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रेल बजट में कैसे समाये देश?

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64 हजार किलोमीटर से अधिक का रेल नेटवर्क और प्रतिदिन 17 हजार ट्रेनों के द्वारा हर साल करीब छह अरब लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचानेवाली भारतीय रेलवे आखिरकार क्या है? एक परिवहन सेवा प्रदाता कंपनी या फिर एक सरकारी मंत्रालय? आप भी यही कहेंगे कि यह एक रेल सेवा प्रदाता संस्थान है जो भारत सरकार में एक मंत्रालय के रूप में काम करता है. क्योंकि यह सबसे बड़ा मंत्रालय है इसलिए सिर्फ रेलमंत्री को ही यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपना बजट अलग से प्रस्तुत करे.

ममता बनर्जी ने भी यही किया. भारत में रेलमंत्री जब मंत्रालय का बजट जनता दरबार में प्रस्तुत करता है तो उसके सामने हमेशा ही दोहरी चुनौती होती है. एक उद्यम को कैसे लाभ में संचालित रखा जाए लेकिन इसका सामाजिक उत्तरदायित्व भी बना रहे. ममता बनर्जी का वर्तमान बजट भी अगर आप पढ़ेंगे तो साफ तौर पर उनके बजट के तीन चार हिस्से दिखाई देंगे. एक हिस्सा कर्मचारियों के कल्याण से जुड़ा है जो निश्चित रूप से रेलवे के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि रेलवे में 14 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं. दूसरा हिस्सा, रेलवे की सेवा योजनाएं, आय व्यय का व्यौरा और लाभ हानि के लिए गुणा गणित का लेखा जोखा है. तीसरा हिस्सा, मालभाड़े की ढुलाई, औद्योगिक गतिविधियों का है और चौथा हिस्सा रेल यात्रियों के लिए योजनाएं, सुविधाओं आदि से जुड़ा है. आमतौर पर पूरा रेल बजट इन्हीं चार भागों में विभक्त दिखाई देता रहा है.

इस बार अपने बजट में ममता बनर्जी ने रेल कर्मचारियों के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उल्लेख किया है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण दो योजनाएं हैं. एक, सभी कर्मचारियों के लिए आवास व्यवस्था को सुनिश्चित करना जिसे रेलवे शहरी विकास मंत्रालय के साथ मिलकर अगले पांच साल में पूरा करेगा और दूसरा है, कर्मचारियों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए प्राथमिक जांच केन्द्र से लेकर बहुउद्देश्यीय अस्पताल बनाने तक की घोषणा की गयी है. ऐसे कुल 522 प्राथमिक स्वास्थ्य जांच केन्द्र और सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल खोले जाएंगे. इसके साथ ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ मिलकर केन्द्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय भी स्थापित किये जाएंगे ताकि रेल कर्मचारियों के बच्चों को बेहतर भविष्य मिल सके. रेलवे में काम करनेवाली 80 हजार महिलाओं के लिए भी कई सुविधाओं की घोषणा ममता बनर्जी ने की है. लेकिन इन घोषणाओं से आम आदमी का क्या लेना देना? शायद कुछ नहीं. कोई भी कंपनी या सेवा प्रदाता संस्थान अपने कर्मचारियों के लिए कोई कार्य करता है तो सेवा लेने वाले व्यक्ति को उससे कोई खास मतलब नहीं होता है. वैसे भी भारत सरकार सिर्फ अपने कर्मचारियों के लिए ही काम करती है. रेल बजट का बड़ा हिस्सा अपने कर्मचारियों की भलाई के लिए उठाये जानेवाले कदमों से भरा है लेकिन इसकी सार्वजनिक समीक्षा का कोई तुक नहीं है क्योकि इसका सेवा का उपयोग करनेवाले व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

दूसरा बड़ा हिस्सा रेलवे के आय व्यय से है. रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि इस साल रेलवे एक हजार करोड़ से अधिक के फायदे में है. इस पैसे का उपयोग रेलवे के विकास में किया जाएगा. रेलवे जो आय व्यय का हिसाब देती है वह थोड़ा जटिल है. सबसे अव्वल सवाल तो यही है कि इसे किसी सार्वजनिक क्षेत्र की ईकाई का लाभ हानि मानें या फिर आम आदमी से जोड़कर देखें? इसका सही जवाब तो कोई बहुत बड़ा विशेषज्ञ ही दे सकता है लेकिन लाभ हानि का गुणा गणित भी रेलवे का अपना आंतरिक मामला है. इसका सार्वजनिक रूप से प्रभाव जरूर पड़ता है लेकिन इसका सार्वजनिक रूप से कुछ लेना देना नहीं है. मसलन, रेलवे अपनी आय को कैसे समायोजित करेगी इसे रेलवे खुद ही तय करता है. वह कितना पैसा रेलवे कर्मचारियों के कल्याण पर खर्च करेगी और कितना पैसा रेलवे विकास पर खर्च करेगी इसका फैसला वह खुद ही करती है. बिल्कुल उसी तरह से जैसे कोई कंपनी अपनी कमाई का समायोजन करती है. इस बार भी रेल मंत्री ने कई सारी योजनाओं का उल्लेख किया है जो रेलवे की परिवहन क्षमता में इजाफा करेगी. इसलिए इस बारे में भी समीक्षा करना सार्वजनिक रूप में कोई बहुत तर्क का विषय नहीं है.

तीसरा बड़ा हिस्सा रेलवे की औद्योगिक गतिविधियों से है. रेलवे देश में माल ढुलाई का सबसे बड़ा जरिया है. यह सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को न केवल प्रभावित करती है बल्कि उसके संचालन में निर्णायक भूमिका निभाती है. रेलवे बजट में हमेशा से मालगाड़ी को तीसरे दर्जे का ही विषय माना जाता रहा है और इस बार भी उसे उठाकर दोयम दर्जे पर भी कर दिया गया हो ऐसा नहीं है. वेस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कारीडोर के लिए अगले महीने एमओयू साईन होगा और उस पर काम शुरू होगा. यह कारीडोर बनेगा तो देश में औद्योगिक गतिविधियों को फायदा पहुंचेगा. इसके साथ ही रेल मंत्री ने देश के सभी महत्वपूर्ण पोर्ट को रेल नेटवर्क से जोड़ने की बात कही है. निश्चित रूप से यह भी एक अच्छा सराहनीय काम होगा. लेकिन अभी भी माल ढुलाई करनेवाली गाड़ियों को रेल परिचालन में वह प्राथमिकता शायद नहीं मिलती है जिसकी वे हकदार हैं. अगर रेल विभाग इस दिशा में प्रयोग करे तो उसको उसकी उम्मीद से बहुत अधिक कारोबार मिल सकता है. मसलन देश में नयी तरह की माल ढुलाई का चलन बढ़ रहा है जिसमें एसी वैगन की मांग से लेकर मोटर गाड़ियों के परिवहन तक की अनंत संभावनाएं हैं. संभवत: यहां आकर रेलवे एक सरकारी पीएसयू की तरह सोचने लगती है और जो है, जितना है उसी को समायोजित कर लेने को अपनी बहादुरी मान लेती है. बजट का यह हिस्सा हमेशा की तरह कमजोर ही बना हुआ है.

चौथा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां नागरिकों का सीधे रेल से वास्ता पड़ता है. इस दिशा में रेलवे कल भी भी फिसड्डी था आज भी है और शायद हमेशा ही रहेगा. यह किसी एक रेल बजट का सवाल नहीं है. यह सेवा के प्रति सेवा प्रदाता के दृष्टिकोण का सवाल है और रेलवे का पूरा परिचालन बाबुओं के हाथ में है. खुद ममता बनर्जी ने अपने बजट भाषण में माना है कि हम रेल नेटवर्क का उस तेजी से विस्तार कर पाये हैं जिसकी दरकार है. उनकी मजबूरी है कि रेलवे में सारा निवेश खुद करना होता है इसलिए जितना कर सकते हैं कर रहे हैं. और कर क्या रहे हैं? औसतन हर साल तीन सौ किलोमीटर नई रेल लाईन जोड़ लेते हैं. अब रेलमंत्री चाहती हैं कि इसमें गति लाई जाए और अगले दस साल में 25 हजार किलोमीटर नई रेल लाईन जोड़ी जाए. इस महत्वाकांक्षी घोषणा का बजट भाषण में कोई आधार नहीं है लेकिन उन्होंने घोषणा तो कर दी है. अगर ऐसा हो जाता है तो 2020 तक भारत चीन से बड़ा रेल नेटवर्क वाला देश हो जाएगा. इसके साथ ही सरकार हाईस्पीड ट्रेनों के परिचालन को लेकर गंभीर है और वह देश के चुनिंदा शहरों को आपस में तेज गति ट्रेनों के जरिये जोड़ना चाहती है. पड़ोसी देश चीन यह काम अगले दो साल में पूरा कर लेगा. कम से कम रेलमंत्री ने अपने बजटीय भाषण में एक पैरा इस योजना को जगह दी यही बहुत है. लेकिन उम्मीद कम है कि इस दिशा में तेज गति से कुछ होगा. नागरिक सुविधाओं के बारे में भी रेल विभाग ढोल जरूर पीटता है लेकिन करता कुछ खास नहीं है. आज भी राजधानी गाड़ी में यात्रा करते हुए भी आपकी दाल बेस्वाद हो या फिर प्लेटफार्म पर भिनभिनाती मक्खियों के साथ बैठकर इंतजार करना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं. रेलवे अपने कर्मचारियों के लिए जितना तत्पर और त्वरित है, अपने यात्रियों के लिए उतना ही ढीला और लेटलतीफ है.

ऐसे में रेल बजट का जो हिस्सा सीधे जनता से जुड़ता है वह हमेशा नई ट्रेन शुरु करने और पुरानी ट्रेन के फेरे बढ़ाने तक सिमट कर रह जाता है. रेलवे के सामने अब चुनौती रफ्तार की है. तेजी से विकसित होते भारतीय शहरों और गांवों के बीच तेज रफ्तार और सुविधायुक्त सेवा यह वक्त की जरूरत हैं. फिलहाल यह बजट इस बारे में सिर्फ एक अथारिटी बनाने से अधिक कुछ बोलता नहीं है. इसलिए सार्वजनिक हित के लिए इसकी समीक्षा करने पर कुछ खास हाथ में नहीं आता है. बाकी रेल बजट रेलवे का अपना लेखा जोखा है, जिससे आपको कुछ लेना देना है?

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