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	<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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	<copyright>&amp;copy;2007 Spoonlabs d.o.o.</copyright>

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		<title>visfot.com । विस्फोट.कॉम</title>

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								<title>अपने होने पर ही हैरान</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/4220.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Thu, 11 Nov 2010 13:03:00 +0600</pubDate>

								<description>‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं। </description>

							

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								<title>जमीन ले लो या गोली मार दो</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/4176.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Fri, 29 Oct 2010 19:41:00 +0600</pubDate>

								<description>भारत-पाक सरहद पर बसे किसान इन दिनों खासी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि किसान मरने तक को तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या पर न तो नौकरशाह गौर कर रहे हैं और न ही सफेदपोश। दरअसल, लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे किसानों के सामने हाल ही में आए एक सरकारी फरमान ने कई दुविधाएं खड़ी कर दी है। इस फरमान के मुताबिक सीमा क्षेत्र में तारबंदी के पार दो फिट से ज्यादा ऊंची फसल पर पाबंदी लगा दी गई है, जबकि किसान सीमा क्षेत्र में जो भी फसल बोते हैं, उनकी ऊंचाई दो फिट से अधिक ही है।</description>

							

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								<title>डकैती छोड़ दी, पर पुलिस पीछा नहीं छोड़ती</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/4080.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Fri, 08 Oct 2010 12:28:00 +0600</pubDate>

								<description>पुलिस कहती है कि चंबल से डाकुओं का खात्मा हो गया है. इसमें बहुत हद तक सच्चाई भी है लेकिन डाकुओं के खात्मे के बाद भी पुलिस का काम खत्म नहीं हुआ है. जो डाकू डकैती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले गये या कुछ तो बाकायदा साधु सन्यासी हो गये. पुलिस अभी भी उनके पीछे पड़ी हुई है और खोज खोज कर गिरफ्तार कर रही है. दिनेश शाक्य की रिपोर्ट-</description>

							

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								<title>विस्थापन के 33 साल बाद,पूरी तरह बर्बाद</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/4006.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Fri, 24 Sep 2010 08:00:00 +0600</pubDate>

								<description>भारत की औद्योगिक प्रगति और शहरी विकास के लिए सबसे आधारभूत जरूरत है जमीन. जहां भी विकास का पहिया पहुंचता है, पहले वहां की जमीन और जमीन के वाशिंदों को रौंदता है. फिर अपनी मर्जी के मुताबिक एक नया साम्राज्य विकसित करता है जो विकास का विस्तार बताकर हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन इस साम्राज्य के विकासक्रम में पीछे छूट गये लोगों की एक दुनिया शेष रह जाती है. सरकार और कंपनियां जिन्हें मुआवजा देकर &amp;quot;अमीर&amp;quot; बनाकर छोड़ देती हैं वे पीछे छूट गये लोग कितने दयनीय होकर रह जाते हैं इसका सटीक उदाहरण है गाजियाबाद का कड़कड़ मॉडल गांव. इस गांव के जरिए विकास और विस्थापन का जायजा ले रहे हैं अनिल पाण्डेय. </description>

							

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								<title>बज गया बस्तर का बैंड</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3977.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Fri, 17 Sep 2010 11:25:00 +0600</pubDate>

								<description>हाल के वर्षों में देश दुनिया बस्तर को सिर्फ इसलिए जानती है कि वहां कब कहां कैसे कितने नक्सली मारे गये या फिर नक्सलियों ने कितने पुलिसवालों को मार गिराया है. लेकिन आदिवासियों की समृद्ध दैवीय परंपरा से एक ऐसा नाद उठ खड़ा हुआ है जो संगीनों की कर्कश आवाज को दबाने के लिए बस्तर से निकल पड़ा है. यह बस्तर बैण्ड है. आदिवासियों की अपनी पहल पर निर्मित हुए बस्तर बैंड देश दुनिया को बस्तर के इस परंपरागत स्वरूप से परिचय करा रहा है जो बस्तर के संगीत में विराजमान दैवीय नाद से श्रोताओं के अनहद को छू रहा है. </description>

							

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								<title>गर्त में गये गांव</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3976.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Thu, 16 Sep 2010 17:40:00 +0600</pubDate>

								<description>2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है, जबकि निवास स्थान छोड़ने को आधार मानें तो 30 करोड़ लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है.</description>

							

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								<title>बाल अधिकारों के बीस साल बाद</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3968.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Tue, 14 Sep 2010 18:50:00 +0600</pubDate>

								<description>अब से बीस साल पहले 1989 को सयुंक्त राष्ट्र द्वारा पारित बाल-अधिकारों के कन्वेंशन के जरिए बच्चों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ्य और सुरक्षित दुनिया का लक्ष्य रखा गया था. मगर समय के दप दशक गुजर जाने के बाद आज बच्चों की यह दुनिया कहीं बदतर, असुरक्षित और बीमार दिखाई देती है.</description>

							

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								<title>दलित उद्यमियों का बढ़ता दबदबा</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3926.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Mon, 06 Sep 2010 12:19:00 +0600</pubDate>

								<description>पहले दलित उद्यमी गंगाराम कांबले के राज्य महाराष्ट्र में इन दिनों दलित उद्यमशीलता की नई इबारत लिखी जा रही है। कांबले ज्ञात दलित इतिहास में भारत के पहले दलित उद्यमी के तौर पर नजर आते हैं। वे शाहूजी महाराज के समकालीन थे। आज दलित समाज से निकलकर व्यवसाय में पांव जमाने वाले उद्यमियों की संख्या पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। लेकिन यह गति महाराष्ट्र में थोड़ी तेज है. अब महाराष्ट्र में दलित व्यवसायियों को एक मंच पर लाकर खड़ा करने के लिए दलित इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) जैसा मंच भी तैयार हो चुका है।</description>

							

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								<title>पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3843.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Thu, 19 Aug 2010 12:09:00 +0600</pubDate>

								<description>कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।</description>

							

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								<title>भूख के पेट में भारत के बच्चे</title>

								<link>http://www.visfot.com/story_of_india/3834.html</link>

								

										

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								<category>भारत की कहानी</category>

								<pubDate>Mon, 16 Aug 2010 15:34:00 +0600</pubDate>

								<description>यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।</description>

							

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<description>visfot.com । विस्फोट.कॉम</description>

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