सत्ता प्रतिष्ठान का दस्तावेज है लिब्राहन की रिपोर्ट-चंपत राय
चंपत राय विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री हैं. लिब्राहन आयोग के दोषियों की सूची में चंपत राय का भी नाम है. लेकिन चंपत राय का कहना है कि उन्हें एक बार भी अपना पक्ष रखने के लिए आयोग ने नहीं बुलाया. रिपोर्ट में चंपत राय को स्थानीय ठेकेदार बताया गया है जबकि उस समय भी वे विश्व हिन्दू परिषद का काम देख रहे थे. प्रस्तुत है चंपत राय से बातचीत जिसमें वे लिब्राहन आयोग पर ही कई तरह के सवाल उठा रहे हैं.
सवाल- लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट पर आपकी पहली प्रतिक्रिया?
जवाब- विसंगतियों और विरोधाभासों से भरी रिपोर्ट. तीन महीने का काम सत्रह साल में पूरा किया. इसका नाम तो लेटलतीफी के लिए गिनीज बुक में दर्ज होना चाहिए.
सवाल- तो क्या आप आयोग के काम काज पर ही सवालिया निशान लगा रहे हैं?
जवाब- बिल्कुल. आयोग के सामने जो कार्य निर्धारित किये गये थे वह करने में ही आयोग पूरी तरह से विफल रहा. मानो वे पहले से तय कर चुके थे कि किसे दोषी करार देना है और किसे दोषमुक्त कर देना है. और सत्रह साल बाद वही किया भी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट मेज पर बैठकर तैयार कर दी है.
सवाल- मेज पर बैठकर से आपका आशय क्या है?
जवाब- लिब्राहन आयोग का कार्यालय लखनऊ में बनाया गया था लेकिन आयोग ने एक भी दिन लखनऊ में बैठने की जहमत नहीं उठाई. उन्होने अपना सारा काम दिल्ली में बैठकर पूरा किया. इससे भी बड़ी बात यह है कि वे एक भी दिन अयोध्या नहीं गये. 6 दिसंबर की घटना जहां घटी वहां जाकर एक भी दिन निरीक्षण करने की जहमत उन्होंने नहीं उठायी. अब इसे आप क्या कहेंगे? क्या मेज पर सत्ता प्रतिष्ठान के इशारे पर तैयार रिपोर्ट नहीं कहेंगे?
सवाल- आप रिपोर्ट को किस आधार पर विसंगति और विरोधाभास का दस्तावेज कह रहे हैं?
जवाब- आप रिपोर्ट देखिए. रिपोर्ट के 166.8 में गोविन्दाचार्य को अटल जी को मुखौटा कहनेवाला बताया गया है. अब बाबरी विध्वंस से इस बयान का क्या ताल्लुक जिसका खुद गोविन्दाचार्य खण्डन कर चुके हैं कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा. इसी तरह जिन लोगों को दोषी ठहराया जा रहा है उनसे पूछताछ की भी जहमत नहीं उठायी है आयोग ने. अटल बिहारी वाजपेयी, बद्रीप्रसाद तोषनीवाल, मोरोपंत पिंगले, ओंकार भावे, राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया को आयोग ने कभी पूछताछ के लिए नहीं बुलाया. मैं भी इन्हीं लोगों में शामिल हूं. रिपोर्ट कितनी मनगढंत है इसका अंदाज इसी से लग जाता है कि इसमें प्रवीण भाई तोगड़िया को भी दोषी ठहराया गया जो कि तब विहिप में बहुत स्थानीय स्तर पर सक्रिय थे.
सवाल- आयोग ने छह दिसंबर की घटना को एक षण्यंत्र करार दिया है. आप क्या कहते हैं?
जवाब- इसीलिए तो मैं इसे विरोधाभासों से भरी रिपोर्ट कह रहा हूं. पैरा 159.8 में रिपोर्ट कह रही है कि घटना स्वयंस्फूर्त न होकर एक सुविचारित कार्य था लेकिन पैरा 7.4 में खुद रिपोर्ट स्वीकार करती है कि उनके सामने ऐसा कोई तथ्य या प्रमाण नहीं प्रस्तुत किया गया जिससे यह साबित हो जाता कि यह सुविचारित कर्म था. गृहसचिव गोडबोले के हवाले से भी आयोग कह रहा है कि यह कहना मुश्किल है कि यह किसी राजनीतिक दल (कांग्रेस या भाजपा) का षण्यंत्र हो सकता है. फिर किस आधार पर वे इसे सुनियोजित षण्यंत्र करार दे रहे हैं?
सवाल- आयोग ने राम मंदिर आंदोलन को ही आंदोलन नहीं माना है.
जवाब- यही तो बात है. एक बार वे लिखते हैं कि यह कोई आंदोलन था ही नहीं फिर बार कई जगह इस बात का उल्लेख करते हैं कि आंदोलन और उससे जुड़े नेता. क्या यह विरोधाभास नहीं है?
सवाल- आगे विश्व हिन्दू परिषद अब रामजन्मभूमि के मसले पर क्या नीति बना रहा है?
जवाब- हमारी नीति संत तय करेंगे. अगले साल हरिद्वार कुंभ में साधु संत मिलकर तय करेंगे कि इस दिशा में आगे क्या करना है. वे जैसा तय करेंगे हम उसके अनुसार चलेंगे.
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राम तत्व कण-कण बसा, मन्दिर मुद्दा झूठ.
मन्दिर मुद्दा झूठ-सत्य है आधा-आधा.
पूरी समझ नहीं है- है निर्माण की बाधा.
कह साधक कवि समझ के बल पर हो सत्यापन.
झूठ के ऊपर झूठ बना आयोग लिब्राहन.
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