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कूड़े में जाए ऐसी बिजली

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वर्तमान में अमीरी के आंकलन का एक तरीका यह भी है कि आप कितना कूड़ा पैदा करते हैं. भारत के एक वर्ग में अमीरी बढ़ रही है तो साथ के साथ कूड़ा भी बढ़ रहा है.

ऐसे में इस विचार को मूक समर्थन मिलना ही चाहिए कि शहर के बढ़ते कूड़े के बोझ को कम करने के लिए उस कूड़े की बिजली बना लेनी चाहिए. अब अगर किसी शहर के लिए कूड़ा उसकी सबसे बड़ी समस्या है तो बिजली उसकी पहली जरूरत. इसलिए ऐसे किसी भी विचार को आंखमूंदकर समर्थन करने में कोई हर्ज नहीं है. लेकिन इस कूड़े से बिजली बनाने के लिए जिस कूड़ा तकनीकि का इस्तेमाल किया जाता है वह इस क्रांतिकारी विचार को भी कूड़ा बना देता है.

कूड़े के इस दैत्य से निपटने के लिए गैर परंपरागत उर्जा स्रोत मंत्रालय ने  1986 में इस क्रांतिकारी विचार के साथ काम शुरू किया कि एक ऐसा बिजलीघर बनाया जाए जो कूड़ा खाकर बिजली पैदा करती हो. सरकारी विचार अचानक शून्य से प्रकट नहीं होते और उनका कोई सरोकार भी नहीं होता इसलिए ऐसे विचार पैदा करने के पीछे विचार पैदा करनेवाली एक ताकत होती है. सरल शब्दों में उन्हें लाबिइस्टि कहते हैं और अति सरल शब्दों में पहुंचवाला व्यापारी. इसलिए विचार से व्यवहार तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और 1990 में दिल्ली के तिमारपुर में ऐसा पहला बिजली संयत्र बनकर तैयार हो गया. लेकिन जिस तकनीकि और क्रांतिकारी विचार के आधार पर यह बिजलीघर बनाया गया था वह सात दिनों में ही धराशायी हो गया. दावा किया गया था कि यह बिजलीघर 6 मेगावाट बिजली पैदा करेगी. सात दिनों में वह इतनी भी बिजली पैदा नहीं कर सकी कि उसकी अपनी बिजली-बत्ती जल पाती. आठवें दिन तो उसने दम ही तोड़ दिया. शिकायत की गयी कि बिजली घर को मिलनेवाले कूडें का कैरोलिफिक वेल्यू इतना नहीं है कि उससे बिजली पैदा हो सके. विरोधों से जो बात सरकार और उसकी मशीनरी को समझ में नहीं आयी थी वह असफलता से समझ में आ गयी. इस तरह क्रांतिकारी विचार पहले प्रयोग में फुस्स साबित हुआ.

इस तरह 58 करोड़ रूपये के निवेश से डेनिश कंपनी की यह महत्वाकांक्षी परियोजना सात दिनों की असफलता के बाद सदा-सदा के लिए बंद हो गयी. सरकार ने जो 20 प्रतिशत आर्थिक मदद थी वह तो डूबा ही लेकिन इस फुस्स विचार के बाद भी कूड़ा भी बना रहा, कंपनियां भी बनी रहीं और सरकार और सरकारी डिपार्टमेन्ट भी बने रहे. 1997 में पर्यावरण मंत्रालय के अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की गयी थी कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को ट्रीट किया जा रहा था वह तकनीकि सही नहीं थी. लेकिन क्रांतिकारी विचार कभी मरते नहीं इसलिए क्षणिक अंतराल के बाद इस विचार ने फिर आकार लिया.

गंधमगुड्डा बना दुर्गंधमगुड्डा 

आंध्र प्रदेश का रंगारेड्डी जिला. इसी जिले की पिरंचेरी पंचायत के गंधमगुड्डा गांव में 2005 में एक बार फिर इस क्रांतिकारी विचार ने आकार लिया. इस बार किसी देशी फाईनेन्स कंपनी पर विश्वास करने की बजाय उसे ठेका दिया गया जो इस तकनीकि के विकास में शामिल रही है. सेल्को इंटरनेशनल लिमिटेड ने इस दावे के साथ एक बार पुनः कूड़े से बिजली बनाने की योजना पर काम करना शुरू किया. यहां भी लक्ष्य रखा गया कि परियोजना पूरी होगी तो 6 मेगावाट बिजली मिलेगी. यहां भी बात नहीं बनी. कुछ दिनों तक यह प्लांट 2-3 मेगावाट बिजली बनाता रहा लेकिन इसके लिए भी उसने कूड़े का नहीं बल्कि धान के भूसी का इस्तेमाल किया. फिर भी जब तक यह प्लांट चला इलाके में बदबू का साम्राज्य कायम रहा. विकास और बिजली की यह कीमत दुर्गंध के रूप में स्थानीय लोग चुकाते रहते लेकिन हारकर कंपनी ही पीछे हट गयी. बात आयी और चली गयी. 

लेकिन यह क्रांतिकारी विचार अभी भी मरा नहीं है. एक बार फिर इसने अपना ठिकाना दिल्ली को बनाया है. इस बार ठिकाना बना है ओखला का सुखदेव विहार. एमसीडी (म्यूनिसिपल कारपोरेशन आफ देलही) का कहना है कि इससे 2000 टन कूड़े से उसे मु्क्ति मिलेगी और इलाके को बिजली भी मिलेगी. अभी तक के अनुभव बताते हैं कि ऐसे प्लांट इतनी बिजली भी पैदा नहीं कर पाते कि अपनी बिजली बत्ती जलाये रख सकें फिर तकनीकि के बारे में गंभीर सवाल तो हैं ही. लेकिन क्रांतिकारी विचार तो आखिर क्रांतिकारी होते हैं इसलिए उनको रोका नहीं जा सकता. और सरकार ने कूड़े की जो विभिन्न परिभाषाएं तैयार की है उन सबको ध्यान में रखते हुए देशभर में 31 प्लांट लगाने की योजना पर काम कर रही है. 

बिजली तो मिलेगी नहीं, कैंसर जरूर हो जाएगा
अभी तक के अनुभवों से पक्का हो गया है कि ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए. कारण कुछ और हैं. इन कारणों में एक कारण यह भी है कि प्रति मेगावाट की दर से सरकार दो स्तरों पर अनुदान देती है. यह एक करोड़ से डेढ़ करोड़ तक होता है. जिस काम को सरकार के अधिकारी ज्यादा रूचि लेकर प्रमोट करते हैं उसके कारण सबको समझ में आ जाते हैं. इस तकनीकि के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. लेकिन जनता को इससे क्या मिलेगा? लोगों को बिजली तो मिलने से रही लेकिन जहां भी ऐसे प्लांट लगेंगे उनके आस पास के लोगों को कैंसर सौगात में मिलेगा. इंसीनरेशन तकनीकि की बदौलत यह बिजली का कूड़ाघर डाईआक्सीन का उत्सर्जन करेगी. डाईआक्सीन कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक घोषित गंधक है. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि खतरनाक रसायनों को जिन्हें विकास की तकनीकि ने ठोस रूप प्रदान कर दिया था उसे यह पुनः कई-कई रूपों में विभाजित कर देता है. अब यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है. शहर के कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा जैसे गंधक भी बहुतायत में निकलते हैं. वैज्ञानिक और व्यावसायिक बुद्धि को किनारे रख दें तो भी क्या हमें यह समझने में दिक्कत है कि प्लास्टिक और पारा के जलने से जो धुंआ निकलता है वह हमारे लिए लाभदायक है या हानिकारक?

ऐसे बिजली की किसे जरूरत होगी जो मौत का खेल खेलती हो? क्या आपको है?

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tulsi singh bisht on 17 June, 2008 13:08;45
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गोपाल कृष्णा जी आपका लेख काफी अच्छा लगा और आपने जो लिखा कि अमीरी बड़ी तो कूड़ा भी बड़ा। रही बात सरकार द्वारा कूड़े से बिजली बनाना और उससे कैसर का होना काफी खतरनाक बात है।
जहां तक मैं कूड़े के विषय में समझता हूं कि आजकल समाज के ठेकेदारों ने लोगों को दिखाया है कि ये खरीदो और वो खरीदो इसके बिना आपका जीना बेकार ये भी एक प्रकार से कूड़ा इक्कठ्ठा करना ही है जो व्यक्ति को विनाश की ओर ही ले जाना है। आपका लेख काफी उच्चकोटि का है लेकिन इस कूड़े से कैसे बचा जा सके इसका विवरण भी आपको अगले लेख में करना होगा ताकि हमारा मार्गदर्शन भी हो सके।
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image गोपाल कृष्ण पानी और पर्यावरण पर काम करनेवाले गोपालकृष्ण शिपब्रेकिंग उद्योग, एसबेस्ट्स और कचरा प्रबंधन में घातक तकनीकि से उत्पन्न खतरों पर लगातार सक्रिय लेखन और आंदोलन कर रहे हैं. बैन एसबेस्टस नेटवर्क के संयोजक. जेएनयू में पब्लिक हेल्थ पर शोधरत.
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