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भारत के लिए जरूरी है व्यापक आर्थिक परिदृश्य

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भले ही हमारे देश में आर्थिक महाशक्ति बनने की संभावना है लेकिन हम इससे आत्मसंतोष नहीं कर सकते. हमें सफलता प्राप्त करने केलिए हर स्तर पर पूरी दृढ़ता के साथ सही कदम उठाने होंगे. सफलता केलिए हमें कुछ बातों पर ध्यान देने की जरूरत है.

वै‍श्विक अर्थव्‍यवस्‍था मंदी के दौर में एक टाइम बम पर बैठी है जहाँ समय-समय पर नयी-नयी घटनाएँ सामने आ रही हैं। बार-बार संकट से उबारने के लिए पैकेजों की घोषणा की जा रही है, लेकिन कब तक एक मरीज को जीवनरक्षक मशीन पर जीवित रखा जा सकता है। ऐसा कहा जा रहा है कि आर्थि‍क गतिविधियाँ पूरब की ओर विशेषकर भारत और चीन की ओर बढ़ रही हैं विकासशील देशों में विश्‍व भर से पूँजी का प्रवाह बढ़ रहा है भारत की जीडीपी करीब 8 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है, लेकिन मेरे विचार से हमारे देश के लिए आर्थिक विकास दर का यह अनुमान वास्तविक धरातल पर सही नहीं है और यह एक ज्वलंत तस्‍वीर पेश करता है।

सकल घरेलू उत्‍पाद के मूल्‍यांकन के लिए मानक
भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का एक बड़ा हिस्‍सा जीडीपी की गणना में शामिल नहीं हो पाता। सांख्यिकी आँकड़ों के संग्रह में सतत सुधार के साथ देश में ऐसी ज्‍यादातर आर्थिक गतिविधियों को जीडीपी की गणना में स्‍थान मिलेगा मसलन असंगठित क्षेत्र में सेवाएँ, ग्रामीण आर्थिक एवं घरेलू गतिविधियाँ आदि। दूसरी बात, भारत में एक व्‍यापक समानांतर अर्थव्‍यवस्‍था है जैसे जैसे हम निम्‍न कराधान एवं मजबूत अंकेक्षण की दिशा में बढ़ते हैं लोग आर्थिक विकास की मुख्‍य धारा में शामिल होने को प्रोत्‍साहित होते हैं। दूसरी ओर, वैट और जीएसटी लागू करने से सभी व्‍यावसायिक आँकडों को व्‍यवस्थित ढंग से दुरूस्‍त किया जा सकेगा जिससे ये सभी संपूर्ण जीडीपी आँकड़ों में शामिल हो जायेंगे। इन बातों से यह साफ है कि वर्तमान में भारत के लिए जीडीपी के वास्‍तविक आँकड़े सही तस्‍वीर पेश नहीं करते वास्‍तव में  भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था इस तस्‍वीर से कहीं अधिक विशाल है जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे सांख्यिकी आँकड़े स्वत: ही विकास की बढ़ी तश्वीर पेश करते हैं।

भारतीय संदर्भ में दूसरी मूल समस्‍या समावेशी विकास की है। पूरे देश में भ्रष्‍टाचार फैला हुआ है सत्ता में बैठे लोग संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं और यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि सभी तरह के लाभ कुछ चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रहे। भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति हमारे आर्थिक नियोजन में एक बड़ी खामी है और यह चिंता की एक बड़ी वजह है इसका सबसे ताजा उदाहरण है आईपीएल विवाद जहाँ समाज के नामी गिरामी लोग राजनीतिक पार्टियों के लोगों के साथ इसमें शामिल थे। जब तक आम आदमी भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं करता, देश में सभी के विकास का लक्ष्‍य हासिल नहीं किया जा सकता। हमारे देशवासियों को करदाता के धन की अहमियत को समझते हुए हर राजनेता एवं नौकरशाह को इसके दुरूपयोग के लिए जवाबदेह ठहराना होगा।

पूँजी प्रवाह

चीन पर यूआन का पुनर्मूल्‍यांकन करने के लिए अमेरिका की ओर से भारी दबाव है यूआन अमेरिका डालर से स्थिर दर से जुड़ा है। अगर चीनी मुद्रा मजबूत होती है, जो डालर कमजोर होगा जिससे विश्‍व मुद्रा बाजार में भारी उतार चढ़ाव आयेगा और उभरते देशों में पूँजी का प्रवाह प्रभावित होगा। भारत में विदेशी पूँजी का प्रवाह तेजी से बढ़ रहा है जिससे घरेलू बाजार में तेजी का रूख बना है। इस तेजी से अनिश्चितता की स्थिति पैदा होने और पूरी अर्थव्‍यवस्‍था पर इसके प्रभाव की आशंका को देखते हुए भारत सरकार ने यूके सिन्‍हा की अध्‍यक्षता में एक समिति गठित की है, जो पूँजी प्रवाह के सार्थक या प्रतिकूल प्रभाव का आकलन करेगी। इस मुददे पर मंथन की जरूरत है क्‍या हमें विदेशी पूंजी की जरूरत है? अगर है तो कितनी मात्रा में और किस शर्त एवं कीमत पर।

भारतीय पूँजी बाजार

भारतीय शेयर बाजारों में हाल के दिनों में तेजी का रूख बना हुआ है, लेकिन पिछले सप्‍ताह यह रूख उलट गया। यूनान ऋण संकट का असर भारत सहित दुनियाभर के शेयर बाजारों पर पड़ा। यद्यपि यूरोपीय संघ ने अपने सदस्‍य देशों में इस संकट को फैलने से बचाने के लिए 750 अरब यूरो का दूसरा पैकेज पेश किया, लेकिन यह पैकेज दीर्घकाल में इस संकट को फैलने से रोकने में कितना कारगर साबित होगा, इसे लेकर आशंका है क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पुर्तगाल के ऋण की रेटिंग घटाकर और यूनान के ऋण को जंक रेटिंग देकर एक चेतावनी दी है अब प्रश्‍न यह है कि हम अपनी घरेलू अर्थव्‍यवस्‍था को वैश्विक वित्तीय संकट से कैसे बचा सकते हैं।

इसके साथ ही हमारे बाजार मंदी की गिरफत में आ सकते हैं जिससे भविष्‍य में आर्थिक विकास पर ब्रेक लग सकता है कुछ ऐसे कारक जो इस परिदश्‍य की ओर ध्‍यान दिलाते हैं। उनमें पहला है आईपीओ लाने के लिए कंपनियों की लंबी कतार जिसके जरिए करीब दो लाख करोड़ रुपये जुटाये जाने की संभावना है। आईपीओ के जरिए बड़ी मात्रा में धन जुटाये जाने से बाजार में तरलता की कमी हो जायेगी। दूसरा कारक है निफ्टी का 24 के PE अनुपात पर कारोबार करना जो काफी अधिक है। एक निवेशक के लिए सामान्‍य नियम है कि जब पीई अनुपात 22 का स्‍तर पार करे, तो बाजार से निकल जाये और जब पीई अनुपात 15 से नीचे हो तो बाजार में फिर प्रवेश कर जाये। इसलिए बाजार में भारी बिकवाली का दबाव हो सकता है। तीसरा कारक म्‍यूचुअल फंड खंड में है अप्रैल महीने में इक्विटी स्‍कीमों से 1,133 करोड़ रुपये बाहर निकले, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में स्‍कीमों में निकासी महज 196 करोड़ रुपये का रहा इस तरह से निकासी काफी अधिक रही, जो बाजार के अनुमान के बिल्‍कुल उलट है। आमतौर पर अप्रैल महीने में शेयर बाजार में नये निवेश होते हैं क्‍योंकि इसी महीने नया वित्त वर्ष शुरू होता है। इससे शेयर बाजार की खराब स्थिति का पता चलता है।

मुद्रास्‍फीति एवं जिंसों की बढ़ती कीमतें

जिंसों की बढ़ती कीमतों से देश में मुद्रास्‍फीति की दर में उल्‍लेखनीय तेजी का रूख बना हुआ है जिससे आम आदमी के लिए चिंता की स्थिति पैदा हो गयी है। ऐसा लगता है कि इस संकट पर अंकुश लगाने के लिए सरकार के पास कोई उपाय नहीं बचा है। एक ओर, भंडारण के लिए पर्याप्‍त जगह नहीं होने की वजह से गोदामों में खाद्यान्‍न सड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर, आम आदमी भ्रष्‍ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली के चलते खाद्य वस्‍तुओं की महँगाई का सामना कर रहा है।

एक तरफ देश में भंडारण के लिए गोदामों की खराब स्थिति है और अब समस्‍या यह है कि किसान नयी फसल सरकार को बेचने को तैयार हैं और अपनी फसल के लिए अधिक न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य माँग रहे हैं। खाद्य वस्‍तुओं की महँगाई और जिंसों के रखरखाव में अव्‍यवस्‍था के चलते सरकार को देशभर में विपक्षी दलों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा बजट सत्र में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ कट मोशन प्रस्‍ताव पेश किया। सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए जिस तरह के उपाय अपनाए उससे देश में कुछ संस्‍थानों की कार्यप्रणाली के बारे में कई तरह के प्रश्‍न खड़े हो रहे हैं। संप्रग सरकार जिस तरह से अर्थव्‍यवस्‍था को संभाल रही है उससे कई सुधारों की गुंजाइश बचती है। उम्‍मीद है कि सरकार नींद से जागेगी और स्थिति को समझते हुए उचित कदम उठायेगी।

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