भविष्य के भारत की ओर पहला बजट
वित्त वर्ष 2010-11 बजट प्रस्तुत होने से पहले आम आदमी की परिभाषा दाल रोटी से जोड़ी जा रही थी. लेकिन बजट आया तो आम आदमी की जगह शहर के वे लोग आ गये जो एक घर और गाड़ी का सपना देखते हैं. अपने बजटीय प्रावधान में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं वह उस आम आदमी को सचमुच राहत देनेवाली हैं जिनका रोना अब तक विपक्षी दल और मीडिया का एक हिस्सा रो रहा था. फिर अचानक ही प्रणव मुखर्जी का बजट आम आदमी का विरोधी कैसे हो गया?
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी जब बजट भाषण पढ़ने के लिए खड़े हुए तो उनके एक ओर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बैठे तो दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी. सत्ता और पार्टी के मध्य खड़े होकर बजट प्रस्तुत करते समय शुरूआत में ही उन्होंने बजट की दिशा के बारे में बता दिया. प्रणव मुखर्जी ने कहा- "एक समर्थ सरकार अपने नागरिकों के जरूरत की प्रत्येक वस्तु सीधे तौर पर वितरित करने का प्रयास नहीं करती है. बल्कि वह एक ऐसी सशक्त व्यवस्था तैयार करती है जिससे व्यक्तिगत उद्यमशीलता और सृजनशीलता फले फूले. सरकार समाज के लाभ से वंचित वर्गों की मदद करने और सेवाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान केन्द्रित करती है. बजट की यही आम अवधारणा आज मेरे भाषण का आधार है."
प्रणव मुखर्जी ने केवल अपने बजट भाषण की शुरूआत ही यहां से नहीं की बल्कि आगामी वित्तीय वर्ष के लिए उनकी समस्त घोषणाएं और योजनाएं इसी के इर्द गिर्द घूमती नजर आती हैं. उन्होंने प्रत्यक्ष तौर दो महत्वपूर्ण कार्य किया है. एक, उस उद्यमशील वर्ग के लिए कर ढांचे में राहत प्रदान कर दी है जो शहर में रहता है और वर्तमान अर्थव्यवस्था में लाभ के पद पर कहीं न कहीं विराजमान है. टैक्स में कटौती की घोषणा के साथ ही उसके लिए एक बड़ी राहत हो गयी क्योंकि यह वर्ग अपनी सुविधा के लिए पाई पाई उड़ा सकता है लेकिन कर देने के सवाल पर तरह तरह के बहाने बनाता है. कर ढांचे में ढील से इस वर्ग द्वारा जो पैसा कर के रूप में सरकार के पास पहुंचता था वह बाजार में पूंजी की तरलता कायम करेगा. इससे बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा और उस घाटे की भरपाई होगी जो मंहगाई के कारण पूरे बाजार को उठानी पड़ रही है. हालांकि सरकार के इस कदम से प्रत्यक्ष करों के रूप में उसे 26,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा. फिर भी अगर प्रणव मुखर्जी ने बाजार को संभालने के लिए यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया तो फिर उनका विरोध क्यों हो रहा है? लेकिन प्रणव मुखर्जी ने सिर्फ इतना ही नहीं किया है. उन्होंने अपने भाषण के अगले चरण में एक सटीक टिप्पणी की है कि एक जटिल अर्थव्यवस्था का प्रबंधन बहुत कठिन कार्य है. जब वित्तमंत्री यह बात बोलते हैं तो उनका सीधा आशय यही होगा कि एक ओर तथाकथित आधुनिक विकास की चमक-दमक को बनाये रखना और दूसरी और परंपरागत भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना बहुत मुश्किल काम है.
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने सचमुच ऐतिहासिक बजट प्रस्तुत किया है. जैसे 91 में मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तुत बजट का कारपोरेट घरानों ने स्वागत किया था और देश में उदारीकरण के शुरूआत का ढिंढोरा पीटा था, ऐसे ही यह बजट देश में ऐसी अर्थव्यवस्था की ओर प्रस्थान का संकेत है जहां विदेशी निवेश तो होगा लेकिन देशी पूंजी का अनादर नहीं होगा. जहां, डॉलर तो होगा लेकिन रूपये की पहचान भी गायब नहीं होगी. जहां उर्जा और उद्योग की नयी परिभाषाएं होंगी, जहां बड़े उद्योग तो होंगे लेकिन छोटे उद्योगों का खात्मा नहीं होगा. जहां, शहर की चमक दमक तो होगी लेकिन गांव उठकर शहर में बसने के लिए आने से पहले थोड़ा सोचेगा. प्रणव मुखर्जी का यह बजट भविष्य की नयी अर्थव्यवस्था की ओर साफ संकेत है जो विकास की अभी तक की समझ को शायद पूरी तरह से उलट देगा.
वित्तमंत्री के जिस एक वाक्य पर पूरा विपक्ष उठकर सदन से बाहर चला गया वह यह कि वे क्रूड आयल से हटाये गये अधिभार दोबारा लगा दिये जाएंगे और एक्साइज ड्यूटी में भी एक रूपये की बढ़ोत्तरी कर दी. इसका परिणाम यह होगा कि पूरे देश में पेट्रोल और डीजल लगभग पौने तीन रुपये हो जाएगा. इसके साथ ही वित्तमंत्री ने कोयले पर पचास रूपये टन के लिहाज से अतिरिक्त कर लाद दिया है. बजट पर सरकार की आलोचना करनेवाला विपक्ष और मीडिया दोनो ही मान रहे हैं कि अगर पेट्रोल और डीजल मंहगे होंगे तो न केवल परिवहन मंहगा होगा बल्कि बिजली भी मंहगी होगी. ऐसा कहनेवाले बजट को संकीर्णता और भूमंडलीकरण के चश्में से देख रहे हैं. इन लोगों को क्या यह मालूम नहीं है कि दुनिया में पर्यावरण में हो रहे बदलावों को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है जिसमें भारत सरकार भी शामिल है. भारत के बजट इतिहास में संभवत: पहली बार ऐसा हुआ है कि गैर परंपरागत उर्जा पर इतना विस्तार से ध्यान दिया गया है. भविष्य में उर्जा के विभिन्न विकल्पों पर जब सारी दुनिया गंभीरता से सोच विचार कर रही है तो भारत पीछे कैसे रह सकता है? गैर परंपरागत उर्जा मंत्रालय आज भले ही एक अदना सा मंत्रालय हो लेकिन भविष्य में यह भारत सरकार का सबसे ताकतवर मंत्रालय बनने जा रहा है क्योंकि आज हम जिन्हें उर्जा का साधन मान रहे हैं वे खात्मे की ओर हैं. और वित्तमंत्री ने फिलहाल किया क्या है? पेट्रोल, डीजल और कोयले के दाम में बढ़ोत्तरी की है. इससे फर्क क्या पड़ेगा? पेट्रो उत्पादों के प्रति रुझान कम होगा. विकल्प की तलाश शुरू होगी और विकल्प के रूप में गैर परंपरागत उर्जा स्रोतों पर वित्तमंत्री जमकर ध्यान दिया है और प्रावधान भी किया है. कुछ ऐसा ही रुख उन्होंने उर्वरकों को लेकर अपनाया है. उर्वरकों, खासकर यूरिया की बढ़ती खपत को कम करने के लिए उन्होंने यूरिया को मिलने वाली सब्सिडी घटाई है. अब अगर कोई यह कहे कि सरकार किसानों का ध्यान नहीं दे रही है तो उसे फिर आगे से कभी यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि यूरिया के अतिशय प्रयोग से खाद्यान्न जहर हो गये हैं. कहीं न कहीं से अगर यूरिया के प्रयोग को हतोत्साहित करना है तो उसकी कीमतों में इजाफा ही एकमात्र सुगम रास्ता है. अब इसकी भी आलोचना करने का क्या तुक है? वित्तमंत्री ने बजट में न केवल पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी का ऐलान किया है बल्कि गाड़ियों की कीमतों में बढ़ोत्तरी होगी. बजट की घोषणाओं के बाद लगभग हर कार कंपनी ने गाड़ियों की कीमतों में दो से पांच हजार बढ़ोत्तरी का ऐलान कर दिया है. क्या केवल इसी आधार पर प्रणव मुखर्जी के बजट को प्रतिगामी करार दे दिया जाना चाहिए?
असल में तो वित्तमंत्री ने अपने पूर्ववर्तियों से उलट साहस करके कारपोरेट घरानों को कम से कम फायदा पहुंचानेवाला बजट प्रस्तुत किया है. उन्होंने न केवल सामाजिक निवेश में भरपूर बढ़ोत्तरी की है बल्कि बड़े उद्योगों के कारण हाशिये पर चले गये छोटे और लघु उद्यमियों को दोबारा उठने के लिए शुरूआती प्रयास किये हैं. वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि छोटे और मझोले उद्योगों को मदद पहुंचाने के लिए वे 2400 करोड़ रुपये का प्रावधान कर रहे हैं क्योंकि यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें सीधे तौर पर छह करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है. पिछले बीस सालों में जितने भी बजट आये हैं वे बड़े उद्योगों को फायदा पहुंचानेवाले रहे हैं लेकिन पहली दफा ऐसा हो रहा है कि बड़े उद्योगों के लिए शुरूआती संकट पैदा करने के साथ ही छोटे उद्योगों को दोबारा पनपने का मौका दिया जा रहा है. हालांकि यह एकदम से अचानक एक बजट में नहीं हो जाएगा लेकिन कम से कम वित्तमंत्री ने शुरूआत तो कर दी है. वित्तमंत्री ने हालांकि बड़े उद्योगों के प्रतीक एसईजेड की तारीफ जरूर की है लेकिन उसके लिए अलग से कोई घोषणा नहीं है. ऐसा नहीं है कि वित्तमंत्री ने बड़ी परियोजनाओं की ओर से पूरी तरह से मुंह मोड़ लिया है लेकिन इतना साफ दिख रहा है कि शहरीकरण के लिए अपने पूर्ववर्तियों की तर्ज पर गांव को उजाड़ने का अघोषित ऐलान नहीं किया है और न ही आधारभूत ढांचे के विकास से अपने हाथ खींचे है. लेकिन उन्होंने पहली बार मनोरंजन उद्योग और टेक्नालाजी द्वारा पैदा की जा रही संभावनाओं को भविष्य के उद्योग का आधार बनाकर एक खाका जरूर खींचा है. वैसे भी पूरी दुनिया में औद्योगीकरण की परिभाषा बदल रही है. भविष्य की दुनिया में जिसे उद्योग कहा जाएगा उससे भारत भी अलग नहीं रह सकता. वित्तमंत्री ने अपने इस बजट में भविष्य के औद्योगिक स्वरूप, उर्जा स्रोतों और खेती किसानी का खाका खींचने की कोशिश की है.
फिर प्रणव मुखर्जी की निंदा और भर्त्सना क्यों की जा रही है? उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के लिए खजाने का मुंह खोल दिया है. सामाजिक निवेश को बेतहाशा बढ़ाया है और आम जन के लिए स्वास्थ्य तथा शिक्षा के लिए उदार होकर धन खर्च करने का ऐलान किया है. सबको स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने पिछले साल के 26 हजार 800 करोड़ के बजटीय प्रावधान को बढ़ाकर 31,036 करोड़ कर दिया है और जनस्वास्थ्य के लिए पिछले साल बजटीय प्रावधान 19,534 करोड़ के प्रावधान को बढ़ाकर 22,300 करोड़ कर दिया है. गांव में सरकारी निवेश को बढ़ाया गया है और आम आदमी के लिए सामाजिक पूंजी निवेश बढ़ाकर 1,37,634 करोड़ किया गया है जो कुल बजटीय प्रावधान का 37 प्रतिशत होगा. यह पैसा केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत खर्च किया जाएगा. क्या इसलिए वित्तमंत्री की आलोचना होनी चाहिए कि वे अपने बजट का सबसे बड़ा हिस्सा गांवों पर खर्च कर रहे हैं और आदमी को राहत पहुंचाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? हालांकि इन सबके बावजूद गांवों और आम आदमी को खुश करने के साथ साथ उद्योग जगत के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को वे भूले नहीं है. लेकिन संभवत: उदारीकरण के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब वित्तमंत्री ने केवल सर्व समावेशी बजट की बात ही नहीं की है उस दिशा में पहल भी की है. लेकिन जैसा होता रहा है पेट्रोल पर एक रूपये एक्साइज की बढ़ोत्तरी को विपक्ष ने मुद्दा बनाया तो मीडिया ने गाड़ियों की कीमतों में वृद्धि और बिजली के मंहगी हो जाने की संभावना को ही मंहगाई का आधार बना लिया. प्रणव मुखर्जी ने जो बजट प्रस्तुत किया है अगर इसी का आगे विस्तार होता रहा तो निश्चित रूप से उदारीकरण के उलट सर्वसमावेशी विकास को आधार मिल सकेगा. यह तात्कालिक तौर पर आम आदमी का बजट हो न हो, भविष्य के भारत का पहला बजट जरूर है. दुर्भाग्य से इस बजट के इस स्वरूप को देखने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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bhaia hamare pas rangeen chashma nahi hai. aapke tark bekar hain . hum kisano ko is swiss bank bharne walo ki sarkar se koi umeed thi hi nahi. jab tak hamari jamin aquire nahi hoti SEZ , HIGHWAY, ya commission khane ke liye hone wale vikas karyo ke liye tabhi tak mahnga diesal, urea dal lenge par bhavishya ka bharat VIDARBH,BUNDELKHAND, hoga yahi budget keh raha hai. hamara saubhagya hai ki aap jaise mitra mile jo hamare marne par RANGEEN chashma utar kar ro lenge.
लोग भूल रहे हैं कि भारत पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव है जिसके लिए जरूरी है कि वह वैकल्पिक उर्जा स्रोत की ओर अग्रसर हो. बजट में ही कुछ विरोधाभास भी दिखते हैं लेकिन फिलहाल यह बड़े बदलाव का संकेत है. हम माने न माने सरकार ने अपने स्तर पर शुरूआत कर दी है.
प्रणब मुखर्जी गरीब लोगों का पैसा अमीरों में बांटने में लगे है (कर छूट भी उन्हें मिली है जिनकी सालाना आमदनी 3 लाख से ज्यादा है), और यह सब वो कर पा रहे हैं क्योंकि आप जैसे स्पान्सर्ड पत्रकार उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं. वरना इस बजट पर तो वह चीत्कार उठनी चाहिये की वित्त मंत्रालय थर्रा उठे.
प्रणब मुखर्जी से आशा कम है... आप तो शर्म करिये
Yes, the budget is balanced but what Pranab has done on 26 Feb 2010 is what the time today allowed him to do. It could not have been done earlier and anyone in his place would have done something like this, give or take a couple of percentage points.
दाल और शककर की बढ़ोतरी में न हो। इसके गंभीर प्रयास किए जाएँ तो न ही विदर्भ का किसान आत्महत्या करेगा और न ही आम आदमी को 19-20 फीसदी मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ेगा। यह काम यदि सरकार आने वाले वर्ष में करे जोकि उसका मुख्य बजट होगा। 1 दिन के बजट से कुछ हासिल होने वाला या खोने वाला मुझे तो कुछ नहीं लगा। यह कदम राज्य और केंद्र सरकार दोनों मिलकर उठाएँ।
carbon utsarjan kam karne ke liye bharat ke kisan ka marna bahut jaroori hai kyoki ye dhan ki kheti karta hai, gou palan karta hai, kheto main aag lagata hai, isi liye aapke aadardeey pranav ji ne hamare marne ka pukhta intejam kiya hai. par hum to doobenge sanam tumko bhi le doobenge.
2-fruits vegetable preservation ko badhava dene se Pepsi jaisi company sab jagah tamater bua degi aur apne rate par khareed kar consumerism ko badhava degi isme kisan ka koi sthan nahi hoga.
3-oilseeds and pulses ke zone banaye jayenge . kaise? nakshe par lal pen se line kheech kar koi videshi company karooro rupaye le jayegi jaise rice export zone bana kar le gayi.
4- agri climatology par bhi alocation hai. jo videshi techniques hai vo bharat main kamyab nahi hai yaha kisan mausam ke sath kheti karna janta hai DESI techniques ko badhawa dena tha.
5-Food park main chaumine, dosa bikega aur kuchh nahi.
6- kya tobacco products ka rate har sal badhane se upyog kam hua hai ? UREA ka rate badhane se uska upyog kam nahi hoga. input cost badhegi
7- Diesal mahanga hogaya ELECTRICITY hai nahi Irrigation cost badhegi.
8-kisano ko karjadar banane par jor hai .kisan credit card bhi trasfer entry ki bimari ka shikar ho chuka hai .(sal main ek bar pura loan chukana padta hai agle din nikal sakte hai iske liye dalalo ki foj paida ho chuki hai.
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