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स्वर्ग की सीढियां टूट गयीं

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अमेरिका के एक नवउदार पूंजीवादी विचारक ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि राज्य छोटा से छोटा और निर्बल से निर्बल होता चला जाए. एक दिन वह इतना छोटा हो जाए कि नहाने के टब में लेटने लायक हो जाए ताकि उसको उसी टब में डुबो-डुबो कर मारा जा सके. ये विचारक अब भी वहीं हैं और बुश सरकार के सात सौ अरब डालर के जमानत पैकेज पर तालियां बजा रहे होंगे.

अमेरिका के तमाम पूंजीपति चाहते हैं इसलिए बुश सरकार और वहां का राजनीतिक वर्ग चाहता है कि अमेरिका को इस वित्तीय संकट से उबार लिया जाए. भूतपूर्व अर्थशास्त्री और वर्तमान कूटनीतिक मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि भारत और चीन को अमेरिका को इस संकट से उबारने में मदद करनी चाहिए. एक समय में विश्व बैंक अमेरिका ने भारत को विदेशी मुद्रा के संकट से बचाने में भारत की मदद की थी, तब वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ही थे. अब समय आ गया है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका के काम आयें. अपना पूरा ध्यान आणविक करार पर लगाकर उनने तीस साल-पैंतीस साल से ठप पड़े अमेरिकी आणविक उद्योग को भारत में लाकर फिर से खड़ा होने का मौका दे ही दिया है.

लेकिन भारत के मनमोहन सिंह ही अमेरिका के अकेले दोस्त नहीं है. यूरोप की वित्तीय अर्थव्यवस्था भी पिछले कुछ सालों से अमेरिका पर निर्भर हो गयी है. अब अमेरिका उद्योग-व्यापार ही नहीं वित्तीय मामलों में भी यूरोप का नेता है. यूरोप के ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन जैसे देश अमेरिका को इस संकट से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर वे ऐसा न करें तो अमेरिका के डूबने के साथ-साथ वे भी डूब जाएंगे. यह पूंजी के भूमण्डलीकरण का कमाल है कि अमेरिका का संकट पूरी दुनिया का संकट बन गया है. कोई कुछ कहे भारतीय अर्थव्यवस्था का जो हिस्सा भूमंडलीकरण के चक्कर में आया है उसे वालस्ट्रीट के सट्टेबाजों के कारगुजारियों की कीमत चुकानी पड़ेगी. 

अमेरिका के करदाता इन सट्टाखोरों की जमानत से खफा हैं. वे पूछ रहे हैं कि हमारे पसीने की गाढ़ी कमाई इन सट्टाखोरों के जमानत पर क्यों लगाई जा रही है? इसकी क्या गारंटी है कि हमारा यह पैसा भी सुरक्षित रहेगा और इसका भी वही हाल नहीं होगा जो लेहमन ब्रदर्स और मेरिल लिंच में पैसा लगानेवालों का हुआ? अमेरिका में यह चुनाव का साल है और वहां के नेता अपने धनदाताओं को नाराज नहीं कर सकते. इसलिए पैकेज को तो यहां के संसद की मंजूरी मिल ही जाएगी. लेकिन बड़ा सवाल बना ही रहेगा कि क्या वालस्ट्रीट वालों की लालच और सट्टाखोरी की आदत का सचमुच कोई इलाज हो सकता है? अपनी पूंजी से दुनिया पर राज करने की जो आदत उन्हें पड़ गयी है क्या राज्य का नियमन उन पर कोई संयम या अनुशासन लगा सकेगा? क्या वास्तविक उत्पादन के बजाय पैसा पैदा करने की पूंजीवादी व्यवस्था का अंत नहीं आ गया है?

जानकार आपको बता देंगे कि लेहमन ब्रदर्स, मेरिल लिंच और एआईजी का संकट कोई 14 सितंबर को रातों-रात नहीं पैदा हुआ. पैसा वापस न लानेवाले कर्ज और रेहन पर रेहन रखनेवालों की पोल तो गये साल ही खुल गयी थी. मकानो का बम बम करता धंधा और गुब्बारे की तरह फुलाया गया जायजाद का कारोबार तो पिछले साल ही हवा हो गया था. मकानों की मांग घटने से उनकी कीमतें घटdollar.jpegने लगीं इसलिए उन पर दिये गये कर्ज की किश्तों के वापस आने में दिक्कतें भी बढ़ने लगीं. ये कर्ज ज्यादातर ऐसे लोगों को दिये गये थे जिनकी कर्ज चुकाने की न तो ज्यादा हैसियत थी और कर्ज देते हुए इस बात की ठीक से पड़ताल भी नहीं की गयी कि वे कर्ज चुका भी सकते हैं या नहीं?

भारत में संकट में पड़े किसानों को जो राहत पैकेज दिया गया था उससे कहीं ज्यादा धन लगाकर बुश सरकार ने बेयर स्टर्न नाम की कंपनी को जमानत पर छुड़ाया था. फिर मकानों को गिरवी रखनेवाली दो दैत्याकार कंपनियां फ्रेडी मैक और फैनी माई को डूबने से बचाया गया. क्योंकि ऐसा नहीं करते तो अमेरिका की वित्तीय स्थिति संकट में आ सकती थी. बुश सरकार ने डूबती कंपनियों को बचाने का यह पराक्रम इसी साल किया था. फिर भी देखा नहीं गया कि लेहमन ब्रदर्स और मेरिल लिंच जैसे बैंकों में क्या चल रहा है? एआईजी दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनी है. उसकी चाल पर भी नजर नहीं गयी. वह तो जब लेहमन ब्रदर्स ने दिवाला निकलने की अर्जी दी तो संकट भस्मासुर बनकर सामने खड़ा हो गया. इसके बाद एक-एक कर संकट की खाईंयां खुलती गयीं.

इतना सब होने के बावजूद खुले बाजार के हमारे भाड़ पैरोकार अब भी मानने को तैयार नहीं है कि इन सर्वशक्तिमान वित्तीय संस्थानों में ऐसा कुछ था जो सड़ा हुआ था और इसका लालच ही इन्हें अंदर से खाकर पोला कर रहा था. फिर भाड़ पैरोकारों को यही लगता है कि अनिष्ट की यह बदरी जल्द ही छंट जाएगी. बुश सरकार ने इन्हें बचाकर पुण्य का कार्य किया है. कोई भी निजी अमेरिकी कंपनी जब डूबती है तो उससे दुनियाभर का अहित होता है. इसलिए उसे जितनी जल्दी बचाकर पटरी पर वापस लाया जाए उतना ही पुण्य और कल्याण मानवजाति का होगा. यह वही देश है जो युधिष्ठिर जैसे धर्मराज की भी जुए के कारण हुई दुर्गति को भलि-भांति जानता है फिर भी वालस्ट्रीट के सट्टेबाजों में कोई खोट नहीं देखता. जुआ खेलनेवाला हर बार इसी विश्वास में पांसा फेकता है कि इस दांव में मैं सब कुछ वापस जीत लूंगा. वाल्स्ट्रीट के खेल में लाखों-करोड़ों-अरबों का सत्यानाश हो गया फिर भी नव उदार पूंजीवादी और बाजारवादी मानने को तैयार नहीं है इस व्यवस्था के मूल में ही विष है.

यह सच है कि खुले बाजार की अर्थव्यवस्था और नव उदार पूंजीवाद अपने ही स्वर्ग में विफल हो गया है. उसकी श्रेष्ठ संस्थाओं का दिवाला निकल गया है. अमेरिकी पूंजीवाद का माडल फेल हो चुका है. जो लोग मुनाफे और बाजार को लोककल्याण के लिए स्वर्ग की सीढ़ी मान रहे थे उनकी सीढियां टूट गयी हैं. रातों-रात करोड़पति होने का जो सपना बेचा जा रहा था वह खाक हो गया है. (कागद कारे) 

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Ratan singh on 05 October, 2008 13:32;59
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साम्यवाद के बाद अब पूंजीवाद भी फ़ैल
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Ratan singh on 05 October, 2008 13:38;53
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आपने साइड में पोल लगाकर कोनसा चेनल बेहूदा पूछा है मुझे तो ये एक से बढकर एक सारे ही बेहूदा लगतें है
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पूंजीवाद खुद को बचाने में लगा है लेकिन विधाता भी नहीं बचा सकेंगे इसे यह खुद अपनी मौत की और आगे बढ़ रहा है। साम्यवाद तो कभी आया ही नहीं, फेल कैसे हुआ?
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y on 05 October, 2008 20:41;58
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subh labh ko samjhna hoga anyatha bar bar yahi hoga.isliye n samayawad n punjiwad koi manmohan ko samjhaye bharat ko chahiye subh labh wad .subh karman te kabahoon n taru.
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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