मंहगाई की मनमोहनी मार
मंहगाई-मंहगाई के इस खेल में फायदे में रहेंगे मनमोहन और उनकी तिकड़ी तथा वे ताकतें ( बहुराष्ट्रीय निगम) जिनके लिए मंहगाई बढ़ाई जा रही है और घाटे में रहेगी इस देश की आम जनता, यूंपीए गठबंधन और गठबंधन की प्रमुख घटक कांग्रेस क्योंकि मनमोहन और उनकी तिकड़ी के नीतियों की वजह से कांग्रेस का हाथ बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ है, देश के आम आदमी के नहीं । इसका हिसाब आम आदमी चुनाव में जरूर लेगा किन्तु हिसाब लेने में अभी चार साल बाकी है सो मंहगाई फ़िलहाल कम होगी यह उम्मीद करना दिवास्वप्न ही है ।
इसे सरकार का वित्तीय कुप्रबंधन कहा जाय या पूजीपतियों को मुनाफा कुटने हेतु भरपूर मौका देने के लिए सोची-समझी रणनीति? लगातार बढ़तीं मंहगाई के कारण देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गई है. इसी आर्थिक आपातकाल के बीच हमारे उर्जामंत्री सुशील कुमार शिंदे ने एलान कर दिया है कि देश में गैस की कीमत २० प्रतिशत बढाई जायेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को कैबिनेट की बैठक में प्राकृतिक गैस की कीमत ३२०० रूपये प्रति एमएससीएम से बढ़ाकर दुगने से भी ज्यादा ६८१८ रूपये प्रति एमएससीएम कर दिया अब अगर गैस की कीमत बढ़ी है तो बिजली की कीमत भी बढ़ेगी, बिजली की कीमत बढ़ने से मंहगाई अपने आप बढ़ेगी । अतः आम आदमी को मंहगाई से फ़िलहाल राहत नहीं मिलने वाली है ।
जब मंहगाई को लेकर सरकार के भीतर कर्मचारियों में हो-हल्ला मचा तो सरकार ने बड़ी ही चालाकी से छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का संकेत देकर आंतरिक विरोध से बच निकली। सरकारी कर्मचारियों को तो राहत मिल गई लेकिन आम आदमी सरकार प्रायोजित इस मंहगाई से बच नहीं पाया । सरकार वैश्वीकरण को भी मंहगाई का कारण बता रही है यह कुछ हद तक सही भी है पर वैश्वीकरण की नीतियां लागू किसने की ? देश की मौजूदा सरकार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर रही है।
मंहगाई नें मांग और आपूर्ति के सिद्धांत को धत्ता बता दिया है। सामान्यतया जब बाजार में किसी वस्तु या खाद्यान की मांग अधिक और आपूर्ती काम होती है तो वस्तु या खाद्यान की कीमतें बढती है। किन्तु इस मनमोहनी मंहगाई पर यह नियम लागू नहीं हो रहा है। यह आश्चर्यजनक है कि बाजार में वस्तुए अथवा खाद्यान पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है आप जितना चाहें उतना खरीद सकते है बावजूद इसके वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे है इससे इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि वस्तुओं की आपूर्ती कहीं से भी बाधित नहीं है तो फिर मंहगाई का जिम्मेदार कौन है?
अप्रैल में मंहगाई दर ९.५९ प्रतिशत रही जबकि मार्च में यह दर ९.९ प्रतिशत थी ७ मई को जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल २००९ में मुद्रास्फीति की दर १.३१ प्रतिशत थी वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार खाद्य पदार्थों की कीमतों में मंहगाई पिछले महीने १६.८७ प्रतिशत रही, जबकि मार्च २०१० में यह १६.६५ प्रतिशत थी प्राथमिक उत्पादों की कीमत अप्रैल में १३.८८ प्रतिशत रही विनिर्मित वस्तुओं की कीमत में ६.७ प्रतिशत की वृद्धी हुई सरकार लगातार कह रही है कि रबी की फसल आने के बाद मुद्रास्फीति में निरंतर कमी आ रही है। किन्तु इन सबके बीच मंहगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है केन्द्र में दुसरी पारी खेल रही मनमोहन सरकार को नहीं दिखाई दे रहा है कि लगातार कीमतें बढने से पुरे देश में हा हाकार मचा हुआ है देश की आम जनता वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों के कारण खून के आँसू रो रही है और सरकार है कि ताबड़तोड़ वस्तुओं के दाम बढ़ाती जा रही है ।
मार्च में एक खबर आयी थी कि केन्द्र सरकार करीब ५० लाख कर्मचारियों का मंहगाई भत्ता बढ़ा रही है मंहगाई भत्ते में ८ प्रतिशत की वृद्धि की बात की गई ८ प्रतिशत मंहगाई भत्ते के बढ़ने से सरकारी कर्मचारियों का कुल मंहगाई भत्ता २७ प्रतिशत से बढ़कर ३५ प्रतिशत हो जायेगी और संभव है कि सरकारी कर्मचारियों को मंहगाई से राहत मिल जाय किन्तु आम आदमी का क्या यहाँ यह सवाल उठाना लाजमी है क्या देश के मंत्रियों की कैबिनेट सिर्फ सरकार चला रही है देश नहीं ? क्या सरकार अब केवल मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, सरकारी अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और पूजीपतियों के कल्याण के लिए ही काम करेगी देश के उन आम आदमी से जिनकी मतों से सत्तासीन हुई है उनसे कोई सरोकार नहीं? मंहगाई बढ़ाने की सरकारी नीतियों देख कर तो यही प्रतीत होता है ।
देश के आम आदमी के दिमाग में यह सवाल कौंध रहा है कि सरकार आम आदमी के जरूरत की खाद्य वस्तुओं के रख-रखाव, मांग व आपूर्ती का प्रबंधन क्यों नहीं कर पा रही है क्या सरकार में बैठे लोग इतने निकम्मे है या यह सब बाजार की ताकतों (पूजीपतियों) सरकार की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है यह देखा और महसूस किया जा रहा है कि जब-जब संसद में मंहगाई का मुद्दा प्रस्तुत हो रहा है तब-तब सरकार एक नए मुद्दे को संसद में लाकर मंहगाई के मुद्दे को जानबूझकर पीछे ढ़केल रही है । पिछले दिनों जब देश की तमाम राजनैतिक पार्टियों नें मंहगाई के मुद्दे पर हो-हल्ला मचाना शुरू किया तो सरकार ने महिला आरक्षण का मुद्दा उछाल दिया महिला आरक्षण के मुद्दे को उछालने के कारण सरकार मंहगाई के मुद्दे से कुछ दिनों के लिए पीछा छुडा लिया। अब फिर से जब एक बार मंहगाई का मुद्दा जोर पकड़ रहा है तो सरकार नक्सली हिंसा को देश के समक्ष सबसे बड़े मुद्दे की तरह पेश कर रही है और फिर से एक बार मंहगाई के मुद्दे को पीछे ढ़केलने के फ़िराक में है ।
मंहगाई का मुद्दा यूपीए और उसके प्रमुख घटक कांग्रेस के लिए कितना बड़ा खतरा है यह मनमोहन और उनकी तिकड़ी को अच्छी तरह पता है। उन्हें यह भी अच्छी तरह पता है कि इन सबके बावजूद भी अगर केन्द्र में अगली पारी भी यूपीए और कांग्रेस की होगी तो उसे राहुल बाबा खेलेंगे मनमोहन नहीं, यही वजह है कि मनमोहन और उनकी तिकड़ी उन बहुराष्ट्रीय निगमों के हित में वह सब कर लेना चाहते है जो बहुराष्ट्रीय निगम उनसे करवाना चाहते है क्योकि सत्ता जाने के बाद उन निगमों के ही शरण में जाना है । उदाहरण के लिए विश्व स्टील सम्राट लक्ष्मीनिवास मित्तल ने जिस तरह से पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री शौकत अजीज को अपना मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया है पाकिस्तानी पूर्व प्रधानमंत्री को लक्ष्मीनिवास मित्तल ने यह इनाम इसलिए दिया क्योकि शौकत अजीज अपने प्रधानमंत्रित्व काल में पाक की जनता के हितों को ताक पर रखकर पाकिस्तान की ३० स्टील मीलों को मित्तल को बेच दिया था, यही वजह है कि मनमोहन मंहगाई बढ़ाकर देश के बहुसंख्य नागरिकों को गरीबी रेखा के नीचे धकेलने सहित अन्य सभी काम करेंगे जिससे उन ताकतों को फायदा हो, सत्ता से बेदखल होने के बाद जिनसे वे जुड़ेंगे ।
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भाई हम तो १०० रुपये किलो दाल और ४० रुपये किलो शक्कर खरीद लेंगे, क्योंकि हमें 'सेकुलर' सरकार चाहिए.
हम राजा-रानी के ६७००० करोड़ के घपलो को भी सह लेंगे, क्योकि हमें 'सेकुलर' सरकार चाहिए.
हम सीबीआई के दुरुपयोग को भी सह लेंगे, क्योंकि....
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