गायब हुआ गुड़ तो मंहगी हो गयी चीनी
बहुत दिनों बाद ऐसा मौका आया जब चेला चीनी ने अपने गुरु गुड़ को कीमतों के मामले में फिर से शिकस्त दे दी है. इन दिनों खुदरा बाजार में गुड़ की कीमत 35 रुपये है जबकि चीनी 44-45 रुपये किलो बिक रहा है और बहुत जल्द 50 रुपये प्रति किलो बिकने की तैयारी में है.
बहुत पहले जब देश में चीनी मिलें कम थीं और गुड़ उत्पादित करने वाली भट्ठियां अधिक तब चीनी की कीमत अधिक हुआ करती थीं और सस्ता गुड़ गरीबों का आहार माना जाता था. मगर हाल के पंद्रह-बीस वर्षों में गुड़ की भट्ठियां कम हो गईं और चीनी मिलें हर जगह छा गईं, लिहाजा चीनी सस्ती और गुड़ महंगा हो गया था. मगर 2009 के आखिरी महीनों में चीनी ने ऐसी छलांग लगाई कि वह अपने गुरु से कीमतों के मामले में फिर से आगे निकल गया. अपने चेले से फिर पराजित होने के पीछे गुरु की गुरुता का कोई दोष नहीं है, वह तो अपनी कीमत पर ही टिका है. जहां था वहीं है. चीनी ने ही उछलते बाजार के सहारे छलांग लगाते हुए अपनी हैसियत बढ़ा ली है. मगर चीनी की इस उछाल के पीछे उसकी ताकत नहीं बल्कि मिल मालिकों की काली करतूत का असर है. मिल मालिकों को चीनी के उत्पादन में सिर्फ 25 रुपये किलो का खर्च आ रहा है, मगर कम उपलब्धता (पता नहीं प्राकृतिक या कृत्रिम) के कारण पर वह इसे थोक बाजार में 4000 रुपये प्रति क्विंटल (मिल गेट प्राइस) यानि 40 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रही है. यानि वह एक किलो चीनी पर 15 रुपये कमा रही है और सरकार नाहक कालाबाजारियों को बदनाम कर रही है.
अब जरा इस हिसाब को समझिये कि कैसे चीनी मिलों को चीनी की लागत पच्चीस रुपये किलो से भी कम ही पड़ती है. वस्तुतः चीनी मिलें फिलहाल 205 रुपये के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से प्रति क्विंटल गन्ना खरीदती है. चुकि आजकल गुड़ के भट्ठियां वाले किसानों को 250 रुपये प्रति क्विंटल अदा करने लगे हैं, इसे देखते हुए कुछ मिलों ने अपनी ओर से 15-20 रुपये प्रोत्साहन राशि भी देना शुरू किया है. इसके बावजूद किसी मिल को गन्ना की खरीद राशि 225 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक नहीं पड़ती. एक क्विंटल गन्ने से नौ किलो से कुछ अधिक चीनी तैयार होता है. इस हिसाब से मिल मालिकों को एक किलो चीनी की लागत 25 रुपये पड़ती है.
आप सवाल उठा सकते हैं कि इसमें उत्पादन लागत को नहीं जोड़ा गया है. तो इसका जवाब यह है कि एक तो उत्पादन व्यय इतना कम होता है कि यह 1 रुपये प्रति किलो भी नहीं पहुंचता, दूसरा हर चीनी मिल मालिक पिराई के बाद गन्ने के बचे अवशेष से बिजली उत्पादित करता है और गन्ने से ही एथेनॉल का निर्माण करता है. इससे एक तो उसे चीनी उत्पादन के दौरान बिजली का खर्च बच जाता है और उत्पादित बिजली को बेचकर वह बहुत कम लागत में अच्छा खासा मुनाफा कमाता है. इस लिहाज से देखा जाए तो चीनी मिलों के लिए चीनी उत्पादन की लागत आजकल 25 रुपये से भी कम बैठती है. फिर भी हम पच्चीस को मानकर चलते हैं. इस लिहाज से मिलों द्वारा गेट प्राइस 40 रुपये प्रति किलो या 4000 रुपये प्रति क्विंटल रखना कहां तक उचित है? गरीबों और आम लोगों के हित के नाम पर बनी यूपीए-2 सरकार मिलों की मुनाफाखोरी पर क्यों लगाम नहीं लगाती?
चीनी की कीमतों में हुई इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी के पीछे शीतल पेय, बिस्कुट, चाकलेट जैसे उत्पादों के निर्माताओं द्वारा आनन-फानन में की जा रही खरीद को बड़ा कारण बताया जा रहा है. ये कंपनियां इस खबर के कारण पैनिक में है कि चीनी की कीमतें 5 रुपये के पार भी जा सकती है. सरकार इस पैनिक पर रोक लगाने के पक्ष में शायद नहीं है, क्योंकि यही पैनिक मिल मालिकों के हित में है और मिल मालिक सरकार के हितों का ख्याल रख रहे हैं. इन आरोपों में कोई अतिश्योक्ति नहीं है, क्योंकि अगर सरकार इस मसले पर गंभीर होती तो सबसे पहले मिलों में उत्पादित चीनी के मूल्य और उसके वितरण पर लगाम लगाती. विवरेज कंपनियों की खरीद का कोटा तय करती और चीनी के राशनिंग की व्यवस्था कराती. मगर सरकार ऐसा कुछ नहीं कर रही. बस पिंड छुड़ाने के नाम पर हमारे मंत्री महोदय शरद पवार जी इस उधर की बातें कर रहे हैं, जिसका इस मसले से कोई लेना-देना नहीं है.
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देखें उदाहरण.
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5440904.cms
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