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	<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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	<copyright>&amp;copy;2007 Spoonlabs d.o.o.</copyright>

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		<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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								<title>परिवार के लिए सत्ता का संकल्प</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/4119.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Sun, 17 Oct 2010 22:11:00 +0600</pubDate>

								<description>पिछले दो तीन दिनों से मुंबई से प्रकाशित होनेवाले अखबारों के लिए एक अनिवार्य खबर छप रही है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे इस साल दशहरा रैली को संबोधित करेंगे. मुंबई के अखबारों की यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले साल खराब स्वास्थ्य के कारण बाल ठाकरे उस शिवाजी मैदान में दशहरे के दिन नहीं आ पाये थे जहां उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति को सौंपा था. </description>

							

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								<title>ब्लागरी का बवाल और आचार संहिता का सवाल</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/4099.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Thu, 14 Oct 2010 11:07:00 +0600</pubDate>

								<description>वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के दो दिवसीय ब्लाग कार्यशाला व सेमीनार से यह बात तो उभर कर सामने आई कि हिंदी ब्लॉगिंग के लिए किसी आचार संहिता या रेगुलेटरी बोर्ड या फिर पंचायत जैसी किसी संस्था के लिए कोई गुंजाईश ही नहीं है। दरअसल  यह संभव ही नहीं है।  दूसरी बात यह कि अगर कानून है तो हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भले ही अपराधी हमेशा पुलिस से दो कदम आगे ही होता है लेकिन कानून के हाथ लंबे होते हैं। इसलिए स्व-नैतिकता ही ब्लॉगिंग में सबसे अनिवार्य तत्व है, यही एक ब्लॉगर की ब्लॉगिंग के लिए आचार संहिता है।</description>

							

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								<title>मानवीय मूल्यों की अमानवीय कार्यशाला पर मीडिया की मुहर</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/4045.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Sat, 02 Oct 2010 21:07:00 +0600</pubDate>

								<description>इस खबर को लिखने की कोई इच्छा नहीं थी.कारण भी साफ था. उदघाटन और समापन की औपचारिकताओं के अलावा इसमें कुछ दिखा नहीं.. कुछ समूह चर्चा भी हुई थी जिसे समापन की जल्दबाजी में शीघ्रता से समाप्त कर दिया गया। दूसरे दिन के अखबारों में खबर भी छपी. लेकिन तीसरे दिन जब बाकायदा समापन का सचित्र समाचार पढा तो मन हुआ कि अब तो खबर लिखनी ही पडेगी। दो दिन की ‘राष्ट्रीय गोष्ठी’ जो एक दिन में ही समाप्त हो गई, को  दो दिन की बताकर मानवीय मूल्यों की चर्चा में मीडिया ने वास्तव में अमानवीय कार्य किया है.</description>

							

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								<title>माया के आगे बेबस मायानगरी</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/4008.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Fri, 24 Sep 2010 15:27:00 +0600</pubDate>

								<description>राजनीति में जाइये तो भी वहीं चिता दिखेगी. नौकरशाही में देखिए वे भी परेशान हैं उसी समस्या से. संत महंत समाज में भी वही एक चिंता है. सामाजिक कार्यकर्ता भी उसी समस्या का रोना रो रहा है. ये तो वास्तविक जीवन को रोजमर्रा की जिंदगी में जीनेवाले लोग हैं. अगर वे रोएं तो तो रोएं पर वे भला क्यों रोएं जो उस समस्या से कल्पना के तौर पर ही सही समाधान खोजकर लाते हैं? फिल्मी समाज के सामने भला वही समस्या कैसे हो सकती है जो समाज के बाकी सक्रिय हिस्से में समाहित है?</description>

							

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								<title>मीडिया खड़ा बाजार में, नहीं किसी की खैर</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3983.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Fri, 17 Sep 2010 20:17:00 +0600</pubDate>

								<description>भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन ही करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। आज भारतीय मूल्यों और परंंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की बैठक में समापन उद्बोधन देते हुए ये बातें कही।</description>

							

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								<title>आतंकवाद की राजनीति और मीडिया</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3907.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Thu, 02 Sep 2010 16:15:00 +0600</pubDate>

								<description>क्या आतंकवाद बौद्धिक स्तर पर इतना विकसित हो चुका है कि उसका राजनीतिक धरातल तैयार हो सके? इस जटिल प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है. जो लोग अल-कायदा को आतंकी संगठन बताकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं वे भी शायद इसे इस्लामिक चरमपंथ कहना ज्यादा मुनासिब समझेंगे बनिस्बत कि आतंकवाद के दर्शन में निहित राजनीति को मान्यता प्रदान करें. लेकिन मुस्लिम देशों में आतंकी गतिविधियों के द्वारा दुनियाभर में थरथराहट पैदा करनेवाले इस्लामिक विद्वान इसे उस राजनीति की प्रतिक्रिया मानते हैं जिसके वैचारिक आक्रमण के कारण इस्लाम को खतरा पैदा हो गया है. शायद इसीलिए &amp;quot;जिहाद&amp;quot; जरूरी हो गया था. </description>

							

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								<title>कारपोरेट पत्रकारों की समाजवादी चिंता</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3698.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 13:41:00 +0600</pubDate>

								<description>11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी &amp;#039;संवाद 2010&amp;#039; के तहत एक परिचर्चा &amp;#039;लॉबींयग, पैसे के बदल खबर और समकालीन पत्रकारिता&amp;#039; का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई दिग्गज पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटें और अपने विचार रखे।</description>

							

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								<title>घर में बढ़ती विदेशी घुसपैठ</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3650.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 29 Jun 2010 20:28:00 +0600</pubDate>

								<description>घुसपैठ और सामान्य आवाजाही में फर्क है। दुनियाभर में अपनी आवश्यकताओं के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर आबादी की आवाजाही सामान्य बात है। लेकिन घुसपैठ सुनियोजित और रणनीतिक है। अर्थात भारत में घुसपैठ आवश्यकता या परिस्थितियों के कारण नहीं बल्कि किसी खास मकसद का हिस्सा है। इनका आगमन, बसाहट और निवास सब रणनीतिक होता है।</description>

							

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								<title>समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3610.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Sat, 19 Jun 2010 18:20:00 +0600</pubDate>

								<description>दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक मुद्दे पर अपना नज़रिया पेश करते हों. शुक्रवार की शाम दक्षिण दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में ऐसी ही एक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें &amp;#039;अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी&amp;#039; विषय पर चर्चा हुई.</description>

							

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								<title>पत्रकारिता में साहित्य का होना न होना</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3472.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Wed, 19 May 2010 00:11:00 +0600</pubDate>

								<description>वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के माननेवाले लोगों में काम करने की शैली में वैसे तो कोई खास अंतर नहीं होता लेकिन दोनों के व्यवहार में एक साफ अंतर दिखाई देगा. दोनों ही पहले से निर्धारित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन तरीका थोड़ा अलग होता है. दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक संवाद इत्यादि में बहुत कम विश्वास करता है. वह सीधे दिशानिर्देश जारी करता है जबकि वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग दिखावे के लिए ही सही बहस करते हैं. भले ही बहस में परिवर्तन की किसी भी गुंजाइश को स्वीकार न करें लेकिन कम से कम बहस की गुंजाइश तो रखते ही है. ऐसी ही एक बहस का आयोजन मंगलवार की शाम इंडिया हैबिटेट सेन्टर में ढेर सारे वामपंथी विचारधारा से जुड़े बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. </description>

							

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<description>visfot.com । विस्फोट.कॉम</description>

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