जान देंगे, जमीन नहीं
क्या एसईजेड के अलावा हमारे सामने औद्योगीकरण का कोई और रास्ता नहीं है? अगले एक-डेढ़ दशक में जब उद्योंगों की परिभाषा पूरी तरह से बदल जाएगी
तब चिमनियां लागने के नाम पर जबरी दी गयी जमीनों का असली मालिक कौन रह जाएगा? सब जानते हैं कि सूचना तकनीकि के प्रभाव में अगले एक-डेढ़ दशक में उद्योगों की चिमनी अवधारणा पूरी तरह से बदल जाएगी. औद्योगिक उत्पादन के वर्तमान ढांचे में भारी बदलाव अवश्यंभावी है. अगर हमारी सरकारें भी यह जानती हैं तो एसईजेड के मोहपाश से कोई सरकार मुक्त क्यों नहीं है? जबकि दूसरी ओर इस बार राजनीतिक दलों की बजाय आश्चर्यजनक रूप से औद्योगीकरण के खिलाफ देश के किसान और मजदूर अपने स्तर पर लामबंद हो रहे हैं। पिछले साल भर में महाराष्ट्र का कोंकण, पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम, पंजाब का बरनाला और अमृतसर, हरियाणा का झज्जर और गुड़गांव, छत्तीसगढ़ का धुरली और बांसी, उत्तर प्रदेश का दादरी, उड़ीसा का कलिंग क्षेत्र इसके प्रमाण बन गये हैं कि एसईजेड के नाम पर किसानों की जमीन को अनाप-शनाप तरीके ये कब्जा किया जा रहा है।
देश में 401 एसईजेड को सैध्दांतिक तौर पर मंजूरी मिल चुकी है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा है। 2.80 लाख एकड़ जमीन इनके लिए निधार्रित की जा चुकी है। सारी कहानी यहीं से शुरू होती है। किसी भी कंपनी ने विशेष आर्थिक क्षेत्रा बनाने के लिए सरकार के पास आवेदन किया तो उसने यह भी बताया कि उसे अपना विशेष आर्थिक क्षेत्रा विकसित करने के लिए कितनी जमीन चाहिए। सरकार कहती है कि 100 एकड़ से कम का प्रस्ताव होगा तो हम विचार नहीं करेंगे। जो एसईजेड एक्ट बना है, उसमें कहा गया है कि जो कंपनी एसईजेड बनाएगी उसको सिर्फ 35 प्रतिशत जमीन पर औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना करनी होगी। बाकी की जमीन को वह अपनी सुविधा के अनुसार रिहाईशी क्षेत्र, व्यवसाय, अस्पताल, स्कूल आदि के लिए विकसित कर सकती है। किसी भी व्यवसायी के लिए यह प्रस्ताव कारू के खजाने जैसा है। अगर औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना में कोई दिक्कत आती है, दूसरे धांधों से न केवल लागत निकाली जा सकती है बल्कि भारी मुनाफा कमाया जा सकता है। इसलिए एसईजेड के लिए जितने भी आवेदन आये हैं वे बड़े शहरों के आस-पास हैं।
देश में लगभग 18 करोड़ हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है। इस जमीन से पूरा देश रोटी पाता है और लगभग 65 फीसदी लोग अपनी रोजी कमाते हैं। इन जमीन धारकों में 80 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनके पास औसत 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। ये 2 हेक्टेयर वाले किसान देश की अर्थव्यवस्था की वह कुंजी हैं जो सकल घरेलू उत्पाद में भले ही कोई खास योगदान न देते हों फिर भी ये अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। न्यूनतम संसाधान में जीवन यापन की ऐसी व्यवस्था के वाहक हैं ये किसान जो भारत को लाख गरीबी में भी वज्र की भांति अभेद्य रखती है। किसानों की एकजुटता का अभियान चला रही वंदना शिवा कहती हैं, 'यही वे लोग हैं जिन्होंने जमीन की उर्वरा शक्ति को बनाये रखा है जिसके कारण हम पिछले दस हजार साल से उसी जमीन पर उसी मात्रा में अन्न उत्पादन कर रहे हैं। अगर उनकी इस तकनीक को हमने छीन लिया तो हो सकता है, अगले दस साल में ही हम दुनिया में अनाज के सबसे अधिक आयातक बन जाएं।' नीति निर्धारकों की बारीक समझ में यह मोटी सी बात भले ही न बैठे लेकिन इसमें सच्चाई है। आदिवासी किसानों के बीच लंबे समय से संघर्ष कर रहे पूर्व प्रशासनिक अधिकारी बी डी शर्मा कहते हैं, 'दुनिया में किसी भी देश के पास ऐसी उपजाऊ जमीन होती तो वह इसे गहने की तरह सहेज कर रखता। हम इसका माटी सा मोल भी नहीं कर रहे हैं।' आज भी जमीन हथियाने की वही नीति है जो अंग्रेजों के समय में थी।
1894 का भूमि अधिग्रहण कानून और इसी से जुड़े हुए 17 ऐसे कानून हैं जो सरकार को यह आजादी देते हैं कि वह जब चाहे, जैसे चाहे, जहां चाहे जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। तब ब्रिटिश हूकूमत व्यापारियों की रक्षा के लिए इस कानून का इस्तेमाल करती थी आज सरकारें इसी कानून की आड़ लेकर कारपोरेट घरानों की लठैत बन गयी हैं। इसके तहत सरकार के लिए सिर्फ दो अनिवार्य शर्त है। पहली शर्त भूमि अधिग्रहण से पहले उसे कम से कम दो अखबारों में इसकी सूचना देनी होगी और दूसरा जमीन से बेदखल हो रहे किसानों का पुनर्वास करना होगा, जिसमें जमीन का मूल्य, नये जगह विस्थापन आदि शामिल है। कानूनी रूप से सरकार को कोई बाधयता नहीं है कि वह भूमि अधिग्रहण के विरोध को स्वीकार ही कर ले। अगर सरकार तय शर्तों को पूरा करती है तो कोई कोर्ट-कचहरी उसके रास्ते में नहीं आ सकता। ग्रामीण विकास मंत्रालय में सचिव रहे के बी सक्सेना बताते हैं, 'किसानों के सामने सिवाय अपनी जमीन से बेदखल होने के और कोई रास्ता नहीं है।'
देश में इतने बड़े उथल-पुथल की व्यूह रचना चल रही है लेकिन मूर्खतापूर्ण ढंग से सभी राजनीतिक दल 'विकास' के हिमायती बने हुए हैं, जिसका आम आदमी की बेहतरी से कुछ लेना-देना नहीं है। यह कारपोरेट, राजनीतिज्ञों और सरकारी बाबुओं का ऐसा लाभकमाऊ गठजोड़ है जिसके पैरामीटर विदेश में बैठे आकाओं द्वारा गढ़े जाते हैं। प्रशासनिक रूप से पूरब में बंगाल और पश्चिम में गुजरात भले ही विचारधारा के स्तर पर विपरीत ध्रुवों पर बैठे हों लेकिन औद्योगिक विकास और विस्थापन के मसले पर दोनों तरह के विचारधारा की सरकारें एकराय हैं।
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अरिंदम चौधरी का सच्चाई बयां करने वाला सम्पादकीय पढें, पता चल जाएगा की इस भूखे नंगों के देश में रोज़ नए ग्लोबल बिलियनियर्स(हजारों की तादाद में) कैसे पैदा हो रहे हैं.
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