डिजिटल मीडिया में विज्ञापन की मांग बढ़ रही है- लिन डिसूजा
देश की तीन सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसियों में शुमार है लिंटास मीडिया ग्रुप (एलएमजी) और इसकी चेयरमैन व सीईओ हैं लिन डिसूजा। लिन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की 50 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में गिनी जाती हैं। उनका मानना है कि विज्ञापनदाताओं के लिए डिजिटल माध्यम काफी तेजी से उभर रहा है। लिन डिसूजा से बातचीत के चुनिंदा अंश।
सवाल- हमारी अर्थव्यव्यवस्था पक्के तौर पर आर्थिक सुस्ती से निकलकर पटरी पर आ गई लगती है। लेकिन पिछला साल-सवा साल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी चुनौती भरा रहा है। बीते साल की यात्रा को आप कैसे देखती हैं?
जवाब- वैश्विक संकट का भारत पर उतना असर नहीं पड़ा। बाहर मंदी थी, लेकिन यहां सुस्ती थी। हमारे विज्ञापन व्यवसाय पर भी उतना बुरा असर नहीं पड़ा जितना बाकी दुनिया में। हां, इतना जरूर हुआ कि पहले जिस तरह 12-15 फीसदी वृद्धि हो रही थी, वह धीमी पड़ गई, 8-9 फीसदी पर आ गई।
भारत में दो-तीन चीजें हुईं। फाइनेंस सेक्टर में म्यूचुअल फंड पर असर पड़ा। लेकिन बीमा और बैंकिंग क्षेत्र ने बाउंस-बैक किया। ऑटो सेक्टर ने भी काफी अचंभित किया। दुनिया भर में ऑटो सेक्टर की हालत खराब थी। लेकिन भारतीय ऑटो सेक्टर ने जबरदस्त प्रदर्शन किया।
विज्ञापन के नजरिये से देखें तो जो दूसरा सेक्टर प्रभावित हुआ वह है टेलिकॉम। यह ऐसा क्षेत्र है जो विज्ञापन के प्रति तेजी से रिस्पांस करता है, इसमें इतनी प्रतिस्पर्धा है, इतने सारे नए खिलाड़ी आ रहे हैं। लेकिन पहली बार इसका रेवेन्यू घट रहा है। यह इस क्षेत्र के बहुत बुरा है क्योंकि इन्होंने पिछले चार-पांच सालों में दसियों हजार करोड़ का निवेश किया है। वे इसे पीछे नहीं खींच सकते।
तीसरा क्षेत्र है मीडिया व एंटरटेनमेंट। टेलीविजन कंपनियां, सिनेमा कंपनियां, बॉलीवुड, इन सबने निवेश जारी रखा है। इनमें से कई में विदेशी निवेश आया है। प्रिंट सेक्टर एक तरह से संघर्ष कर रहा है क्योंकि न्यूजप्रिंट का संकट था। लेकिन यह स्थिति भी अब सुधर रही है। कुल मिलाकर उपभोक्ता अब भी उपभोग कर रहा है। किसानों की आत्महत्या की बात हम जानते हैं। लेकिन अब भी उपभोग की चाहत है।
सवाल- इधर विज्ञापन उद्योग में किस तरह के परिवर्तन आ रहे हैं। क्या एजेंसियों और मीडिया से ग्राहकों की उम्मीदें बदल गई हैं?
जवाब- एक खास बात यह हुई है कि ग्राहक (विज्ञापनदाता) टीवी या प्रेस से ज्यादा मांग करने लगे। वे यकीनी तौर पर डिजिटल की मांग कर रहे हैं। हम इस समय डिजिटल माध्यम में काफी विकास की उम्मीद कर रहे हैं। डिजिटल में भी मोबाइल और इंटरनेट। मोबाइल में एप्लीकेशंस हैं लेकिन ज्यादा नहीं। इंटरनेट में जो चीज बहुत ऊंची जा रही है वह है सर्च। सर्च पर विज्ञापन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। डिस्प्ले या बैनर विज्ञापन में ऐसा नहीं हो रहा है। लेकिन सर्च पर विज्ञापन 200 गुना बढ़ा है। इस समय सर्च पर 50 हजार विज्ञापनदाता है, जबकि अन्य माध्यमों पर 5 हजार हैं। लोग इससे वाकिफ नहीं हैं, लेकिन मीडिया के क्षेत्र में ऐसा हो रहा है।
सवाल- आपने डिजिटल की बात की तो भारत में हिंदी ब्लॉगिंग का काफी तेज गति से विकास हो रहा है। साल 2007 के अंत में हिंदी ब्लॉगों की संख्या महज 500 के आसपास थी। लेकिन अब इनकी संख्या 20,000 के आसपास हो गई है। इसे आप किस रूप में देखती हैं?
जवाब- निश्चित रूप से यह पूरी दुनिया के स्तर पर वैकल्पिक मीडिया के रूप में विकसित हो रहा है। अंग्रेजी को एक तरफ रख दें तो चीन जैसे देशों में उनकी अपनी भाषा में लाखों ब्लॉग हैं जो लोकप्रिय हैं। भारत में हिंदी ही नहीं, मराठी, बंगला, तमिल, तेलुगू, मलयालम व कन्नड़ जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में ब्लॉग बन रहे हैं। यह अच्छा विकासक्रम है। हम इस पर नजर रखे हुए हैं। लेकिन इसकी स्वीकार्यता बनने और दायरा बढऩे में अभी थोड़ा वक्त लग सकता है।
सवाल- आपके हिसाब से अगले कुछ सालों में पारंपरिक प्रिंट उद्योग में विज्ञापन आय का स्वरूप कैसा रहेगा? खासकर हिंदी जैसी भारतीय भाषाओं के प्रिंट माध्यम का क्या हिस्सा रहेगा?
जवाब- यह अच्छी खबर नहीं है क्योंकि प्रिंट माध्यम लगातार युवा लोगों में रीडरशिप खो रहा है या उसकी रीडरशिप ठहरी हुई है। विज्ञापन में इसकी हिस्सेदारी पहले 60 फीसदी थी, अब 44-45 फीसदी रह गई है। इस समय टेलीविजन या प्रिंट में जो विकास हो रहा है, वह है क्षेत्रीय मीडिया में। टेलीविजन में मराठी चैनल, बंगाली चैनल व गुजराती चैनल बढ़ रहे हैं। दक्षिण में तो पहले ही ऐसा हो चुका है। प्रिंट में हमें लगता है कि क्षेत्रीय मीडिया हमेशा अंग्रेजी से बेहतर करता रहा है।
सवाल- विज्ञापन भी मीडिया का हिस्सा है। भले ही यहां मनी-मनी ही हो, लेकिन क्या इसे जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता? जो सारी चीजें उपभोग करता है, उपभोक्ता है क्या उसकी तरफ से कोई अंकुश विकसित किया जाना जरूरी है?
जवाब- यह वाकई एक बड़ी समस्या है। मैं तहेदिल से मानती हूं कि कभी-कभी हमारे यहां जिस तरह का विज्ञापन होता है, वह एकदम गैर-जिम्मेदार है। दरअसल, पीयूष (पीयूष पांडे, ओ एंड एम) और बाल्कि (लोवे इंडिया के बालकृष्णन, चीनी कम व पा फिल्मों के निर्देशक) मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। मैं उनसे कहती हूं कि आपके पास वो ताकत है कि आप लोगों को किसी भी चीज पर भरोसा दिला सकते हैं। आप उनमें अच्छी चीजों के प्रति भी विश्वास जगा सकते हैं। हम अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं।
यकीनन आप लिंटास में देख सकते हैं कि हम अपने विज्ञापनों में जो भी विचार पेश करते हैं, उसमें एक तत्व सामाजिक बदलाव का रहता है। इसे आप टाटा टी के जागो रे अभियान में देख सकते हैं। हमारी कोशिश है कि उपभोक्ता सिर्फ उत्पाद के बारे में ही नहीं, कुछ सामाजिक सच्चाइयों को भी आंखें खोलकर देखे। लेकिन बहुत-सी एजेंसियां हैं जो उपभोक्ता की मासूमियत का शोषण कर रही हैं। फिर भारत में तरह-तरह के उपभोक्ता हैं। कुछ हैं जो बहुत जागरूक हैं और कुछ हैं जो कुछ नहीं जानते हैं और उन्हें बेवकूफ बनाया जा सकता है। वे अनजान हैं। हमारे राजनीतिज्ञ तक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं। हमें, विज्ञापन जगत को जिम्मेदार होना पड़ेगा।
यह हकीकत है कि कम्युनिवेशन व विज्ञापन के सेक्टर में हम पर्याप्त काम नहीं कर रहे हैं, जबकि हमें काफी ज्यादा करना चाहिए। असल में, हम इसमें मनी नहीं देखते, रेवेन्यू नहीं देखते। यह गलत है। सामाजिक व व्यक्तिगत स्तर पर हम करते हैं, लेकिन समुदाय के स्तर पर हमारा विज्ञापन सेक्टर होपलेस है। यह केवल पार्टियों में जाता है।
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agar ek add agency samajik badlaav se lekar saamudaiyik kartavya ki bat yad rakhti hai to tareef k layak bat hai, lekin kahne aur jameeni star me antar nahi ho to accha!
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