कर्नाटक पहुंचा कॉरपोरेट उपनिवेशवाद
अब कर्नाटक दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कम्पनी आर्सेलर-मित्तल के निशाने पर है। झारखण्ड और ओडीशा में सक्रिय स्थानीय जनप्रतिरोध के चलते उसके प्रस्तावित इस्पात संयन्त्रों के लिये ज़मीन मिलने में आ रही देरी, कठिनाई या अनिश्चितता की वजह से वह कर्नाटक में अपना जाल बिछा रही है। उसकी गिद्धदृष्टि वहां के उम्दा, बेशक़ीमती और दुर्लभ खनिज पदार्थों एवं प्राकृतिक संसाधनों पर है।
आखिरकार, आर्सेलर-मित्तल जैसे वैश्विक कॉरपोरेट समूह क्योंकर कर्नाटक में आक्रामक ढंग से घुसपैठ करने पर आमादा हैं। उसका मूल कारण है-अनेक खनिज पदार्थों और प्राकृतिक संसाधनों से उसका समृद्ध होना। देश में विद्यमान सर्वाधिक गुणवत्ता वाले कुल लौह अयस्क संसाधनों का 10 प्रतिशत कर्नाटक में है। सच कहा जाय, तो सर्वोत्तम प्रकार के लौह अयस्क संसाधनों की उपलब्धता की दृष्टि से ओडीशा (33 प्रतिशत), झारखण्ड (27 प्रतिशत) तथा छत्तीसगढ़ (19 प्रतिशत) के बाद कर्नाटक का ही स्थान है। इतना ही नहीं, देश में विद्यमान कुल मैग्नेटाइट (कम गुणवत्ता वाले) लौह अयस्क संसाधनों का एकमुश्त 74 प्रतिशत अकेले कर्नाटक के पास है। एस्वेस्टस, बॉक्साइट, क्रोमाइट, डोलोमाइट, ग्रेफ़ाइट, चीनी मिट्टी, चूना-पत्थर, मैग्नेसाइट, मैंगनीज़, गेरू, क्वार्ट्ज़ स्फटिक या काचमणि और सिलिका रेत (या बालू) कर्नाटक में भरा पड़ा है। यहां पर देश का अधिकांश फेल्साइट, मोल्डिंग सैण्ड (63 प्रतिशत) तथा फुच्साइट क्वार्टज़ाइट (57 प्रतिशत) मौजूद है। कर्नाटक में ग्रेनाइट चट्टानी क्षेत्र 4,200 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसलिये यह राज्य दुनिया भर में आलंकारिक ग्रेनाइटों के लिये प्रसिद्ध है। यहां पर सोने की खदानें भी हैं।
आर्सेलर-मित्तल ही नहीं, दक्षिण कोरियाई कॉरपोरेट समूह पोस्को भी कर्नाटक में अपना इस्पात संयन्त्र लगाने की जुगत में है। अनुमान है कि उसका प्रस्तावित संयन्त्र 40 से 60 लाख टन की वार्षिक क्षमता वाला होगा। टाटा मेटैलिक्स 30 से 50 लाख टन की वार्षिक क्षमता वाले इस्पात संयन्त्र की स्थापना के लिये ज़ोर आज़माइश कर रहा है। इस्सार स्टील 60 लाख टन की वार्षिक क्षमता वाले इस्पात संयन्त्र की स्थापना के लिये कटिबद्ध है। जेएसडब्लू स्टील अने चालू इस्पात संयन्त्र की क्षमता 90 लाख टन से बढ़ाकर 1 करोड़ 60 लाख टन करने की योजना पर अमल कर रहा है। दर असल बात यह है कि वैश्विक कॉरपोरेट महादैत्य कर्नाटक के सारे-के-सारे खनिज पदार्थों और प्राकृतिक संसाधनों पर क़ाबिज़ होना चाहते हैं।
इस समय लगभग 4 करोड़ 20 लाख टन लौह अयस्क संसाधनों का उत्खनन प्रति वर्ष कर्नाटक में हो रहा है। इनमें से 3 करोड़ टन का निर्यात हो रहा है और शेष 1 करोड़ 20 लाख टन जे एस डब्लू स्टील निगल रहा है। अनुमान है कि कर्नाटक में 1 अरब 20 करोड़ टन से ज्यादा लौह अयस्क है जिस पर आसुरी कॉरपोरेट शक्तियां एकाधिकार क़ायम करना चाहती हैं। कॉरपोरेट समूहों ने नये इस्पात संयन्त्रों की स्थापना अथवा जेएसडब्लू स्टील ने अपने चालू संयन्त्र की क्षमता बढ़ाने के लिये जो महत्त्वाकांक्षी प्रस्ताव रखे हैं अगर उन पर अमल होता है, तो राज्य में लौह अयस्क संसाधनों की लूट के लिये भीषण मारामारी मचेगी। खनन इतने बड़े पैमाने पर खतरनाक ढंग से होने लग जायेगा कि कर्नाटक की समूची खेतीबाड़ी, ग्रामीण आबादी और स्थानीय जनता की पुश्तैनी या परम्परागत रोज़ी रोटी पर मारक प्रहारों का सिलसिला चल पड़ेगा। कर्नाटक में जगह जगह पर माफिया घराने कुकुरमुत्ते की तरह उगेंगे जो कॉरपोरेट औपनिवेशिक तन्त्र की छतरी तले काम करेंगे, जिनकी राजसत्ता में भागीदारी रहेगी, जिनकी मौजूदगी सब दलों में होगी और जो सरकार व विपक्ष में रहकर देशी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों की चौतरफ़ा रखवाली या चौकीदारी करेंगे यानीजो उनके ज़रखरीद गुलामों की तरह व्यवहार करेंगे।
कर्नाटक में कॉरपोरेट उपनिवेशवाद के साम्राज्य विस्तार के लिहाज़ से बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का जाल बिछा हुआ है औन इन सुविधाओं में लगातार इजाफ़ा भी हो रहा है। लगभग 3,172 किलोमीटर लम्बा नेटवर्क( लगभग 3,973 किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राजमार्गों का संजाल( लगभग 9,829 किलोमीटर लम्बे (राज्य सरकार द्वारा निर्मित) मुख्य मार्गों का संजाल( न्यू मंगलौर पोर्ट जैसा बड़ा बन्दरगाह (10 अन्य बन्दरगाह) तथा 2012 तक राज्य सरकार द्वारा लगभग 2,381 किलोमीटर लम्बे मुख्यमार्गों के निर्माण की योजना अमल शुरू--ये है कर्नाटक में बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का एक मोटा ब्यौरा। कर्नाटक के साथ एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी जुड़ा हुआ है कि यहां पूर्वी घाट क्षेत्र और पश्चिमी घाट क्षेत्र विद्यमान हैं और इन दोनों क्षेत्रों का मिलन नीलगिरि की पर्वतश्रृंखला में होता है।
अगर कर्नाटक में देशी विदेशी कॉरपोरेट घरानों द्वारा खड़ी की जाने वाली इस्पात परियोजनाओं तथा उनके या उनके गुर्गों द्वारा जारी उत्खनन गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोका नही जायेगा, तो वहां के किसान, आम लोग, देशज समुदाय और स्थानीय ग्रामीण इलाक़े उजड़ते जायेंगे।
खेती किसानी की दृष्टि से कर्नाटक अत्यन्त सम्पन्न है। यहां तीनों ही फ़सलें होती हैं--खरीफ़, रबी और जायद। यहां की प्रमुख फ़सलें हैं--धान, रागी, ज्वार, मक्का, दलहन, तिलहन आदि। नक़दी फ़सलें भी यहां खूब होती हैं। अन्य फ़सलें हैं-कपास, गन्ना, हरी व लाल मिर्च, इलायची, काजू, नारियल, सुपाड़ी, तम्बाकू आदि। इतना ही नहीं, कर्नाटक देश भर में मोटे अनाजों, कच्चे रेशम और कॉफी का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। देशी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा खड़ी की जाने वाली मेगा परियोजनाओं से भारी संख्या में लोग अपनी ज़मीन और रोज़ी से विस्थापित होंगे, जिससे कर्नाटक में भीषण तबाही मचेगी।
(डॉ. कृष्णस्वरूप आनन्दी आजादी बचाओ आन्दोलन से जुड़े समाजकर्मी एवं लेखक है)
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