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आइये समझें अर्थ का शास्त्र

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बहुत सारे लोग अनिल सिंह को अनिल रघुराज के नाम से जानते हैं. किसी दौर में आर्थिक पत्रकार के तौर पर दिल्ली में झंडा गाड़नेवाले अनिल सिंह मुंबई गये तो अनिल रघुराज के रूप में ब्लागिंग शुरू की. मुस्कुराते हुए बात करतें हैं और बात करते हुए बीच बीच में खांसते हैं. उन्हें खांसने का कोई रोग नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि यह उनका स्टाइल है. बोलते बहुत धीरे हैं लेकिन जो बोलते हैं वह समझा हुआ सा लगता है इसलिए मन में बहुत सारे सवाल जवाब नहीं आते हैं. ऐसे ही अनिल सिंह उर्फ अनिल रघुराज ने अपनी एक वेबसाइट शुरू की है- अर्थकाम.

भारतीय जीवन परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा से आप कतई अपरिचित नहीं होंगे और इस बात से आप इत्तेफाक रखते ही होंगे कि जहां दो व्यवस्थाएं व्यक्ति की आंतरिक उन्नयन के लिए हैं वहीं दो व्यवस्था बाहर की प्रगति को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त हैं. यहां यह भी समझ लेना चाहिए कि धर्म का आशय वह धर्म नहीं है जिसे हम आज धर्म कह रहे हैं. अर्थ का आशय वह अर्थ नहीं है जिसे आज हम अर्थशास्त्र समझ रहे हैं. हां, काम और मोक्ष के बारे में आप जो समझ रहे हैं उसका आशय आज भी वही है. योगवशिष्ठ में राम ने गुरू वशिष्ठ को संसार का सार समझना चाहा तो वशिष्ठ ने उन्हें कहा कि इच्छा का विस्तार ही संसार है. हम जो कामना करते हैं उसका जो भी विस्तार होता है वही हमारा संसार हो जाता है. हमारा मोक्ष भी इसी कामना से ही निर्धारित होता है. अगर हमारी कामना सम्यक है तो मोक्ष है. अगर सम्यक नहीं है तो आवागमन का चक्र चलता रहेगा. कर्मबंधन से आखिर कौन पीड़ित नहीं है?

लेकिन अन्य दो विधान धर्म और अर्थ रहस्यपूर्ण हैं. धर्म का अर्थ सामाजिक व्यवस्था है. भारत में धर्म का अर्थ उपासना पद्धति मात्र समझने से बहुत सी दिक्कतें हो जाएंगे. ऐसे में आप धर्मग्रंथ पढ़ते हैं तो आपको यह समझना मुश्किल होता है कि आप धर्मग्रन्थ पढ़ रहे हैं या फिर अपना इतिहास. धर्म ऐसी सामाजिक व्यवस्था का नाम है जो शासन की बजाय अनुशासन के आधार पर काम करती है. समय के साथ इसका आशय बदलकर मात्र टीका रोली चंदन तक सिमट गया है लेकिन मूल में तो यह एक सामाजिक व्यवस्था ही है. इसका अपना सामाजिक अनुशासन है, उस अनुशासन के आधार पर विकसित सामाजिक प्रशासन है. उस सामाजिक प्रशासन के आधार पर विकसित आर्थिक संरचना है. उस आर्थिक संरचना के आधार पर विकसित सामाजिक संरचना का विकास है. इस धर्म में अंदर और बाहर का पूरा विकास शास्त्र रूप में विद्यमान है. लेकिन क्या हम कभी उस शास्त्र को पकड़ने की कोशिश करते हैं?

अनिल रघुराज की आर्थिक समझ को समझते हैं तो ऐसा लगता है कि उन्होंने इस पुरूषार्थ चतुष्टय के एक पुरुषार्थ अर्थ को समझने की कोशिश की है. अर्थ का संधि विच्छेद संस्कृत के विद्वान करके उसमें धातु और प्रत्यय की व्याख्या करें लेकिन अर्थ की सटीक परिभाषा वही हो सकती है जो समाज को समग्रता में समाहित करती हो. अर्थात अर्थशास्त्र वह जो समाजशास्त्र पर टिका हो. लेकिन नये तरह के अर्थशास्त्र ने नया ही इतिहास लेखन कर दिया है. नया अर्थशास्त्र समाज पर टिकने की बजाय समाज को अपने पर टिकाने की दिशा में काम कर रहा है. मांग की आपूर्ति करने की बजाय आपूर्ति की क्षमता के लिहाज से मांग पैदा कर रहा है. इस अनर्थशात्र को ही अर्थशास्त्र या फिर इकोनोमी कहकर हमारे दिमाग में ठूंस दिया जाता है और हम इस अनर्थशास्त्र में इतने उलझ जाते हैं कि अर्थ तक पहुंच ही नहीं पाते. अनिल सिंह पहुंचे हुए दिखाई देते हैं.

उन्होंने जब अर्थकाम शुरू किया था उससे पहले वे एक आर्थिक अखबार में काम कर रहे थे. उन्होंने आर्थिक अखबार को हर रोज एक बात समझाने की कोशिश की कि अर्थशास्त्र की विषयवस्तु हिन्दी में वह नहीं हो सकती जो अंग्रेजी में चल रही है. हिन्दी का पाठक वर्ग अंग्रेजी वाले अर्थशास्त्र से अछूता है ऐसा नहीं है लेकिन उसकी जरूरतें, प्राथमिकताएं, समझ और जानकारी बिल्कुल अलहदा हैं. अखबार ने उन्हें आश्वस्त किया था कि हम ऐसा ही प्रयोग करेंगे कि आर्थिक अखबार हिन्दी समाज का प्रतिनिधित्व करता दिखाई दे. लेकिन जैसा कि तय था, न उनको ऐसा करने दिया गया और न ही वे ऐसा कर सके. पत्रकारिता की नौकरी में मनमाफिक काम जिस तरह की हताशा पैदा करती है वह हताशा बहुत जल्द अनिल रघुराज के मन में भी आ गयी. लगभग दो दशक की पत्रकारिता के बाद इतना तो समझ में आ गया था कि लोगों को आदमी नहीं मशीन चाहिए. भारतीय पत्रकारिता के सामने यह दुर्भाग्य इसलिए भी है कि हमारा एजेण्डा हम खुद तय नहीं करते हैं. हमारा एजेण्डा कोई और तय करता है और हम सिर्फ उसे फालो करते हैं. आर्थिक अखबारों के मामले में तो यह 101 प्रतिशत सच्चाई के रूप में सामने आती है. अनिल रघुराज ने ऐसे ही वक्त में अपने अर्थ की समझ को खुद से प्रयोग करने की ठानी.बेवसाइट बनायी- अर्थकाम.

कई दफा उनकी इस वेबसाइट को पढ़ते हुए अर्थ की बारीकियां इतने मोटे तौर पर समझ में आ जाती हैं कि हैरानी होती है कि करोड़ों अरबों का कारोबार करनेवाले हमारे मीडिया घरानों को रिपोर्टिंग का यह अंदाज क्यों नहीं सूझता? आखिर वे हमें कौन सी भाषा में कौन सा ज्ञान दे रहे हैं कि पढ़नेवाले को ही समझ में न आये? लेकिन उन अखाबारों और टीवी चैनलों की वे जाने क्योंकि उनका एजेण्डा कहीं और से सेट हो रहा है. अनिल जी ने जो प्रयोग किया है वह निश्चित रूप से हिन्दी की आर्थिक पत्रकारिता के राह में मील पत्थर गाड़ेगा. उन्हें भी शायद इस बात का अंदाज नहीं होगा कि इस छोटे से प्रयोग से हिन्दी में आर्थिक पत्रकारिता को पटरी पर आने में बड़ी मदद मिलेगा. उन्हें तो धन्यवाद है ही लेकिन उस इंटरनेट को उनसे ज्यादा धन्यवाद जो ऐसी प्रतिभाओं से मिलने का मौका दे रही है. अन्यथा चिरौंजीलाल नुमा लालाओं ने लंबे समय तक पूंजी के दम पर प्रतिभाओं को कुंठित करने का ही काम किया है.

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मैथिली गुप्त on 23 April, 2010 17:26;02
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अनिल जी को बहुत बहुत शुभकामनायें.
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Sanjeet Tripathi on 24 April, 2010 00:40;36
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anil ji ko unke blog par lambe samay se padhte aa raha hu, is naye prayog ke liye unhe badhai aur shubhkamnayein...
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सोनू on 24 April, 2010 09:31;05
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चलिए आप ख़ुद भी इस वेबसाइट को पढ़ा करेंगे तो अच्छा है। उदाहरण के लिए आपने और प्रेम शुक्ल ने नीचे दिए लिंक को पढ़ा होता तो "स्वेट शेयर" को "स्वीट शेयर" ना लिखते:

बिना स्वेद की स्वेट इक्विटी
http://goo.gl/lgpH
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सोनू on 24 April, 2010 18:16;55
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दरअसल आपसे या किसी से भी हर विषय की जानकारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन मुझे लगता है कि आप लोग मिलजुल कर कम ही लिखते हैं। मैं देखता हूँ कि न्यूज़रूम के मार्के वालों के अलावा ऐसे लेख काफ़ी कम हैं जिनकी बायलाइन में "विस्फोट न्यूज़ नेटवर्क" लिखा हो या एक से ज़्यादा बंदों के नाम हों। जैसे अच्छा होता कि स्वेट शेयरों के प्रसंग में अगर आप अनिलजी से कुछ पूछते, तब वे फट से कोई लिंक भेज देते या कंपनी अधिनियम की मुनासिब धारा पढ़वा देते। बाक़ी आपको पत्रकारिता का ढंग बताना मेरा ढीठपन ही होगा।
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Jitendra Dave on 25 April, 2010 02:35;07
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हिन्दी में आर्थिक पत्रकारिता का खालीपन बहुत सता रहा था. ऐसे में अनिलजी का यह प्रयास स्वागत योग्य है. ईश्वर उनको सफलता दे. और हाँ, उनके अर्थाकाम को पढ़कर हमारी माली हालत भी सुधर जाए! शुभकामनाएं.
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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