धन की लक्ष्मी या पूंजी की अप्सरा?
कनाट प्लेस और लक्ष्मीनगर दोनों ही अर्थव्यवस्था के बम-बम होने से पहले के बाजार हैं. खुले बाजार की अर्थव्यवस्था आने और भारत के अमेरिका से जुड़ने से पहले भी ये बाजार थे. धूमधाम से दिवाली मनाते थे. लेकिन देखते ही देखते कनाट प्लेस का अमेरिकीकरण हुआ. बहुमंजिला इमारते बनीं. अंतरराष्ट्रीय ब्राण्डों के आउटलेट खुले. पालिका बाजार बना, जिसमें सस्ती और नकली चीजों की भरमार हो गयी.
जो लोग ऊपर की असली और मंहगी दुकानों में नहीं जा पाते हैं वे पालिका से सस्ती और नकली ब्राण्डों को खरीद लाते हैं. कनाट प्लेस की अंडरबेली पालिका बाजार थी. ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका की नकल करते हुए भारत में एक अण्डरक्लास उभर आया है जो बिल्कुल अमेरिका की तर्ज पर ही जीवन जीता है. पिछले सत्रह सालों में अमेरिकाग्रस्त अमीरी ने भारत में ऐसे ही गरीबों को बनाया है.
इनकी बात भी नहीं करता अगर दीवाली मनाने के उत्साह में इनका भिन्न चरित्र महानगरों में काले धोले की तरह साफ दिखाई नहीं देता. पिछले सत्रह सालों से नये बाजार के लिए दीवाली सबसे बड़ा त्यौहार हो गया था. इस त्यौहार में दीप को अप्रासंगिक बनाकर बाकी सब प्रेरणाओं और परंपराओं को उपभोग से जोड़ दिया गया था. किसी से पूछो कि परंपरा में यह क्यों है कि धनतेरस अलग और लक्ष्मीपूजन अलग? धन ही अगर लक्ष्मी होती तो लक्ष्मी पूजन भी धनतेरस की रात को ही हो जाता. इन्हें अलग क्यों किया गया? किसान की लक्ष्मी बैलों की खुरों में और वणिक की लक्ष्मी बही-खातों में क्यों बैठी हुई हैं? रात को देखनेवाले उलूक पर बैठी लक्ष्मी की पूजा ही सबसे बड़ी पूजा ही सबसे बड़ी पूजा और लक्ष्मी ही सबसे बड़ी देवी होतीं तो दुर्गापूजा और अंबा माता का डांडिया नौ दिन क्यों चलता? शुभलाभ लिखना ही भारतीय गृहस्थ का सबसे अभीष्ट और उत्तम प्रयोजन होता तो द्यूत को कौरव वंश के नाश का कारण क्यों माना जाता? धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा द्यूतक्रीड़ा में द्रौपदी समेत सबको दांव पर लगाने के कारण ऐसे धिक्कारे क्यों जाते? हाड़तोड़ मेहनत से कमाई गयी लक्ष्मी संपदा हो गयी और जुए से अर्जित धन को गृहस्थ धर्म को नष्ट करना क्यों बताया गया?
लक्ष्मी अप्सरा नहीं है. वह घर-परिवार को धारण करने और स्थिरता देनेवाली पतिव्रता स्त्री है. अप्सरा कुछ मनोरंजन कर सकती है लेकिन घर नहीं बसा सकती. घर बसाना अप्सरा का नहीं बल्कि लक्ष्मी का धर्म है. जो इसे जानते थे उन्होंने लक्ष्मी को चंचला जरूर कहा. माया को महाठगिनी भी बताया. ऋग्वेद में श्री सूक्त है तो पुरूष सूक्त भी. लेकिन जिन लोगों ने दिवाली को बाजार और उपभोग के सबसे बड़े अवसर के रूप में देखा वे उनका भारत में लक्ष्मी की इन अवधारणाओं से कुछ लेना-देना नहीं है. जो महान अंतराष्ट्रीय बाजार भारत में लाया गया उसका कोई ऱाष्ट्रीय चरित्र ही नहीं था. उसका पुराण होना तो संभव ही नहीं था क्योंकि वह पैदा ही अस्सी के दशक में हुआ जब थैचर आंटी और अंकल सैम ने वाशिंगटन में तय किया कि राज्य को अपना कल्याणकारी अवतार छोड़कर पुलिस वाले के भेष में आ जाना चाहिए. समाज में वही विधि और व्यवस्था का जिम्मा ले तथा उद्योग व्यापार में ट्रैफिक पुलिस का. बाजार आज की सबसे बड़ी शक्ति है. पूंजी ब्रह्म है और मुनाफा मोक्ष इसलिए मनुष्य के हर कार्य व्यवहार का एक बाजार मूल्य होना चाहिए. बाजार में जो है उसी का अस्तित्व है, बाजार से परे जो भी है उसका कोई अस्तित्व नहीं है. इसलिए वालस्ट्रीट विश्व की नयी राजधानी हो गयी. वाशिंगटन भी उससे चलनेवाला तंत्र हो गया. मनुष्य के आर्थिक इतिहास में वित्तीय पूंजी का ऐसा वर्चस्व कभी नहीं था. मार्क्स ने भी "पूंजी" नाम की अपनी पोथी में कहा था कि जब वित्तीय पूंजी ही सबकुछ हो जाएगी तो पूंजीवाद का अंत हो जाएगा.
इस बाजार का अपना कोई पुराण नहीं है इसलिए यह जहां भी गया उसने वहां के पुराण और देवी-देवताओं को इसने अपनाकर उपयोग शुरू किया. यूरोप के वेलेण्टाईन डे से लेकर भारतीय गृहस्थ की दिवाली तक इसके अच्छे उपकरण बन गये. पूंजी के भूमंडलीकरण के लिए वसुधैव कुटुम्बकम जैसी उदात्त भारतीय अवधारणा का भी दुरूपयोग किया गया. उन्हें यह भी पता नहीं कि पृथ्वी वसुधा कैसे बनती है और पूरा संसार एक कुटुम्ब कैसे हो जाता है. उल्टे ये तो परिवार को तोड़कर एक व्यक्ति को एक ईकाई बना रहे हैं. उनकी मंशा थी कि संसार में दो ही तरह के व्यक्ति बचें. एक बेचनेवाले और दूसरे खरीदने वाले. ये दोनों ही अंतहीन उपभोग में लिप्त रहें ताकि अर्थव्यवस्था सर्वदा मुनाफे में चलती रहे. यही मुनाफे का लालच वित्तीय पूंजी के संसार को आखूट संकट में डाल गया है. वालस्ट्रीट के युधिष्ठिरों ने सब कुछ दांव पर लगाकर दीवाला निकाल दिया है.
भारतीय बाजारों में दीवाली के त्यौहार पर जो सूतक छाया हुआ आपने देखा है वह वालस्ट्रीट के दीवाले के कारण ही आया है. अप्सरा पूंजी के भूमंडलीकरण से उद्योग-व्यापार-व्यवसाय के जिन प्रासादों में समृद्धि के घुंघरू बज रहे थे उनमें सन्नाटा पसर गया. विदेशी पूंजी के निवेश से पनपे उद्योग व्यापार और उसी से चलते शेयर बाजार की सारी रौनक काफूर हो गयी. दिवाली का त्यौहार भी वहां आशा का दिया नहीं रख पाया. जो इंडिया पिछले पंद्रह साल से विदेशी पूंजी के सहारे दिपदिप कर रहा था वह वालस्ट्रीट के दिवाले के बाद सूना और सुन्न हो गया. कहा जा रहा था कि बाकी का भारत जब तक इंडिया से नहीं जुड़ेगा वह पिछड़ा ही रहेगा. वालस्ट्रीट के कारण जो सन्नाटा पसरा है उसमें इसी भारत ने भारत को बचाकर रखा है.
लक्ष्मी के बिना गृहलक्ष्मी नहीं चल सकती यह तो एक आम गृहस्थ जानता ही है लेकिन वह यह भी जानता है कि केवल उसी को साधने से जीवन नहीं जिया जा सकता. जीवन के और भी प्रयोजन हैं जिन्हें साधने की जरूरत है. केवल पैसा कमाने से ही जीवन सब प्रयोजन नहीं पूरे होते. मुझे लगता है देश के ज्यादातर गृहस्थ इस बात को समझते हैं. शेयर बाजार की एक प्रतिशत जमात को पीछे छोड़ दें तो बाकी के लोग तो अपने खेत-खलिहानों, कारखानों और दफ्तरों से मेहनत की कमाई करनेवाले ही है. ये लोग शेयर के सट्टे में रातों-रात बनने-बिगड़ने के खेल में शामिल नहीं है. भारतीय गृहस्थ के लिए लक्ष्मी अभी भी शेयर बाजार की अप्सरा नहीं है. संतोष का यह कोई छोटा-मोटा कारण नहीं है.
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बाजार खुला छोड़ने की वस्तु नहीं है नियंत्रण की वस्तु है।
prabhas ji karanjia ki ramvilas sarma ki line per aa rahe hai . sanskrutik virasat ka sach pata to pahle bhi raha hoga pr aab sweekarna suru kiya hai . badhai
तजकर चरण विवेकमय, करतब करे अनेक.
करतब करे अनेक, सवारी है उल्लू की.
जिसपर बैठे, मति-हरण करले लल्लू की.
कह साधक विष्णु के बिन लक्ष्मी ऐसी है.
उठती गिरती सेंसेक्स की गति जैसी है.
और हाँ! आज विष्णु समाज/राष्ट्र है.
उल्लू कौन? सब जानते हैं,सिवाय उल्लूओं के!
नही हो जो उल्लू- तो इसे समझे...
छतीस का है आँकङा,लक्ष्मी-वीणापाणि.
विष्णु के सान्निध्य में दोनो सुख की खानि.
दोनो सुख की खानि कौन क्न्कार करेगा?
ज्ञान और सम्पत्तिमय भारत विश्व वरेगा.
समझो साधक विष्णु है विवेक का दाता.
तज विवेक आचरण इन्डिया नित भटकाता.
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