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	<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

	<link>http://www.visfot.com/</link>

	<copyright>&amp;copy;2007 Spoonlabs d.o.o.</copyright>

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		<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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								<title>बीस बरस बाद भी हजार कोस दूर</title>

								<link>http://www.visfot.com/index.php/seminar/2466.html</link>

								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 20:26:00 +0600</pubDate>

								<description>पूरी कश्मीर घाटी में पिछले दो हफ्ते से जमात-ए-इस्लामी द्वारा गठित हिजबुल मुजाहीदीन जमकर कत्लेआम कर रहा है. राज्य सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पूरी तरह से नकारा साबित हो चुके हैं. ऐसे ही वक्त में 19 जनवरी 1990 को कश्मीर में बतौर राज्यपाल जगमोहन का प्रवेश होता है. </description>

							

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										<title>सुरेश चिपलूनकर</title>

										

											<link>http://http://sureshchiplunkar.blogspot.com</link>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 17:43:31 +0600</pubDate>

										<description>जो तीसरा रास्ता आपने सुझाया है, वही कारगर साबित होगा… लेकिन वह कभी नहीं होगा… :) जो मानसिकता अमरनाथ के लिये ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं दे सकती, वह मानसिकता सिर्फ़ हथियाने वाली मानसिकता है… वह किसी को कुछ दे नहीं सकती… दूसरे नम्बर वाला रास्ता मूर्खतापूर्ण आत्महत्या का सुझाव है, जबकि पहले वाला रास्ता अपनाने की केन्द्र सरकारों की नीयत, हिम्मत कभी रही नहीं…। अब आप बताईये कि दुनिया के किस-किस देश में वहीं के नागरिक अपने ही देश में शरणार्थी हैं और कितने समय से? और जब कोई रास्ता नहीं है तब नेहरु द्वारा रखा गया &amp;quot;कश्मीर नामक छाती का पत्थर&amp;quot; भारत कब तक चुपचाप ढोये…? कब तक हमारे टैक्स के पैसों से कश्मीरी मुसलमान ऐश करेंगे, तिरंगा जलाकर? ये तीनों रास्ते तो बेकार हैं, चौथा रास्ता सुझाईये…</description>

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										<title>शेष नारायण सिंह</title>

										

											<link>http://sheshji.blogspot.com</link>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 20:52:32 +0600</pubDate>

										<description>बेहतरीन विश्लेषण. ख़ास कर जगमोहन का इकबालिया बयान पब्लिक डोमेन में लाने के लिए आपका धन्यवाद. . जहां  तक कश्मीरी पंडितों की वापसी की बात है , तो उसके लिए सही माहौल पैदा किया जाना चाहिए . क्योंकि दिल्ली में अपने रोज़गार के सूत्र ढूंढ रहे कश्मीरी पंडितों को भी वह अवसर मिलना चाहिए जिस से वे कभी कभी अपनी मातृभूमि के दर्शन कर सकें बिना किसी हिंसा के खतरे के.</description>

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										<title>prashant mehrishi</title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 23:30:30 +0600</pubDate>

										<description>jab tak sanjay tiwari jaise secular patrakar is desh main rahenge kashmiri pandito ke ghar lotne ki chhodo .uttar pradesh bachna mushkil hai . jab tak sare patrakar tarun vijay nahi banege kuchh nahi hoga. hum to ladte hue mare jayenge par tumhara  kya hoga tiwari ji aap hi tarkik vishleshan kar sakte hain.</description>

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										<title>prashant mehrishi</title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Wed, 20 Jan 2010 23:56:57 +0600</pubDate>

										<description>http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_6118686.html</description>

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										<title></title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 00:01:33 +0600</pubDate>

										<description>http://www.amarujala.com/today/bijnews.asp?city=19Bij2M.asp</description>

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										<title>Jeet Bhargava</title>

										

											<link>http://www.secular-drama.blogspot.com</link>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 03:26:01 +0600</pubDate>

										<description>संजय जी आपने लेख की शुरूआत में कई अच्छी बाते की है, जिसके लिए हार्दिक साधुवाद. लेकिन आगे आपने ठीक उसी अंदाज में बात की है, जैसे कि नकली सेकुलर करते हैं. एन-केन प्रकारेण ठीकरा संघ-भाजपा के सर पर फोड़ना. क्या बात है आप भी इस &amp;#039;सेकुलर-फैशन&amp;#039; का शिकार हो गए?? आप ही बताएं, कि आज देश-विदेश में कश्मीरी पंडित/हिन्दू बिलकुल अकेला है. ऐसे में भाजपा-संघ जैसा कोई राष्ट्रवादी-राष्ट्रव्यापी संगठन उनके पक्ष में खडा रहे तो बुराई क्या है?? शायद आप भूल रहे हैं कि भाजपा संघ के प्रयासों के चलते ही देश में कश्मीर-समस्या के प्रति जन-जागरूकता आई है. वरना देश का बाकी हिस्सा तो सेकुलरवाद की अफीम खाकर सोया था और कश्मीर को किसी एलियन देश जैसा समझता था. एक और बात कि.. आप भले ही बिहारी हिन्दू और कश्मीरी हिन्दू में विभाजन कर ले ( राज ठाकरे भी यही कर रहा है: जिसने कोंग्रेस की सरपरस्ती में पांडे के सामने देशपांडे और यादव के सामने जाधव तथा चौहान के सामने चव्हान और उपाध्याय के सामने पाध्ये को तलवार लेकर खडा कर दिया है) हर सच्चा हिन्दू कश्मीरी पंडितो के दर्द से पीड़ित है और यह सभी हिन्दुओं का साझा दर्द है. एक हिन्दू होने के नाते आप भी कही न कही कश्मीरी पंडितो के दर्द से आहत हैं. वरना आप अपनी तेजस्वी कलम क्यों उठाते, जबकि अपने आप को मुख्यधारा का मीडिया कहने वाला सेकुलर मीडिया तो नपुन्सकी मौन धारण किए हुए बैठा है. और लाखो कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा से मुंह मोड़कर इतालवी महारानी तथा उनके भोंदू युवराज के यशोगान में व्यस्त है. इसलिए मन दूषित ना करे और पीड़ितों के हक़ में ही नहीं उनकी आवाज बुलंद करने वालो के हक़ में भी बात हो तो ही राष्ट्र बचेगा. और राष्ट्र हित में लिखने वाले तरुण विजय और आप जैसे कुच्छ नाम मात्र के लोग ही बचे हैं, वह भी अपनी लेखनी से न्याय न कर पाएं तो अरुंधती राय, पुन्य प्रसून और महेश भट्ट, शबाना आज्मियों को पढ़ना और आपको पढ़ना बराबर लगेगा.</description>

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										<title>Samar Singh</title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 03:31:58 +0600</pubDate>

										<description>भाईसुरेश चिपलूनकर की बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. शेष नारायण सिंह जी आपकी बात पर हंसू या रोऊँ ??  पिछले कई दशक से हमारी सेकुलर सरकारे और उनकी रोटी पर पलने वाले बिकाऊ बुद्धीजीवी भी &amp;#039;माहौल बनाने&amp;#039; जैसी बाते कर रहे हैं. लेकिन कुछ नहीं हुआ. उलटे लाखो लोग इस जेहादी आंतकवाद की बलि चढ़ गए.</description>

									</item>

								

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										<title>Vibha Dubey</title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 03:49:08 +0600</pubDate>

										<description>संजय साहेब, जब कश्मीरी मुस्लिमो के हक़ में सारी दुनिया के मुस्लिम एक हो जाते हैं. और पाकिस्तानी-हिन्दुस्तानी का भेद भूल जाते हैं. तो कश्मीरी हिन्दू और बिहारी हिन्दू सहित दुनिया के तमाम हिन्दू टाट-पांत और देश-प्रदेश को भूलकर एक होकर कश्मीरी हिन्दुओं पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठा सकते? और संघ या बीजेपी जैसा कोई संगठन हिन्दू जन-मन को इसके लिए जगाए तो इसमें गलत क्या है??</description>

									</item>

								

									<item>

										<title>शेष नारायण सिंह </title>

										

											<link>http://sheshji.blogspot.com</link>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 10:46:17 +0600</pubDate>

										<description>समर सिंह जी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 रोना ठीक रहेगा .</description>

									</item>

								

									<item>

										<title></title>

										

										<category>सभा-संगत</category>

										<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 12:17:59 +0600</pubDate>

										<description>मैं विभा दूबे जी का जवाब देना चाहूंगा. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर इस्लाम के नाम पर दुनिया के मुसलमान एक हो सकते हैं तो फिर हिन्दू होने के नाम पर कश्मीरी और गैर कश्मीरी हिन्दुओं के बीच एकता क्यों नहीं हो सकती? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विभा जी, अव्वल तो हिन्दू भी एक संप्रदाय है जैसे मुसलमान या फिर इस्लाम और इसाइयत. इसलिए जरूर ऐसा हो सकता है. लेकिन इधर हमेशा एक भूल हम सब करते हैं और वह भूल है हिन्दुत्व और सनातन धर्म में फर्क. भारत सनातन सभ्यता का देश है जबकि हिन्दू धर्म प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे ऊपर थोपी गयी एक पहचान है. इसलिए धर्म के नाम पर एक होने की तमन्ना होती है क्योंकि हमारे ऊपर धर्म के नाम पर ही हमला होता है. कोई ऐसा करना चाहे तो जरूर करे लेकिन समाधान इसमें नहीं है. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाधान सनातन जीवन दर्शन में है जो कि सबको सबके हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र करता है. इस्लाम के नाम पर जो आतंकवाद और उग्रवाद है उसका जवाब हिन्दुत्व के नाम पर नहीं दिया जा सकता. विष को विष से उतारा तो जा सकता है लेकिन फिर व्यक्ति पर नये तरह का विष हावी हो जाता है. यह सोचने का पश्चिमी तरीका है जो मानवता के किसी काम का नहीं है. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिला शक कश्मीर से बाहर गये लोगों को वहां वापस जाने का मौका मिलना चाहिए औऱ उन्हें भी जो कश्मीर जाना चाहते हैं भले ही वे नान कश्मीरी हों. इसकी व्यवस्था प्रशासन को प्रशासनिक स्तर पर करनी चाहिए. यह हिन्दू मुस्लिम का सवाल नहीं होना चाहिए. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर में पण्डितों का संकट सभ्यता मूलक है. तो समाधान कभी भी संप्रदाय के दायरे में नहीं निकल सकता. आप समस्या के मूल में जाइये. और संकट को वहां से पकड़ना शुरू करिए जहां से कश्मीर में नये संप्रदाय का  उदय हुआ था. अपनी कमजोरी का ठीकरा किसी और के सिर नहीं फोड़ना चाहिए। </description>

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<description>visfot.com । विस्फोट.कॉम</description>

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