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बिहार में बदल गये अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्धांत

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बिहार ने विकास दर का जादुई आंकड़ा छू लिया. किसी को यकीन नहीं. कोई यह मानने को तैयार नहीं कि बिहार जैसे राज्य में विकास में किसी को विश्वास नहीं है. चारों ओर बिहार में विकास के आंकड़ों को स्वीकार करने की बजाय उस पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. आइये समझते हैं कि बिहार ने विकास की दहाई का जादुई आंकड़ा छुआ कैसे?

अर्थशास्त्र के सिद्वान्तों को मानें तो बिना उद्योग-धंधों के विकास के, किसी भी प्रदेश की विकास की बात करना बेमानी है। आमतौर पर माना जाता है कि विकास की प्रथम सीढ़ी कृषि के क्षेत्र में विकास का होना होता है। विकास का रास्ता खेतों से निकल कर के ही कल-कारखानों के आंगन तक जाता है। उसके बाद ही वह सेवा क्षेत्र की ओर रुख कर पाता है। बीमारु राज्य के रुप में पहचाने जाने वाले बिहार में 2004-09 के दौरान जादुई तरीके से विकास हुआ और इसने 11.03 फीसदी के दर के आंकड़े को आसानी से प्राप्त कर लिया। भारतीय सांख्यिकी संगठन ने जब इस रपट को सार्वजनिक किया तो पूरा देश अविश्वास और आश्चर्यभरी मिश्रित प्रतिक्रिया से लबरेज हो गया। दूसरे प्रदेशों खासकर विकसित राज्यों के लिए यह लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐतिहासिक और क्लासिकल सिद्धान्त के अनुसार अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्धांत के तरीके के अलावा किसी दूसरे तरीके से विकास नहीं हो सकता है। जैसा कि हम जानते हैं विभाजन के बाद से ही बिहार कल-कारखानों और बेशकीमती खनिज पदार्थों दोनों से महरुम रहा है।

उद्योग-धंधों, बिजली और अन्य संसाधनों की कमी से जूझते हुए बिहार के लिए सिर्फ कृषि के बलबूते पर विकास के 11.03 फीसद जैसे ऊंचे दर को प्राप्त करना मुश्किल था। कृषि के अलावा इस विकास में सेवा क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, होटल-रेस्त्रां और संचार की क्रांति के योगदान को भी हम कम कर के नहीं आंक सकते हैं। विकासशील देशों को छोड़ दें तो विकसित देशों के विकास में सेवा क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है। पर पिछड़े प्रदेशों में ऐसा होना सम्भव नहीं हो पाता है। फिर भी बिहार ने इस मिथ को बदला है और साथ ही विकास के वाहकों में हो रहे बदलाव की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। सही प्रकार से औद्योगीकरण की बयार कभी भी बिहार में बह नहीं पाई। फिर भी वहां सेवा क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ। यह अर्थशास्त्र के मापदण्डों के जरुर खिलाफ है, पर है एकदम सच। सेवा क्षेत्र में विकास का ही नतीजा था कि बिहार में कृषि और कुटीर उद्योगों के विकास को बल मिला। संचार और निर्माण क्षेत्र में भी इसी वजह से विकास हुआ।

थोड़ा आश्चर्यजनक लेकिन सच है कि मनीआर्डर उद्योग ने भी इस पूरे कवायद में अपनी सकारात्मक भूमिका निभायी है। प्रवासी बिहारियों ने देश ही नहीं विदेशों में  भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ये प्रवासी बिहारी अपने परिवारों को मनीआर्डर के जारिये पैसा भेजते हैं, जिससे निर्माण क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है। यह विकास निजी और सार्वजनिक दोनों स्तरों पर गति पकड़े हुए है। परिणामत: सीमेंट और स्टील उद्योग को इससे फायदा पहुंच रहा है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में स्टील और सीमेंट क्षेत्र में विकास की गति इसके कारण भी सामान्य रही है।

बिहार में, सेवा क्षेत्र के विकास में संचार क्रान्ति का योगदान 17.4 फीसदी है। आज पूरे देश में मोबाईल धारकों की संख्या तकरीबन 500 मिलियन हो गई है। मोबाईल के क्षेत्र में थ्री जी सुविधा की भी जल्द ही शुरुआत होने जा रही है। बिहार के दूर-दराज के गांवों में भी मोबाईल की पहुंच हो गई है। यह रोजगार का एक विकल्प बनकर पूरे देश में उभरा है। मोबाईल और इसके सिम को खरीदने और बेचने का कार्य गांवों में जोर-शोर से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि इससे वर्तमान में वे अपनी आमदनी का 60 फीसदी आय अर्जित करते हैं। बिहार के ग्रामीण जनों ने इस विकल्प का जम कर फायदा उठाया है। उन्होंनें इसका इस्तेमाल अपने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए भी की है। इतना ही नहीं वे इसके जरिये अपनी जानकारी को भी बढ़ा रहे हैं। बाजार पर उनकी इसके माध्यम से हमेशा नज़र रहती है।

बिहार में विकास के बरक्स में यह कहना होगा कि निश्चित रुप से अब बिहार में स्वरोजगार के प्रतिशत में तेजी से इजाफा हुआ है। सरकारी नौकरी के अलावा अब बिहारी निजी क्षेत्र में जाने के अलावा स्वरोजगार पर भी अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। बिहार में विकास की स्थिति के ऊपर किये गये हालिया सर्वेक्षण से स्पष्ट हो गया है कि अब वहां के विकास में स्वरोजगार का योगदान 40-50 फीसदी है और बिहार में आये इस बदलाव का ही नतीजा है कि बिहार में विकास दर तेजी से बढ़ रहा है। अर्थशास्त्री भी बिहार में टूटते अर्थशास्त्र के मानकों पर हैरान हैं। रिसर्च की जरुरत पर जोर दिया जा रहा है। जबकि इन सबसे अनजान अभी भी बिहार में बैंकिग सुविधाओं से वंचित वर्ग को बैंकिग सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। मोबाईल बैंकिग की सुविधा का विस्तार हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि बिहार में संचय की प्रवृति को बल मिल रहा है। बेरोजगारी के काले बादल तेजी से छीज रहे हैं। लोगों में जागरुकता भी आ रही है। विकास के अन्यान्य विकल्पों को भी वहां अपनाया जा रहा है। बड़े कल-कारखानों की जगह कुटीर उद्योग पर ध्यान दिया जा रहा है।

और आखिर में लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात. बिहार में विकास लगभग शून्य पर जा पहुंचा था. ऐसे में अगर पिछले चार सालों में बिहार का पुनर्निर्माण शुरू हुआ है तो वह शून्य से सीधे दहाई पर ही दिखाई देगा. हो सकता है आनेवाले सालों में इसमें कमी आये लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार ने अपने विकास का जो बीड़ा उठाया है वह उसे जारी रखेगा.

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abhishek ranjan singh on 18 January, 2010 23:34;58
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satish sir aapa lekh padha kafi rochak aur gyanparak laga...aaj sach me bihar pragati ke path per agrasar hai....ek behtar sashan dene se jyada nithish ji me bihar me ek system hone ka ehsas karaya...system anushashan ka dushra naam hai.....aur shayad ye bihar me nitish ne kar dikhaya....kamyabi ek din me nahi milta......uske liye musalsal kosish karni parti hai.....sir aapse aisse hi lekh ki aage bhi ummid karta hoon.......subhkamnaon sahit
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narhari on 20 January, 2010 15:56;57
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aur detail batayen
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Jeet Bhargava on 31 January, 2010 04:23;01
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सार्थक और सकारात्मक लेख. कृपया इसे जारी रखे. अब तो प्रतिभावान और पुरुषार्थी बिहार लालू-राबडी राज की काली छाया से बाहर निकल चुका है इसलिए उसका विकास होना भी अवश्यम्भावी है. इसके लिए नितीश कुमार और सुशील मोदी बधाई के पात्र हैं.
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image सतीश सिंह लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
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