Home | अर्थ-अनर्थ | इस सरदार की समझ पर तरस आता है

इस सरदार की समझ पर तरस आता है

image

जैसे-जैसे गरीबी कम होती है, महंगाई बढ़ती जाती है। अर्थशास्त्र की कोई स्थापना भले ही इसे मानने से इनकार करे, लेकिन मशहूर अर्थशास्त्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ऐसा ही मानते हैं। विकसित देशों के योजनाकार जिस तरह 2008 में आई भयानक मंदी के लिए तेज आर्थिक विकास को ही जिम्मेदार मानते थे, मोंटेक सिंह का बयान भी कुछ ऐसा ही है। चूंकि अहलूवालिया अर्थशास्त्री हैं, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं, देश के वित्त सचिव रह चुके हैं, सबसे बड़ी बात यह कि वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी नौकरी कर चुके हैं। जाहिर है उनके विचार को तरजीह दिया ही जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका यह विचार स्वीकार के काबिल है?

जिस व्यक्ति पर देश की योजनाएं बनाने और उसका फायदा गरीब से गरीब व्यक्ति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है, उसका यह आकलन स्वीकार करने लायक भी है। ऐसा कहते वक्त मोंटेक सिंह अपने ही पुराने साथी सचिन डी तेंदुलकर की उस रिपोर्ट को भी भूल गए, जिसे उन्होंने योजना आयोग के ही कहने पर तैयार किया था और पिछले साल सितंबर में पेश किया था। प्रधानमंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार सचिन डी तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि आर्थिक उदारीकरण के तमाम चमकीले दावों के बावजूद देश में गरीबों की संख्या में करीब 10 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस समिति का कहना था कि भारतीय गांवों और शहरी स्लम में रह रहे गरीब लोगों की संख्या में आर्थिक उदारीकरण के दौरान करीब 11 करोड़ की वृद्धि हुई है। इसके पहले वंदना शिवा की स्वयंसेवी संस्था नवधान्य ने भी भारतीय गरीबों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक देश में करीब 21 करोड़ लोगों को कम से कम एक शाम भूखा रहना पड़ता है। मोंटेक सिंह मानते हैं कि गांवों के गरीबों की हालत सुधरी है, लिहाजा उनकी क्रय शक्ति बढ़ी और वे पहले की तुलना में खाने-पीने पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं। यही वजह है कि महंगाई दर कम नहीं हो पा रही है। सबसे पहले गरीबों की सुधर रही हालत के मोंटेक के दावे पर ही विचार किया जाना जरूरी है।

फिलहाल खाद्य महंगाई दर करीब सोलह फीसदी है और इसमें कमी नहीं आ पा रही है तो बकौल मोंटेक इसके लिए गरीब जिम्मेदार हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि देश के गरीबों की हालत में पिछले एक साल में ही काफी सुधार आया है, क्योंकि सचिन तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट एक साल पहले ही आई थी। लेकिन सभी जानते हैं कि पिछले साल पूरे उत्तर भारत में भयानक सूखा पड़ा था। देश की जीडीपी में खेती का महज पंद्रह फीसदी योगदान है, जबकि तमाम दावों के बावजूद आज भी देश की करीब 65 फीसदी आबादी की रोजी-रोटी सीधे तौर पर खेती पर ही आधारित है। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि देश के गरीबों की हालत पूरी तरह सुधर गई है। केंद्र में सरकार चला रहे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का मानना है कि मनरेगा के जरिए गांवों में क्रांति आई है। यह सच है कि गांवों में मनरेगा ने लोगों की हालत सुधारने में मदद दी है, लेकिन हालत इतनी बेहतर हो गई है कि गरीब ज्यादा खाने लगे हैं, इसे मोंटेक भले ही मानते हों, सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में शामिल खाद्य सुरक्षा मामलों के जानकार ज्यां द्रेज और हर्ष मंदर तक इसे मानने से इनकार करते रहे हैं। अगर गांवों के गरीबों की खरीद क्षमता में इतनी ही बढ़त हो गई होती तो आज भी भूख से मरने वाली खबरें अखबारों में आए दिन नहीं छपती रहतीं। फिर खाद्य सुरक्षा के लिए कानून बनाने की जरूरत ही नहीं रह जाती। मोंटेक सिंह ऐसा कहते वक्त अपने ही एक पूर्व सहयोगी अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को ही भूल गए। करीब चार साल पहले सेन गुप्ता कमेटी ने एक रिपोर्ट दी थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 83 करोड़ 70 लाख लोग ऐसे थे, जिनकी रोजाना की आमदनी महज बीस रुपये या इससे भी कम थी यानी पांच साल में यूपीए सरकार और योजना आयोग ने ऐसी क्रांति ला दी है कि इस हालत में बदलाव आ गया है।

दरअसल, मोंटेक सिंह का यह बयान उनकी पश्चिमी सोच का ही परिचायक है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी 2008 की महंगाई के लिए भारतीयों को जिम्मेदार ठहराया था। बुश जैसे लोगों की नजर में समूचे भारतीयों की वकत कुछ वैसी ही है, जैसी मोंटेक जैसों की नजर में गरीबों की है। तब बुश ने कहा था कि भारतीय भकोसने लगे हैं। लिहाजा, दुनिया में अनाज कम पड़ रहा है। गनीमत है कि अपने योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने ऐसा नहीं कहा है, लेकिन उनका बयान बुश के बयान से तासीर के मामले में कुछ अलग नहीं है। यह सच है कि मनरेगा जैसी योजनाओं ने गांवों से मजदूरों का पलायन रुका है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि उन मजदूरों और मजबूरों की खरीद क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव आ गया है। भारतीय वित्त संस्थान के निदेशक जेडी अग्रवाल मानते हैं कि महंगाई की असल वजह कुछ और है। उनका कहना है कि पिछले बजट में सरकार ने सर्विस टैक्स 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत जैसे ही किया, तब उनके जैसे कई अर्थशास्ति्रयों ने आशंका जताई थी कि महंगाई बढ़ेगी। आज जो महंगाई है, उसमें एक बड़ी वजह यह भी है।

पिछले साल मुद्रा बाजार में जब डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमतें गिरने लगीं, तब हमारी सरकार और उसके अर्थशास्ति्रयों ने इसे आर्थिक विकास के तौर पर देखा था। इसे लेकर अच्छी-अच्छी बातें भी की गई थीं, लेकिन हकीकत यह है कि इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार से दाल या चीनी की खरीद के लिए हमारे व्यापारियों को पहले की तुलना में ज्यादा पैसा देना पड़ा। जाहिर है कि उनकी खरीद कीमत बढ़ी, जिसके चलते बाजार में महंगाई के दैत्य का मुंह लगातार बढ़ता जा रहा है। सेंसेक्स में तेजी को अर्थव्यवस्था के विकास के तौर पर गिनाया गया, लेकिन ऐसा भी नहीं था। वहां की तेजी बनावटी थी, जिसका असर रियल स्टेट में बनावटी तेजी के तौर पर दिखा। जाहिर है, बाजार से पैसा गायब हो गया। इसका भी असर महंगाई को बढ़ाने में सहायक रहा। सरकार चाहे जो भी दावा करे कि वह महंगाई पर काबू नहीं पा सकती। हकीकत तो यह है कि वह जो भी उपाय कर रही है, उसकी जानकारी बाजार को पहले ही हो जा रही है। इससे जमाखोरी बढ़ रही है। जमाखोरी कालाबाजारी को लेकर आती है। ऐसे में कीमतें नहीं बढ़ें, ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन सरकार का ध्यान उस पर नहीं है। इन उपायों के जरिए महंगाई पर काबू पाने की बजाय सरकार गरीबों को ही जिम्मेदार ठहराने में जुटी हुई है। बेहतर तो यह होता कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष महंगाई बढ़ने के कारणों की उचित मीमांसा करते और उसे रोकने के लिए भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक अर्थशास्त्रीय नजरिया अख्तियार करते।

Subscribe to comments feed Comments (3 posted):

R K GUPTA on 26 October, 2010 14:27;48
avatar
इस समय दो दो सरदार है सत्ता में और हालात तो आप देख ही रहे है.
Thumbs Up Thumbs Down
4
Anup on 26 October, 2010 14:57;02
avatar
बेहतरीन लेख....

अनूप

A
Thumbs Up Thumbs Down
2
am on 29 October, 2010 15:01;03
avatar
सारे चुटकुले सरदारों पर ही बनते हे.......अत आशा करना बेकार हे इन सरदारजी पर...........
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 3 | displaying: 1 - 3

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image Umesh Chaturvedi हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने विभिन्न अखबारों और टीवी चैनलों में काम किया. वर्तमान में एक मीडिया संस्थान में पढ़ाने के साथ स्वतंत्र लेखन.
Rate this article
5.00
More from अर्थ-अनर्थ
Previous
image
इस सरदार की समझ पर तरस आता है
जैसे-जैसे गरीबी कम होती है, महंगाई बढ़ती जाती है। अर्थशास्त्र की कोई स्थापना भले ही इसे मानने से इनकार करे, लेकिन मशहूर अर्थशास्त्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ऐसा ही मानते हैं। विकसित देशों के योजनाकार जिस तरह 2008 में आई भयानक मंदी के लिए तेज आर्थिक विकास को ही जिम्मेदार मानते थे, मोंटेक सिंह का बयान भी कुछ ऐसा ही है। चूंकि अहलूवालिया अर्थशास्त्री हैं, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं, देश के वित्त सचिव रह चुके हैं, सबसे बड़ी बात यह कि वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी नौकरी कर चुके हैं। जाहिर है उनके विचार को तरजीह दिया ही जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका यह विचार स्वीकार के काबिल है?...
image
शेयर बाजार में ठगी का कारोबार
क्या आप अपनी पूंजी दोगुनी करना चाहते है? वो भी एक माह से कम समय में! आपको लग रहा होगा कि लेखक के पास कौन सी जादू की छड़ी आ गयी है कि यह एक माह से कम समय में पूंजी को दुगनी कर रहा है वो भी ऐसे मंदी के माहौल में जब दुनिया की बड़ी-बड़ी आर्थिक संस्थाएं दिवालिया हो रही हैं. लेकिन यकीन मानिये यह सच है बाम्बे स्टाक एक्सचेंज में लिस्टेड एक कंपनी जिसका नाम “ओड़िसा मिनरल डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड” है....
image
मंदी के रास्ते आई मंहगाई बनी हरजाई
सन २००८ में आयी आर्थिक मंदी के बाद से विश्व भर में तमाम देशों की आर्थिक सेहत खराब बनी हुई है। कभी ऐसा लगता है कि अब हालत ठीक है तो कभी स्तिथि खराब लगने लगती है। इस बड़े आर्थिक प्रहार के बाद से दो वित्तीय वर्ष पूर्ण होने के उपरांत भी आर्थिक मंदी से अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी है और ये आर्थिक मंदी सीधे –सीधे बढती महंगाई के लिये जिम्मेदार है।...
image
स्विस बैंक में सेंध और भारत की भूमिका
भारत के करोड़ों ईमानदार टैक्सदाताओं और नागरिकों के लिये यह एक खुशखबरी है कि फ़्रांस के HSBC बैंक के दो कर्मचारियों हर्व फ़ेल्सियानी और जॉर्जीना मिखाइल ने दावा किया है कि उनके पास स्विस बैंकों में से एक बैंक में स्थित 180 देशों के कर चोरों की पूरी डीटेल्स मौजूद हैं। 2 साल से इन्होंने लगातार यूरोपीय देशों की सरकारों को ईमेल भेजकर "टैक्स चोरों" को पकड़वाने में मदद की पेशकश कर रखी है। जर्मनी की गुप्तचर सेवा को भेजे अपने ईमेल में इन्होंने कहा था कि ये लोग स्विटज़रलैण्ड स्थित एक निजी बैंक के महत्वपूर्ण डाटा और उस कम्प्यूटर तक पुलिस की पहुँच बना सकते हैं।...
image
तेल के नाम पर खतरनाक खेल
हम सभी को समझना होगा कि भारत में एक लीटर पेट्रोल की कींमत ५३ रूपये है ऐसा क्यों? और सरकार लगातार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी करती जा रही है. आखिर तेल के नाम पर अपने देश के हुक्मरान कौन सा खतरनाक खेल खेल रहे हैं?...
image
चीनी आर्थिक चमत्कार के पैबंद
चीन से आ रही मजदूरों के आत्महत्या करने की खबरों से चीनी आर्थिक चमत्कार के ‘रहस्य‘ खुलने लगे हैं। क्या इस साम्यवादी राष्ट्र के विकास की बुनियाद निर्धन मजदूरों के शोषण पर टिकी है? क्या सस्ते उत्पादन के पीछे चीन में मजदूरों का अंतहीन शोषण है जो आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है?...
image
भारत के लिए जरूरी है व्यापक आर्थिक परिदृश्य
भले ही हमारे देश में आर्थिक महाशक्ति बनने की संभावना है लेकिन हम इससे आत्मसंतोष नहीं कर सकते. हमें सफलता प्राप्त करने केलिए हर स्तर पर पूरी दृढ़ता के साथ सही कदम उठाने होंगे. सफलता केलिए हमें कुछ बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. ...
image
मंहगाई की मनमोहनी मार
मंहगाई-मंहगाई के इस खेल में फायदे में रहेंगे मनमोहन और उनकी तिकड़ी तथा वे ताकतें ( बहुराष्ट्रीय निगम) जिनके लिए मंहगाई बढ़ाई जा रही है और घाटे में रहेगी इस देश की आम जनता, यूंपीए गठबंधन और गठबंधन की प्रमुख घटक कांग्रेस क्योंकि मनमोहन और उनकी तिकड़ी के नीतियों की वजह से कांग्रेस का हाथ बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ है, देश के आम आदमी के नहीं । इसका हिसाब आम आदमी चुनाव में जरूर लेगा किन्तु हिसाब लेने में अभी चार साल बाकी है सो मंहगाई फ़िलहाल कम होगी यह उम्मीद करना दिवास्वप्न ही है । ...
image
शेयर बाजार को ले डूबेंगी डब्बा कंपनियां
शेयर बाजार की नियामक संस्था सेबी ( सेक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) के ठीक नाक के नीचे काले धन को सफेद करने का कारोबार धड़ल्ले से जारी है । डब्बा कंपनियों के माध्यम से इसे अंजाम दे रहे हैं डब्बा ट्रेडर्स। दरअसल डब्बा ट्रेडर्स एक ऐसे कुख्यात कारोबारी तरीके का नाम है जो काले धन को सफेद करने का कारोबार धड़ल्ले से कर रहे हैं । ...
image
आइये समझें अर्थ का शास्त्र
बहुत सारे लोग अनिल सिंह को अनिल रघुराज के नाम से जानते हैं. किसी दौर में आर्थिक पत्रकार के तौर पर दिल्ली में झंडा गाड़नेवाले अनिल सिंह मुंबई गये तो अनिल रघुराज के रूप में ब्लागिंग शुरू की. मुस्कुराते हुए बात करतें हैं और बात करते हुए बीच बीच में खांसते हैं. उन्हें खांसने का कोई रोग नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि यह उनका स्टाइल है. बोलते बहुत धीरे हैं लेकिन जो बोलते हैं वह समझा हुआ सा लगता है इसलिए मन में बहुत सारे सवाल जवाब नहीं आते हैं. ऐसे ही अनिल सिंह उर्फ अनिल रघुराज ने अपनी एक वेबसाइट शुरू की है- अर्थकाम. ...
image
मंहगाई को रोकना है तो...
रिज़र्व बैंक ने एक बार फिर ब्याज दरें बढ़ा दीं हैं। उनकी सोच है कि बाज़ार में रुपये की कमी से खर्च पर लगाम लगेगी और उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद कम होगी। रिज़र्व बैंक के प्रबंधन में देश के चोटी के विद्वान लगे हैं। अर्थशास्त्र के एक प्रकांड पंडित इस देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए यह कहना कि ब्याज़ दर बढ़ा कर मंहगाई पर काबू पाना नामुमकिन है, शायद छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन सच्चाई यह है कि बैंकों से पैसा लेकर फालतू की चीज़ें नहीं खरीदी जातीं।...
image
आईपीएल में कैसे और कहां से बरस रहा है पैसा?
कभी सोचा है आपने कि आखिर आठ-दस टीमों के खेलने-खिलाने से आईपीएल में कैसे और कहां से ऐसा पैसा बरस रहा है? आखिर क्यों तमाम घृणित किस्म की राजनीतिक जोड़तोड़ से, जाने कहां-कहां से करोड़ों जुगाड़कर बड़े-बड़े दिग्गज इस पर दांव लगा रहे हैं? ...
image
बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के चंगुल में बिहार
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने एक बार फिर सात वर्षो के बाद बिहार के किसानों को अपने चंगुल में ले ही लिया और बिहार के किसानों को मक्के की ऐसी बीज बेचकर चम्पत हो गए जिसमें अंकुरण तक नहीं आया। इनसे उपजी मक्के की फसल में दाने नहीं आए और लाखों हेक्टेयर की फसल बिहार में बर्बाद हो गई। सात साल पहले भी बिहार में मोन्सेन्टो कम्पनी के कारगिल बीज ने ऐसा ही गुल खिलाया था।...
image
पटना निगल जाता है आधा बिहार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं कि बिहार का विकास किए बगैर देश विकसित नहीं हो सकता, मगर जब बात उनके अपने राज्य की आती है तो संभवत: यह तर्क वे भूल जाते हैं और विकास की बड़ी राशि पटना में ही खर्च कर डालते हैं, भले भागलपुर, पूर्णिया या सुपौल जैसे जिले पिछड़े ही रह जाएं।...
image
लीजिए, एक और किसान हितैषी बजट
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण का आखिरी वाक्य देखिए. वे कहते हैं- "यह बजट आम आदमी से जुड़ा है. यह किसानों, कृषि कारोबारियों, उद्यमियों और निवेशकों से जुड़ा हुआ है." अरे, एक और किसान हितैषी बजट आ गया. पिछले दस सालों के बजट बाद के संपादकीय पढ़िये. आपको हर संपादकीय में एक बात जरूर दिखाई देगी कि किसानों और कृषि के उत्थान के लिए सरकार ने नये सिरे से प्रयास किये हैं. हमारी मीडिया के लिहाज से हर बार बजट में वित्त मंत्री किसानों के लिए अच्छी अच्छी खबरें लेकर आते हैं. ...
image
भविष्य के भारत की ओर पहला बजट
वित्त वर्ष 2010-11 बजट प्रस्तुत होने से पहले आम आदमी की परिभाषा दाल रोटी से जोड़ी जा रही थी. लेकिन बजट आया तो आम आदमी की जगह शहर के वे लोग आ गये जो एक घर और गाड़ी का सपना देखते हैं. अपने बजटीय प्रावधान में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं वह उस आम आदमी को सचमुच राहत देनेवाली हैं जिनका रोना अब तक विपक्षी दल और मीडिया का एक हिस्सा रो रहा था. फिर अचानक ही प्रणव मुखर्जी का बजट आम आदमी का विरोधी कैसे हो गया?...
image
बजट में किसान और कृषक अलग अलग क्यों हैं दद्दू?
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषण के अंत में कहा है कि यह बजट आम आदमी का है। यह किसानों, कृषकों, उद्यमियों और निवेशकों का है। इसमें बाकी सब तो ठीक है, लेकिन किसान और कृषक का फर्क समझ में नहीं आया। असल में वित्त मंत्री ने अपने मूल अंग्रेजी भाषण में फार्मर और एग्रीकल्चरिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2