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चीनी आर्थिक चमत्कार के पैबंद

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चीन से आ रही मजदूरों के आत्महत्या करने की खबरों से चीनी आर्थिक चमत्कार के ‘रहस्य‘ खुलने लगे हैं। क्या इस साम्यवादी राष्ट्र के विकास की बुनियाद निर्धन मजदूरों के शोषण पर टिकी है? क्या सस्ते उत्पादन के पीछे चीन में मजदूरों का अंतहीन शोषण है जो आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है?

एक तरफ दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से लगभग उबर चुकी है और दूसरी तरफ चमत्कारिक विकास करने वाले चीन में श्रमिक असंतोष की बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई है। विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के चमत्कार की बुनियाद रहे हैं- वहां का बंद समाज, निरंकुश एकदलीय व्यवस्था, उदार सरकारी अनुदान और सस्ते मजदूर। सस्ते श्रम की बदौलत बने सस्ते चीनी उत्पाद विश्व बाजार में किसी तूफान की तरह आए। जहां वे गए, बहुत से स्थानीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर गए। कारोबारियों के लिए यह समझ पाना मुश्किल था कि आखिर चीनी व्यवसायी इतनी सस्ती कीमत पर माल कैसे बना और बेच लेते हैं? उनमें से बहुतों ने चीनियों से प्रतिस्पर्धा की बजाए मजबूरी में उन्हीं की मार्केटिंग और आयात का काम पकड़ लिया। चीनी अर्थव्यवस्था बढ़ती चली गई, उसकी मुद्रा मजबूत होती चली गई और उसी के अनुरूप उसका आर्थिक और राजनैतिक दर्जा उठता चला गया। आज वैश्विक महाशक्तियों में चीन का नाम रूस से पहले आता है। लेकिन इस चमत्कार की रीढ़ बने श्रमिक वर्ग की दशा बद से बदतर होती जा रही है।

हाल ही में चीन से गरीबी के कारण श्रमिकों द्वारा आत्महत्याओं की घटनाओं और कुछ कंपनियों में हुई  दुस्साहसपूर्ण हड़तालों की खबरें मिली हैं। उन्होंने वहां की शानदार और चमचमाती आर्थिक सफलता के पीछे छिपे श्रमिक-शोषण के पैबंदों को उधेड़ना शुरू कर दिया है। चीन के सस्ते उत्पादों की सिर्फ गुणवत्ता ही खराब नहीं है। वहां के कार्यस्थलों की स्थितियां और भी बुरी हैं। एक खांटी कम्युनिस्ट राष्ट्र से जैसी उम्मीद थी, उसी के अनुरूप चीन लगभग दो दशक तक मजदूरों के उत्पीड़न को छिपाने और उनकी आवाज दबाने में सफल रहा। किंतु अब लगता है कि दमित, पीड़ित और शोषित श्रमिक वर्ग के लिए पानी सिर से ऊपर चला गया है। इलेक्ट्रानिक्स कंपनी फाक्सकान के 12 श्रमिकों ने हाल में आत्महत्या कर ली है। दूसरी ओर श्रमिकों की हड़ताल के बाद होंडा संयंत्र के प्रबंधकों को मजदूरों का वेतन बढ़ाना पड़ा है। कई राज्यों में श्रमिक असंतोष फूटा पड़ रहा है। यह सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है। 

चीन लोकतंत्र समर्थकों के दमन और मानवाधिकारों की प्रत्यक्ष उपेक्षा के लिए सुपरिचित है। किंतु यह उनके जैसी ‘नैतिक या सैद्धांतिक समस्या‘ मात्र नहीं है बल्कि चीनी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है। सस्ती मजदूरी ने चीन में विदेशी निवेशकों को खूब आकर्षित किया है, खासकर मैन्यूफैक्चरिंग और असेंबलिंग के क्षेत्रों में। चीन की निर्यात केंद्रित अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत भी सस्ते उत्पाद ही हैं। उन्हें कोई उनके टिकाऊपन या क्वालिटी के लिए नहीं खरीदता। लेकिन आज यदि चीन श्रमिकों को जायज वेतन देने और कार्यस्थलों की स्थितियां सुधारने का फैसला करता है तो फिर उत्पादों के दामों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

बड़े विकट हालात
चीन से लगभग हर हफ्ते कोयला खानों के ढहने और दर्जनों मजदूरों के मारे जाने की खबरें आती हैं। इनका जारी रहना बताता है कि अपने कामगारों के जीवन की चीनी नेतृत्व को कितनी परवाह है। ऐसी छिटपुट खबरों के अलावा, समूची चीनी अर्थव्यवस्था में, विशेषकर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में श्रमिकों की कार्य परिस्थितियां और वेतन आदि के बारे में ठोस सूचनाएं दुर्लभ हैं। अलबत्ता, मौजूदा श्रमिक आंदोलन से कुछ अहम तथ्य सामने आए हैं। 

चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)  जहां लगातार बढ़ रहा है वहीं मजदूरों के औसत वेतन में पिछले 22 साल से लगातार गिरावट आई है। वर्ष 1983 में जहां कुल जीडीपी में वेतन भत्तों का हिस्सा 56 प्रतिशत तक था वहीं 2005 में य्ाह घटकर 36 प्रतिशत रह गय्ाा। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में बताया गया था कि 23 फीसदी श्रमिकों के वेतन में पिछले पांच साल से कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरी ओर भारत की तरह चीन में भी महंगाई काफी बढ़ गई है जिसका दबाव आम लोगों पर पड़ रहा है। उधर धनपति अर्थव्यवस्था पर सिकंजा कसते जा रहे हैं। देश की 45 फीसदी समृद्धि पर दस फीसदी लोगों का कब्जा है।

इस तरह की स्थितियां किसी निरंकुशतावादी व्यवस्था में ही संभव है। इसे चीनी जनता का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि वहां किसी भी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस या सुझावों की गुंजाइश नहीं है। कम वेतन को लेकर विरोध तो छोड़िए, चर्चा तक की स्थिति नहीं है। आज जब चीन के बरक्स हमारी तरक्की की अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार पर सवाल उठाए जाते हैं तो उसका जवाब है हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, जहां हर किसी को असहमति जताने और सवाल उठाने का हक है। हमें धीमी तरक्की स्वीकार है लेकिन लोकतंत्र को नहीं खो सकते। संभवतः यही टिकाऊ तरक्की भी है और तभी कहा जाता है कि सन 2020 तक भारत चीन को पीछे छोड़ देगा। 

बहरहाल, चीन में ‘आर्थिक विकास‘ एक सरकारी आदेश है, जिसका हर हालत में, कितनी भी जटिल और दुखद परिस्थितियों में पालन किया जाना जरूरी है। एक कम्युनिस्ट व्यवस्था में यूं तो श्रमिकों के हित सर्वोपरि होने चाहिए लेकिन यह चीनी शैली का अपना साम्यवाद है जहां चीजों को सस्ता रखने के लिए जरूरी हिफाजती प्रबंधों की भी जरूरत नहीं समझी जाती, जीवन के लिए उचित परिस्थितियां मुहैया कराना तो दूर की बात हैं।

अधिकार और तरक्की का द्वंद्व
न्यूनतम खर्च, न्यूनतम जवाबदेही का चीनी मॉडल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को रास आता है। कहते हैं कि चीनी कपड़ा मिलों में निर्मित जिस उत्पाद पर औसतन पांच डालर (लगभग 230 रुपए) का खर्च आता है, वह अमेरिकी बाजार में 40 डालर (लगभग 1900 रुपए) में बिकती है और इसमें चीनी श्रमिकों की हिस्सेदारी महज 80 सेंट (लगभग 33 रुपए) होती है। 

पेईचिंग में हाल तक सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम वेतन 117 डालर (लगभग 5300 रुपए) था। चीन अब खुद को एक विकसित राष्ट्र मानता है। अगर इसकी तुलना विकसित राष्ट्रों के न्यूनतम वेतन (अमेरिका में 7.75 डालर या लगभग 350 रुपए प्रति घंटा और इंग्लैंड में 5.95 पाउंड या लगभग 405 रुपए प्रति घंटा) से तुलना करें तो चीन के ‘विकास‘ की वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है। वहां न्यूनतम मजदूरी पड़ोसी जापान की तुलना में सिर्फ पांच फीसदी है और उसके भुगतान की भी कोई गारंटी नहीं है। 

ज्यादातर चीनी मजदूर दिन में 13 घंटे मशीन की तरह काम करते हैं। वे विकट आवासीय परिस्थितियों में रहते हैं। न पेंशन की सुविधा है, न चिकित्सा बीमा की। दिन-रात मेहनत के बाद जब वे 40 की उम्र तक पहुंचते हैं तो काम करने लायक नहीं रह जाते। किंतु तब तक उनकी जगह दूसरे मजदूर ले चुके होते हैं और चीन सरकार का आर्थिक चक्र चलता रहता है। उत्पादन पर खर्च कम से कम रखने का उसका उद्देश्य पूरा होता रहता है। बहरहाल, यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहेगा, इसमें संदेह है क्योंकि अगले 12 साल में अधिकतम उत्पादक आयु वर्ग (15 से 24 वर्ष) के युवकों की संख्या में एक तिहाई की कमी आने वाली है। 

कठोर सरकारी अंकुश के बावजूद चीन में श्रमिक आंदोलन धीरे-धीरे गंभीर रूप अख्तियार कर रहे हैं। सन 2004 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वहां उस वर्ष कोई 74000 श्रमिक विवाद हुए थे। अब ये खासे बढ़ चुके होंगे। दबाव में कुछ कंपनियों और कुछ राज्यों को न्यूनतम वेतन में 20 से 25 फीसदी के बीच बढ़ोत्तरी करनी पड़ी है। लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। यूं भी बात सिर्फ वेतन की नहीं है। मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना, कार्यस्थलों पर हालात सुधारना, और उन्हें इंसानों के लायक जरूरी अधिकार मुहैया कराना और भी जरूरी है। लेकिन क्या चीन ऐसा करने की स्थिति में है? ऐसा हुआ तो अपने ही लोगों के शोषण की बुनियाद पर टिके उसके आर्थिक मॉडल का क्या होगा?

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ई-गुरु राजीव on 20 June, 2010 17:00;30
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बालेंदु जी ने नयनाभिरामी चीन की सही तस्वीर दिखाई है, जो आँखे खोलने के लिए पर्याप्त है.
चीन के विकास में न्यूनतम वेतन/लागत की बात अब समझ में आई है.
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image बालेन्दु दाधीच माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.
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