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	<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

	<link>http://www.visfot.com/</link>

	<copyright>&amp;copy;2007 Spoonlabs d.o.o.</copyright>

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		<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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								<title>जनता के लिए जनता द्वारा जन-पत्रकारिता</title>

								<link>http://www.visfot.com/index.php/bat_karamat/2871.html</link>

								<category>बात करामात</category>

								<pubDate>Thu, 04 Feb 2010 21:04:00 +0600</pubDate>

								<description>इधर हाल के दिनों में विस्फोट से जुड़े लेखकों को हमने एक इमेल किया था. इमेल में मैंने कुछ संक्षिप्त चर्चा पत्रकारिता पर पूंजी के प्रभाव के बारे में की थी. प्रतिउत्तर में कुछ जवाब आये जिसमें एक जवाब महत्वपूर्ण है. पुष्यमित्र पूछते हैं, थोड़ा और विस्तार से समझाइये. </description>

							

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										<title>Rajesh R. Singh</title>

										

											<link>http://www.aihrco.org</link>

										

										<category>बात करामात</category>

										<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 19:42:29 +0600</pubDate>

										<description>अनिल जी जो मुहीम आपने चलाई है वास्तव में वह मुहीम न केवल आपकी बल्कि  हमारी और उन सभी पत्रकारों की है जो अपने आपको लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सिपाही मानते है या होने का दावा करते है । डिजिटल मीडिया नें पत्रकारिता के लिए जो रास्ता खोला है उसमें एकजुट होकर एक मंच पर आने के बजाय अलग अलग बिखर कर अपनी ताकत खो रहे है बाकी लोगों के बारे में तो मै कुछ नहीं कह सकता किन्तु मै इस मुहीम में आपके साथ हूँ ।</description>

									</item>

								

									<item>

										<title>sanjay</title>

										

											<link>http://www.visfot.com/author/sanjayswadesh</link>

										

										<category>बात करामात</category>

										<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 20:25:57 +0600</pubDate>

										<description>जो पैसे लेखकर लिखने की बात करते हैं, वे क्या लिखते हैं? जहां पैसे लेकर लिखा जाता है, वहां लेखन का दायरा बंधा होता है। ऐसे दायरे में बंध कर कई लोग दो-चार सौ रूपये जुटा लेते हैं। पर वह शब्दों का खेल भर होता है। &lt;br /&gt;
जो पैसे लेकर लिखने की बात करते हैं, उन्हें जरा कहिए कि वे हिंदुस्तान, अमर अजाला, नवभारत टाइम्स आदि अपने यहां प्रकाशित आलेखों के बदले पैसे मिलते हैं। जरा लेख भेज कर तो देखें, छपता है कि नहीं? और छपता है  तो कितना कमाते हैं?</description>

									</item>

								

									<item>

										<title>Sam Pruner</title>

										

										<category>बात करामात</category>

										<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 23:13:35 +0600</pubDate>

										<description>Dear Sanjay,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
You doing great job. Keep it up.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Regards</description>

									</item>

								

									<item>

										<title>-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा</title>

										

										<category>बात करामात</category>

										<pubDate>Tue, 09 Feb 2010 21:59:01 +0600</pubDate>

										<description>-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा&lt;br /&gt;
संजय तिवार जी मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हँू। आपने जितने भी कारण अपनी बात को सिद्ध करने के लिये गिनाये हैं। सभी तार्किक हैं। हाँ इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि जीवन चलाने के लिये धन की जरूरत होती है और व्यक्ति धन कमाने के लिये अपने हुनर का उपयोग करता है। अनेक लोगों का मानना है कि लेखन भी वह हुनर है, जिसके माध्यम से धन कमाया जा सकता है। आज के परिप्रेक्ष में उनका ऐसा सोचना प्रारम्भिक अवस्था में गलत भी नहीं है, लेकिन आगे चलकर यही सोच विकृत मानसिकता को जन्म देती है। जब लेखन पैसा कमाने के जरिये के रूप में एक आधार बना जाता है तो लेखक या पत्रकार वह नहीं लिखता है, जो समाज या मानवता या प्रकृति के संरक्षण और, या इन सबके उत्थान के लिये जरूरी है, बल्कि ऐसे हालात में ऐसे विषय और ऐसी बातें बढा-चढाकर लिखी जाने लगती हैं, जो धनात्सर्जन कर सकें। यहीं से पत्रकारिता का बण्टाधार होना शुरू हो जाता है। अतः घूम फिरकर पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने वाले लोग पत्रकार कर्म में शामिल हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
आपका दर्द सही है, आपकी सोच भी सही है। इस सम्बन्ध में मेरा एक विनम्र सुझाव है। अभी भी समाज में ऐसे लोगो की कमी नहीं है, जिनके पास न्यूनतम जरूरत के आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं और जो धन को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानते हैं तथा ऐसे लोगों के दिल में भी अपने आसपास की घटनाओं को लेकर दर्द है। यही नहीं उनमें अनेक संवेदनशील हैं और कुछ तो लिखना भी जानते हैं। यदि ऐसे लोगों को लेखन कला में, भाषा में और भावाभिव्यक्ति में कमजोर होने के उपरान्त भी आप अवसर देते हैं तो आपके मिशन में ऐसे लोग सच्चे सहयोगी बन सकते हैं। और भी बहुत सारे तरीके हो सकते हैं, सच्चे लेखकों तक पहुँचने के, प्रयास करते रहना चाहिये।&lt;br /&gt;
-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध १९९३ में स्थापित एवं १९९४ से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें २८ जनवरी, २०१० तक, ४०४९ रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के १७ राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. ०१४१-२२२२२२५ (सायं ७ से ८ बजे)</description>

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<description>visfot.com । विस्फोट.कॉम</description>

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