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किचेन में यूरेनियम

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कल रात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एटमी करार की भव बाधाओं से जूझ और एक हद तक निपट कर सोए थे लेकिन जागे तो एक जोरदार धमाका उनका इंतजार कर रहा था।

मुद्रास्फीति का इंडेक्स आ चुका था और यह कोई अच्छी खबर नही थी कि बाजार में एक सप्ताह में महंगाई की दर साढ़े ग्यारह फीसदी तक पहुंच गई है और सरल भाषा में कहें तो आलू-प्याज से गाजर-मूली और साबुन तेल तक के दाम बढ़ गए हैं और बाजार आम आदमी और सरकार दोनों की पकड़ से बाहर हो गया है।

यह कोई शुभ सूचना नही है। सब लोग और खासतौर पर विपक्षी यह याद दिलाने में कतई नही चुक रहे कि यह महंगाई तेरह साल का एक रिकॉर्ड है और पिछली बार भी यह रिकॉर्ड तभी बना था जब मनमोहन सिंह नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री हुआ करते थे। मनमोहन सिंह वित्त मंत्री रहने के पहले रिजर्व बैंक के गर्वनर भी रह चुके हैं और उन्हें अच्छी तरह पता है कि मुद्रास्फीति क्यों होती है और इसके क्या-क्या उपाय हो सकते हैं। अब तो खैर बहुत देर हो गई है मगर चिदम्बरम को वित्तमंत्री बना कर मनमोहन सिंह ने कोई बहुत शानदार फैसला नही किया था। जब उनको मोंटेक सिंह अहलुवालिया को भारत सरकार में लाना ही था तो उन्हें ही वित्त मंत्री बना देते। या प्रधानमंत्री रहते हुए भी वित्त मंत्रालय वे खुद अपने पास रख सकते थे। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है।

अब जब महंगाई पर हाहाकार मचा हुआ है और कोई निदान बताने की बजाय सभी धिक्कार मंत्र जपने में लगे हुए हैं तो एक बात पर हैरत होती है। जिस दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़े थे उसी दिन वित्त मंत्री चिदम्बरम ने घोषित कर दिया था कि इसका असर बाजार पर पड़ना लाजमी है। जब ये भाव बढ़ाए गए थे तो दुनिया के तेल बाजार में पेट्रोलियम की कीमत 135 डॉलर प्रति बैरल थी। आज की ताजा खबर यह है कि यह कीमत इसी साल 200 डॉलर तक पहुंच सकती है। सरकार को अगर दीवालिया नही होना है तो उसे फिर से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पडे़गे और जाहिर है कि मनमोहन सिंह सरकार को और जूते पड़ेंगे। एक बैरल में 119 लीटर से कुछ ज्यादा का आंकड़ा होता है और इस हिसाब से कच्चे तेल का दाम ही लगभग 38 रुपए प्रति लीटर बैठता है। इसके बाद रिफाइनरी का खर्चा और पेट्रोल पंपो से ले जाने और पंप मालिकों के कमीशन आदि को मिला कर तेल की कीमत तय होती है.  अगर कच्चा तेल 200 डॉलर के भाव हो गया तो हमें तमाम रियायतों के बावजूद एक लीटर पेट्रोल लगभग 75 रुपए में पड़ेगा। उस हालत में चुनाव में कांग्रेस का क्या हाल होगा यह समझा जा सकता है।

कृषि मंत्री शरद पवार आज बहुत हैरत में बता रहे थे कि हमारे पास इतना अनाज और आलू प्याज हुआ है कि किसानों के पास उसे रखने के लिए जगह नहीं है। भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भी पूरी तरह भरे हुए हैं। श्री पवार का कहना यह है कि किसानों को सरकार उचित दाम नही दे पा रही और यह भी बाजार में आए संकट की एक जड़ है। अब पवार को यह कौन याद दिलाए कि दो साल पहले जब अनाज के भंडार खाली थे तो विदेशों से खराब श्रेणी का गेंहू आयात करने के लिए भारत सरकार ने शायद उन्हीं की सहमति से जो दाम दिया था वही भारतीय किसानों को क्यों नही दिया जा सकता। अगर आप किसान की जेब और पेट भरी रखेंगे तो उनका कर्जा माफ करने की नौबत ही नही आएगी।

वामपंथी सबके सब लगता है कि अपने किचन गार्डन में सब्जियां और अनाज उगाते हैं। पूरा देश जब महंगाई को ले कर हैरान और परेशान था तो मार्क्सवादी पोलित ब्यूरो के महासचिव प्रकाश करात ने लगभग खीझ कर पत्रकारों से कहा कि महंगाई क्यों बढ़ी यह आप मुझसे क्यों पूछते हैं। उनसे पूछिए जिन्होंने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं और उन्हें एटमी करार की चिंता ज्यादा है। इस संदर्भ में कुत्ते की दुम वाला मुहावरा अपने आप याद आ जाता है। देश में सुनामी हो या चक्रवात अपने कामरेड भाई इंकलाब जिंदाबाद ही करते रहेंगे। भारत में सिर्फ खाना ही महंगा नही हो रहा। थोक भाव इंडेक्स के आधार पर ही महंगाई का हिसाब किया जाता है और यह शुक्रवार की रात तक ग्यारह से काफी आगे निकल गया था। रिजर्व बैंक की सुरक्षित सीलिंग सीमा इस मामले में साढ़े पांच प्रतिशत की है। इसका सीधा असर बैंकों पर पड़ा है और घर से ले कर गाड़ी खरीदने तक के कर्जे फटाफट महंगे हो गए हैं। फरवरी में जब मुद्रास्फीति साढ़े पांच प्रतिशत के आस पास थी तो बैंकों को छूट दी गई थी कि वे अपनी आधार पूंजी यानी नकद कर्ज अनुपात यानी केश क्रेडिट रेशियो का प्रतिशत छह तक ले जा सकते हैं। आज की तारीख में यह प्रतिशत नौ करने की जरूरत आ गई है और इतना पैसा खुद रिजर्व बैंक के खजाने में भी नही है।

फिलहाल उलटी धारा चल रही है। रुपया डॉलर की तुलना में मजबूत होता जा रहा है और इस बात से चिदम्बरम भले ही खुश हों लेकिन कमल नाथ नाराज हैं क्योंकि निर्यात करने के लिए उन्होंने जो लक्ष्य अपने सामने रखा था वह अब डॉलर की कीमत से निर्धारित होता है और यह कीमत बदलने से निर्यात का इंडेक्स नीचे चला जाता है। निर्यात नही होगा तो देश में विदेशी मुद्रा नही आएगी और विदेशी मुद्रा का अभाव कम से कम कमल नाथ की राय में भारत को दुनिया के व्यापार जगत में बहुत पीछे ले जाएगा। इस तर्क को अगर उलट कर देखें तो अगर निर्यात नही भी हो और रुपए का भाव बढ़ता रहे तो डॉलर का अनुपातिक दाम गिरेगा और भारत को मिलने वाला कच्चा तेल भी उन्ही बढ़े हुए डॉलर वाले दामों पर प्राप्त होगा। जाहिर है कि इसका असर महंगाई पर भी पड़ेगा और फिलहाल महंगाई के आंकड़ो को न सरकार अनदेखा कर सकती है और न किसी भी पार्टी के नेता। भाजपा के जो नेता उछल उछल कर बोल रहे हैं कि मनमोहन सिंह की सरकार महंगाई के मामले में फेल हो गई वे भी अगर किसी संयोग से सत्ता में आए तो यही महंगाई उन्हें भी विरासत में मिलने वाली है और इसे सुलझाने के लिए वे कोई ऐसे मौलिक प्रयास वे भी नही कर पाएंगे.

हमारे प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी विरोधी सब यूरेनियम की चिंता में रतजगा कर रहे हैं. बेहतर हो कि वे उस किचन की चिंता करें जिसके चूल्हे पर गुस्से का यूरेनियम धधक रहा है. गुस्से के इस यूरेनियम से जो विस्फोट होगा उससे वह सरकार ही नहीं रहेगी जो अमेरिका से यूरेनियम के समझौते पर अपनी रातों की नींद हराम कर सके.

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bharat sagar on 21 June, 2008 06:57;00
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Joote paren to paren , Alok ji , ye nahin sudh-renge ! kyonki ye desh ki oe nahin dekhte , Amerika ki or dekhten hain , desh ki or sirf chunav men !
Chunav ki isthiti ye hai , Nag -nathon , sanp-nathon men thode -thode dono -charo -aathon ,chun liye jaten hain , aur gath-bandhan shuru ho jata hai ..............
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tulsi singh bisht on 21 June, 2008 13:36;49
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यूरेनियम की आग और घर का कीचन, दोनों बातों में फर्क है। यूरेनियम का संबंध देश की सुरक्षा से है और किचन का संबंध अपनी पेट पूजा से। जहां तक यूरेनियम का विषय है इस पर प्रधानमंत्री को सोचना चाहिए देश के हित के लिए। और कीचन की समस्या इसलिए उत्पन्न है कि कभी प्रधानमंत्री ने खुद खाना नहीं बनाया तो उन्हें महंगाई के बारे में क्या पता चलेगा?? महंगाई की मार चारों तरफ से है। देश में और देश के बाहर भी। इसका सिर्फ इतना ही हल हो सकता है कि भारत देश जो सामान निर्यात करता है, उसके बदले में उस देश से समझौता करे कि हम आपको ये सामान दे रहे हैं और आप इस सामान के बदले तेल के दामों पर कंट्रोल करें अन्यथा हमें भी कुछ ठोस कदम उठने पड़ेंगे।
भारत देश कोई फिसड्डी देश नहीं है जो पेट्रोल उत्पन्न करने वाले देशों से डर जाए ये बात प्रधानमंत्री को समझनी चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री का जो रोना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेजी के कारण आई है। इसलिए महंगाई की मार जनता पर पड़ी है। मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहता हूं कि उन्हें समझना चाहिए कि हम भी कुछ दम रखते है अन्यथा कहावत है कि दूसरों के महल को देखकर अपनी झोपड़ी फूंक देना।
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आलोक तोमर on 23 June, 2008 00:06;46
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तुलसी भाई का बार्टर वाला आईडिया उत्तम है. बहुत उत्तम. मगर अमेरिका बड़ा हरामी है. हमारा ही आटा हमें बेच देता है अमेरिका सिर्फ़ भय का निर्यात करता है. खरीदेंगे?
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आलोक तोमर on 23 June, 2008 00:13;49
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इसे भी पढ़ लें कृपया

आलोक तोमर
नई दिल्ली, 22 जून- एटमी करार पर मची मार से परेशान है सरकार। लेकिन भारत सरकार की ही फाइलें बताती हैं कि भारत के पास यूरेनियम का विराट भंडार मौजूद है और बहुत कम लोगों को पता है कि भारत का यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इक्तीस अरब रुपए का निवेश भारत और अफ्रीका के कई देशों में यूरेनियम की खदानों में करने के वचन दे चुका है।

भारत में जिन राज्यों में सबसे ज्यादा यूरेनियम मौजूद है और जिसकी पुष्टि उपग्रह चित्रों ने भी की है, वे राज्य हैं झारखंड, बिहार, मेघालय, आध्र प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडू। इन राज्यों की खदानों से एक वर्ष में ही इतना यूरेनियम निकल सकता है जो हमारी अगले चालीस साल की जरूरतें पूरी कर दें।

भारतीय यूरेनियम कॉरपोरेशन ने झारखंड, आध्र प्रदेश और मेघालय में यूरेनियम की खुदाई और उसके संश्लेषण के लिए बड़ा बजट रखा है। सिर्फ झारखंड में साढ़े छह अरब रुपए इस काम में लगाने के लिए तैयार रखे हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के नलगौंड़ा और कड़प्पा जिलों में अठारह अरब के निवेश से यूरेनियम प्लांट लगाने की तैयारी की फाइल पर एटमी ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने फाइल पर 8 जून 2006 को दस्तखत कर दिए थे।

भारतीय यूरेनियम कॉरपोरेशन के अध्यक्ष रामेन्द्र गुप्ता की माने तो भारत यूरेनियम के मामले में विदेशों में भी निवेश करके अपने आपको यूरेनियम का बहुत बड़ा सप्लायर बना सकता है और उनकी निजी राय यह है कि अमेरिका के साथ एटमी करार करते समय भारतीय यूरेनियम के निर्यात और उपयोग पर अमेरिका का किसी भी तरह का प्रतिबंध मानने से इंकार कर देना चाहिए।

और तो और मुंबई की एक निजी कंपनी टॉरियन रिसोर्सज प्राईवेट लिमिटेड ने सहारा के रेगिस्तान के एक छोटे से देश नाइगर में शोध के बाद वहां तीन हजार वर्ग किलोमीटर की खदान खरीदी है और यूरेनियम कॉरपोरेशन को अपने उत्पादनों का एकाधिकार देने का भी वादा किया है। कंपनी के मालिक सचिन बालेजा ने कहा कि वे आयात-निर्यात के अपने व्यापार से हट कर अगर एक अनजान क्षेत्र में अपनी पूरी पूंजी झोंक रहे हैं तो इसमें देशभक्ति पहले और व्यापार बाद में।
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j on 09 August, 2008 02:49;54
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aalok ji badhai
yah bat thik nahi hai ki rupya majboot hone se niryat kam hota hai.jise jroorat hoti hai wah to jhak mar kar jis bhaw mile apni aawsyakta puri karta hai.hamare ameriki pitthu bhai hamko samjhate hai ki aap ka swasthya achha hona aapke liye thik nahi hai. hum man bhi lete hai. hai na kamal.ek niryat ka kalpnik dar chhod dijiye to rupya majboot hone se fayka hi fayda hai.aayat sasta pdega jisme kachcha tel bhi samil hai,krj ka bhugtan dollar me hone se wah bhi kam rupye me padega.
pradhan mantriji to koi ahasan chukta kar rahe hai.mahgai jitni badh jaye agle pradhan mantri yahi rahenge. chamtkar kaise hote hai yeh aap se to chhupa nahi hai . koi korkasar na reh jye isliye chunaw me jane se pahle samjhota karwa dena lajimi hai,phir purv chunaw aayukt Gill sahab to ministry mein hain.aab kya unhe bhi chunw jeetne k gur kise se sikhna pdenge?so gharwali kya mujre wali se jyada diljbahla payegi.?
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image आलोक तोमर हिन्दी पत्रकारिता में कालाहांडी के भूख की रिपोर्टिंग से चर्चा में आये आलोक तोमर आरोपों से घिरे रहनेवाले पत्रकार हैं. फिर भी सक्रियता में कोई कमी नहीं. लेखन के अलावा टीवी पत्रकारिता में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित. डेटनालाइन इंडिया और शब्दार्थ के संपादक.
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