लीजिए, एक और किसान हितैषी बजट
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण का आखिरी वाक्य देखिए. वे कहते हैं- "यह बजट आम आदमी से जुड़ा है. यह किसानों, कृषि कारोबारियों, उद्यमियों और निवेशकों से जुड़ा हुआ है." अरे, एक और किसान हितैषी बजट आ गया. पिछले दस सालों के बजट बाद के संपादकीय पढ़िये. आपको हर संपादकीय में एक बात जरूर दिखाई देगी कि किसानों और कृषि के उत्थान के लिए सरकार ने नये सिरे से प्रयास किये हैं. हमारी मीडिया के लिहाज से हर बार बजट में वित्त मंत्री किसानों के लिए अच्छी अच्छी खबरें लेकर आते हैं.
लेकिन हमारी मीडिया शायद ही कभी इस बात का उल्लेख करता हो कि भीमकाय होते कारपोरेट जगत को सरकार कितनी और किस मात्रा में सब्सिडी देती है. केवल इसी साल, बजट में बड़े कारपोरेट घरानों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 5,00,000 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया है. अर्थात हर हर घण्टे कारपोरेट घरानों के लिए 57 करोड़ की सब्सिडी, अर्थात हर मिनट लगभग एक करोड़. बड़े कारपोरेट घरानों को यह फायदा पिछले साल के मुकाबले 70 फीसदी ज्यादा है क्योंकि पिछले बजट में यह छूट हर घण्टे 30 करोड़ के लिहाज से बैठती थी. इसलिए हो सकता है कि किसान हितैषी की बात संपादकीय में प्रूफ की गलती से चली जाती हो और हर बार कारपोरेट की बजाय गलती से किसान शब्द चला जाता हो. लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह बजट कारपोरेट किसान हितैषियों द्वारा तैयार किया गया है और यह केवल उन्हें ही फायदा पहुंचाएगा.
वित्तमंत्री के बजट भाषण शुरू होने से पहले कुछ टेलीविजन चैनलों ने यह सवाल उठाना शुरू किया कि क्या प्रणव मुखर्जी एक राजनीितज्ञ की तरह व्यवहार करेंगे या फिर इण्डिया इंक. के सीईओ की तरह? इन चैनलों का संकेत साफ था. वित्तमंत्री जी को भारत के सीईओ की तरह ही व्यवहार करना चाहिए, एक राजनीतिज्ञ के रूप में देश के नागरिकों की सेवा से उन्हें बचना चाहिए. इस सवाल का अनुपूरक सुझाव देखिए. वित्तमंत्री का बजट भाषण क्या बाजार की पूंजी को बढ़ायेगा या फिर उसे नष्ट करेगा? और वित्तमंत्री ने इन समाचार चैनलों की किसी आशंका को जाया नहीं जाने दिया. वे कारपोरेट हितैषी बजट पढ़ने में कामयाब हुए. कारपोरेट घरानों को उन्होंने उम्मीद से बढ़कर दिया. वित्तमंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की बजाय पहली बार निजी क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की ड्राइवर सीट पर बैठाने का भी श्रेय हासिल कर लिया.
लेकिन हम वित्तमंत्री जी के बजट के उस हिस्से पर नजर डालते हैं जिसमें वे कृषि के लिए चार रणनीतिक घोषणा करते हैं. इसमें सबसे पहला है- कृषि उत्पादन. इसका मतलब कुछ खास नहीं है. बाकी के तीन प्रावधान कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचानेवाले हैं. मसलन, एक प्रावधान यह किया गया है कि उत्पादों के वेस्टेज को कम करने की कोशिश की जाएगी. इसका मतलब यह है कि अब बड़ी कंपनियों को मौका मिलेगा कि वे भंडारण के लिए अपने भंडारघर बना सकेंगे. साथ ही वित्तमंत्री जी यह भी कहते हैं कि वे "किसानों के लिए ऋण" मुहैया कराएंगे. इसका अर्थ है कि देश के अंबानी और गोदरेज जैसे किसान अगर मुंबई जैसे शहर में स्टोरेज की बर्बादी को दूर करने के लिए कोई कोल्ड स्टोरेज बनाते हैं तो इन किसानों को बाकी किसानों की दर पर ही ऋण उपलब्ध करवाया जाएगा. इतने पर ही वित्तमंत्री जी रूके नहीं है. वे और आगे बढ़ते हैं. किसानों के नाम ऋण मात्रा बढ़ाई जाएगी लेकिन उसे उन किसानों को नहीं दिया जाएगा जो ऋण चुकाने की बजाय आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं. यह पैसा नये कारपोरेट किसानों को बांटा जाएगा. बजट में इसके लिए जो प्रावधान किये गये हैं उसकी बानगी देखिए-"ईसीबी पालिसी के तहत आधारभूत ढांचा विकास की परिभाषा में बदलाव कर दिया गया है." सरकार सिर्फ बात ही नहीं कर रही है. 10 और 25 करोड़ की राशि के रूप में कारपोरेट किसानों को ऋण का आवंटन शुरू भी कर दिया गया है. आपको यहां यह भी जानना चाहिए कि जहां एक ओर करोड़ों में लोन लेनेवालों की संख्या बढ़ रही है वहीं आर रामकुमार और पल्लवी चह्वाण ने अपने अध्ययन में पाया है कि साल 2000 से 2006 के बीच 25,000 से कम के लोन लेनेवालों की संख्या में कमी आयी है.
वित्तमंत्री का बजट हमसे वादा करता है कि वे 2000 से अधिक आबादी वाले हर गांव में बैंकिंग सुविधाओं को पहुंचाने का पूरा प्रयास करेंगे. लेकिन अभी तक की हकीकत जरा उलटी है. 1993 के बाद ग्रामीण इलाकों में बैंक ब्रांचों की संख्या में कमी आयी है वह भी तब जबकि ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि दर्ज की गयी है. अगर बजट में की गयी किसानी की नयी परिभाषा को समझें तो ये बैंक ब्रांच निजी क्षेत्र के बैंकों द्वारा खोले जाएंगे. यह बात तब और समझ में आ जाएगी जब आप वित्तमंत्री के स्टेट आफ द आर्ट इन्फ्रास्टक्चर बनाने की दलील इसके साथ जोड़ दें. अब इस तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर कौन बना सकता है यह बताने की जरूरत शायद नहीं है. हमारे वित्तमंत्री जी ने कारपोरेट घरानों के लिए गांव के दरवाजों को पूरी तरह से खोल दिया है जिनकी न तो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में कोई रुचि है और न ही वे लाभ के इतर कुछ सोचना चाहते हैं.
आम आदमी के नाम समर्पित इस बजट में आम किसानों के लिए ऋण चुकाने के लिए अतिरिक्त सब्सिडी का प्रावधान करने की बात कही गयी है. यह उस प्रयास का हिस्सा है जिसके तहत 2008 में 70 हजार करोड़ का किसान ऋण माफी का ऐलान किया गया था. दशकों बाद सरकार ने किसानों के लिए ऋण माफी की ऐसी कोई घोषणा की थी. लेकिन इसके साथ ही सरकार ने कारपोरेट घरानों के साथ भी पूरा न्याय किया है. इस बजट में टैक्स फायदों के रूप में उन्हें 80,000 करोड़ रूपये का फायदा पहुंचाया गया है. पिछले साल यह 66,000 करोड़ रुपया था, उसके पहले 62,000 हजार करोड़. अगर कारपोरेट घरानों को सरकार द्वारा पहुंचाये गये फायदे का आंकलन करें तो पिछले 36 महीनों में सरकार प्रत्यक्ष तौर पर 2,08,000 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचा चुकी है. अगर पिछले दो दशक से जारी लूट और हड़प का हिसाब करें तो कारपोरेट घरानों को प्रत्यक्ष तौर पर किसानों की ऋण माफी के कोई पंद्रह गुना अधिक फायदा पहुंचाया जा चुका है. अकेले इसी साल वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कारपोरेट घरानों को एक्साइज ड्यूटी में 1,70,765 करोड़, कस्टम ड्यूटी के रूप में 2,49,021 करोड़ के फायदे के साथ ही प्रत्यक्ष तौर पर 80,000 करोड़ की माफी शामिल है. सब जोड़ लीजिए. आपको पता लगेगा कि इस बजट में वित्तमंत्री जी ने कोई 5,00,000 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया है.
फिर भी हमारा मीडिया, बुद्धिजीवी समाज और तथाकथित विशेषज्ञ वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के बजट को संतुलित बजट बता रहे हैं. क्या हम इन्हें ताकतवर लोगों के स्टेनोग्राफर की संज्ञा दे दें तो कुछ गलत होगा?
(पी साईंनाथ देश के जाने माने पत्रकार हैं और वर्तमान में द हिन्दू में बतौर कृषि संपादक कार्यरत हैं.)
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