क्रिकेट और राजनीति का युगान्तकारी रिश्ता
हर आम और खास भारतीय क्रिकेट और राजनीति का दीवाना होता है। राजनीति और क्रिकेट के खेलों की सफलता और विफलता पर भारतीयों की प्रतिक्रिया भी एक सरीखी होती है। जो जीते तो सभी सिकंदर, हार गए तो साथी बंदर। 1983 का विश्वकप जीत कर लाए तो कपिलदेव महान। 1984 में इंदिरा लहर पर ही सही कांग्रेस को 415 सीटें जिता लाए तो राजीव गांधी अद्वितीय। जैसे ही कपिलदेव के नेतृत्व में टीम इंडिया हारने लगी कपिलदेव पर सट्टेबाजी तक की तोहमत लगने लगी। क्रिकेट के बारे में उनकी समझ पर सवाल उठने लगे।
ठीक उसी के समांतर केंद्र में अति शक्तिशाली राजीव गांधी 1984 में `मिस्टर क्लीन´ थे, उनके कार्यकाल के दो वर्ष बीतते-बीतते उन पर चारों ओर से भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सत्ता परिवर्तन हुआ। जो जॉर्ज फर्नांडीस 1989 में बोफोर्स की तोपों की गुणवत्ता पर सवाल पूछ रहे थे, उन जॉर्ज फर्नांडीस के रक्षामंत्रित्व काल में राजीव गांधी की उन्हीं बोफोर्स तोपों से कारगिल के शिखर पर विजय की सलामी दी गई। इसे राजनीत की विडंबना कहें या प्रकृति का न्याय की रक्षा सौदे में दलाली के मुद्दे पर 1980 के दशक में संसद में सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले जॉर्ज फर्नांडीस कारगिल युद्ध में शहीद सैनिकों की ताबूत की खरीद में हुए भ्रष्टाचार के आरोप के शिकार हुए। आज भी श्री फर्नांडीस केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच के दायरे में हैं। बोफोर्स घोटाले में हर दिन राजीव गांधी से दस सवाल पूछने वाले प्रख्यात कानूनविद राम जेठमलानी कालांतर में घोटाले के प्रमुख अभियुक्त और कमीशन की रकम प्राप्त करने के आरोपी हिंदुजा बंधुओं के पैरोकार बने। इस चुनाव तक बोफोर्स का भूत गांधी परिवार का पीछा करता रहा। गांधी परिवार के कानूनी पेंचबाज हंसराज भारद्वाज क्वात्रोच्ची को मदद पहुंचाते समय गुप्तता बनाए रखने में विफल होने की सजा स्वरूप वर्तमान कैबिनेट में जगह नहीं बना पाए। उनकी जगह कानून मंत्री बन गए वीरप्पा मोइली जिनकी नरसिंहराव सरकार बचाने में सांसद रिश्वतखोरी में भूमिका की जांच सीबीआई कर चुकी है।
वीरप्पा मोइली द्वारा रिश्वत के लिए धन के प्रबंधन के पर्याप्त सबूत भी सीबीआई के पास थे। 1980 के दशक के अंत में जब राजीव गांधी सत्ता से बाहर जाते नजर आए तो उनके तमाम साथी उन पर तोहमत लगाते हुए भाग गए थे। क्रिकेट टीम में देखें तो सुनील गावस्कर और रवि शास्त्राी के अलावा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में आपको एक क्रिकेटर नजर नहीं आएगा जो भारतीय क्रिकेट के अंतरिक्ष पर सतत दिखाई देता हो। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस आलाकमान के एक गुट विशेष ने पी.वी. नरसिंहराव को प्रधानमंत्री बनाया। प्रधानमंत्री बनने के पहले नरसिंहराव बेहद निरीह प्राणी नजर आते थे। प्रधानमंत्री बनते ही वे बड़े से बड़े राजनेता के बाप बन गए। कपिलदेव के बाद दिलीप वेंगसरकर और रवि शास्त्री भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बने। वेंगसरकर को कभी स्थायी नहीं होने दिया गया और रवि शास्त्री ऑस्ट्रेलिया में बेंसन एंड हेजेस विश्वकप के अलावा इतने अलोकप्रिय रहे कि उनकी `होमपिच´ यानी वानखेड़े स्टेडियम में भी उनके खिलाफ मुंबई के क्रिकेट प्रेमी नारे लगाते थे। कांग्रेस पार्टी में जो भूमिका सीताराम केसरी की रही, भारतीय क्रिकेट में वही भूमिका रवि शास्त्री की नजर आती है। इंदिरा गांधी से नरसिंहराव के कार्यकाल तक यानी लगभग तीन दशक तक कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष चाहे जो रहा हो कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी हुआ करते थे। ठीक इसी तरह भारतीय क्रिकेट के प्रसारण का अधिकार चाहे जिस चैनल को मिले, बीसीसीआई का अलिखित फरमान है कि कमेंटेटर रवि शास्त्री रहेंगे। सीतराम केसरी के बारे में कहावत थी `न खाता न बही, केसरी ने जो कही वही बात सही´।
रवि शास्त्री भी बीसीसीआई की बेहिसाबी खाता-बही हैं। सीताराम केसरी की शक्ल किसी कांग्रेसी को पसंद नहीं थी, पर केसरी कांग्रेस की अपरिहार्यता थे। रवि शास्त्री की शक्ल भी भारत के किसी भी क्रिकेट प्रेमी को पसंद नहीं, अगर आपको क्रिकेट देखना है तो रवि शास्त्राी की शक्ल देखना आपकी मजबूरी है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन और पी.वी. नरसिंहराव में ढेर सारी समानताएं थीं। दोनों आंध्र प्रदेश से रहे। दोनों की पृष्ठभूमि सामान्य घर की थी। पी.वी. नरसिंहराव कई भाषाओं के ज्ञाता, घरेलू नीति से लेकर वैदेशिक नीति तक में दक्ष और साहित्य से लेकर अर्थ जगत तक के मर्मज्ञ थे। अजहरूद्दीन श्रेष्ठ बल्लेबाज, मौकापरस्त गेंदबाज और उत्कृष्ट क्षेत्ररक्षक थे। कांग्रेस पार्टी के ठेकेदारों ने नरसिंहराव को बेचारा समझ कर प्रधानमंत्री बनाया। मोहम्मद अजहरूद्दीन को बीसीसीआई ने बेचारा समझकर कप्तान बनाया। नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री कार्यालय तक को ठगों और तांत्रिकों का अड्डा बना दिया। अजहरूद्दीन बमकांड के प्रमुख अभियुक्त टाइगर मेमन, दाऊद इब्राहीम जैसे माफिया और शरद शेट्टी जैसे सट्टाकिंग से सटे हुए पाए गए। नरसिंहराव देश के पहले प्रधानमंत्री हुए जिन्हें ठगी के आरोप में निवृत्ति के बाद दंडाधिकारी की अदालत के कटघरे में खड़ा होना पड़ा और अजहरूद्दीन पहले क्रिकेट कप्तान रहे जिन्हें सटोरियों से संबंधों के चलते बीसीसीआई ने प्रथम श्रेणी के क्रिकेट से आजीवन प्रतिबंधित कर दिया। बुढ़ापे में भी नरसिंहराव के महिला प्रेम की `गॉसिप´ सुनाई पड़ती थी। अजहरूद्दीन पर तो संगीता बिजलानी की बिजली कुछ इस कदर गिरी कि बेचारे आज तक उसी की चमक में चकनाचूर हैं।
अजहरूद्दीन ने भारतीय क्रिकेट को सौदागरों का अड्डा होना सार्वजनिक कर दिया, तो नरसिंहराव ने भारतीय संसद की गरिमा को नीलाम करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। मजे की बात है कि दोनों ने अपना चुनावी कैरियर आंध्रप्रदेश के बाहर चुनाव लड़कर जारी रखा। नरसिंहराव ने भारतीय राजनीति को कारपोरेट दलाल नेताओं का स्थायी अड्डा बनाया। अजहरूद्दीन ने बीसीसीआई का प्रयोजक-सटोरिया-प्रशासक तिकड़ी के तिलिस्म में जीने का स्थायी रोग दे दिया। कपिलदेव और राजीव गांधी दोनों समांतर युग के रहे। राजीव गांधी ने इस देश को इक्कसवीं सदी और इंडियन डायस्पोरा का स्वप्न दिखाया। कपिलदेव ने भारतीय क्रिकेट में विश्वविजयी होने का अप्रत्याशित स्वाभिमान भरा। राजीव गांधी आधुनिक राजनीति के एक अग्रदूत थे तो कपिलदेव आधुनिक क्रिकेट के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ भारतीय खिलाड़ी। दोनों को भ्रष्टाचार के आरोप ने रुलाया। मोहम्मद अजहरूद्दीन और नरसिंहराव भी क्रमश: क्रिकेट और राजनीति के मैदान में समानांतर युग में कप्तान रहे। दोनों अपने फन के माहिर पर अपनी सफलता के लिए किसी भी स्तर पर उतरने को तैयार व्यक्तित्व थे। राजनीति और क्रिकेट दोनों क्षेत्रों में 1996 से 2004 तक का काल युगांतकारी था।
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