भाजपा, कांग्रेस सबने धोखा दिया- कर्नल बैंसला
देश विदेश में अपनी और कौम की पहचान बनाने के बाद , सफलता के मंत्र चुनिंदा ऐतिहासिक आन्दोलनों से जुडी पुस्तकों के पन्नों में ढूंढते हुए कर्नल किरोडी बैसला को एक बार फिर से सर्व समाज को साथ लेकर आरक्षण की किसी बड़ी जंग के लिए इन दिनों अपने आवास पर आराम के साथ अध्ययन, मनन और चिंतन करते देखा जा सकता है। दिल में 'शोले ओर शिकायतों' का तूफान जब उबाल लेता है तो अपनी गलतियॉ पूछने लग जाते है, तो किताबों से इतिहास के उदाहरण देकर खुद को बेकसूर साबित करने का कोई मौका भी नहीं चूकते। महापंचायत के बाद अभी उन्हें मुख्यमंत्री के बुलावे का इंतजार है। यह बात दीगर है कि उनका लक्ष्य खुद उनको ही कोसों दूर दिखाई दे रहा है। उनका मानना है कि उनके पास जो भी है पाने के लिए है खोने को कुछ नही है। जीवन के कुछ अनछुए बिन्दुओं पर उनसे हुई एक बेबाक बातचीत-
सवाल- जिस कौम में आपने जन्म लिया उसके बारे में आप क्या कहना चाहेगें?
जवाब- गुर्जर एक बहादुर जाति है, इसके साथ राजनैतिक और प्रशासनिक स्तर पर भेदभाव हुआ है। इसे आरक्षण मिलना चाहिए जिससे इसके बच्चे भी आई ए एस, आई पी एस बन सके। वैसे भूटान से आऐ हुए जंगली हाथियों के झुण्ड को कलकत्ता की संकरी गलियों से होकर निकाल लेना आसान है लेकिन गुर्जरों को नेतृत्व देना आसान नहीं है। मुझे अशिक्षित गुर्जरों से कोई शिकायत नहीं, मुझे शिक्षित राजनेता गुर्जरों से शिकायत है जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर मुझे और समाज को धोखा दिया हैं। जो मेरे और अपनी कौम के नहीं हुए वो उन दलों के भी नहीं होगें जिनके साथ वो हैं।
सवाल- गुर्जरों को आरक्षण दिलाने की बात दिमाग में कब और कैसे आई?
जवाब- 1958 में जब महाराजा कॉलेज जयपुर में पढ़ा करता था तो मीणा छात्र भी थे जिन्हें आरक्षण नामक योग्यता के बलबूते आगे बढते देखा। सेना में आरक्षण नहीं था इसलिए जब 1990 में सेवानिवृत होकर अपनी कौम की बदहाल स्थिति देखी तो दिल अन्दर से कॉप गया और तभी से एक मिशन के रूप में इस काम को हाथ में लिया है, और शरीर में खून के अन्तिम कतरे तक इसके लिए संघर्ष करता रहूंगा।
सवाल- आरक्षण आन्दोलन की भूमिका आपने किस प्रकार से तैयार की?
जवाब- मेरी इतिहास में हमेशा से ही रूचि रही है मैंने अपनी कौम के साथ देश के इतिहास का भी गंभीरता सक अध्ययन किया। सेना से सेवामुक्त होने के बाद गुर्जर समाज के बीच लगभग 10 बर्षो तक गॉव ढाणी घूमा और एक ओर उनकी स्थिति का आंकलन किया तो दूसरी ओर उन्हें आरक्षण के फायदे और इसे उनके अधिकार के रूप् में समझाया। आज आन्दोलन के विस्तार और रूप को लेकर हैरानी होती है मगर आरम्भ में गुर्जर समाज ने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया ,मुझे समाज के बीच बहुत विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी ।आज भी भले ही लोग कुछ भी कहें में इस लड़ाई को लड़ने के लिए हर स्तर पर तैयार हूं। किसी भी समाज में परिवर्तन लाना बहुत बड़ी चुनौती है उससे भी बडी बात है लोगों के दिमाग को बदलना और मैंने वो सब कुछ किया हैं।
सवाल- आन्दोलनों की समझौता टेबुलों पर पीछे हटने पर लगे आरोपों पर आप क्या कहेंगें?
जवाब- मुझ पर मेरे अपनों ने जो समाज के नाम पर राजनीति करते थे उन्होंने खूब कीचड उछाला। समाज को दिगभ्रमित भी किया लेकिन बाद में सच्चाई सामने आ गई। मैं पैसे का करूगा क्या? 23 हजार पेंशन मिल रही हैं अकेला प्राणी हूं दो बेटे सेना में कर्नल है। एक निजी कम्पनी में मैंनेजर और बेटी इंकमटैक्स कमिश्नर है। मेरे पास किस चीज की कमी थी? चाहता तो आराम की जिंदगी जीता ।लेकिन मुझे उस कौम के बारे में सोचना था जिसमें मेरा जन्म हुआ और वो बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर थी। इसलिए मैनें उसकी खातिर अपनी जिंदगी को समर्पित कर दिया। वैसे ऐसा कौन हुआ है जिसने कुछ किया हो और उस पर आरोप न लगे हों?
सवाल- आपने राजनीति में न आने की कसम खाई थी उसका क्या हुआ?
जवाब- ये सच है कि मेरा राजनीति में जाने का कोई इरादा नहीं था मगर मैं तीनों आन्दोलनों को समझौते की टेबिल पर जाकर हार गया, क्योंकि मेरे और मेरी कौम के पास राजनैतिक ताकत नहीं थी । इसलिए मैं पावर चाहता था। और वैसे भी डॉ अंबेडकर भी अपनी कौम के लिए तभी कुछ कर पाऐ जबकि वो संसद में थे अन्यथा क्या कर सकते थे? मैं सांसद के रूप में आरक्षण की इस बंदर बांट पर आवाज उठाना चाहता था और उसे वहीं से उठाया जा सकता था। गांधी जी ने भी कई बार आन्दोलनों को रोका और वापिस लिया था। मैंने पी एम एन वेटिंग से कह दिया था कि मैं चुनाव तभी लडूंगा जब आरक्षण पर पार्टी मेरा साथ देगी।
सवाल- चुनाव में हुई हार पर आप क्या कहेगें?
जवाब- एक बात तो ये है कि मैं देश में सबसे कम अन्तर से हारा हूं। लेकिन हार तो हुई ही हैं। दूसरी बात ये है कि मुझे सरकारी ताकत के बलबूते जबरदस्ती हराया गया है। जिसका भाई प्रदेश का डी जी पी हो उसकी ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। और फिर उसे सरकार ने छुटटी पर भेजकर खुला छोड़ दिया था। कोई ये सवाल क्यों नहीं उठाता कि छुट्टियों में वो रहे कहॉ? मेरे लोकसभा चुनाव क्षेत्र में ही थे। तीसरी बात है कि ईश्वर नहीं चाहता था कि मैं किसी पार्टी का पिटठू बनकर उसके पीछे चलूं। वो मुझसे कुछ ओर ही कराना चाहता है और वो जो चाहता है उसे करने को मैं तैयार हूं। चौथी और महत्वपूर्ण बात ये है कि भाजपा कॉग्रेस दोनों ही नहीं चाहते थे कि मैं संसद में पहुंचकर आरक्षण के खिलाफ आवाज बुलंद करू। इसीलिए भाजपा के कुछ लोगों ने भी मेरा विरोध किया। मेरी हार देश की जनता की हार हैं।
सवाल- आरक्षण के इस संघर्ष में आज आप खुद को कहॉ पाते हैं?
जवाब- मैं नेलसन मण्डेला तो बन नहीं सकता जिन्होंने अपने जीवन के अमूल्य 29 बर्ष जेल की कोठरी में निकाल दिये। कौम की खातिर गुर्जर जाति के लिए जो कुछ भी अधिकाधिक कर सकूगा वह जी जान के साथ ऐलान से करूगा। मुझे जेल जाने से कोई डर नहीं है इस प्रकरण को लेकर सरकार चाहे तो आज गिरफतार कर ले ।मेरी तो इतनी ही गुजारिश है कि जो विधेयक राज्यपाल महोदय के पास ठण्डे बस्ते में अटका पडा है उसके साथ न्याय हो। या फिर मुख्यमंत्री गहलौत सार्वजनिक रूप से यह कह दे कि गुर्जर पिछडे नही है और उनकी हालत प्रदेश में दयनीय नहीं है। जिन सम्मानीय सी पी जोशी ने बसुंधरा सरकार के दौरान विपक्ष के नेता के रूप में विधेयक को ऐतिहासिक बताया था वो अब चुप क्यों हैं? अगर उसमें कोई खामी थी तो उस समय क्यों नहीं विरोध किया, अब ऐसी वैसी मीन मेख की बाते क्यों?
सवाल- आरक्षण आन्दोलन के दौरान जिन साथियों ने साथ दिया उनके बारे में क्या कहेगें?
जवाब- 1857 में आजादी की पहली जंग को जैसे देश के ही कुछ राजा महाराजाओं ने अंग्रेजों का साथ देकर देश के साथ गद्दारी की ।´(उन्होंने इसके लिए 1857 की एक पुस्तक के चित्रों के माध्यम से अपनी बात की पुष्टि की)´ । ठीक ऐसे ही कुछ मेरे अपने साथियों की भूमिका भी संदिग्ध रही है जो राजनैतिक पदों, टिकट पाने के लालच में मेरा साथ छोड़ गये है। हॉलाकि उन सबका हश्र बुरा हुआ हैं, और कुछ ऐसे भी है जो निस्वार्थ भाव से कौम की खातिर आज तक मेरे साथ खड़े हैं।
सवाल- आरक्षण को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है?
जवाब- राष्ट्रीय बहस होने की जरूरत है जबसे आरक्षण शुरू हुआ है तब से प्रति दस वर्ष बाद कहीं कोई समीक्षा नहीं कहीं कोई संशोधन नहीं। इसमें कोई जोड़-घटाव नहीं किया जा रहा है , ये बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। फिर वही 2010 आने वाला है। इस बीच सभी जातियों में कई उतार चढ़ाव आ चुके हैं. कुछ संपन्न हुए है तो कुछ अति संपन्न हो गये हैं। जिन्हें अब जरूरत नहीं उन्हें छोड़ जरूरतमंद जातियों को इससे जोड़ने की आवश्यकता हैं या फिर स्थिति परिस्थितियों को देखते हुए आमूल चूल परिवर्तन की सख्त जरूरत है। एक जाति ने तो इसे कामधेनू गाय समझ लिया है । जबकि में देख रहा हूं कि देश का गरीब तबका भड़क रहा है और मुझे क्रांति दीवारों पर लिखी दिखाई दे रही हैं। बारूद कभी भी भड़क सकता है। जब तक इसका समाधान नहीं होगा तब तक देश में अब अमन चैन नहीं रहने वाला हैं।
सवाल-क्या आप कोई पुस्तक लिखने की सोच रहे हैं?
जवाब- हॉ मैं सोच रहा हूं मेरा होम वर्क पूरा है (´गुर्जर जैसा मैंने उन्हें समझा और जाना´)। ये है किताब का नाम जिसमें में बहुत सी ऐसी बातों का खुलासा कर रहा हूं जो मेरे अन्तर्मन में है।
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
kiya iske liya samaj aap aabhari hai
aur aap ke sath bhagwan aapki har manokamana puri kre (vishram padhiyar jheerota ajmer)
Post your comment