Home | आमने-सामने | दलित के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहती कांग्रेस- अली अनवर

दलित के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहती कांग्रेस- अली अनवर

image अली अनवर, अध्यक्ष, पश्मांदा मुस्लिम महाज

अली अनवर पश्मान्दा मुस्लिम महाज के नेशनल प्रेसीडेन्ट हैं और राज्यसभा में जद (यू) के मुख्य सचेतक हैं. रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत करवाने में अकेले अली अनवर की ही भूमिका है. पिछले दो साल से लगातार वे इस रिपोर्ट को सदन में पेश किये जाने के लिए अभियान चला रहे थे. रंगनाथ मिश्रा आयोग के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर हमने उनसे लंबी बात की. प्रस्तुत है अली अनवर से पूरी बातचीत-

सवाल- रंगनाथ मिश्रा आयोग के बारे में आप क्या कहेंगे?
जवाब-
रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन भारत सरकार के नोटिफिकेशन पर 2004 में किया गया जिसका पूरा नाम है भाषाई एवं अल्पसंख्यक धर्म आयोग. गठन के एक साल तक तो यह आयोग काम ही नहीं शुरू कर सका था. गठन के तीन साल बाद 2007 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसके दो साल सात महीने बाद दिसंबर 2009 में सरकार ने इसे सदन पटल पर रखा. रिपोर्ट सदन पटल पर कैसे आयी इसे आप सब जानते हैं. वह भी तब जब मुख्य सूचना आयुक्त ने कहा कि आप रिपोर्ट सार्वजनिक कीजिए और मीडिया में रिपोर्ट के हिस्से छपने लगे. फिर भी सरकार हीला हवाली कर रही थी जिसके बाद मैंने अकेले दो बार राज्यसभा को इस मुद्दे पर नहीं चलने दिया तब जाकर सरकार ने आश्वासन दिया कि वह शीत सत्र के समापन से पहले रिपोर्ट को सदन पटल पर रखेगी. हमें इस मुद्दे पर सभी दलों से समर्थन मिला. कम से कम भाजपा ने भी यह तो कहा ही कि रिपोर्ट सदन पटल पर आनी चाहिए. लेकिन सरकार ने एक तो रिपोर्ट को सदन स्थगित होने वाले दिन इसे सदन पटल पर रखा और वह भी बिना एटीआर के. यह न सिर्फ रिपोर्ट के साथ अन्याय है बल्कि सुप्रीम कोर्ट का भी अपमान है.

सवाल- क्या सरकार जानबूझकर ऐसा कर रही है?
जवाब- बिल्कुल। सरकार की शुरू से ही इस रिपोर्ट को दबाने की मंशा साफ दिख रही है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आयी तो सरकार ने उसे अल्पसंख्यकों का वोट बटोरने के लिए खूब इस्तेमाल किया. लेकिन रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए तैयार नहीं थे. आयोग की रिपोर्ट को लेकर सरकार कितनी बेपरवाह थी वह आप इसी से समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए प्रधानमंत्री का समय दिया ही नहीं जिसके बाद आयोग के कुछ लोग प्रधानमंत्री कार्यालय में रिपोर्ट रिसीव करवा आये. इससे ज्यादा कुछ और अनादर हो सकता है इस आयोग का?

हमें मुसलमान होने के नाम पर 10 प्रतिशत आरक्षण नहीं चाहिए. रंगनाथ मिश्रा आयोग की इस सिफारिश का हम भी विरोध कर रहे हैं. लेकिन दूसरी सिफारिशें जरूर मान्य की जानी चाहिए.सवाल- इस आयोग में ऐसा क्या है जो सरकार इस रिपोर्ट को लेकर इतनी उदासीन है?
जवाब- असल में आयोग के काम काज में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर एक क्लाज जोड़ा था. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में दलित ईसाईयों के आरक्षण को लेकर एक केस की सुनवाई हो रही थी. इसी वक्त सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के काम काज में एक और टर्म्स आफ रिफरेन्स जुड़वाया कि यह आयोग अन्य धर्मों में भी दलितों की पहचान करेगा. सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्देश के बाद सरकार ने आयोग के काम काज में इसे जोड़ दिया. बस यहीं से सरकार इस आयोग को लेकर उदासीन हो गयी.

भारत में अभी सिर्फ हिन्दू, सिख और बौद्ध के अलावा अन्य किसी धर्म में दलित को मान्यता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने जब यह कह दिया कि अन्य धर्मों में दलित की पहचान का काम भी यह आयोग करे तो सरकार इस आयोग को लेकर उदासीन हो गयी. इसीलिए रिपोर्ट को ढाई साल तक रिपोर्ट को दबाकर रखा और अब बिना एटीआर के रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत कर दिया. यह एक तरह से सुप्रीम कोर्ट और संसद दोनों का अपमान है.

सवाल- रंगनाथ मिश्रा आयोग ने क्या अन्य धर्मों में दलित की पहचान की है?
जवाब- बिल्कुल. 1950 के प्रेसिडेन्सियल आर्डर के तहत जो व्यवस्था कायम की गयी है कि सिर्फ हिन्दुओं में ही दलित हैं उसे रंगनाथ मिश्रा आयोग ने असंवैधानिक माना है. रंगनाथ मिश्रा आयोग ने इसे उतना ही गलत माना है जितना धर्म के आधार पर भेदभाव करना. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे वापस लेने की सिफारिश की है.

सवाल- इसका व्यावहारिक परिणाम क्या होगा?
जवाब- अगर रंगनाथ मिश्रा आयोग की इस सिफारिश को मान लिया जाता है तो दूसरे धर्म के दलितों को एससी कोटे में जगह मिलेगी जिससे वह उन्हीं दलितों के समान अवसर पा सकेंगे जैसे हिन्दू, सिख और बौद्धों को मिला हुआ है.

सवाल- आयोग और कौन सी मुख्य सिफारिशें हैं?
जवाब- देखिए, रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट दो खण्डों में और चार सौ पृष्ठों की है. लेकिन मुख्यरूप से आयोग ने तीन सिफारिशें की हैं. पहली सिफारिश तो यही है कि 1950 का प्रेसिडेन्सियल आर्डर वापस लिया जाए, दूसरी, अल्पसंख्यकों को 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए. लेकिन आयोग अपनी इस दूसरी सिफारिश करते समय एक और महत्वपूर्ण सिफारिश करता है. आयोग कहता है कि अगर अल्पसंख्यकों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था में कोई पहाड़ जैसी समस्या हो तो 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण में अल्पसंख्यकों के लिए 8.4 प्रतिशत जो सीटें आरक्षित हैं उसमें मुस्लिम ओबीसी के लिए आरक्षित 6 प्रतिशत मार्क को अलग से चिन्हित कर दिया जाए.

सवाल- इसे थोड़ा और स्पष्ट करिए?
जवाब- देखिए रंगनाथ मिश्रा आयोग भी जानता है कि धर्म के नाम पर आरक्षण असंवैधानिक है इसलिए वह जब धर्म के नाम पर 15 प्रतिशत के आरक्षण की संभावना बतायी है तो आयोग एक वैकल्पिक व्यवस्था भी देता है. देश में धर्म के नाम पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. यह जानते भी आयोग ने 15 प्रतिशत आरक्षण धार्मिक आधार पर देने की वकालत करना गलत है. हम इसका विरोध करते हैं. इस्लाम और ईसाई कभी इसका समर्थन नहीं करेंगे.

सवाल- इसाई और मुसलमान इसका विरोध क्यों करेंगे?
जवाब- अगर रंगनाथ मिश्रा आयोग की इस सिफारिश को मान लें कि धर्म के नाम पर आरक्षण होगा तो इसमें सबसे अधिक नुकसान ईसाईयों और मुसलमानों को ही होगा. हम क्या चाहते हैं? हम सिर्फ यह चाहते हैं कि आयोग ने जिस 1950 के प्रेसिडेन्सियल आर्डर को समाप्त करने की सलाह दी है उसे मान लिया जाना चाहिए.  इससे मुसलमान और ईसाई दलितों को एसएसी केटेगरी में जगह मिल जाएगी और उसकी समस्या का समाधान भी हो जाएगा और सांप्रदायिक सद्भाव नहीं बिगड़ेगा. अगर धर्म के नाम पर आरक्षण दिया जाएगा तो देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा. इसका विरोध तो हम सब कर रहे हैं. और अभी ईसाईयों और मुसलमानों को विभिन्न वर्गों में जो सुविधाएं मिली हुई हैं वे सब धर्म के नाम पर आरक्षण मिलने पर खत्म हो जाएगा. आप ही बताइये हम भला धर्म के नाम पर आरक्षण को कैसे मान सकते हैं?

सवाल- भाजपा का इस पूरे मसले पर क्या रुख है?
जवाब- भाजपा इस पूरे मामले में गंदा खेल खेल रही है. उनके लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं. वे वास्तविक स्थिति को सामने रखने की बजाय इसे राजनीतिक रंग दे रहे हैं. हम भी तो यही कह रहे हैं कि धर्म के नाम पर आरक्षण नहीं होना चाहिए. हम सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के नाम पर आरक्षण मांग रहे हैं. इसमें गलत क्या है? हम खुद मुसलमान होने के नाते आरक्षण की मांग नहीं कर रहे हैं. लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बात को बिगाड़ रहे हैं और इसे सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं. इससे असल बात पीछे छूट जाएगी और राजनीति हावी हो जाएगी.

सवाल- और कांग्रेस क्या कहती है?
जवाब- कांग्रेस भी ड्रामेबाजी कर रही है. वह दलितों का भला नहीं चाहती है. वे दलितों के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहते. दलितों के नाम पर राहुल गांधी ड्रामेबाजी कर रहे हैं. मुसलमान और ईसाई दलितों को आरक्षण राजनीतिक एजेण्डा है जिसे कांग्रेस पूरा नहीं करना चाहती. दलित मुसलमानों की आज भी कोई नुमाइंदगी नहीं है हमारे संसद में. रंगनाथ मिश्रा आयोग इस दिशा में रास्ता खोल रहा है लेकिन कांग्रेस जानबूझकर इसमें अडंगा लगा रही है.

सवाल- आप चाहते क्या हैं?
जवाब- धर्म चाहे कोई भी हो लेकिन भारत में जाति व्यवस्था वास्तविकता है. कोई भी धर्म जाति व्यवस्था के गुण-दुर्गुण से मुक्त नहीं है. अगर हिन्दू दलितों को आगे बढ़ने का मौका है तो फिर मुसलमान दलित और ईसाई दलित को आगे बढ़ने का मौका क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? भारतीय संसद में कुल तीस मुसलमान सांसद हैं लेकिन उसमें दलित मुसलमान कितने हैं? एक भी नहीं. बीस इसाई सांसद हैं जिसमें एक भी दलित वर्ग से नहीं है. क्या इसकी चिंता नहीं होनी चाहिए? क्या सिर्फ हिन्दू दलितों की ही चिंता होगी? दूसरे धर्मों के दलितों की चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए?

सवाल- तो क्या आप बड़ी राजनीति की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं?
जवाब- देखिए हम सिर्फ यह चाहते हैं कि मजहब के आधार पर हम दलितों को बांटने की कोशिश बंद होनी चाहिए। हिन्दू हो या मुसलमान दलित सब जगह दलित एक समान है. इसलिए हम चाहते हैं कि सभी धर्मों के दलितों में एकता हो. धर्म के नाम पर दलितों को बांटने का खेल बंद होना चाहिए. सभी दलित एक समान हैं फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या फिर ईसाई. इसलिए इनकी पहचान सिर्फ दलित के तौर पर होनी चाहिए. इसे आप बड़ी राजनीति कह सकते हैं क्योंकि हम मजहब के नाम पर होनेवाली राजनीति हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहते हैं. हमारी मांग पूरी तरह से सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर आरक्षण पाने की है जिसकी मंजूरी हमारा संविधान भी देता है और अब रंगनाथ मिश्रा आयोग भी विकल्प रूप में जो सुझाव दे रहा है उसे मांनने के अलावा और कोई चारा नहीं है. यह देश और समाज दोनों के हित में है. सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है गरीबी को दूर करने के िलए सरकार उपाय तो करे ही लेकिन आरक्षण जाति के आधार पर गलत नहीं है. धर्म बदलने से भी अगर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में बदलाव नहीं है तो क्या उन्हें आरक्षण नहीं मिलना चाहिए? मैं खुद अंसारी हूं लेकिन मैं यह आरक्षण मुसलमान होने के नाते अपने लिए नहीं मांग रहा हूं. मैं मुसलमान दलितों के लिए आरक्षण की मांग कर रहा हूं. यह उनकी जरूरत है.

हम ऐवान (संसद) में अकेले थे लेकिन आवाम में हम अकेले नहीं होंगे. हम इंसानियत के इस सवाल को लेकर आवाम के बीच जाएंगे.सवाल- धर्म के आधार पर आरक्षण गलत तो जाति के नाम पर आरक्षण सही कैसे है?
जवाब- धर्म के नाम पर आरक्षण पहले तो असंवैधानिक है और यह कभी हो नहीं सकता. और हर धर्म में ऊंच नीच है. मैं कह रहा हूं कि जाति के नाम पर आरक्षण होना चाहिए और आरक्षण का लाभ सिर्फ जरूरतमंदों को मिलना चाहिए. हम तो कहते हैं कि हम अल्पसंख्यक नहीं है. हम बहुसंख्यक है. हम दलितों की एकता चाहते हैं फिर वे किसी भी धर्म हों. यही नैसर्गिक, स्वाभाविक और मूल बात है. सांप्रदायिकता नामक बीमारी की यह अचूक दवा है.

सवाल- तो क्या ऊंची जाति के मुसलमान आपका विरोध नहीं कर रहे हैं?
जवाब- ऊंची जाति के मुसलमान तो हमारे दुश्मन हैं ही क्योंकि इससे उनको नुकसान होता है. आपको क्या लगता है कि कोई अब्दुल्ला बुखारी और शहाबुद्दीन इस मसले पर हमारा समर्थन करेंगे. उनका वश चले तो न जाने मेरे साथ क्या करें. लेकिन इस सवाल पर मैंने संसद में भी कहा कि भले ही यहां मेरा साथ कोई नहीं दे रहा है मैं इस मसले को आवाम के बीच लेकर जाऊंगा और वहां मैं अकेला नहीं रहूंगा. आप देखिए सदन में अल्पसंख्यक सांसदों की संख्या पचास के करीब है लेकिन इस मसले पर कोई सांसद आगे नहीं आया. ये सारे सांसद ऊंची जाति के हैं. रसूखवाले लोग हैं. उन्हें दलित मुसलमानों से कोई हमदर्दी आखिर क्यों होगी?

सवाल- आगे आप अपनी मांग के समर्थन में क्या करेंगे?
जवाब- मैंने पहले ही कह दिया है लोगों के बीच जाऊंगा. सरकार को मजबूर कर दूंगा कि वह रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिश को माने और दलितों को उसका वाजिब हक दे. जब तक यह नहीं हो जाता तब तक न हम चैन से बैठेंगे न तो सरकार को चैन से बैठने देंगे.

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
Rate this article
5.00
More from आमने-सामने
Previous
image
कश्मीर में अलगाववाद को मनोवैज्ञानिक मदद कर रहा है भारत
अजय च्रंगू पनुन कश्मीर के अध्यक्ष हैं जो कि निर्वासित कश्मीरी पण्डितों की सबसे बड़ी प्रतिनिधि संस्था है. कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने से हो रहे उपद्रव के बारे में अजय च्रंगू कहते हैं कि अलगाववादियों की "बाटमलाइन" सेपरेशन है. यानी वे तब तक शांत नहीं होंगे जब तक कि कश्मीर घाटी को भारत से अलग नहीं कर दिया जाता. ऐसे में भारत सरकार की ढुलमुल नीतियां कश्मीर को भारत के साथ रखने की बजाय भारत से दूर करेंगी. कश्मीर मसले पर अजय च्रंगू से एक बातचीत-...
image
विरोधियों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे-कुठियाला
पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए भोपाल में स्थापित माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय अक्सर विवादों में रहा है. छह महीने पहले जब प्रशासन ने नये कुलपित प्रो. बी के कुठियाला की नियुक्ति की तो एक बार फिर विश्वविद्यालय में तूफान खड़ा हो गया. प्रो. कुठियाला की नियुक्ति से लेकर अब तक विश्वविद्यालय पत्रकारिता की पढ़ाई का नहीं बल्कि राजनीति का अखाड़ा बन गया है. कुलपति पर आरोप है कि वे एक खास विचारधारा (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) से संपर्क रखते हैं इसलिए उनकी नियुक्तियों और कार्यपद्धति में उस विचारधारा का प्रभाव है जिसे वे बर्दाश्त नहीं करेंगे. जबकि कुलपति का कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर विश्वविद्यालय का माहौल खराब कर रहे हैं ताकि विश्वविद्यालय में जो बदलाव होने चाहिए उसे वे प्रभावित कर सकें. भोपाल में उनके घर पर हुई बातचीत में हमने उन पर लगे आरोपों और विश्वविद्यालय को लेकर लंबी बातचीत की. ...
image
शब्दों की चौकीदारी संभव नहीं-अनुपम मिश्र
अनुपम मिश्र पानी और पर्यावरण पर काम करने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन उनकी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के साथ उन्होंने एक ऐसा प्रयोग किया जिसका दूरगामी दृष्टि दिखती है. उन्होंने अपनी किताब पर किसी तरह का कापीराईट नहीं रखा. इस किताब की अब तक एक लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. मीडिया वर्तमान स्वरूप और कापीराईट के सवाल पर हमने विस्तृत बात की. यहां प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-...
image
निरुपमा के पिता ने दी थी बुरे अंजाम की धमकी- प्रियभांशु
निरुपमा की मौत के बाद प्रियभांशु गहरे अवसाद में है और मीडिया से बात करना बंद कर चुका है. लेकिन जिस प्रकार से निरुपमा के घरवाले इस पूरे मामले को टर्न देने की कोशिश कर रहे थे उसमें प्रियभांशु का बोलना जरूरी हो गया था. प्रियभांशु का कहना है कि निरुपमा के पिताजी ने तीन बार फोन करके उसके पिता को धमकी दी थी कि अपने बेटे को समेट लीजिए नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा. प्रियभांशु से की गयी बातचीत का महत्वपूर्ण अंश. ...
image
गुजरात दंगों का प्रायश्चित है गांधी कथा - नारायण भाई
गांधी की गोद में पैदा हुए नारायणभाई देसाई महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेवभाई देसाई के बेटे हैं. उन्होंने सक्रिय रूप से दस साल तक महात्मा गांधी के साथ काम किया है. महात्मा गांधी को बेहद करीब से देखने जाननेवाले नारायणभाई ने 80 साल की उम्र में गांधी कथा कहना शुरू किया तो संभवत: वे गांधी को उन्हीं के तरीकों से लोगों के सामने लाने जा रहे थे जो सेमिनारी गांधी और सरकारी गांधी से अलग थे. नारायणभाई देसाई अब तक 82 गांधी कथा कह चुके हैं. उनकी 82वीं गांधी कथा के मौके पर हमने उनसे लंबी बात की. बातचीत के प्रमुख अंश-...
image
अमर सिंह अच्छे, मुलायम अवसरवादी- कल्याण सिंह
अमर सिंह बहुत अच्छे इंसान हैं, राजनीतिक प्रबंधन का कौशल उनके टक्कर का किसी और नेता में नहीं है. उन्होंने मुलायम सिंह यादव की पार्टी को बहुत मजबूती दी और आय से अधिक संपत्ति के मामले में उनको अमर सिंह ने ही बचाया. अमर सिंह एक बहुत अच्छे नेता हैं और मैं उनका बहुत आदर करता हूँ .उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, कल्याण सिंह ने विस्फोट से एक विशेष बातचीत के दौरान यह बातें कहीं हैं. ...
image
सेन्सरशिप स्वीकार नहीं करेंगे -एरिक स्मिथ
गूगल कारपोरेशन के अध्यक्ष और सीईओ एरिक स्मिथ ने न्यूजवीक मैगजीन से बात करते हुए कहा है कि चीन में उनके ऊपर कई तरह के अनावश्यक प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जा रही थी जिसे वे स्वीकार नहीं करते. इसलिए गूगल ने वहां से बाहर जाने की धमकी दी थी. प्रस्तुत है न्यूजवीक में प्रकाशित एिरक स्मिथ से फरीद जकारिया की बातचीत-...
image
डिजिटल मीडिया में विज्ञापन की मांग बढ़ रही है- लिन डिसूजा
देश की तीन सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसियों में शुमार है लिंटास मीडिया ग्रुप (एलएमजी) और इसकी चेयरमैन व सीईओ हैं लिन डिसूजा। लिन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की 50 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में गिनी जाती हैं। उनका मानना है कि विज्ञापनदाताओं के लिए डिजिटल माध्यम काफी तेजी से उभर रहा है। लिन डिसूजा से बातचीत के चुनिंदा अंश। ...
image
राजनीति में आध्यात्मिक भावना रखनी चाहिए-राजनाथ सिंह
भाजपा अध्यक्ष के रूप में चार साल की राजनीतिक पारी खेलनेवाले राजनाथ सिंह को भाजपा का सबसे बेचारा अध्यक्ष कहा गया. लेकिन राजनाथ सिंह कहते हैं कि जिन कारणों से उन्हें बेचारा कहा जाता है वह उनकी उदारता है. राजनीति में आध्यात्मिक भावना रखने की सलाह देने वाले राजनाथ सिंह से चार साल के अपने अध्यक्षीय कार्यकाल और अन्य कई महत्वपूर्ण मसलों पर विस्फोट.कॉम ने विशेष बातचीत की....
image
मैं अकेला आया हूं और निरंतर चलता रहूंगा- नितिन गडकरी
भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन गडकरी ने गुरुवार को नई दिल्ली में विधिवत भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान संभाली. इस मौके पर उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेस में पत्रकारों से भी बातचीत की. लगभग एक घण्टे चली इस प्रेस कांफ्रेस में नितिन गडकरी से पत्रकारों ने खुलकर सवाल पूछे. इस प्रेस कांफ्रेस में पूछे गये कुछ महत्वपूर्ण सवाल और उस पर गडकरी के जवाब यहां प्रकाशित कर रहे हैं- संपादक...
image
दलित के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहती कांग्रेस- अली अनवर
अली अनवर पश्मान्दा मुस्लिम महाज के नेशनल प्रेसीडेन्ट हैं और राज्यसभा में जद (यू) के मुख्य सचेतक हैं. रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत करवाने में अकेले अली अनवर की ही भूमिका है. पिछले दो साल से लगातार वे इस रिपोर्ट को सदन में पेश किये जाने के लिए अभियान चला रहे थे. रंगनाथ मिश्रा आयोग के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर हमने उनसे लंबी बात की. प्रस्तुत है अली अनवर से पूरी बातचीत-...
image
सत्ता प्रतिष्ठान का दस्तावेज है लिब्राहन की रिपोर्ट-चंपत राय
चंपत राय विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री हैं. लिब्राहन आयोग के दोषियों की सूची में चंपत राय का भी नाम है. लेकिन चंपत राय का कहना है कि उन्हें एक बार भी अपना पक्ष रखने के लिए आयोग ने नहीं बुलाया. रिपोर्ट में चंपत राय को स्थानीय ठेकेदार बताया गया है जबकि उस समय भी वे विश्व हिन्दू परिषद का काम देख रहे थे. प्रस्तुत है चंपत राय से बातचीत जिसमें वे लिब्राहन आयोग पर ही कई तरह के सवाल उठा रहे हैं....
image
कांग्रेस मराठी माणुस को बांट रही है-उद्धव ठाकरे
शिवसेना की ओर से इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की सारी कमान उनके कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के हाथ में है. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की अस्वस्थता को देखते हुए यह चुनाव न सिर्फ शिवसेना के लिए बल्कि खुद उद्धव ठाकरे के लिए भी परीक्षा की घड़ी है. उद्धव ठाकरे इस चुनाव को महाराष्ट्र की मुक्ति का चुनाव मान रहे हैं और उनका कहना है कि कांग्रेस प्रदेश में मराठी माणुस की मानसिकता के साथ खिलवाड़ कर रही है और एक साजिश के तहत उसे बांट रही है. मराठी सामना के कार्यकारी संपादक संजय राऊत ने उनसे विस्तृत बात की जिसका संपादित हिस्सा हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं- संपादक...
image
उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी भाजपा - सुदर्शन
के.एस. सुदर्शन संघ के लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। नौ साल तक आरएसएस के सरसंघचालक रहे सुदर्शन के काल में ही भाजपा ने सत्ता संभाली. जाहिर है वह वक्त भाजपा संघ संबंधों को लेकर सबसे संवेदनशील वक्त था जब कई बार संघ और भाजपा आमने-सामने आ खड़े हुए थे. अब सुदर्शन सरसंघचालक तो नहीं है लेकिन भाजपा को लेकर उनके अपने अनुभव क्या रहे हैं? संघ और भाजपा के बीच बढ़ी दूरियों के लिए कौन जिम्मेदार हैं, ऐसे ही कई सारे सवालों के साथ अवधेश आकोदिया ने उनसे बात की....
image
भारतीय दृष्टि से ही निकलेगा समस्याओं का समाधान - समदौंग रिन्पोछे
यह महज संयोग ही नहीं है कि सरकार से इतर जो लोग विरोध के स्तर तक समाज कार्य में सक्रिय हैं उनमें से अधिकांश कहीं न कहीं महात्मा गांधी से प्रेरित हैं. 15 अगस्त की आधीरात जब देश आजादी का जश्न मना रहा था तो महात्मा गांघी बंगाल में बंटवारे से पैदा हुए शूल पर मरहमपट्टी कर रहे थे. आजादी के बाद भी समाज का वह शूल और नासूर कम नहीं हुआ है बल्कि और अधिक जटिल और भयावह हो गया है. इस शूल और नासूर को मिटाने के लिए जो लोग काम कर रहे हैं उनमें निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री समदौंग रिन्पोछे भी हैं. हिन्द स्वराज के लेखन के सौ साल पूरे हो गये हैं. स्वतंत्रता दिवस के इस मौके पर हमने समदौंग रिन्पोछे से बातचीत की. ...
image
दंगों की राजनीति कांग्रेस ने शुरू की- जरनैल सिंह
देश विदेश में सूचनाओं से जुड़े किसी व्यक्ति के लिए जरनैल सिंह शायद ही अपरिचित नाम हो. दिल्ली दंगों के मसले पर चिदंबरम पर जूता फेंककर उन्होंने न केवल राजनीति को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का संदेश दिया बल्कि मीडिया को भी मुद्दों पर पत्रकारिता करने के लिए प्रेरित किया. जरनैल सिंह जिस जज्बे और मुद्दे को लेकर पत्रकारिता में आये थे उसी जज्बे और मुद्दे के कारण वे पत्रकारिता से छुट्टी पर भेज दिये गये. उनका वह जज्बा और मुद्दा क्या है, कांग्रेस के बारे में वे क्या सोचते हैं और वे अब क्या करेंगे जैसे अनेकों सवालों पर विस्फोट न्यूज नेटवर्क ने उनसे बात की....
image
फिर लौटेंगे कार्टून के दिन - काक
हम अखबार के कोने में कार्टून न देखें तो अखबार अधूरा लगता है. लेकिन क्या हमने कभी किसी कार्टूनिस्ट की जिंदगी में झांककर देखने की कोशिश की है कि उसके अपनी जिंदगी का कोना कितना पूरा या अधूरा है? काक हम सबके लिए सुपरिचित कार्टूनिस्ट हैं. काकदृष्टि ब्लिट्ज के जमाने से अपने पाठकों को दृष्टि देती आयी है. एक और मशहूर कार्टूनिस्ट चंदर की काक से की गयी बातचीत. ...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2