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मार ही डालेगा यह मोबाईल

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आखिरकार दूरसंचार विभाग ने भी माना है कि मोबाईल फोन मानवस्वास्थ्य के लिए खतरनाक है इसलिए बच्चों, गर्भवती महिलाओं और हृदय रोगियों को इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए.

मोबाईल फोन से होने वाले रेडिएशन के खराब असर के बारे में लोगों को चेतावनी देते हुए सरकार ने मोबाईल सर्विस प्रोवाइडर्स और मोबाईल फोन निर्माताओं से ऐसे प्रचार विज्ञापनों से बचने को कहा है जिनमें बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मोबाईल फोन का इस्तेमाल करते दिखाया गया हो। दूरसंचार मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइंस के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली इलैक्ट्रो-मैग्नेटिक वेव्स मोबाइल इस्तेमाल करने वाले के दिमाग के टिशु काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं। गाइलाइंस में बच्चों, प्रेगनेंट महिलाओं और दिल की बीमारियों से पीड़ित लोगों को मोबाइल फोन का सीमित इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है।

भारत में मोबाइल फोन के इस्तेमालकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और साल 2010 के अंत तक इनकी संख्या बढ़कर 50 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि बहुत से माता-पिता सुरक्षा कारणों और हर समय संपर्क बनाए रखने के मकसद से अपने बच्चों को टेलीफोन मुहैया कराते हैं। गाइडलाइंस में कहा गया है कि मोबाइल फोन या रेडियो टर्मिनल्स रेडियो फ्रीक्वेंसी रेडिएशन एनर्जी छोड़ता है जो टिशूज़ को गर्म कर देती है और यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

लंबे समय तक मोबाईल फोन का इस्तेमाल करने से दिमाग के कुछ सेल्स को नुकसान हो सका है। गाइडलाइंस में कहा गया है कि अगर मोबाइल फोन का लंबे समय तक इस्तेमाल सीमित करना संभव नहीं है तो हैंड्सफ्री का इस्तेमाल करना चाहिए। इसमें यह भी सिफारिश की गयी है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन के इस्तेमाल से रोकना चाहिए क्योंकि बच्चों के टिशू काफी नाजुक होते हैं और उन पर असर अधिक होता है। रिपोर्ट के अनुसार ध्वनि यंत्रों का इस्तेमाल करने वाले, पेसमेकर लगाने वालों और दूसरे मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करने वाले लोगों को मोबाइल फोन का सीमित इस्तेमाल करना चाहिए।

इसके साथ ही अस्पताल परिसर के आईसीयू जैसे संवेदनशील इलाकों में भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल पूरी तरह बैन होना चाहिए। मंत्रालय ने मोबाईल फोन विनिर्माताओं से वेबसाइट या प्रत्येक हेंडसेट पर स्पेसिफिक एबजोर्प्शन रेट (एसएआर) का ब्यौरा देना चाहिए। एसएआर दर इस बात का संकेत उपलब्ध कराती है कि औसतन कितने समय तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल हानिकारक नहीं है। थेरपी का सहारा लेने वाले व्यक्तियों को भी मोबाइल फोन से बचना चाहिए। मोबाइल फोन से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के ब्रेन के टिश्यू को क्षतिग्रस्त करती हैं। इन नतीजों के संदर्भ में दूरसंचार मंत्रालय ने हाल में कुछ गाइडलाइंस जारी कीं। सर्विस प्रोवाइडरों और निर्माताओं से कहा गया है कि वे विज्ञापनों में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सेलफोन का इस्तेमाल करते न दिखाएं।

इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि चीन के बाद सेलफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा भारत में बढ़ रही है। 2010 तक करीब 50 करोड़ लोगों के हाथ में सेलफोन होगा और इनमें ज्यादा तादाद बच्चों की होगी। कई पैरंट्स सुरक्षा के लिहाज से और हर समय खुद से जोड़े रखने के लिए बच्चों को मोबाइल फोन दिला देते हैं। मगर गाइडलाइंस में कहा गया है कि मोबाइल फोन या रेडियो टर्मिनल रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी को रेडिएट करते हैं। ये शरीर के टिश्यू को और गर्म करने का काम करते हैं जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है।

बिना हैण्ड्सफ्री न के लंबी बात करने से इस बात का खतरा भी लगातार बना रहता है कि कहीं इसके लंबे इस्तेमाल से दिमाग के टिश्यू नष्ट न हो जाएं। मंत्रालय ने लोगों को सलाह दी है कि अगर देर तक बात करना जरूरी हो तो वे हैंड्सफ्री का इस्तेमाल करें। साथ ही 16 साल से नीचे के बच्चों को सेलफोन से दूर ही रखें। बच्चों के टिश्यू नाजुक होने के कारण जल्दी प्रभावित होते हैं। गाइडलाइन में कहा गया है कि हॉस्पिटल के आईसीयू में भी मोबाइल पर रोक लगनी चाहिए। मंत्रालय ने निर्माताओं से प्रत्येक हैंडसेट के स्पैसिफिक एबजॉर्पशन रेट (एसएआर) के विवरण वेबसाइट और हो सके तो हैंडसेट पर भी देने को कहा है। एसएआर वैल्यू ही तय करती है कि किसी मोबाइल फोन को किस हद तक इस्तेमाल करना नुकसानदेह नहीं है। इस बीच मंत्रालय ने स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी और इसके प्रसार के लिए असरदार सिस्टम विकसित करने पर भी जोर दिया है। इस काम में वैज्ञानिक, सरकार, उद्योग और जनता को मिलकर काम करना चाहिए ताकि मोबाइल फोन तकनीक के बारे में बनी आम समझ के स्तर को ऊपर उठाया जा सके।

इलेक्ट्रो मेग्नेटिक वेव्स क्या होता है?

मोबाईल फोन ध्वनि संकेतों को यहां से वहां पहुंचाने के लिए रेडियों तरंगों का इस्तेमाल करते हैं. ये तरंगे इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों का हिस्सा होती हैं जिन्हें स्पेक्ट्रम कहा जाता है. स्पेक्ट्रम को कई नामों से जाना जाता है. मसलन, एक्सरे, इन्फ्रारेड और अल्ट्रा वायलेट किरणें आदि. उर्जा विखंडन के अलग-अलग पहलुओं पर स्पेक्ट्रम कई हिस्सों में विभाजित होता है. इसे मापने के लिए जो पैमाना प्रयोग होता है उसे हर्ट्ज कहते हैं. इसी पैमाने से यह मापा जाता है कि प्रति सेकेण्ड कितनी रेडियों तरंगें आपके पास तक पहुंच रही हैं. मसलन जब जीएसएम आधारित मोबाईल सेवा शुरू हुई थी तो 900k का सिम इस्तेमाल होता था. लेकिन आज सामान्य तौर पर 1800k का सिम इस्तेमाल होता है. यानी पहले मोबाईल पर बात करते समय अगर प्रति सेकेण्ड आप 900 हर्ट्ज रेडियो तरंगे आपके पास पहुंचती थी तो अब वह 1800 हर्ट्ज हैं. यानी विकिरण का खतरा दोगुना हो गया है.

अत्यधिक फ्रीक्वेंसी के रेडियों तरंगों का प्रयोग साफ और स्पष्ट बातचीत के लिए जितना अच्छा है स्वास्थ्य के लिए उतना ही नुकसानदेह. यह रेडियो विकिरण इतना ताकतवर होता है कि वह आपके सेल्स में आमूल बदलाव कर देता है. यही नहीं इसका असर डीएनए पर भी होता है और लगातार विकिरण के प्रभाव में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

अनिद्रा का कारण भी है मोबाईल

एक हफ्ता पहले ब्रिटेन में एसोसिएटेड स्लीप सोसायटी द्वारा जारी एक अध्ययन में भी कहा गया है कि जो किशोर औसतन 5एसएमएस और 5 फोन काल प्रतिदिन करते हैं वे अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं. स्लीप-2008 नामक इस शोध में दावा किया गया है कि जो मुक्त होकर मोबाईल का इस्तेमाल करते हैं वे अनिद्रा, थकान और चिड़चिड़ेपन का जल्दी शिकार हो जाते हैं. अध्ययन में पाया गया है कि जो किशोर मोबाईल का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उनके शरीर का बायोलाजिकल क्लाक बिगड़ जाता है और वे कई तरह की परेशानियों से धिर जाते हैं.     

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tulsi singh bisht on 17 June, 2008 15:33;18
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माना मोबाइल फोन एक आना वाला खतरा पैदा हो गया है और सरकार भी धीरे-धीरे जागरूक हो रही है। लेकिन आज तक किसी भी मोबाइल फोन कंपनियों और हेण्डसेट बनाने वाली कंपनियों ने अपनी बात को स्वीकार नहीं किया है। वे विज्ञापन के द्वारा दुनिया को पास लाने की बात करते हैं और अपनी अपनी कंपनियों के सिंग्नलस ठीक बताती और कहती है मुझे इस्तेमाल करो और टावर फुल पाऊ। इस पर भी सभी कंपनियों को एक प्रकार के सिंग्नलस देना चाहिए ताकि लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना चाहिए। लेख काफी अच्छा है आगे भी लिखें।
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anita kumar on 17 June, 2008 23:20;01
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great post
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कबीर on 15 August, 2009 16:48;18
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लेख अच्छा प्रतीत होता है.............. आँह उबासी
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