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ऐसे बिकने लगा क्रिकेट

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भारत में क्रिकेट का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है। बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) का गठन 1928 में हुआ था। इस संस्था में अक्सर अफसरों, नवाबों और राजनीतिज्ञों का कब्जा रहा। 1980 तक बीसीसीआई राजनीतिक तौर पर कोई महत्वपूर्ण संगठन के रूप में प्रख्यात नहीं हुआ करता था। 1982 के एशियाड खेलों तक हॉकी भारतीयों का सबसे लोकप्रिय खेल हुआ करता था। 1982 में एशियाड का आयोजन दिल्ली में किया गया।

इंदिरा गांधी ने अपने पुत्रा राजीव गांधी को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने के लिए एशियाड खेलों को माध्यम बनाया। एशियाड खेलों के साथ ही भारत में टेलीविजन माध्यम की भी क्रांति हुई। पहली बार रंगीन टीवी एशियाड खेलों के समय ही आया। उस समय हॉकी में भारत और पाकिस्तान सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे। 1982 के दशक में मुंबई में आयोजित विश्वकप हॉकी में भारतीय टीम की पराजय ने हॉकी खिलाड़ियों के प्रति आम आदमियों के आक्रोश का इजहार किया। इंडियन हॉकी फेडरेशन ने विश्वकप के आयोजन के दौरान भारतीय खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, आवास और उनको दिए जाने वाले पारिश्रमिक में भयंकर भूलें की थी। इस कारण हॉकी टीम का प्रदर्शन लगातार गिरता जा रहा था।

1980 के ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब हुई थी लेकिन मॉस्को ओलंपिक का शीतयुद्ध के चलते अधिकांश देशों ने बहिष्कार किया था। इसलिए हॉकी की चोटी की टीमों ने उसमें हिस्सेदारी नहीं की थी। सो 1980 का स्वर्ण पदक हॉकी प्रेमियों को विश्वविजेता का गौरव नहीं दिला पाया था। 1982 के एशियाड में पदक तालिका में भारत पांचवें स्थान पर था। लेकिन खेल प्रेमियों की निगाहें पदक तालिका से कहीं ज्यादा हॉकी के फाइनल मुकाबले पर लगी थी। राजीव गांधी की तरफ से खेलगांव की देख-रेख की जिम्मेदारी इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के सदस्य बूटा सिंह को सौंपी गई थी। उन दिनों बूटा सिंह अक्सर खेल गांव जब जाते थे तो हॉकी खिलाड़ियों से मिलकर हरहाल में स्वर्ण पदक जीतने की अपेक्षा व्यक्त करते थे। फाइनल में भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला हुआ।

यह हॉकी का पहला मुकाबला था जिसे करोड़ों लोगों ने टेलीविजन पर सीधे प्रसारण के चलते देखा। उस मुकाबले में पाकिस्तान ने भारत की सरजमीं पर भारतीय टीम को 7-1 से रौंद डाला। टेलीविजन पर दर्शकों ने जो मैच देखा उसमें भारतीय टीम के तत्कालीन गोलकीपर मीर रंजन नेगी गोलपोस्ट छोड़कर भागते नजर आते थे। इस पराजय से एशियाड की सफलता का सारा श्रेय धुल गया। हॉकी टीम के खिलाफ लोगों का आक्रोश ऐसा उमड़ा कि आज तक हॉकी के खिलाड़ी भारतीयों की नजर में सितारे बनने में कामयाब नहीं हो पाए। तब राजनीतिज्ञों ने क्रिकेट को भारत स्टारगेम बनाने का फैसला किया। सनद रहे कि 1982 से 1985 के बीच पहली बार कोई केंद्रीय मंत्री बीसीसीआई का अध्यक्ष बना। एनकेपी सालवे के बीसीसीआई अध्यक्ष बनते ही 1983 में कपिलदेव की टीम अप्रत्याशित रूप से लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर विश्वकप की विजेता वेस्टइंडीज को पछाड़कर प्रूडेंशियल विश्वकप जीत लाई। इस विजय ने क्रिकेट को भारत का सितारा खेल बना दिया। 1990 से 1993 तब बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर माधवराव सिंधिया का कब्जा रहा। इसी दौरान विश्वकप में पाकिस्तान को कामयाबी मिली। माधवराव के बाद आईएस बिंद्रा और राज सिंह डूंगरपुर बीसीसीआई के अध्यक्ष हुए। इन दोनों को कांग्रेस सहित कई राजनीतिज्ञ हस्तियों का प्रश्रय प्राप्त था। आईएस बिंद्रा और डूंगरपुर के जमाने में ही क्रिकेट में सट्टेबाजी का आरोप बड़े पैमाने पर उछला। सनद रहे कि 1996 से 1999 तक आरएस डूंगरपुर जब बीसीसीआई के अध्यक्ष थे उसी समय केंद्र में तीन सरकारें आई और गई। एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारें इन तीन वर्षों में आई और अपदस्थ हो गई।

यह भारतीय राजनीति का संक्रमण काल था। यही भारतीय क्रिकेट का भी संक्रमण काल हुआ करता था। जगमोहन डालमिया का क्रिकेट के मैदान पर इसी दौरान उदय हुआ। जगमोहन डालमिया 1990 से 91 के बीच बीसीसीआई के सचिव चुने गए। 1993 से 1997 के बीच भी वे बीसीसीआई के सचिव रहे। 15 जुलाई 1997 को क्रिकेट को नियंत्रित करनेवाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था आईसीसी के वे अध्यक्ष बन गए। जगमोहन डालमिया कोलकाता से थे। पश्चिम बंगाल फुटबॉल के खेल का दीवाना रहा है। बीसीसीआई पर डालमिया के प्रभाव ने कोलकाता को फुटबॉल की बजाय क्रिकेट का दीवाना बना दिया। इसी बीच मोहम्मद अजहरुद्दीन सट्टेबाजी के विवाद के चलते अलोकप्रिय हो गए। भारतीय क्रिकेट दागदार हो गया। तब सौरव गांगुली क्रिकेट टीम में अपना स्थान बना रहे थे। यह जगमोहन डालमिया का ही प्रताप था कि उन्होंने सौरव गांगुली को धीरे-धीरे भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बना दिया। सौरव गांगुली 1996 में इंग्लैंड के दौरे पर गई भारतीय टीम में पहली बार स्थान बना पाए। उन्हें यह स्थान जगमोहन डालमिया की कृपा से प्राप्त हुआ था। 1999 में जब इंग्लैंड में विश्वकप आयोजित हुआ तो जगमोहन डालमिया आईसीसी के अध्यक्ष थे। जगमोहन डालमिया के कार्यकाल में टेलीविजन के प्रसारण के अधिकारों से बीसीसीआई को मोटी आय का स्रोत प्राप्त हुआ। 1983 से 1999 तब जब भी कहीं भारतीय टीम मुकाबले के लिए जाती थी तो दूरदर्शन को प्रसारण अधिकार प्राप्त होता था। दूरदर्शन प्रसारण अधिकार प्राप्त करने के लिए आवश्यक राजस्व उगाही के लिए टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनियों का सहारा लेता था।

उन दिनों दूरदर्शन पर प्रोडक्शन और मार्केटिंग के लिए चार कंपनियों का बोलबाला हुआ करता था, ये थीं-वल्र्डटेल, यूटीवी, मल्टी चैनल और निंबस। जगमोहन डालमिया ने वल्र्डटेल के प्रमुख मार्क मैसव्क्रनहॉस को अपना साथी बनाया। `वल्र्डटेल´ ने चारों कंपनियों का `कंसॉर्शियम´ तैयार किया। इस `कंसॉर्शियम´ में `वल्र्डटेल´ के मार्क मैस्क्रेन्हॉस ने यूटीवी के रॉनी स्क्रूवाला को पटाकर दूरदर्शन मार्केटिंग राइट का बैंक गारंटी देकर प्रसारण अधिकार कब्जे में करना शुरू किया। इस प्रसारण अधिकार के चलते `वल्र्डटेल´ को मोटी कमाई होती थी। बीसीसीआई और दूरदर्शन के अधिकारियों की मिलीभगत से `वल्र्डटेल´ मलाई काट रही थी। उसी समय क्रिकेट के प्रसारण अधिकार को लेकर `कंसॉर्शियम´ के सदस्यों के बीच झगड़ा शुरू हुआ। `निंबस´ के मालिक हरीश थवानी और `मल्टी चैनल´ के निदेशक मृत्युंजय पांडेय ने विश्वकप के प्रसारण में अपनी हिस्सेदारी के लिए विवाद शुरू किया। शिकायतों का पुलिंदा नवगठित प्रसार भारती के कार्यकारी चेयरमैन ओपी केजरीवाल तक पहुंचा। डालमिया किसी भी हाल में `निंबस´ और `मल्टी चैनल´ को विश्वकप के प्रसारण में घुसने नहीं देना चाहते थे। मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा की अदालत में `निंबस´ और `मल्टी´ की ओर से प्रसारण अधिकार को लेकर चुनौती दी गई। जस्टिस श्रीकृष्णा ने बीसीसीआई और दूरदर्शन पर प्रसारण अधिकार के लिए कोर्ट के समक्ष खुली बोली लगाने का निर्देश जारी किया। इसके चलते पहली बार क्रिकेट के प्रसारण का अधिकार `वल्र्डटेल´ से छिनकर `निंबस´ को मिल गया। `निंबस´ के मालिक हरीश थवानी के इस दुस्साहस से जगमोहन डालमिया अच्छे-खासे आहत हुए।

उन दिनों क्रिकेट की गतिविधियों पर पैनी नजर रखनेवालों का मानना था कि यदि प्रसारण अधिकार `वल्र्डटेल´ को मिलता तो डालमिया हर हाल में भारतीय टीम को विश्वकप के फाइनल तक ले जाते। चूंकि प्रसारण अधिकार उनकी मर्जी के खिलाफ किसी अन्य कंपनी को गया, इसलिए उन्होंने उस कंपनी को सबक सिखाना तय किया। मार्केटिंग विशेषज्ञों का कहना था, यदि भारतीय टीम 1999 के विश्वकप में सेमी फाइनल तक पहुंचती तो `निंबस´ प्रसारण अधिकार के चलते मोटा मुनाफा कमा सकती थी। `निंबस´ को सबक सिखाने के चलते टीम इंडिया को क्वार्टर फाइनल में हरा दिया गया। यदि इंग्लैंड में मुकाबला हो और कोई एशियाई टीम फाइनल में न पहुंचे तो कप के आयोजक घाटे में चले जाते हैं। इसलिए पाकिस्तान उस समय विश्वकप के फाइनल में पहुंचा। यदि मुकाबला रोचक हो जाता तो भी `निंबस´ मुनाफा कमा सकता था। इसलिए मुकाबला एकतरफा कराया गया। सेमीफाइनल तक जबरदस्त फॉर्म में खेलनेवाली पाकिस्तानी टीम लॉर्ड्स के मैदान में सिर्फ 132 रनों में सिमट गई। फाइनल मुकाबला सिर्फ 75 ओवरों में खत्म हो गया। ऑस्ट्रेलियाई टीम आठ विकेट से कप जीतने में कामयाब हो गई। यदि मुकाबला आखिरी ओवर तक चलता तो निंबस घाटे से उबर जाता। क्योंकि 25 ओवरों में वह विज्ञापन के महंगे स्पॉट बेच लेता।

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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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