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गुजरात दंगों का प्रायश्चित है गांधी कथा - नारायण भाई

image गांधी कथाकार नारायणभाई देसाई

गांधी की गोद में पैदा हुए नारायणभाई देसाई महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेवभाई देसाई के बेटे हैं. उन्होंने सक्रिय रूप से दस साल तक महात्मा गांधी के साथ काम किया है. महात्मा गांधी को बेहद करीब से देखने जाननेवाले नारायणभाई ने 80 साल की उम्र में गांधी कथा कहना शुरू किया तो संभवत: वे गांधी को उन्हीं के तरीकों से लोगों के सामने लाने जा रहे थे जो सेमिनारी गांधी और सरकारी गांधी से अलग थे. नारायणभाई देसाई अब तक 82 गांधी कथा कह चुके हैं. उनकी 82वीं गांधी कथा के मौके पर हमने उनसे लंबी बात की. बातचीत के प्रमुख अंश-

सवाल- गांधी कथा का विचार मन में कब आया?
जवाब-गांधी कथा का विचार गांधी जी की जीवनी लिखते हुए आया. गांधी जी की जो जीवनी मैंने तैयार की थी वह 23 सौ पृष्ठ और चार खण्डों में है जिसका नाम है मारू जीवन एज मारो संदेश. इसका प्रकाशन नवजीवन प्रकाशन ने किया है लेकिन जीवनी लिखते वक्त ही मेरे ख्याल में यह बात आयी कि जीवनी तो लिख दी लेकिन आम जन तक यह जीवनी पहुंचेगी कैसे? इसलिए मेरे मन में विचार आया कि मैं कथा के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक गांधी जी की जीवनी लेकर जाऊंगा. अब मन में यह विचार तो आया लेकिन मैंने कभी कोई कथा सुनी भी नहीं थी. जिसने कभी कथा सुनी भी न हो वह कथा करने के बारे में कैसे सोच सकता है? लेकिन अखबारों में पढ़ता था कि कोई कथा करता है तो हर तरह के लोग सुनने के लिए आते हैं. लेकिन मुझे लगता था कि अगर बच्चों को कहानी के जरिए मैं शिक्षण कर सकता हूं तो फिर कथा क्यों नहीं कर सकता. यह विचार आने के बाद संपूर्ण क्रांति विद्यालय में 9-10 महीने तक गांधी की कथा की और उनसे फीड बैक लिया. लोगों का फीडबैक कथा की दृष्टि से बहुत उत्साहवर्धक नहीं था क्योंकि लोग कहते थे कि आप गांधी जी के बारे में जिस तरह से बताते हैं वह इतिहास के पन्ने तो खुलते हैं लेकिन वह कथा नहीं है.

अब मेरे लिए मुश्किल थी कि मैं कथा के रूप में गांधी को लोगो के सामने कैसे प्रस्तुत करूं. 11-12 फरवरी को हर साल गुजरात के विभिन्न स्थानों पर गांधी मेला आयोजित किया जाता है. इस आयोजन से पहले दस दिन मैं रोज दो गांव घूमता था और गांववालों को शाम को गांधी कथा सुनाता था. जब मैंने गांववालों के सामने कथा की तो थोड़ा आत्मविश्वास और बढ़ा लेकिन मेरी मुश्किल यह थी कि कथाकार के लिए कोई आधार होना जरूरी होता है लेकिन मेरे पास ऐसा कोई आधार नहीं था. इसलिए गांधी कथा के इस अभ्यास काल के दौरान मैंने कुछ गीत भी शामिल किये और संगीत टोली का गठन किया. लेकिन पहली बार गांधी कथा की अपने एक मित्र के आश्रम में जो कि खुद कथाकार हैं. यह 2005 की बात है. यहां से गांधी कथा की शुरूआत हुई.

सवाल- अब तक कितनी गांधी कथा कर चुके हैं?
जवाब- अब तक 81 गांधी कथा हो चुकी है. 82 वीं यहां (मेवाड़ संस्थान, गाजियाबाद) में हुई है.

सवाल- गांधी कथा में आमतौर पर किस स्रोतावर्ग की रुचि दिखाई देती है?
जवाब- सब प्रकार के श्रोतावर्ग हैं. शुरुआत में तो वही लोग ज्यादा आते थे जो गांधी समाज से जुड़े हुए हैं. लेकिन अब ऐसा देखने में आ रहा है युवा वर्ग गांधी कथा के प्रति आकर्षित हो रहा है. पिछली दफा जो दिल्ली में कथा की थी उसमें तो डेढ़ हजार युवकों ने पूरे समय गांधी कथा सुनी थी. गांव और नगर दोनों जगह गांधी कथा हो चुकी है जिसमें नगर में संख्या अधिक होती है और गांव में संख्या थोड़ी कम होती है.

सवाल- गांधी कथा का आकर्षण और आधार क्या है?
जवाब- मुख्यरूप से गांधी कथा के दो आधार हैं. मेरी कोशिश होती है कि मैं जहां भी गांधी कथा करू वहां संगीत की टोली स्थानीय हो. इसका परिणाम यह होता है कि गांधी कथा के समाप्त हो जाने के बाद भी वहां गांधी चर्चा बनी रहती है. इसके लिए भद्रा बहन पूरी मदद करती हैं कि स्थानीय स्तर पर एक संगीत टोली तैयार हो जाए. गांधी जी के बारे में बहुत कुछ बोला जाता है और लिखा जाता है. लेकिन अपनी कथा में मैं गांधी जी के जीवन चरित्र के माध्यम से विषय को रखता हूं. मैं गांधी के साथ 22 साल रहा हूं. 10 साल सक्रिय रूप से उनके साथ काम किया है. उनके साथ रहते हुए जो अनुभव किया वही गांधी कथा के माध्यम से लोगों को बताता हूं.

सवाल- कथा की विषयवस्तु किस प्रकार से निर्धारित करते हैं?
जीवन- कथा की विषयवस्तु तो एक ही है-पोरबंदर से दिल्ली. लेकिन इसमें श्रोताओं के हिसाब से प्रस्तुतीकरण बदल जाता है.

सवाल- गांधी कथा कितने दिन में पूरी हो जाती है?
जवाब- गांधी का जीवन इतना लंबा और विशद है कि उनके बारे में किसी कथा को कुछ दिनों में पूरा कह पाना असंभव है. फिर भी सामान्यता 9 दिन में पूरा गांधी चरित्र कहने में सुविधा होती है. प्रतिदिन तीन घण्टे. इस तरह से नौ दिन में गांधी कथा पूरी होती है. लेकिन अब लोगों के पास नौ दिन का समय होना बड़ा मुश्किल है तो सात दिन में पूरा करने की कोशिश करते हैं. प्रतिदिन तीन घण्टे तो कथा के लिए होने ही चाहिए. फिर हर कथा के बाद मुझे यही महसूस होता है कि अरे, अभी तो कुछ बताया ही नहीं. अभी तो गांधी जी के बारे में कितना बताना तो बाकी ही रह गया.

सवाल- लेकिन भारत में कथा उनकी कही जाती है जिनका व्यक्तित्व चमत्कारिक अथवा दैवीय रहा है. क्या आप गांधी कथा के माध्यम से आप उन्हें एक चमत्कारिक और दैवीय शक्ति के रूप में सामने लाना चाहते हैं?
जवाब- यह तो बहुत बड़ी बात है. मैं खुद गांधी जी को चमत्कार नहीं मानता हूं. वे कोई देवता नहीं थे. वे एक सामान्य पुरुष थे जिन्होने निरंतर सत्य की साधना करके अपने आप को ऊपर उठाया. गांधी अवतार नहीं थे बल्कि वे पुरुषार्थ पुरुष थे. देखो, मैं उनके साथ रहा हूं. उनको देखा है. उनके साथ काम किया है लेकिन मैं उन्हें अवतार पुरुष नहीं मानता हूं. मैं कह सकता हूं कि गांधी से ज्यादा भक्ति मुझे मेरे पिताजी महादेवभाई देसाई में थी. महादेवभाई गांधी को दैव पुरुष मानते थे. वे कहते थे गांधी चमत्कार हैं. और जितनी मेरी मेरे पिताजी में श्रद्धा थी उससे कई गुणा अधिक उनकी श्रद्धा गांधी जी में थी. फिर भी उनके सामने भी मैने कभी इस बात को स्वीकार नहीं किया कि गांधी चमत्कारिक अवतार थे. गांधी पुरुषार्थ पुरुष थे और उनको उसी रूप में मैं लोगों के सामने प्रस्तुत करता हूं. गांधी के विराट व्यक्तित्व को जितना मैंने उनके रहते अनुभव किया उनके जाने के बाद उनका विराट व्यक्तित्व और विराट रूप में सामने आना शुरू हुआ. मैं अपन कथाओं में यही बात कहता हूं कि देखो गांधी हमार आपके जैसे सामान्य पुरुष थे और कोई सामान्य व्यक्ति कोशिश करे तो कहां तक जा सकता है इसका नमूना गांधी जी ने पेश किया है.

सवाल- आप मानते हैं कि गांधी ने कोई चमत्कार नहीं किया?
जवाब- गांधी ने कोई चमत्कार नहीं किया था. उनके कार्यों के परिणाम चमत्कार के रूप में सामने आया कि ब्रिटिश राज्य खत्म हो गया तो मैं ऐसा मानता हूं कि देश में ब्रिटिश राज्य केवल गांधी के कारण खत्म नहीं हुआ. उसमें और भी कारण थे. खुद गांधी जी ने भी कभी यह नहीं कहा कि उनके कारण देश को ब्रिटिश राज्य से मुक्ति मिली है. ब्रिटिश सरकार ने जरूर यह माना है कि अगर वे भारत से वापस जा रहे हैं तो उसमें गांधी का अहिंसा आंदोलन बहुत बड़ा कारण है. यह इतिहास है और इतिहास को कोई बदल नहीं सकता. लेकिन ये कहना कि गांधी के अहिंसक आंदोलन से स्वराज्य मिल गया, सही नहीं है. मैं इसे गलत मानता हूं.

सवाल- गांधी को पुरुषार्थ पुरुष कहने के पीछे आपके अपने आधार क्या हैं?
जवाब- गांधी जी ने दो तरह के पुरुषार्थ किये. अंतर और वाह्य. गांधी में यह दोनों पुरुषार्थ दिखते हैं. वे समाजक्रांति भी करते हैं और आत्मशुद्धि भी करते हैं. हालांकि दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है लेकिन पश्चिम में समाज क्रांति की बात सबसे मुखर है जबकि अपने यहां आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति के ही रास्ते सबसे प्रबल हैं. गांधी ने इन दोनों का सामंजस्य किया. उन्होंने चित्तशुद्धि से समाजक्रांति और समाजक्रांति को चित्तशुद्धि का माध्यम बनाया.

सवाल- मोरारी बापू ने भी तीन किश्तों में गांधी कथा कही है और यह बताने की कोशिश की है गांधी के राम और अयोध्या के राम दोनों एक ही हैं. आप क्या कहेंगे?
जवाब- मैंने उनकी दांडी की वह कथा सुनी है जो गांधी पर उनकी पहली कथा है. वे जो कहना चाहते हैं वे कह रहे हैं लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि गांधी के राम और अयोध्या के राम एक ही नहीं है. गांधी जी ने खुद कहा था कि मेरा राम दशरथ का पुत्र राम नहीं है. वे कहा करते थे उनका राम वह तत्व है तो अल्ला में भी है, भगवान में भी है और ईसा मसीह में भी है. इसलिए मैं ऐसा बिल्कुल नहीं मानता हूं. एक बात मैं और बता दूं कि जब गांधी के बारे में मैं ऐसा कह रहा हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे रामचरित मानस को मान नहीं देते थे. आश्रम में नियमित रामचरित मानस का पाठ होता था. फिर भी वे जिस राम के सहारे थे वह अयोध्या के राम नहीं थे.

सवाल- गांधी के प्रति सम्मान होने के बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें कई बातों के लिए दोषी ठहराता है. आप क्या कहते हैं?
जवाब- गांधी के बारे में कुछ अफवाहें और गलत प्रचार हैं जिसके कारण गांधी को समझने में मुश्किल होती है. जैसे एक बहुत गलत प्रचार चला आ रहा है कि गांधी जी चाहते तो भगत सिंह को फांसी नहीं होती. यह झूठ है. गांधी जी के चाहने से कुछ नहीं होता. खुद इरविन भी चाहते तो भगत सिंह की फांसी नहीं रोक सकते थे क्योंकि इसके बारे में फैसला ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर करता था. गांधी जी ने छह बार कोशिश की कि भगत सिंह को फांसी रुक जाए. यह उनकी डायरी में दर्ज है. गांधी जी के बारे में ऐसे बहुत सारे भ्रम है जिसके कारण एक वर्ग में उन्हें लेकर गुस्सा है.

सवाल- ऐसा आभास होता है कि खुद गुजरात में गांधी का प्रभाव कम हो गया है?
जवाब- यह बात सही है कि पिछले पच्चीस तीस सालों से वहां विपक्ष ही सरकार में हैं. लेकिन जब गांधी थे तो वे खुद ही कितने दिन गुजरात में रहे? जब गुजरात से निकले तो कहा कि आजादी मिलने के बाद ही यहां वापस आऊंगा. गुजरात के नगरों में गांधी का प्रभाव कम है यह बात सही है लेकिन कच्छ और सौराष्ट्र में आज भी गांधी का प्रभाव है. लेकिन यहां एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि गुजरात के दंगों के कारण गुजरात में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा है. मसलन अहमदाबाद के जोहापुरा इलाके में अब सार्वजनिक बसें भी नहीं जाती. नरेन्द्र मोदी जी इसे भले ही गर्व की बात मान लें लेकिन एक गुजराती होने के नाते मैं इसे शर्म की बात मानता हूं कि गांधी के गुजरात में ऐसा हो रहा है.

सवाल- क्या ऐसा गुजरात में हुए दंगों का प्रभाव है?
जवाब- गुजरात में जो दंगे हुए उसके लिए एक गुजराती होने के नाते नरेन्द्र मोदी जितना मैं भी अपने आप को जिम्मेदार मानता हूं. दंगों में चाहे हिन्दू मरा हो या मुसलमान, गुजरात का नागरिक होने के नाते उस पाप में मैं भी भागीदार हूं. इसलिए मेरी गांधी कथा गुजरात दंगों का प्रायश्चित है. मैं गांधी जी की तरह उपवास नहीं कर सकता इसलिए उनकी कथा कहकर अपने पाप को कम कर रहा हूं.

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लिमटी खरे on 16 April, 2010 21:53;48
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बहुत बढिया प्रस्‍तुति संजय जी, बधाई, हमारा दर्भाग्‍य था कि आपके कहने के बाद भी हम नारायण भाई को सुन नहीं सके आपने इसके माध्‍यम से उसे कुछ हद तक पूरा तो कर दिया है, पर मन में कथा न सुन पाने की कसक जरूर बाकी है, बहरहाल शुक्रिया बहुत शुक्रिया जनाब
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विष्‍णु बैरागी on 17 April, 2010 00:51;25
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नारायण भाई की गाम्‍ंधी कथा मैंने सुनी है-अगस्‍त 2007 में, इन्‍दौर में। यह रोमांचक और अविस्‍मरणीय अनुभव है। जिसने भी यह कथा सुनने का अवसर पाया है उसने सचमुच में कुछ अनूठा पाया है।
यह साक्षात्‍कार प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद।
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अभय तिवारी on 19 April, 2010 13:15;14
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इतनी मर्मस्पर्शी बाते करने वाले नारायण भाई की गाँधी कथा सुनने का बहुत मन है..
महादेव देसाई के पुत्र होने के साथ, नारायण भाई समाजवादी नेता और ब्लौगर अफ़लातून देसाई के पिता भी हैं..
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aayush on 20 April, 2010 15:27;50
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''गुजराती होने के नाते मैं खुद भी यहाँ हुए सांप्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार हूँ।'' हृदय को छू लेने वाली प्रस्तुति। ऐसा लगता है मानो नारायण भाई देसाई के मुख से कलयुग का 'गाँधी' बोल रहा हो। साधुवाद।
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संजय बेंगाणी on 01 May, 2010 15:03;45
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नारायणभाई से व्यक्तिगत पहचान है. बहुत बार मिले भी है. जिन बातों से मेरी असहमती है वह लिख रहा हूँ.

"यह बात सही है कि पिछले पच्चीस तीस सालों से वहां विपक्ष ही सरकार में हैं."

यह बात घोर अलोकतांत्रिक है. जो भी दल सत्ता में रहे वह सत्तापक्ष होता है. और जब वह सत्ता में नहीं होता विपक्ष कहलाता है. यहाँ शायद वे गैर कांग्रेसी सरकार की बात कर रहे है तो उन्हें विनम्रता से कहना चाहुंगा गाँधी का सत्यानाश कॉंग्रेस ने ज्यादा किया है.

"गुजरात में जो दंगे हुए उसके लिए एक गुजराती होने के नाते नरेन्द्र मोदी जितना मैं भी अपने आप को जिम्मेदार मानता हूं."

यहाँ मैं पूछना चाहूँगा, किन दंगों से आपको तकलीफ हो रही है. 1962 के या बाद के या बहुत बाद के. मुगलकाल से ही यहाँ दंगे होते आए है. मोदी को धन्यवाद की पिछले लम्बे काल से शांति है. इतने लम्बे काल तक कभी शंति नहीं रही. क्या मैं गलत कह रहा हूँ? आपको खूश होना चाहिए.

***

नायारणभाई भले व्यक्ति है. भाषा पर अच्छी पकड़ है. गाँधी में उन्हे अटूट श्रद्धा है. मैं इन बातों के लिए उन्हे नमन करता हूँ.
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sanjay modi on 12 May, 2010 22:14;35
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sanjay modi on 12 May, 2010 22:29;15
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narayan bhai, aap ki batton se laga aap gandhi katha kam congress katha jayada kaha rahe ho,
aapki jankari waste bata dun ki gandhi ne hi kah tha ki congress party ko azadi milte hi bhang kar diya jayega taki koi bhi iska nazayaz fayda nahi uttha sake, magar, unhi ki gaud mein baithne wale nehru ne aisa nahi hone diya aur congress ke is abhiyan ko azad bharat mein unhone satta hathiyane ka jariya banaya, aur ye aaj bhi ho raha hai, usi nehru ne congress ke naam pe satta hatiya ke veer ran bankuron ko china kr hatton marwaya, desh ke kisi bhi kone mein ugrawad panpa hai to is congress ke sasan kal mein hi panpa hai, manipur mein bhartya nari ko nanga ho ke apni baat rakhni padi to yahi congress ke sasan mein, kashmiriyon aaj tak khadera hua bhi is congress ke sasan kal mein hi, punjabiyon ko delhi mein mara gaya aur congress ke tatkalin sirsh neta rajivji ne samarthan kiya wo bhi is sasankal mein, north east mein ugrawad aaj bhi hai aur sasan mein congress bhi, maowadi sare aam hatya kar rahe hai aur congress saatta mein, aap gujrat se bhi bahar dekhiye kyonki gandhi kewal gujrat ke nahi bulki pure desh ke the aur desh unka, jise aaj congress ne kitna dayniya bana diya hai, gujrat dango se pahle godhra pe bhi kuch bolte to aap ki batton mein succhaai ki jhalak dikhti.
kher aap delhi mein baithe congression ki gandhi ke bahane se madad is tarah hi karte rahe to ye to pakka hai ki aap ko bhi bharat ratna bhi mil hi jayega, magar jara sochiye swarag mein baithajo gandhi aaj ka bharat dekh ke lahuluhan hai usko kya chehra dikhaoge?
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दंगों की राजनीति कांग्रेस ने शुरू की- जरनैल सिंह
देश विदेश में सूचनाओं से जुड़े किसी व्यक्ति के लिए जरनैल सिंह शायद ही अपरिचित नाम हो. दिल्ली दंगों के मसले पर चिदंबरम पर जूता फेंककर उन्होंने न केवल राजनीति को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का संदेश दिया बल्कि मीडिया को भी मुद्दों पर पत्रकारिता करने के लिए प्रेरित किया. जरनैल सिंह जिस जज्बे और मुद्दे को लेकर पत्रकारिता में आये थे उसी जज्बे और मुद्दे के कारण वे पत्रकारिता से छुट्टी पर भेज दिये गये. उनका वह जज्बा और मुद्दा क्या है, कांग्रेस के बारे में वे क्या सोचते हैं और वे अब क्या करेंगे जैसे अनेकों सवालों पर विस्फोट न्यूज नेटवर्क ने उनसे बात की....
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फिर लौटेंगे कार्टून के दिन - काक
हम अखबार के कोने में कार्टून न देखें तो अखबार अधूरा लगता है. लेकिन क्या हमने कभी किसी कार्टूनिस्ट की जिंदगी में झांककर देखने की कोशिश की है कि उसके अपनी जिंदगी का कोना कितना पूरा या अधूरा है? काक हम सबके लिए सुपरिचित कार्टूनिस्ट हैं. काकदृष्टि ब्लिट्ज के जमाने से अपने पाठकों को दृष्टि देती आयी है. एक और मशहूर कार्टूनिस्ट चंदर की काक से की गयी बातचीत. ...
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