कांग्रेस मराठी माणुस को बांट रही है-उद्धव ठाकरे
शिवसेना की ओर से इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की सारी कमान उनके कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के हाथ में है. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की अस्वस्थता को देखते हुए यह चुनाव न सिर्फ शिवसेना के लिए बल्कि खुद उद्धव ठाकरे के लिए भी परीक्षा की घड़ी है. उद्धव ठाकरे इस चुनाव को महाराष्ट्र की मुक्ति का चुनाव मान रहे हैं और उनका कहना है कि कांग्रेस प्रदेश में मराठी माणुस की मानसिकता के साथ खिलवाड़ कर रही है और एक साजिश के तहत उसे बांट रही है. मराठी सामना के कार्यकारी संपादक संजय राऊत ने उनसे विस्तृत बात की जिसका संपादित हिस्सा हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं- संपादक
सवाल- विधानसभा चुनाव का समर प्रारंभ हो गया है. इस जंग में शिवसेना कहां है?
जवाब- सबसे आगे. पिछले पांच साल ही नहीं बल्कि दस साल में महाराष्ट्र का सत्यानाश हो गया है. कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस के कारोबार से जनता परेशान है.
सवाल- यानी आपने तलवार उठा ली है?
जवाब- तलवार जनता ने उठायी है. जैसे ही महाराष्ट्र में चुनाव के तिथियों की घोषणा की गयी पूरे महाराष्ट्र में एक उत्साह और चेतना की लहर दौड़ गयी है. आम जनता को लगने लगा है कि वह जिस क्षण का बेसब्री से इंतजार कर रही थी वह क्षण आ गया है. पूरे महाराष्ट्र प्रवास के दौरान मैंने यही देखा है. लोग परिवर्तन चाहते हैं. महाराष्ट्र की जनता को निष्क्रिय शासक नहीं चाहिए. जनता ने पक्का कर लिया है कि कुछ भी हो जाए इन्हें वापस घर लौटा देना है.
सवाल- क्या आप इसे एक युद्ध मानते हैं?
जवाब- यह केवल युद्ध नहीं बल्कि महाराष्ट्र की जनता के आजादी की लड़ाई है. बहुत लोगों को यह बात ठीक नहीं लगेगी लेकिन आजादी का मतलब सिर्फ विदेशियों से मिलनेवाली आजादी नहीं है. अत्याचारी और अन्यायी सरकार किसी की भी हो उससे मुक्ति की लड़ाई आजादी की ही लड़ाई होती है.
सवाल- देश को युद्ध याद है. एक पानीपत का युद्ध और दूसरा कुरुक्षेत्र का युद्ध. इस युद्ध को आप कौन सा युद्ध मानते हैं?
जवाब- पानीपत का युद्ध महत्वपूर्ण है क्योंकि उस युद्ध से मराठों का संबंध रहा है. मराठों की सैन्यशक्ति बहुत थी लेकिन सब ओर बिखरी हुई थी. अब्दाली की सेना सामने थी. मराठों की सेना समुद्र के समान थी. प्रदेश मराठों का था. अपने हिन्दुस्थान का था. अब्दाली गैर था. उसे यहां के दुर्ग और रास्तों की जानकारी नहीं थी. जबकि मराठा इन बातों में निपुण थे. युद्धकला में भी माहिर थे. मराठा जिगरबाज थे. प्रत्यक्षरूप से युद्ध शुरू होनेवाला था उसके कुछ दिन पहले अथाह मराठा सैन्यशक्ति का निरीक्षण करने एक पहाड़ी पर गया. उसके सलाहकार भी आसपास ही खड़े थे. मराठा फौज की ताकत देखकर अब्दाली के सलाहकारों के पैर कांपने लगे. लेकिन अब्दाली ने देखा कि फौज में अलग अलग जगह से धुआं उठ रहा है. उसने पूछा कि वह क्या है? तो उसके सलाहकारों ने कहा कि सबका अलग अलग भोजन तैयार हो रहा है. अब्दाली ने तुरंत कहा कि हम युद्ध जीत जाएंगे. उसके सलाहकारों ने पूछा यह कैसे संभव है तो उसने कहा था कि युद्धभूमि में भी जो लोग एक साथ भोजन नहीं कर सकते वे एक साथ लड़ कैसे सकते हैं? विदेशी अब्दाली भी इस बात को पहचान गया था कि मराठे कभी एक नहीं हो सकते. उसने बगावत के बीज डाले और हम पानीपत का युद्ध हार गये.
सवाल- आपका कहने का आशय क्या है?
जवाब- पानीपत की लड़ाई हमें बताती है मराठों एक होकर लड़ो. यही महाराष्ट्र धर्म है. भूमिपुत्रों को बचाना, हिन्दू और हिन्दुत्व को बचाना ही महाराष्ट्र धर्म है. जब जब देश पर और हिन्दुत्व पर संकट आया है तब तब महाराष्ट्र के सपूतों ने देश और धर्म के लिए अपने आप को न्यौछावर कर दिया है. यही महाराष्ट्र धर्म है. यही क्षत्रियों का धर्म है. अपनी जनता को संरक्षण देने के लिए लड़नेवाला धर्म यही है.
सवाल- मराठी माणुस के सवाल पर एक नयी पार्टी का निर्माण हुआ. क्या शिवसेना को उसका नुकसान हो रहा है?
जवाब- असल में मराठी माणुस में फूट डालनेवाले ये लोग कांग्रेस से सुपारी लेकर फूट डाल रहे हैं. कांग्रेस अब तक क्या करती रही है? कांग्रेस ने भी वही किया है जो अंग्रेज करते थे. फूट डालो और राज करो. भूमिपुत्रों ने अपनी वज्रमुट्ठी से जिन कांग्रेसियों के दांत तोड़े थे उसी वज्र मुट्ठी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. वह शिवसेना के ही कुछ लोगों को तोड़ रही है. लेकिन जो लोग शिवसेना से लालच देकर कांग्रेस की ओर ले जाए गये आज जरा उनकी हालत देखिए. कांग्रेस उनको इस्तेमाल करती है और फेंक देती है. अब सबको पता चल गया है कि कांग्रेस अपना मतलब निकालती है फिर कचरे के डिब्बे में फेंक देती है.
सवाल- शिवसेना का जन्म मूलतः माणुस और मराठी अस्मिता के मुद्दे पर हुआ था. क्या आज भी वह मुद्दा आपको उतना ही महत्वपूर्ण लगता है?
जवाब- बिल्कुल। अभी मिरज की घटना को ही देखिए. गणेश उत्सव में शिवाजी महाराज की वह ऐतिहासिक तस्वीर लगाई गयी थी जिसमें उन्होंने अंगरखे से अफजल खान की अंतड़ियों को फाड़ दिया था. यह ऐतिहासिक सच्चाई है लेकिन फिर भी वहां दंगा हो गया. क्या अफजल खान के वंशज आज भी महाराष्ट्र में निवास कर रहे हैं जो अफजल खान की मौत का बदला लेने की मानसिकता रखते हैं? शिवाजी महाराज की जय कहने पर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है. लेकिन अब महाराष्ट्र में शिवाजी के इतिहास को भी खत्म करने की कोशिश हो रही है. ऐसे धर्मांध लोगों के खिलाफ लड़ने के लिए भूमिपुत्रों को एक होने की जरूरत है.
लेकिन इस पूरे मामले में कांग्रेस सरकार ने क्या किया? उन्होंने उन दंगाईयों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी नहीं दिया. ऐसे समय में हमें महाराष्ट्र धर्म का पालन नहीं करना चाहिए? हमारा मानना है कि जब जब धर्म पर संकट आये तब तब हर काम छोड़कर धर्म रक्षा के लिए आगे निकल कर आना ही महाराष्ट्र धर्म है.
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