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अर्थ-अनर्थ

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मंहगाई को रोकना है तो...

रिज़र्व बैंक ने एक बार फिर ब्याज दरें बढ़ा दीं हैं। उनकी सोच है कि बाज़ार में रुपये की कमी से खर्च पर लगाम लगेगी और उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद कम होगी। रिज़र्व बैंक के प्रबंधन में देश के चोटी के विद्वान लगे हैं। अर्थशास्त्र के एक प्रकांड पंडित इस देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए यह कहना कि ब्याज़ दर बढ़ा कर मंहगाई पर काबू पाना नामुमकिन है, शायद छोटे मुंह बड़ी बात होगी लेकिन सच्चाई यह है कि बैंकों से पैसा लेकर फालतू की चीज़ें नहीं खरीदी जातीं।
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आईपीएल में कैसे और कहां से बरस रहा है पैसा?

कभी सोचा है आपने कि आखिर आठ-दस टीमों के खेलने-खिलाने से आईपीएल में कैसे और कहां से ऐसा पैसा बरस रहा है? आखिर क्यों तमाम घृणित किस्म की राजनीतिक जोड़तोड़ से, जाने कहां-कहां से करोड़ों जुगाड़कर बड़े-बड़े दिग्गज इस पर दांव लगा रहे हैं?
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बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के चंगुल में बिहार

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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने एक बार फिर सात वर्षो के बाद बिहार के किसानों को अपने चंगुल में ले ही लिया और बिहार के किसानों को मक्के की ऐसी बीज बेचकर चम्पत हो गए जिसमें अंकुरण तक नहीं आया। इनसे उपजी मक्के की फसल में दाने नहीं आए और लाखों हेक्टेयर की फसल बिहार में बर्बाद हो गई। सात साल पहले भी बिहार में मोन्सेन्टो कम्पनी के कारगिल बीज ने ऐसा ही गुल खिलाया था।...
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पटना निगल जाता है आधा बिहार

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं कि बिहार का विकास किए बगैर देश विकसित नहीं हो सकता, मगर जब बात उनके अपने राज्य की आती है तो संभवत: यह तर्क वे भूल जाते हैं और विकास की बड़ी राशि पटना में ही खर्च कर डालते हैं, भले भागलपुर, पूर्णिया या सुपौल जैसे जिले पिछड़े ही रह जाएं।...
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लीजिए, एक और किसान हितैषी बजट

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वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण का आखिरी वाक्य देखिए. वे कहते हैं- "यह बजट आम आदमी से जुड़ा है. यह किसानों, कृषि कारोबारियों, उद्यमियों और निवेशकों से जुड़ा हुआ है." अरे, एक और किसान हितैषी बजट आ गया. पिछले दस सालों के बजट बाद के संपादकीय पढ़िये. आपको हर संपादकीय में एक बात जरूर दिखाई देगी कि किसानों और कृषि के उत्थान के लिए सरकार ने नये सिरे से प्रयास किये हैं. हमारी मीडिया के लिहाज से हर बार बजट में वित्त मंत्री किसानों के लिए अच्छी अच्छी खबरें लेकर आते हैं. ...
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भविष्य के भारत की ओर पहला बजट

वित्त वर्ष 2010-11 बजट प्रस्तुत होने से पहले आम आदमी की परिभाषा दाल रोटी से जोड़ी जा रही थी. लेकिन बजट आया तो आम आदमी की जगह शहर के वे लोग आ गये जो एक घर और गाड़ी का सपना देखते हैं. अपने बजटीय प्रावधान में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं वह उस आम आदमी को सचमुच राहत देनेवाली हैं जिनका रोना अब तक विपक्षी दल और मीडिया का एक हिस्सा रो रहा था. फिर अचानक ही प्रणव मुखर्जी का बजट आम आदमी का विरोधी कैसे हो गया?
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बजट में किसान और कृषक अलग अलग क्यों हैं दद्दू?

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषण के अंत में कहा है कि यह बजट आम आदमी का है। यह किसानों, कृषकों, उद्यमियों और निवेशकों का है। इसमें बाकी सब तो ठीक है, लेकिन किसान और कृषक का फर्क समझ में नहीं आया। असल में वित्त मंत्री ने अपने मूल अंग्रेजी भाषण में फार्मर और एग्रीकल्चरिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया है।
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बजट में करदाताओं को मिला उम्मीद से बढ़कर

जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी, वित्त मंत्री ने बजट 2010-11 में वह काम कर दिखाया। सभी को यही लग रहा था कि क्योंकि प्रत्यक्ष कर संहिता (डायरेक्ट टैक्स कोड) लागू होनी है, इसलिए शायद प्रणब मुखर्जी इस बार व्यक्तिगत आयकर की दरों या स्लैब में कोई तब्दीली नहीं करेंगे।
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प्रणव दा ने पेश किया 'आम' आदमी का आम बजट

शुक्रवार को लोकसभा में साल 2010-11 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री ने आखिर में इसे देश के आम आदमी को समर्पित करने के साथ समापन किया. नवगठित यूपीए सरकार के वित्तमंत्री के बतौर अपना पहला बजट प्रस्तुत करते हुए समाजवादी अर्थव्यवस्था के पक्षधर प्रणव मुखर्जी ने कारपोरेट और आम आदमी के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है.
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बजट भाषा की परिभाषा

बजट के दौरान कुछ शब्द अनिवार्य रूप से प्रयोग किये जाते हैं जो अर्थव्यवस्था के हालात बताते हैं. इन शब्दों का क्या अर्थ होता है, आइये समझने की कोशिश करते हैं-
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सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
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सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक ने 10 नवंबर को सोनिया गांधी पर सीआईए एजंट होने का आरोप लगाकर सनसनी पैदा कर दिया है. पूरी की पूरी कांग्रेस उत्तेजित है और संघ भी बैकफुट पर चला गया है. सुदर्शन के आस पास के लोगों का कहना है कि सुदर्शन जी भुलक्कड़ हो गये हैं और उन्हें कुछ ठीक से याद नहीं रहता. शायद इसीलिए उन्होंने इतनी बड़ी चूक कर दी. ...
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सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
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नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
मुंबई। महाराष्ट्र के नए निजाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। कांग्रेस आलाकमान ने अशोक चव्हाण को फर्जीवाड़े से फ्लैट पाने के आरोप में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की गद्दी से हटा दिया। लेकिन नए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी उसी तरह के फर्जीवाड़े में गले तक डूबे हुए हैं। उन्होंने जितने बड़े बड़े झूठ बोलकर सरकार से फ्लैट हथियाए हैं वे कांग्रेस के लिए ज्यादा दागदार हैं।...
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अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
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अपने होने पर ही हैरान
‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं। ...
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गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?
यह एक ऐसा सवाल है जिस पर अब विवाद होने लगा है. 30 जनवरी 1948 को क्या जब महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे ने गोली मारी तो महात्मा गांधी ने अपने मुंह से हे! राम का संबोधन किया था? उस वक्त घटनास्थल पर मौजूद रहे एक प्रत्यक्षदर्शी के डी मदान का कहना है कि "मैंने नहीं सुना था कि उन्होंने हे राम कहा था या नहीं."...
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भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
स्कूल जाते बच्चों के भी हाथ में भगवा थमाकर भले ही संघ ने शक्ति प्रदर्शन की भरपूर कोशिश की हो लेकिन 10 नवम्बर का दिन उसके इतिहास में कोई बडी घटना के रूप में याद नहीं किया जायेगा। हॉ हम बात कर रहे है राजस्थान के भरतपुर जिला मुख्यालय की जहॉ देश भर की ही तरह हिन्दुवादी संघटनों ने अपने उपर लग रहे ‘भगवा आतंकवाद’ के आरोपों के विरोध में शक्ति प्रदर्शन किया था। भरतपुर जहॉ संघ प्रचारक क रूप में भाजपा के पीएमइन वेंटिग लालकृष्ण आडवानी ने अपनी सेवाऐं दी है संघ का ये विरोध प्रदर्शन एक दम भददा और हल्का रहा।...
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एनसीपी के 'दादा' का दांव
महाराष्ट्र में कांग्रेस में परिवर्तन हुआ तो राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भी अपने पत्ते खोल दिये. राज्य में लंबे समय से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही सत्ता के दावेदारी पर एनसीपी ने आखिरकार प्रदेश की प्रशासनिक कमान अपनी ओर से शरद पवार के भतीजे अजीत पवार को सौंप दी है. अब गुरुवार को शाम साढ़े चार बजे पृथ्वीराज चव्हाण के साथ अजीत "दादा" पवार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे....
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पीएमओ वाले पृथ्वीराज
महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यूपीए सरकार पार्ट वन और पार्ट टू में बतौर पीएमओ मिनिस्टर जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए भी उन्होंने कभी ताकतवर होने का दंभ नहीं पाला और चुपचाप काम करते रहे. बिट्स पिलानी से बीई और बर्कले विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री हासिल करनेवाले पृथ्वीराज की राजनीतिक कमेस्ट्री ने उनके सार्वजनिक जीवन में पहली बार इतना गाढ़ा रंग उड़ेला है....
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सुलग रहा है मेरठ 'हिन्दुस्तान'
एक ओर हिन्दुस्तान अखबार अपनी अलग कंपनी बनाकर अखबार को चमकाने और अखबार का विस्तार करने में लगा है वहीं दूसरी ओर हिन्दुस्तान के विभिन्न संस्करणों में हालात ठीक नहीं है. हिन्दुस्तान के मेरठ संस्करण में इन दिनों इस्तीफे दिये जा रहे हैं लेकिन प्रचारित किया जा रहा है कि जो आफिस नहीं आ रहे हैं वे छुट्टी पर चले गये हैं....
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आलोक तोमर के बगल में बसे किशोर मालवीय
सीएनईबी में पहले से एक सलाहकार संपादक थे- आलोक तोमर. अब दूसरे सलाहकार संपादक भी वहां नियुक्त हो गये हैं किशोर मालवीय. उन्होंने सीएनईबी चैनल के साथ बतौर कंसल्टिंग एडिटर अपनी नई पारी की शुरुआत की है। सीएनईबी से पहले वे ‘वायस ऑफ इंडिया’ न्यूज चैनल के साथ जुड़े हुए थे। उन्होंने करीब दो दशक के कॅरियर में देश के नामी-गिरामी मीडिया संस्थानों में कई जिम्मेदारियां निभाईं हैं।...
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सुरक्षा परिषद की छांव में खेती पर दांव
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संसद में दिये गये अपने भाषण में भारत से मिले प्यार की भूरि भूरि प्रशंसा जरूर की लेकिन अपनी व्यावसायिक मजबूरियों को छिपा नहीं सके. बराक ओबामा ने संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए जहां एक ओर भारत को महाशक्ति करार देकर उसके लिए संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता को अपना समर्थन दिया वहीं भारत और अमेरिका द्वारा मिलकर खेती के क्षेत्र में एक और हरित क्रांति के आगाज की घोषणा की....
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आतंक नहीं कश्मीर केन्द्रित हुई ओबामा यात्रा
रविवार की देर शाम भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित भोज में ओमर अब्दुल्ला के शामिल होने से जो आशंका पैदा हुई थी वह सोमवार को हैदराबाद हाउस में और प्रबल रूप में सामने आ गयी जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में स्वीकार किया कि वे पाकिस्तान से बात करते वक्त "के" शब्द पर बात करने से नहीं कतराते हैं....
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भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
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