Home | परत-दर-परत | डायरी से डब्बे तक सट्टे का सफरनामा

डायरी से डब्बे तक सट्टे का सफरनामा

image

भारतीय खेलों के साथ सटोरियों का संबंध दशकों पुराना है. पश्चिम बंगाल के सटोरिए फुटबाल और राजस्थान के सटोरिए हाकी पर पिछले 100 वर्षों से सट्टा लगाते आ रहे हैं. क्रिकेट पर सट्टा लगाने की परंपरा भी दशकों पुरानी है. लेकिन ये सट्टे संगठित व्यापार के रूप में 1980 के दशक में शुरू हो पाये. सटोरियों और खिलाड़ियों के बीच मैच फिक्सिंग की शुरूआत 1980 के दशक में ही हुई. 1983 में विश्वकप जीतने से पहले भारतीय क्रिकेटरों पर सटोरियों का प्रभाव न के बराबर था. 1983 में विश्वकप जीतने के बाद टेलीविजन पर क्रिकेट का बड़ा दर्शक वर्ग खड़ा हो गया था.

इसी दर्शक वर्ग में से बड़े पैमाने पर सटोरियों का वर्ग भी क्रिकेट पर सट्टा लगाने लगा था. 1983 से 1990 तक राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, मुंबई आदि में सट्टा पंटर और बुकी के बीच की एक डायरी तक सीमित था. 1990 के दशक में संचार क्रांति ने सट्टे का दायरा बढ़ा दिया. सटोरिये दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद और मुंबई समेत दुबई तक आपरेट करने लगे.

लेकिन सट्टे के इस कारोबार को समझने के लिए क्रिकेट पर सट्टे की प्रक्रिया को समझना जरूरी है. किसी भी क्रिकेट मैच पर सट्टे का भाव खेलनेवाली टीमों के तत्कालीन कौशल, उनके पूर्व रिकार्ड, जिस मैदान पर क्रिकेट खेला जा रहा हो उसकी पिच का इतिहास, उस शहर का मौसम का रिकार्ड, टीम के गठन आदि के आधार पर तय होता है. उदाहरण के लिए यदि वेस्टइंडीज और भारत के वर्तमान दौरे का भाव तय करना हो तो बुकीज दोनों टीमों की जीतने की क्षमता के आधार पर एक भाव निश्चित करेगा. इस समय वेस्टइंडीज की टीम अपने होम ग्राउण्ड पर खेल रही है. 20-20  विश्वकप में उसका प्रदर्शन भारत की तुलना में बेहतर रहा है. वेस्टइंडीज टीम का मनोबल भी भारतीय खिलाड़ियों की तुलना में बेहतर रहा है. ऐसे में कोई बुकी वेस्टइंजीज का भाव 60 पैसे खोल सकता है तो भारतीय टीम का भाव उसे डेढ़ रूपये खोलना पड़ेगा. यह भाव टेलीफोन के माध्यम से बुकी सारे पंटरों को बता देगा. यदि कोई पंटर वेस्टइंडीज की टीम पर एक लाख रूपये का सट्टा लगाएगा तो वेस्टइंडीज को टीम जीतने पर उसे साठ हजार रूपये का भुगतान बुकी को करना होगा. यदि वेस्टइंडीज की टीम मैच हार गयी तो पंटर बुकी के पास एक लाख रूपये भेजेगा. यदि पंटर एक लाख रूपये का सट्टा भारतीय टीम पर लगाता है और मैच भारत की टीम जीतती है तो बुकी को पंटर के पास डेढ़ लाख रूपये का भुगतान करना होगा. यदि भारतीय मैच हारता है तो भी पंटर को बुकी को एक लाख रूपये का भुगतान करना होगा.

पूरे मैच के दौरान ओवर दर ओवर और कई बार हर गेंद पर बुकी अपना भाव बदल देता है. पहले पूरे मैच पर ही भाव लगा करता था लेकिन अब किसी बल्लेबाज के व्यक्तिगत स्कोर, उसके द्वारा लगाये जानेवाले चौके-छक्के, किसी विकेट कीपर द्वारा पकड़े जाने वाले कैचों की संख्या, गेंदबाज द्वारा ली जानेवाली संभावित विकेट, मैच के टास, पहले बल्लेबाजी या पहले क्षेत्ररक्षण के फैसले या फिर किसी टीम के टोटल स्कोर पर भी सट्टा लगता है. क्रिकेट चूंकि धीमा खेल है इसमें तमाम कारण मैच को प्रभावित कर सकते हैं इसलिए पंटर इस खेल को सट्टे के लिए अधिक उपयुक्त पाते हैं. फुटबाल, बास्केटबाल, हाकी आदि खेलों में बुकी व्यापक स्तर पर भाव बदलने में सफल नहीं हो सकता.क्रिकेट में बुकी अपनी विशेषज्ञता के आधार पर सफल नहीं हो सकता. वहां फैसला किसी भी क्षण बदल सकता है इसलिए बुकी बिना मैच फिक्स किये मोटी रकम हमेशा कमाए ऐसा कोई फार्मूला नहीं रहता. क्रिकेट में बुकी अपनी विशेषज्ञता के आधार पर बिना मैच फिक्स किये अपने पंटरों से बुक मैनुपुलेट कर सकते हैं. क्रिकेट के मैचों के दौरान बुकी और पंटर दोनों टेलीफोन के एक एक्स्चेन्ज से जुड़े होते हैं. इस एक्स्चेन्ज को बुकी डिब्बा कहा करते हैं. इस डिब्बे में स्पीकर फोन लगा होता है. इसी डिब्बे से बुकी ताजा भाव प्रसारित करता रहता है. पंटर ताजा भाव के आधार पर अपना सट्टा बुक कराते रहते हैं.

हैंसी क्रोनिए मामले के बाद सीबीआई ने क्रिकेट के मैच फिक्सिंग सिण्डिकेट की जांच की तो पता चला कि क्रिकेट पर सट्टे का रैकेट देश का सबसे सुसंगठित रैकेट है. दुनिया के किसी भी कोने में खेले जानेवाले मैच का प्रसारण अगर भारत में हो रहा है तो तो प्रतिदिन औसतन 100 करोड़ का सट्टा लगता है. चूंकि भारत में सट्टा खेलनेवालों के खिलाफ भारतीय कानून में जुआ खेलनेवाले धाराओं के तहत की कार्रवाई हो सकती है इसलिए सट्टा खेलने से न पंटर डरता है और न ही बुकी. क्योकि उन्हें मालूम है कि पकड़े जाने पर अगर कार्रवाई होती भी है तो अधिक से अधिक एक साल की जेल होगी या फिर दो हजार रूपये का जुर्माना.

सीबीआई ने अपनी जांच में जिन लोगों को पकड़ा उसमें एक एमके गुप्ता भी था. मुकेश कुमार गुप्ता उर्फ एमके उर्फ जॉन एमके गुप्ता उर्फ एमके जॉन से पूछताछ में अत्यंत रोचक जानकारियां मिली थीं. एम के गुप्ता से टेलीफोन पर बात करते समय हैंसी क्रोनिए का टेलीफोन दिल्ली पुलिस ने टेप किया था. एमके हैंसी क्रोनिए को रिश्वत देकर मैच का परिणाम बदलवाया करता था. अगली कड़ियों में हम इस बात की पड़ताल जारी रखेंगे कि हलवाई की दुकान पर काम करनेवाले एक आदमी के बेटे ने कैसे क्रिकेट की दुनिया को कालिख से पोत दिया.

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
Rate this article
3.00
More from परत-दर-परत
Previous
image
इस्लामी रणनीति है हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा
क्या देश में हिन्दू आतंकवाद पूरी तरह पैर पसार चुका है जो उतना ही खतरनाक है जितना कि अरब के पैसे से पलनेवाला बहावी आतंकवाद? भारत में कुछ छुटपुट ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें न केवल आतंकी घटनाओं के समान बनाकर पेश किया गया बल्कि उनका हिन्दू कनेक्शन भी साबित करने की कोशिश की गयी. प्रेम शुक्ल की पड़ताल है कि भारत में हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा भी इस्लामिक चमपंथी विचारकों और रणनीतिकारों की "फेश सेविंग एक्सरसाइज" है िजसमें उन्हें मुस्लिम वोट की लालची सरकार का संरक्षण मिला हुआ है. ...
image
कंधमाल: सांप्रदायिक धुव्रीकरण नई चुनौती
कंधमाल की आग उड़ीसा से अधिक अब राजधानी दिल्ली में धधक रही है. पिछले महीने 22 से 24 अगस्त के बीच दिल्ली में चर्च संगठनों द्वारा एक जनसुनवाई करके यह साबित करने की कोशिश की गयी कि कंधमाल में दंगा पीड़ितों का पुनर्वास नहीं हो रहा है. इस जन-सुनवाई के संयाजकों में जॉन दयालॅ, कटक-भुवनेश्वर के बिशप रिफेल चैनथ एवं वामपंथी विचाराधरा सहमत की माला हाशमी प्रमुख थी....
image
सुलझी हुई समस्या को उलझाने पर आमादा
आज जो लोग भी कश्मीर की समस्या निपटाने निकले हैं सवाल पैदा होता है क्या उन्हें कश्मीर की समस्या का ओर-छोर भी पता है? क्या राहुल गांधी और ओमर अब्दुल्ला की नयी पीढी १९४७ से २०१० के बीच कश्मीर में क्या हुआ है उसकी प्रामाणिक जानकारी से लैस भी है? यदि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कश्मीर की स्थिति को ठीक से समझ ही रही होती तो क्या पिछले ६ वर्षों के शासनकाल में उसने एक सुलझ चुकी समस्या को उलझा लेने की मूर्खता की होती?...
image
छत्तीस हुआ तिरसठ का आंकड़ा
सोनिया गांधी बीते शुक्रवार को चौथी बार कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी .उनके इस चयन के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक दौर शुरू हो जाएगा. सोनिया गांधी अपने पति राजीव गांधी की १९९१ में हत्या के बाद राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए जिस अंदाज में १०,जनपथ से कांग्रेस की राजनीति का नियंत्रण रखने का परोक्ष-अपरोक्ष प्रयास करती रही हैं उसका एकमेव उद्देश्य रहा है अपने पुत्र राहुल गांधी को एक दिन इस देश का प्रधानमंत्री बनाना....
image
चीन के सामने दीन हीन
पिछले कुछ वर्षों से चीन हिन्दुस्तान को पूर्वोत्तर तथा जम्मू एवं कश्मीर के मसले में अनावश्यक आँख तरेरने लगा है. चीन के इस दुस्साहस के लिए हिन्दुस्तान सरकार की अनावश्यक मिमियाहट जिम्मेदार है. जुलाई के महीने में चीन ने हिंदुस्तानी सेना के उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस.जसवाल को बीजिंग का वीजा यह कह कर नकार दिया कि वे विवादास्पद क्षेत्र के सैन्य प्रमुख हैं. लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल का वीजा मध्य जुलाई माह में नकारा गया। इसके बाद ११ अगस्त को निर्वासित तिब्बतियों की सरकार के प्रमुख दलाई लामा हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से मिले तो इस पर चीनी राजनायिक इतने गरम हो गए कि हिन्दुस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान चीन के समक्ष याचना वाली मुद्रा में खड़ा हो गया....
image
संसद का हाल: सांसद को पसंद केवल बवाल
पंद्रहवीं लोकसभा ने एक साल पूरे कर लिये हैं. यह साल वैसे तो कामकाज के लिहाज से ऐसी किसी खास उपलब्धि का नहीं रहा है जिसके लिए संसद का पिछला एक साल याद किया जाए लेकिन क्या पूरे साल सांसदों ने उस 'बिजनेस' में हिस्सा लिया जिसके लिए जनता ने उन्हें चुनकर सदन तक पहुंचाया है? संसद के कामकाज के बारे में आम धारणा यही है कि संसद में जनता के अपेक्षाओं के अनुरूप काम काज नहीं होता. संसद जितनी चलती है उससे अधिक ठप रहती है. अब वेतनवृद्धि के बाद एक नयी तोहमत और लग गयी है कि देश की जनता मंहगाई से परेशान है और सरकार ने जनप्रतिनिधियों का वेतन चार गुना बढ़ा दिया. सवाल है कि क्या हमारे सांसद सचमुच जनता की उम्मीदों और अपेक्षाओं पर पानी फेर रहे हैं?...
image
गांधी का स्वराज बनाम जिन्ना जवाहर का कुराज
देश का ६४ वां स्वतन्त्रता दिवस बीत गया. कुछ सरकारी-अर्ध सरकारी, निजी, राजनीतिक समारोहों की औपचारिकता के अलावा अब १५ अगस्त का दिन एक सार्वजनिक अवकाश के सिवा शायद ही किसी अन्य महत्त्व का शेष रह गया हो. साल दर साल आजादी के गौरव के प्रति आम आदमी उसी तरह अनभिज्ञ होता जा रहा है जिस तरह राही मासूम रजा के उपन्यास की एक स्त्री पात्र पाकिस्तान को नजदीकी शहर में बनने वाली कोई मस्जिद समझ रही थी. ऐसा क्यों? क्योंकि ६३ साल पहले इस देश को आज़ादी के नाम पर एक सत्तान्तारण जरूर मिल गया था पर जिस स्वराज की परिकल्पना लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी कर रहे थे, वह स्वराज हिन्दुस्तान को आज दिन तक नसीब नहीं है....
image
हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क
हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है। इसमें बहुत सारे संप्रदाय हैं। संप्रदायों को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहता है लेकिन हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर इटली के उदार राष्ट्रवादी चिंतक माजिनी से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर ही उन्होंने हिंदुत्व का राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।...
image
जरूरी है जाति की जनगणना
जाति आधारित जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी। 1941 में सरकार का पूरा ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर था जिसके चलते जनगणना नहीं हो पाई। आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना शुरू हुई तो जाति का मसला उठाया गया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रभंजक मांग बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।...
image
सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है
कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।...
image
लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
image
पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
image
कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
image
कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
image
शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
image
बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
image
रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2