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	<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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	<copyright>&amp;copy;2007 Spoonlabs d.o.o.</copyright>

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		<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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								<title>भाषा भी होती है सर्वहारा, दलित और सवर्ण</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3181.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Mon, 22 Mar 2010 16:23:00 +0600</pubDate>

								<description>बड़ोदरा में भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन संस्था ने एक बेहतरिन आयोजन किया। जिसमें भाषा और बोली के सवाल पर देश भर के विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठे हुए। भाषा के सवाल पर इतने बड़े पैमाने पर विद्वानों के जुटान का शायद यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। प्रोफेसर गणेशी देवी के संयोजन में हुए इस कार्यक्रम को बड़ोदरा की स्थानीय मीडिया में तो अच्छी कवरेज मिली लेकिन नहीं कह सकता उसके बाहर वह खबर बनी या नहीं। </description>

							

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								<title>बिल्डरों, ठेकेदारों और सरकारी अफसरों का &#039;हिन्दू&#039; समागम</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/3040.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 02 Mar 2010 10:52:00 +0600</pubDate>

								<description>भाजपा नेता, सरकारी अमला, बिल्डर-ठेकेदार और रसूखदारों के समर्थन-सहयोग से भोपाल में हिन्दू संगम सम्पन्न तो हो गया, लेकिन संघ जैसा चाहता था, वैसा हिन्दू समागम तो तब भी नहीं हुआ। इन सब की भीड़ में संघ और उसके कार्यकर्ता दोनों ही कहीं गुम गये। लेकिन शायद यही नया संघ है, जहां वह दिल से नहीं दिमाग से चलता है। यह संघ अपने स्वयंसेवक और कार्यकर्ताओं से नहीं समर्थकों से चलता है। इस संघ में कार्यकर्ता कम हो गए, नेता बढ़ गए। यह संघ क्लालिटी नहीं, क्वांटिटी चाहता है। भीड़ के लिए वह कुछ भी करेगा। </description>

							

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								<title>अंबेडकर और गांधी : संवाद जारी है</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2996.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 23 Feb 2010 23:44:00 +0600</pubDate>

								<description>बाबासाहब अम्बेडकर और महात्मा गांधी सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, दो &amp;#039;स्कूल&amp;#039; हैं, दो वैचारिक केन्द्र हैं, दो संस्थाएं हैं। दोनों आधुनिक भारत के सर्वाधिक विवादास्पद चरित्रों में हैं। चूंकि दोनों लीक से हटकर चले, इसलिए उन पर उनके समय से लेकर आज तक सवाल उठाए जाते रहे हैं। दोनों की मंजिल एक-दूसरे से जितनी मिलती थी, रास्ते उतने ही जुदा थे।</description>

							

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								<title>मानस और महात्मा के बीच रामकथा का सेतुबंध</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2860.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 09 Feb 2010 12:00:00 +0600</pubDate>

								<description>पिछली सदी के महानायक और समय बीतने के साथ अवतार के रूप में स्थापित होते जा रहे महात्मा गांधी भारतीय कथा परंपरा के विषय इतनी जल्दी बन जाएंगे, इसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन ऐसा हो गया. महात्मा गांधी अब भारत की कथा परंपरा में शामिल हो गये हैं. इस दिशा में पहली कोशिश की महात्मा गांधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बेटे नारायणभाई देसाई ने की.</description>

							

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								<title>भारतीय पत्रकारिता के महात्मा गांधी</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2837.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Fri, 29 Jan 2010 12:24:00 +0600</pubDate>

								<description>किसी को महात्मा गांधी कब कहना चाहिए यह जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि महात्मा गांधी होने का अर्थ क्या है? मेरी समझ में समकालीन भारतीय संदर्भ में महात्मा गांधी का अर्थ वह सागर है जिसमें सभी धाराएं आकर समाहित हो जाती हैं. इसी अर्थ में प्रभाष जोशी हिन्दी पत्रकारिता के महात्मा गांधी हैं. </description>

							

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								<title>बीस बरस बाद भी हजार कोस दूर</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2466.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 19 Jan 2010 20:26:00 +0600</pubDate>

								<description>पूरी कश्मीर घाटी में पिछले दो हफ्ते से जमात-ए-इस्लामी द्वारा गठित हिजबुल मुजाहीदीन जमकर कत्लेआम कर रहा है. राज्य सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पूरी तरह से नकारा साबित हो चुके हैं. ऐसे ही वक्त में 19 जनवरी 1990 को कश्मीर में बतौर राज्यपाल जगमोहन का प्रवेश होता है. </description>

							

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								<title>मानवता के हित में है तिब्बत की स्वायत्तता</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2429.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Thu, 14 Jan 2010 21:41:00 +0600</pubDate>

								<description>तिब्बत की आजादी का संघर्ष गत पांच दशकों से जारी है। चीन द्वारा अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए तिब्बती नागरिकों का दमन किए जाने के कारण वे निर्वासित होकर भारत में रहने के लिए मजबूर है। किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र पर जबरन आधिपत्य एक गंभीर मानवीय मसला है और पड़ासी देश के नाते भारत के लिए भी यह स्थिति घातक है। </description>

							

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								<title>पुस्तक प्रेम पर भारी पड़ गया बुलडोजर</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2373.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Tue, 05 Jan 2010 23:19:00 +0600</pubDate>

								<description>उधर दिल्ली छोड़कर इधर नागपुर आइये. किताबों को पड़ते पाठकों के अकाल के बीच दिल्ली और देश में भले ही पुस्तक मेलों को प्रोत्साहन दिया जाता हो लेकिन इधर नागपुर में ऐसे पुस्तक मेलों को बुलडोजर लगाकर ढहा दिया जाता है और कहा जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि निगम के इन नियमों का पालन नहीं किया गया. </description>

							

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								<title>पुण्यतिथि के बहाने आरक्षण के फसाने</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2090.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 00:51:00 +0600</pubDate>

								<description>26 नवंबर को जब सारा देश मुंबई में हुए हमलों को याद कर रहा था ऐसे वक्त में लोग यह भूल गये कि ऐतिहासिक रूप से यह दिन देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नायारणन की पुण्यतिथि भी थी. उनके जन्मदिन के अवसर पर दिल्ली में राष्ट्रवादी अम्बेडकरवादी महासंघ ने एक सेिमनार का आयोजन किया. इस सेमिनार का विषय था- दलित हिन्दुओं के सामने चुनौतियां. सेमीनार में दलितों के सवाल पर विस्तार से चर्चा की गयी.</description>

							

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								<title>अब थारो कई पतियारो रे परदेशी...</title>

								<link>http://www.visfot.com/seminar/2047.html</link>

								

										

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								<category>सभा-संगत</category>

								<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 22:57:00 +0600</pubDate>

								<description>यह वास्तव में शोकसभा थी. यहां कोई दो मिनट का मौन नहीं था. जाने वाले व्यक्ति के बारे में प्रशंसा के गान नहीं थे. अनुभव और यादों का वर्णन नहीं था. बोलनेवालों में होड़ नहीं लगी थी. कोई बोलने खड़ा हुआ तो गला रुंध गया, किसी ने सिर्फ यह कहा कि मेरी श्रद्धांजलि. और ऐसा कहनेवाले वे लोग जिन्हें जमाना सुनता है. वे लोग जो खूब बोलते हैं और जमकर लिखते हैं. लेकिन यहां मानों शब्द स्थिर और जड़वत हो चला था.  कौन बोले? क्या बोले? और सबसे बढ़कर, क्यों बोले?</description>

							

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<description>visfot.com । विस्फोट.कॉम</description>

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