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वित्तमंत्री जी, कृपया ध्यान दीजिए

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आम आदमी की कीमत पर प्राप्त की गई विकास दर क्या जायज है? हमारी राष्ट्रीय आय तो 7-8 प्रतिशत के बीच बढ़ने की उम्मीद है मगर देश में कृषि जगत का विकास 3 प्रतिशत से भी नीचे रहने की आशंका है, ऐसा क्यों? क्या गरीबों की थाली से अन्न गायब कर डेब्ट-जीडीपी दर को कम करना एक सही रणनीति है? ऐसे में निश्चय ही इस बार प्रणब मुखर्जी पर वित्तीय घाटा और महंगाई के बीच सामंजस्य बिठाने का दबाव रहेगा।

इस बार वर्ष की शुरुआत से ही वित्त-मंत्रालय में बजट को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। दरअसल, इस वर्ष का आम बजट कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट होगा। साथ ही सरकार के सामने पिछले वर्ष की तरह विश्वव्यापी आर्थिक मंदी जैसी कोई वैश्विक समस्या भी नहीं है। आज सरकार के सामने बढ़ती महंगाई, बढ़ता वित्तीय घाटा, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को लागू करना, किसानों को सही समर्थन मूल्य न मिलना जैसी घरेलू समस्याएं हैं। मगर सरकार इस असमंजस में जरूर है कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से निपटने के लिए इसने नवंबर 2008 में जो आर्थिक राहत लागू किए थे, उसे जारी रखा जाए या नहीं। समय से पहले इस आर्थिक राहत पैकेज को खत्म करने से राष्ट्रीय विकास की गति धीमी होने की आशंका है। किसानों को लेकर सरकार विशेष तौर पर असमंजस में है। क्योंकि आर्थिक मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन करने पर हमारी आय में वृद्धि होती है, मगर वही प्रदर्शन जब कृषि जगत में होता है तो यह हमारी आय में परिलक्षित नहीं होता। इस कारण वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 6 जनवरी को कृषि जगत से जुड़े लोगों से बजट के प्रारूप को लेकर सलाह-मशविरा भी किया।

फिलहाल सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या वित्तीय घाटा को कम करना है। चालू वित्त वर्ष का बजट पेश करने के दौरान सरकार ने मंदी को ध्यान में रखते हुए वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.8 प्रतिशत रहने की आशंका जताई थी। यह सरकार द्वारा वर्ष 2003-04 में जारी ‘फिस्कल रेस्पांसबिल्टि एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट’ के अंतर्गत वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत तक लाने के लक्ष्य से बहुत ज्यादा है। अप्रैल-सितंबर 2009 के दौरान हमारी कर वसूली में पिछले वर्षों की तुलना में 25 प्रतिशत की कमी आई है। इस दौरान पूरे वर्ष के लक्ष्य का 35 प्रतिशत निगम कर ही प्राप्त हो सका है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले 6 महीनों में हमारी आय पूरे वित्त वर्ष के लक्षित आय का 39 प्रतिशत ही है। इस अवधि के दौरान डॉलर मूल्य में हमारे आयात में 33 प्रतिशत की कमी आई, जबकि निर्यात में 29 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यानी इस वर्ष लक्ष्य से कम सरकारी आय लगभग तय है।

ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि जब सरकार की आय में कमी आएगी तो सरकार आम आदमी को राहत पहुंचाने वाले लोक-कल्याणकारी कार्य कैसे करेगी? आय कम होने की स्थिति में नरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण स्वरोजगार योजना, जवाहर रोजगार जैसी योजनाओं पर खर्च होने वाले रुपए कहां से आएंगे? वित्तीय घाटा में वृद्धि सीधे-सीधे इन मदों पर होने वाले खर्च में कमी करने के लिए सरकार पर दबाव बनाएंगी। गौरतलब है कि वित्तीय घाटा ज्यादा होने पर हमारी डेब्ट-जीडीपी रेशियो में लगातार वृद्धि हो रही है। यदि यह अनुपात 5.5 से अधिक हो गया (जो फिलहाल 5 के आसपास है) तो हम विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेने के हकदार भी नहीं रह जाएंगे। इसके अतिरिक्त देश में स्थानीय निवेशकों के पलायन का खतरा भी बढ़ जाएगा। विदेशी निवेशकों की बात तो छोड़ ही दें।

इसलिए यह बेहद जरूरी है कि सरकार अपने व्यय की मदों पर ध्यान दे और जहां तक हो सके उसे कम करने की कोशिश करे। मगर इतने से काम नहीं चलेगा। अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिलने लगे हैं। इसलिए इसे नवंबर 2008 में जारी किए गए उदारवादी आर्थिक नीतियों पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। उदारवादी आर्थिक नीतियों की समाप्ति का सीधा मतलब है कि मंदी से पहले के दौर में पहुंचना। वैसे भी भारत में मंदी का कोई खास असर नहीं हुआ, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था कोई निर्यातोन्मुखी अर्थव्यवस्था नहीं है। हमारे घरेलू बाजार में निर्यात की वस्तुओं को खपाने की क्षमता थी और इसने खपाया भी। यानी मंदी के कारण निर्यात में जो कमी आई उसकी भरपाई घरेलू बाजार ने कर दी। आने वाले समय में जब अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुधार होने और मंदी समाप्त होने की बात की जा रही है तो भारत इससे अछूता कैसे रह सकता है? इसमें सबसे महत्वपूर्ण उस आर्थिक पैकेज की समाप्ति है जो सरकार ने इस दौरान शुरू किया था। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार को केंद्र और राज्य के बीच आय के बंटवारे को भी नए तरीके से परिभाषित करना चाहिए। इस कार्य में ‘गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स’ को लागू करना एक सही कदम हो सकता है, जिसकी सिफारिश तेरहवें वित्त आयोग ने भी की है। आने वाले बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को लंबी अवधि वाले कारपोरेट बौंड पर भी विचार करना चाहिए, ताकि देश के आर्थिक विकास को यथावत~ बनाए रखने के लिए आधारभूत ढांचा तैयार करने हेतु घरेलू बाजार से पूंजी उपलब्ध कराई जा सके।

इसके अतिरिक्त वित्त मंत्री को महंगाई पर काबू पाने के लिए भी ठोस उपाय इस आम बजट में करने होंगे। पिछले एक वर्ष में महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ी है, उससे आम आदमी त्रस्त है। लगभग बारह महीने पहले घरेलू बाजार में 100 रुपए में जितना खाद्य पदार्थ मिल सकता था, उतनी खाद्य सामग्री के लिए आज लोगों को 135 से 140 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। 19 दिसंबर 2009 को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार खाद्य वस्तुओं की बात करें तो इनके मूल्य में पिछले वर्ष की अपेक्षा लगभग 19.95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह पिछले 11 वर्षों में सर्वाधिक है। आम आदमी चावल, दाल, आलू और प्याज के बिना अपने भोजन की कल्पना नहीं कर सकता। इन चारों अनिवार्य उपभोक्ता वस्तुओं के दाम पिछले एक साल में आसमान छूने लगे हैं। आलू का मूल्य पिछले एक साल में बढ़कर दोगुना से भी ज्यादा हो गया है। जबकि प्याज के दाम में लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दालों की कीमत भी पिछले एक साल में लगभग 42 प्रतिशत बढ़ी है। चावल के मूल्य में भी इस दौरान करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस एक साल में दूध और चीनी के दामों में भी जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है।

खाद्य पदार्थों की बजाए अगर हम प्रसंस्करित खाद्य पदार्थों यानी मन्युफैक्चर्ड फूड प्रॉडक्ट्स की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। जिस अवधि में खाद्य पदार्थों की कीमत में 19.95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, उस अवधि में मन्युफैक्चर्ड फूड प्रॉडक्ट्स की कीमतों में रिकार्ड 24.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़े थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर हैं। यदि हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर आंकड़ों का पुनर्निधारण करें तो महंगाई का दानव और भी विकराल दिखेगा। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उपभोक्ता को मिलने वाली सामग्री उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को प्रभावित करती है, थोक मूल्य सूचकांक को नहींं। इसलिए महंगाई को मापने का वर्षों पुराना सरकारी तरीका जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक बौद्धिक हथकंडा मात्र है।

लेकिन इस महंगाई के जिम्मेदार आसमानी हैं या सुल्तानी या फिर दोनों? यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब जनता को मिलना जरूरी है। दरअसल इस महंगाई के पीछे इस वर्ष देश के उत्तरी भाग में पड़ने वाला सूखा है तो दक्षिणी भाग में होने वाली भारी बारिश। इन कारणों की वजह से हमारे यहां खाद्यान्न उत्पादन में कमी आई। इससे बाजार में मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पा रही है और खाद्यान्नों की कीमत आसमान छू रही हैं। चूंकि थोक मूल्य सूचकांक में लगभग 65-75 प्रतिशत उपभोक्ता वस्तु खाद्य वस्तु ही हैं। इसलिए खाद्य पदार्थों के मूल्य में वृद्धि के कारण आज मुद्रास्फीति भी काफी बढ़ गई है। लेकिन सरकार के पास गोदाम में पर्याप्त अनाज मौजूद है। आसमानी कारणों से यदि हमारे खाद्यान्न उत्पादन में कमी आई तो सरकारी गोदाम से अनाजों को बाजार में क्यों नहीं छोड़ा गया? यदि ऐसा किया गया होता तो बाजार में मांग-आपूर्ति का अनुपात बना रहता और आम जनता इस कमरतोड़ महंगाई से बेवजह जूझने से बच जाती। थोड़ी बहुत गड़बड़ी सरकारी वितरण प्रणाली में भी है जिसमें सरकार के अलावा कोई और हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

इसके अतिरिक्त घरेलू बाजार में पूंजी की अतिरिक्त तरलता ने भी महंगाई की आग में घी का काम किया। सरकार चाहती तो इस तरलता को कम कर सकती थी। मगर उसने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे घरेलू बाजार में पूंजी की अतिरिक्त तरलता कम होती। वह रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और नकद आरक्षी अनुपात में बढ़ोतरी कर सकती थी। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

दरअसल सरकार चाहती थी कि घरेलू बाजार में अनिवार्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में वृद्धि हो। यदि ऐसा नहीं था तो नवंबर माह में मौद्रिक नीति की घोषणा के साथ ही वह बाजार में पूंजी की तरलता को पूरी तरह से काबू में रखने के प्रयास करती। वह केवल स्टैट्युटरी लेंडिंग रेट (एसएलआर) ही क्यों बढ़ाती? वह रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और नकद आरक्षी अनुपात में भी वृद्धि कर सकती थी। भारतीय रिजर्व बैंक के इस फैसले पर कई स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने भी आपत्ति जताई थी। उन्हें यह आशंका थी कि सरकार महंगाई को बढ़ने का मौका दे रही है ताकि वह जनता की क्रयशक्ति को आधार बनाकर सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाकर पेश कर सके। क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि का मतलब विकास की गति तेज होना भी है। साथ ही सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि का मतलब डेब्ट-जीडीपी दर में कमी आना भी है।

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