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बजट भाषा की परिभाषा

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बजट के दौरान कुछ शब्द अनिवार्य रूप से प्रयोग किये जाते हैं जो अर्थव्यवस्था के हालात बताते हैं. इन शब्दों का क्या अर्थ होता है, आइये समझने की कोशिश करते हैं-

अनुदान मांग: यह संचित निधि से खर्च होनेवाली राशि का अनुमान होता है जिसे लोकसभा की मंजूरी की दरकार होती है. आम तौर पर हर मंत्रालय या विभाग के लिए अलग अनुदान मांग होती है.

केन्द्रीय योजना: योजना के लिए सरकार का बजटीय समर्थन केन्द्रीय योजना कहलाता है.

योजनागत खर्च: केन्द्रीय योजना, राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों की योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार की सहायता के लिए आवंटित राशि योजनागत खर्च की श्रेणी में आती है.

गैर योजनागत खर्च: इसमें राजस्व के साथ साथ पूंजीगत खर्च भी शामिल होता है. मसलन, ब्याज का भुगतान, कुल रक्षा खर्च, सब्सिडी, डाक, पुलिस, पेंशन, आर्थिक सेवाएं, सरकारी कंपनियों को दिये गये कर्ज के अलावा राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों और दूसरे देशों को दिया जानेवाला कर्ज इसमें शामिल होता है.

पूंजीगत खर्च: जमीन, इमारत, मशीनरी आदि पर किया गया खर्च पूंजीगत खर्च के तहत आता है. शेयरों में निवेश, किसी सरकारी कंपनी को दिया गया कर्ज भी पूंजीगत खर्च की श्रेणी में आता है.

पूंजीगत प्राप्तियां: आमजन से जुटाये गये कर्ज जिन्हें बाजार कर्ज कहा जाता है, ट्रेजरी बिलों के जरिए भारतीय रिजर्व बैंक या अन्य पक्षों से ली गयी उधारी, विदेशी संस्थानों या सरकारों से लिया गया कर्ज और केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों, केन्द्रशासित प्रदेशों और अन्य पक्षों को दिये गये कर्ज की प्राप्ति शामिल होती है. विनिवेश के जरिए जुटाई गयी रकम भी इसी के तहत आती है.

पूंजीगत बजट: यह पूंजीगत प्राप्तियों और भुगतान का लेखा-जोखा होता है. साथ ही सार्वजनिक खाते का भी इसमें रिकार्ड होता है. इसके दो हिस्से होते हैं. एक, पूंजीगत प्राप्तियां और दूसरा पूंजीगत खर्च.

प्राथमिक घाटा: राजकोषीय घाटे और ब्याज भुगतान के बीच का अंतर प्राथमिक घाटा कहलाता है.

मौद्रिक घाटा: सरकार की उधारी पूरा करने का इसके तहत आता है. भारतीय रिजर्व बैंक सरकार की जरूरत के लिए नोट की छपाई करता है.

राजकोषीय घाटा: यह राजस्व प्राप्तियों के साथ साथ कुछ निश्चित गैर ऋण पूंजीगत प्राप्तियों के साथ साथ कुल खर्च का अंतर होता है. यह सभी स्रोतों से सरकार के लिए उधारी भी तय करता है.

राजस्व खर्च: सरकारी विभागों को चलाने में आनेवाला खर्च, सब्सिडी पर खर्च और सरकारी कर्जों पर किये जाने वाले ब्याज भुगतान राजस्व खर्च के तहत आता है. इसमें सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और कार्यालयों के खर्च भी शामिल होते हैं.

राजस्व प्राप्तियां: इसमें सरकार द्वारा नयी ड्यूटी और करों का उल्लेख होता है. साथ ही केन्द्र सरकार के निवेश पर ब्याज और डिविडेन्ट को भी शामिल किया जाता है. सरकारी सेवाओं के बदले शुल्क और अन्य प्राप्तियां राजस्व प्राप्ति के तहत आती है.

व्यय बजट: इसमें सरकार के पूंजीगत खर्च और राजस्व खर्च दोनों का उल्लेख होता है. इसमें दोनों तरह के खर्चों को जोड़कर एकसाथ प्रस्तुत किया जाता है.

वित्त विधेयक: इसमें नये करों का जिक्र होता है. साथ ही मौजूदा कर व्यवस्था में कोई कोई संशोधन या फिर मौजूदा कर व्यवस्था को उसकी मियाद से आगे बढ़ाने का फैसला लिया जाता है. वित्त विधेयक को भी बजट के साथ साथ ही संसद की मंजूरी भी लेनी होती है.

विनियोग विधेयक: संसद की मंजूरी के लिए सरकार इसे सदन के पटल पर रखती है और संचित निधि से खर्च के लिए पूंजी की व्यवस्था करती है.

संचित निधि: सरकार को हर तरह से होनेवाली आय संचित निधि में जमा होती है. सरकार के सभी तरह के खर्च भी इसी निधि में जमा किये जाते हैं जिसके लिए संसद की मंजूरी अनिवार्य होती है.

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सोनू on 26 February, 2010 16:57;14
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आपने जिन पदों की परिभाषा दी है अगर उन्हें वर्णक्रम में जँचा देते तो अच्छा होता।
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