कश्मीर में अलगाववाद को मनोवैज्ञानिक मदद कर रहा है भारत
अजय च्रंगू पनुन कश्मीर के अध्यक्ष हैं जो कि निर्वासित कश्मीरी पण्डितों की सबसे बड़ी प्रतिनिधि संस्था है. कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने से हो रहे उपद्रव के बारे में अजय च्रंगू कहते हैं कि अलगाववादियों की "बाटमलाइन" सेपरेशन है. यानी वे तब तक शांत नहीं होंगे जब तक कि कश्मीर घाटी को भारत से अलग नहीं कर दिया जाता. ऐसे में भारत सरकार की ढुलमुल नीतियां कश्मीर को भारत के साथ रखने की बजाय भारत से दूर करेंगी. कश्मीर मसले पर अजय च्रंगू से एक बातचीत-
सवाल- कश्मीर में क्या हो रहा है?
जवाब- लोगों के विरोध को एक बगावत का स्वरूप देने की कोशिश की जा रही है जिसे कुछ लोग यह कह रहे हैं कि जैसे नब्बे में अलगाववादियों को जनता का समर्थन था वैसा ही समर्थन इस बार है. लेकिन ऐसा नहीं है. हां, इतना जरूर है कि उपद्रवी सत्ता तंत्र में भी फैल चुके हैं जो इस उपद्रव को हवा दे रहे हैं. उनकी कोशिश है कि शेष दुनिया को यह बताया जाए कि कश्मीर भारत के साथ नहीं है. घाटी में हालात को सुधारने के लिए जो भी कोशिशें की गयी हैं वे सब भी विफल हो चुकी हैं. भारत सरकार भी इस कोशिश में है कि कोई राजनीतिक पहल की जाए और अलगाववादियों के साथ समझौता कर लिया जाए. जबकि घाटी में बैठे अलगाववादियों के आका मानते हैं कि घाटी में चल रहे जनाक्रोश की बॉटमलाइन तो सेपरेशन है.
आज उपद्रव का जो स्वरूप दिखाई दे रहा है वह भी भारत द्वारा शुरू किये गये पीस प्रोसेस से निकला है. अटल बिहारी वाजपेयी ने जब कहा कि आतंकवाद से कोई समझौता नहीं करेंगे और पाकिस्तान से किसी भी तरह का रिश्ता नहीं रखेंगे तो पाकिस्तानी हुक्मरानों की मजबूरी हो गयी कि वे आतंकवाद को घाटी में घटाने की की दिशा में उपाय करें. लेकिन उसके बाद से ही अलगाववादी ताकतों ने उपद्रव को अपना रास्ता बना लिया ताकि पूरी दुनिया में यह संदेश जाए कि कश्मीरी अवाम भारत के खिलाफ है. इस दिशा में वे काफी दिनों से काम कर रहे हैं. इसमें उनको सफलता नहीं मिलती अगर भारत सरकार समय समय पर यह संदेश नहीं देती कि भारत सरकार तो अलगाववाद के सवाल पर पाकिस्तान के साथ किसी समझौते पर पहुंच गयी थी लेकिन पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के कारण वह समझौता अस्तित्व में नहीं आ सका. इसका कश्मीरी अलगाववादियों में गलत संदेश गया और उन्होंने उपद्रव का रास्ता अख्तियार कर लिया क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि भारत सरकार अगर किसी बड़े निर्णय के लिए तैयार थी तो उससे अभी भी वह निर्णय करवाया जा सकता है. इसलिए आज कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसको साजो सामान अगर पाकिस्तान दे रहा है तो मनोवैज्ञानिक मदद भारत की नीतियों के कारण हो रहा है.
सवाल- तो भारत कश्मीर खो चुका है?
जवाब- इस तरह के अलगाववाद और उग्रवाद से कैसे निपटा जाता है इसे चीन और अफगानिस्तान को देखकर समझा जा सकता है. अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों ने कितने नागरिकों को मारा? क्या उसकी कहीं कोई निंदा हुई? कश्मीर में भारत ने बहुत संयम से काम लिया है. दुनिया में आज कोई भी देश भारत के इस संयम की प्रशंसा करता है. लेकिन इस वक्त कश्मीर में जो हो रहा है वह भारत के राजनीतिक नेतृत्व को चुनौती है. जो लोग यह मैसेज देते रहे हैं कि कश्मीर में कोई समझौता करना चाहिए, अलगाववादी उन्हें मजबूर कर रहे हैं कि वे वह करें जिसका मैसेज दे चुके हैं. इस समय जो विरोध प्रदर्शन है वह प्रमुखता से भारतीय राजनीतिज्ञों को झुकाना है. इसके साथ ही दूसरा उद्येश्य ओबामा की प्रस्तावित भारत यात्रा तक कश्मीर में अस्थिरता बरकरार रखें.
सवाल- जब राजनीतिक समाधान की बात होती है तो उसका आशय क्या होता है?
जवाब- जब राजनीति प्रक्रिया या समाधान की बात शुरू होती है तो उसका संबंध भारतीय संविधान की धारा 1 से है. यही वह धारा है जो भारत को एक अक्ष्क्षुण और संप्रभु राष्ट्र बनाता है. लेकिन घाटी के अलगाववादी चाहते हैं कि यह धारा कश्मीर में लागू न हो. इसका मतलब यह होगा कि एक राष्ट्र के अंदर दो संविधान होगा. जम्मू कश्मीर भले ही भारत का हिस्सा होगा लेकिन वहां भारत का संविधान लागू नहीं होगा. इसे ही वे स्वायत्तता कह रहे हैं जिसका समर्थन मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला भी कर रहे हैं. हालांकि भारत के प्रधानमंत्री ने संविधान के दायरे में रहकर ही स्वायत्तता देने की बात कही है. लेकिन जब राजनीतिक समाधान की बात चलती है तो उसका सीधा सा मतलब भारतीय संविधान को कश्मीर में निष्प्रभावी कर देना होता है. इसका मतलब साफ है कि वे आटोनॉमी या स्वायत्तता नहीं मांग रहे हैं बल्कि वे रिपब्लिक विदिन रिपब्लिक की मांग कर रहे हैं.
सवाल- कश्मीर के सभी राजनीतिक दल भी इसी मांग का समर्थन कर रहे हैं?
जवाब- पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस इस मांग के समर्थन में हैं जबकि अलगाववादी तो सीधे तौर पर सेपरेशन की ही मांग कर रहे हैं. अलग होकर पाकिस्तान के साथ जाएंगे या अलग राष्ट्र बनाएंगे यह निर्णय भी वे खुद करेंगे.
सवाल- भारत से अलग होने की मांग करनेवाले ऐसे अलगाववादी कितनी संख्या में हैं?
जवाब- जहां तक घाटी का सवाल है तो आज के समय में कोई भी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है जो अलगाववादियों के खिलाफ घाटी में बोल सके. सत्ता और सत्ता के बाहर वे बहुत ताकतवर स्थिति में हैं. उन लोगों के मन में भारत के संविधान और सेना के प्रति कोई आदर बचा नहीं है. फिर भी ऐसा नहीं है कि वहां मतभेद नहीं है. स्वायत्तता और आजादी वालों के बीच मतभेद है. आजादी मांगनेवालों और पाकिस्तान के साथ जानेवालों में मतभेद है. फिर इस्लाम के विभिन्न सम्प्रदायों का आपस में मतभेद है. लेकिन जब भारत विरोध का सवाल आता है तो सब एक साथ हो जाते हैं. प्रत्यक्ष तौर पर भारत के समर्थन में बोलनेवाला घाटी में अब कोई नहीं है. इसका एक बड़ा कारण है कि अटल बिहारी वाजपेयी शासन के बाद भारत सरकार की शक्तियों के बारे में घाटी में कोई आदर बचा नहीं है.
फिर भी, कश्मीरी पण्डित, सिख, जाट इन अलगाववािदयों के साथ नहीं है. घाटी के बाहर रहनेवाले कश्मीरी पण्डितों की आबादी पांच लाख हैं. वे कभी नहीं चाहते कि कश्मीर भारत से अलग हो. कश्मीर घाटी की आबादी साठ लाख है. लेकिन ऐसा नहीं है कि घाटी में सभी मुसलमान आजादी चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों की कुल आबादी साठ प्रतिशत के करीब है जबकि चालीस बयासील प्रतिशत के करीब गैर मुसलमान हैं. लेकिन मुसलमानों में भी सारे लोग आजादी चाहते हैं ऐसा नहीं है. गैर मुसलमानों और मुसलमानों के एक वर्ग को शामिल कर लिया जाए तो आज जम्मू कश्मीर में बड़ा तबका भारत के साथ रहना चाहता है. हाल में ही कुछ सर्वे आये हैं. एक विदेशी एजंसी के सर्वे के अनुसार तो केवल 20 प्रतिशत लोग हैं जो भारत से अलग होना चाहते हैं. अगर इस सर्वे को सही मानें तो 80 प्रतिशत लोग भारत के साथ रहना चाहते हैं.
सवाल- आपकी समझ से कश्मीर समस्या का समाधान क्या है?
जवाब- कश्मीर में पिछले पचास साल से तथ्यों के रूप में झूठ का प्रचार किया जा रहा है, पहले उसको खारिज करने की जरूरत है. जैसे वहां बंटवारे का एक तर्क अभी भी चलाया जाता है कि बंटवारे के वक्त हिन्दू मुस्लिम बहुल इलाकों के आधार पर भारत पाकिस्तान बनाया गया. इसी तर्क पर घाटी के मुसलमान अलग राष्ट्र की मांग करते हैं. जबकि विभाजन का तर्क तो केवल ब्रिटिश इंडिया पर ही लागू होता था. न तो अंग्रेजों और न ही मुस्लिम लीग ने कभी इस बात की वकालत की कि विभाजन का यह तर्क अन्य रजवाड़ों पर लागू किया जाए. इसलिए जम्मू कश्मीर पर धर्म आधारित बंटवारे का तर्क लागू ही नहीं हो सकता क्योंकि शुरू में पाकिस्तान ने ही इसका विरोध किया था. अब यह कैसे हो सकता है कि एक तर्क के आधार पर पहले वे पाकिस्तान ले लेते हैं और जैसे ही उन्हें पाकिस्तान मिल गया उन्होंने दूसरा तर्क गढ़ लिया. एक बात तो यह कि इस बारे में सच्चाई सबको बताई जाए. इसी तरह से यह तर्क चलाया जाता है कि नेहरू ने रायशुमारी का वादा किया था, उसे पूरा किया जाए. लेकिन नेहरू ने कहा था कि पाकिस्तानी फौजें वहां से हटें. यह कैसे हो सकता है कि जब परिस्थितियां पाकिस्तान के पक्ष में हो तो वे कोई और बात करें और जब परिस्थितियां उनके अनुकूल हो तो वे रायशुमारी की बात करने लगते हैं. कश्मीर में अलगाववाद का निर्माण झूठ के आधार पर निर्मित हुआ है उसे काटने की जरूरत है.
लेकिन भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि वह भारत सरकार चाहे भी तो कश्मीर के बारे में कुछ निर्णय नहीं ले सकती. भारत एक अविभाज्य राष्ट्र है और इस राष्ट्र की सीमा में रहनेवाले किसी राज्य को स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिया जा सकता. भारत एक सेकुलर स्टेट है. सांप्रदायिक तर्कों के आधार पर यहां कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. अगर सारे हिन्दू कहें कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनना चाहिए तो क्या यह संभव है? इसी तरह से सिर्फ धर्म के आधार पर कश्मीर घाटी को आजाद करने की बात पर विचार ही नहीं किया जा सकता यह भारतीय संविधान का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन होगा. भारत सरकार को घाटी में सख्ती से यह संदेश देना चाहिए कि जो नहीं हो सकता उस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, परिस्थितियां चाहें कुछ भी बन जाएं, शायद तभी अलगाववादियों की मंशा कमजोर पड़े.
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