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खुशहाल सोनिया की बदहाल रायबरेली

image सोनिया गांधी द्वारा आईटीआई में जीएसएम प्लांट का उद्घाटन

राबरेली में कांग्रेस उस सर्कस के समान है जहां सोनिया के आते ही तंबू लग जाता है, कुर्सियां बिछ जाती हैं और उनके जाते ही तंबू उखड़ जाता है.

रायबरेली परंपरागत रूप से नेहरू परिवार का चुनावी क्षेत्र रहा है. यहां से ज्यादातार समय नेहरू वंश के लोगों ने ही प्रतिनिधित्व किया. आपातकाल के बाद राजनारायण द्वारा इंदिरा की हार को छोड़ दें तो बाकी सभी चुनावों में कांग्रेस का प्रतिनिधि ही चुनकर आता रहा है. लेकिन कांग्रेस की छत्रछाया में 60 साल रहने के बावजूद रायबरेली बदहाल है. एक बार जब फिर लोकसभा चुनाव सामने हैं तो स्थानीय लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्होंने सोनिया से क्या पाया और क्या खोया.

अगर उद्योगों की ही बात करें तो यहां उद्योगों की हालत खस्ता है. रायबरेली में आधुनिक औद्योगिक युग की शुरूआत रायबरेली टेक्सटाईल मिल के निर्माण के साथ शुरू हुआ. शुरू में यह निजी क्षेत्र की कंपनी थी जिसे बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने केन्द्र सरकार के अधीन कर लिया था. लंबे समय बंद रहने के बाद 2005 में इसे दोबारा शुरू किया गया. कंपनी में लगभग एक हजार महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है. लेकिन वेतन को लेकर झगड़ा कभी खत्म नहीं होता. शुरू में इन्हें 12 रूपये मासिक वेतन दिया जाता था जिस पर लंबे समय तक विवाद चला तो कंपनी ने वेतन बढ़ाकर 1800 रूपये कर दिया. जबकि केन्द्र सरकार के नियमानुसार 2700 रूपये होना चाहिए. 1973 में आईटीआई की स्थापना के साथ रोजगार का बड़ा अवसर उपलब्ध हुआ. आईटीआई(इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री) के साथ ही इसे कलपुर्जों की सप्लाई करनेवाली सैकड़ों और छोटी-बड़ी युनिटें अस्तित्व में आ गयी. तमाम कोशिशों के बावजूद पिछले 13 सालों से आईटीआई घाटे में चल रही है. 2003 में तो हालत इतने खराब हो गये कि लगभग एक हजार कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (वीआरएस) दे दिया गया. जिन्हे वीआरएस दिया गया उनमें अधिकांश गैर-अधिकारी वर्ग के हैं. कंपनी के घाटे में होने के कारण पिछले चार-पांच सालों से कर्मचारियों को मिलनेवाली शिक्षा, स्वास्थ्य, एलटीसी आदि की सुविधाएं बंद हैं.

ऊंचाहार में स्थापित फिरोज गांधी थर्मल पावर कारपोरेशन 1980 में शुरू हुई थी. जब यह परियोजना शुरू हुई थी तो राज्य सरकार के अधीन थी. बाद में 1992 में राज्य सरकार ने इसे एनटीपीसी को हस्तांतरित कर दिया. परियोजना पूरी तरह से फायदे में है और इसकी एक यूनिट की जगह अब चार यूनिट बिजली पैदा कर रही हैं. लेकिन इंदिरा गांधी ने किसान परिवारों से वादा किया था कि उन्हें जमीन की कीमत के साथ इस परियोजना में नौकरी भी मिलेगी. उस समय किसानों ने इस परियोजना के लिए जमीन देने के लिए साफ तौर पर मना कर दिया था. लेकिन इंदिरा गांधी की अपील और आश्वासन के बाद किसानों ने अपनी जमीन दी थी. लेकिन आज भी नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन में वादे के बावजूद एक हजार किसान परिवारों को नौकरी नहीं मिली है. जबकि परियोजना की पहली ही यूनिट लगने में 18 गावों के 1361 किसान परिवार प्रभावित हुए थे.

रायबरेली में बंद औद्योगिक इकाईयां- मोदी कारपेट लिमिटेड- कटवारा, यूनिवर्सल इन्सुलेटर कंपनी- अमावां रोड, कृष्णा पेपर मिल- हरचंद्रपुर, शरारे शू कंपनी- बछरावां, इन्कैन फर्टिलाईजर- कुंदनगंज, यूपी टायर एण्ड ट्यूब कंपनी- अमावां रोड, रावल पेपर मिल- अमांवा रोड, नेशनल स्विच एण्ड गियर- अमावां रोड, वेस्पा कार कंपनी- सलोन, रायबरेली टेक्सटाईल कंपनी- सुल्तानपुर रोड, अपकाम केबिल्स- अमावां रोड, जाम टूल्स- सुल्तानपुर रोड- धवन उद्योग- सुल्तानपुर रोड, बिरला सीमेन्ट एण्ड पाईप- मुंशीगंज, श्रीधर इंटरप्राईजेज- सुल्तानपुर रोड

तमाम दबाव और लिखत-पढ़त के बाद मुश्किल से 207 लोगों को किसी तरह इस परियोजना में समायोजित किया गया. लेकिन अब केन्द्र सरकार के अधीन हो जाने के बाद और चार साल के कांग्रेसी शासन और सोनिया गांधी के नेतृत्व के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. कोयले से निकलनेवाली राख पांच किलोमीटर के दायरे में लोगों को बीमार कर रही है. सरायपरसू गांव के काकोरे लाल कहते हैं कि "टीबी और दमा तो यहां छूत का रोग हो गया है. हर गांव में दर्जनों लोग टीबी और दमा के शिकार हैं." एनटीपीसी के खिलाफ समय-समय पर विरोध चलता रहता है लेकिन न कोई सुनवाई होती है और न ही इन ग्रामीणों की चिंता करनेवाला कोई है.

इसी तरह एक निजी क्षेत्र की कंपनी मोदी कार्पेट लिमिटेड की स्थापना 1977 में हुई थी. लेकिन 1993 आते-आते यह बंद हो गयी. 2002 में घाटे का सौदा मानकर प्रबंधन ने इस कंपनी को बेच दिया. कंपनी के बंद होने के कारण 500 परिवार भुखमरी के शिकार हो गये. यहां के लोगों को इस सवाल का जवाब नहीं मालूम कि जिस कंपनी को दो बार विदेशी मुद्रा कमाने के लिए पुरस्कृत किया गया हो वह बीमार कैसे हो सकती है. कर्मचारियों ने अपनी तरफ से पहल करके कहा कि वे कंपनी चलाएंगे और प्रबंधन को 32 लाख रूपये मासिक का निश्चित लाभ भी देंगे लेकिन प्रबंधन इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ. उल्टे कर्मचारियों का जो बकाया वेतन था वह भी उन्हें नहीं दिया गया.

रायबरेली के कोई डेढ़ दर्जन बड़े और सैकड़ों की संख्या में छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं. इससे यहां हजारों लोग बेरोजगार हुए हैं. इस बात की शिकायत तो लोगों में है ही कि जिस क्षेत्र की सांसद सर्वशक्तिमान सोनिया गांधी हों और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हो वहां अगर लोग परेशान हैं तो दोष आखिर किसे दिया जाए. उद्योगों की बात न भी करें तो यहां सांसद निधि के दुरूपयोग का भी आरोप लगता है. विपक्षी दल कहते हैं कि यहां सोनिया गांधी सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं के घरों में बिजली पानी की चिंता करती हैं. कांग्रेसी भले ही यह तर्क दें कि गैर-कांग्रेसी सरकारों के शासनकाल में ही विकास अवरूद्ध हुआ है लेकिन रायबरेली में ये तर्क सिर्फ बचाय में दी गयी दलील नजर आती है और कुछ नहीं.   

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Rajesh Agrawal on 23 June, 2008 22:25;30
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सच है कि भावनाओं के भरोसे बार-बार मत बटोरे नहीं जा सकते. रायबरेली का आक्रोश कहीं एक न जीती जा सकने वाली लड़ाई में न बदल जाये. बेहतरीन लेख, लेखक और ब्लाग माडरेटर संजय जी को धन्यवाद!
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