se bahar nikalne par kae log kewal mathe par tika lagar tagte hain.
jo dharmik sthal kisi chariti bord se sanchalit hai waha ye sthisi nhi hain. baki jagah lut hain.
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Geeta Dogra on 26 May, 2009 21:12;52
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shani shingnapur mein yeh thaggi mein bhi dekh chuki hun.is se hamari aastha par fark padta hai, yeh bat ve log nahi samjhte, aapne sahi likha hai. shani maharaj inhe koi saja vahi dete,yeh harani ki bat hai
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