उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी भाजपा - सुदर्शन
के.एस. सुदर्शन संघ के लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। नौ साल तक आरएसएस के सरसंघचालक रहे सुदर्शन के काल में ही भाजपा ने सत्ता संभाली. जाहिर है वह वक्त भाजपा संघ संबंधों को लेकर सबसे संवेदनशील वक्त था जब कई बार संघ और भाजपा आमने-सामने आ खड़े हुए थे. अब सुदर्शन सरसंघचालक तो नहीं है लेकिन भाजपा को लेकर उनके अपने अनुभव क्या रहे हैं? संघ और भाजपा के बीच बढ़ी दूरियों के लिए कौन जिम्मेदार हैं, ऐसे ही कई सारे सवालों के साथ अवधेश आकोदिया ने उनसे बात की.
सवाल- लोकसभा चुनावों में हार के लिए भाजपा के कई नेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जिम्मेदार बता रहा हैं। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
जवाब- जो ऐसा कह रहे हैं वे संघ की विचारधारा को जानते और समझते ही नहीं हैं। संघ भाजपा को क्यों हराएगा? वैसे भी इन चुनावों में मतदाता की तो कोई अहमियत रही ही नहीं। यह चुनाव पूरी तरह से इलोक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का गड़बड़ी का खेल था जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह से अपनी इच्छानुसार खेला। कांग्रेस को जितनी सीटें मिली, उनका अनुमान किसी विश्लेषक ने यहां तक स्वयं कांग्रेस ने भी नहीं लगाया था। कांग्रेस इवीएम मशीनों के दुरूपयोग से जीती है। मैं आपको कई उदाहरण दे सकता हूं कि जहां यह साबित हो जाता है। पी. चिदंबरम के मामले में भी ऐसा ही हुआ।
सवाल- यदि ऐसा है तो आपकी ओर से शिकायत क्यों नहीं की गई?
जवाब- इसके कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद जल्दी ही ऐसा किया जाएगा। हम तो चाहते हैं कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां इवीएम की बजाय मतपत्रों से ही मतदान हो।
सवाल-क्या भाजपा संघ और हिंदुत्व से तौबा करना चाहती है?
जवाब-इसमें से ज्यादातर वे लोग है जो सत्ता के आकर्षण से भाजपा में हैं न कि विचारधारा से प्रभावित होकर। यह उनकी मर्जी है। हमने किसी को बांध थोड़े ही रख रखा है। यदि उन्हें लगता है कि संघ और हिंदुत्व के बिना वे सत्ता में आ सकते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। जो भी हो, सभी बातें स्पष्ट रूप से हो जाएं तो अच्छा है। किसी के मन में शंका नहीं रहनी चाहिए। शंका समस्या पैदा करती है। उसे जितना जल्दी हल कर लें उतना अच्छा है। जहां तक हिंदुत्व की बात है तो यह तो एक जीवन पद्धति है, भाजपा इसे क्यों छोडऩा चाहेगी।
सवाल-आप हिंदुत्व को कैसे परिभाषित करते हैं?
जवाब-हिंदुत्व पांच मूल तत्वों से बना है। पहला, उपासना की प्रत्येक पद्धति का सम्मान करना। दूसरा, जड़ है या चेतन सब बराबर हैं। तीसरा, मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है न कि स्वामी। चौथा, महिलाओं का सम्मान और पांचवा जीवन का मकसद भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने तक ही सीमित नहीं है। इन पांचों तत्वों का समग्र रूप हिंदुत्व है।
सवाल- भाजपा इस पर कहां तक खरी उतरी है?
जवाब- जाहिर तौर पर पूरी तरह से तो खरी नहीं उतरी है। यदि वह ऐसा कर पाती तो देश में उसके समर्थन में कमी नहीं आती। कहीं न कहीं तो चूक हुई है। मेरे ख्याल से भाजपा यह तय नहीं कर पाई कि उसे किसी दिशा में चलना है। मूल विचार के विपरीत काम करने का प्रयास हुआ। यह सब उन लोगों की वजह से हुआ जो सत्ता की खातिर भाजपा में आए हैं।
सवाल- भाजपा के अलावा संघ की और क्या समस्याएं हैं?
जवाब- पहली बात तो भाजपा हमारे लिए कोई समस्या नहीं है। जहां तक संघ की अन्य समस्याओं का प्रश्न है तो इतने विशाल संगठन में सब कुछ एक साथ ठीक रखना मुश्किल काम है। फिलहाल कोई बड़ी समस्या तो नहीं है। कुछ कार्यक्रमों में उतार-चढ़ाव चलता रहता है।
सवाल-संघ की वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि शाखाओं व उनमें आने वाले लोगों की संख्या...
जवाब-शहरी क्षेत्रों की कुछ शाखाओं में ऐसा हुआ है, लेकिन आप इसका सामान्यीकरण नहीं कर सकते हैं। आप ये भी तो देखिए कि हमारी ज्यादातर शाखाएं बहुत अच्छी तरह से संचालित हो रही है। हर आयु और वर्ग के लोग इनमें आ रहे हैं। शहरों की कुछ शाखाओं का ठीक ढंग से नहीं चलना चिंता का विषय है। जल्दी ही इसका समाधान निकाल लिया जाएगा।
सवाल-युवा और बुद्धिजीवी वर्ग आपसे दूर क्यों होता जा रहा है?
जवाब-हमसे न युवा दूर हो रहे हैं और न ही बुद्धिजीवी। दोनों वर्ग हमसे निरंतर जुड़ रहे हैं। हां, यह जरूरी कहा जा सकता है कि जीवन में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते युवा अब उतनी सक्रियता से हमारे कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं ले रही है। हमारा प्रयास है कि वे प्रतिस्पर्धा और अपने सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए कार्य करें।
सवाल-संघ के भीतर अनुशासनहीनता बढऩे की क्या वजह है?
जवाब-अनुशासन तो संघ का आधार है। कई जगह पर अनुशासनहीनता की जानकारी मुझे भी मिली है। अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लोगों का पूर्णत: आप पर विश्वास हो। अनुसरणकर्ता का नीतियों और तौर-तरीकों से सहमत होना जरूरी है। हम देख रहे हैं कि दिक्कत कहां पर है।
सवाल-संघ को राजनीति में सक्रिय होने का कितना नुकसान हुआ?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक संगठन है। हम राजनीति में कभी सक्रिय नहीं हुए। सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जरूर जनसंघ और जनता पार्टी बनी। इनमें ज्यादातर संघ से जुड़े हुए ही लोग थे। हमारी विचाराधारा भी समान थी, इसलिए संघ ने इनका समर्थन किया। इसका मकसद राजनीति करने का बिल्कुल नहीं था।
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