समय की पुकार, सूबे में हो पुलिस सुधार
नक्सली हिंसा के मामले में झारखण्ड सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से एक है. अभी हाल में ही गृहमंत्री पी चिदंबरम भी इसीलिए झारखण्ड आये थे ताकि वे दिखा सकें कि नक्सलवाद से लड़ाई में वे राज्य को हर संभव मदद दे रहे हैं. लेकिन फ्रांसिस इनदवार की हत्या खुद पुलिस प्रशासन पर कई गंभीर सवाल उठा रहा है. इनदवार को 30 सितंबर को खूंटी से अगवा किया गया था.
सात दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस प्रशासन यह निर्णय नहीं कर पाया कि उनको कैसे ढूंढा जाए. इनदवार सामान्य सब इंस्पेक्टर थे इसलिए हो सकता है खुद पुलिस प्रशासन ने इस अपहरण को बहुत गंभीरता से न लिया हो. लेकिन जब इनदवार का सर और धड़ अलग-अलग बरामद हुआ तो पुलिस का गुस्सा उबल पड़ा और पुलिस के निचले स्तर के कर्मचारी और जवान प्रदर्शन पर उतर आये.
मंगलवार की सुबह रांची से लगभग २० किलोमीटर की दूरी पर पड़ने वाली मार्ग रांची टाटा हाइवे स्तिथ नामकुम थाना क्षेत्र के रईसा मोड़ पर फ्रांसिस इनदवार की सरकटी लाश बरामद की गयी. ऐसा समझा जा रहा है कि फ्रांसिस इनदवार की हत्या लाश बरामदगी से कुछ घंटे पहले ही नाक्सालियो द्वारा की गयी थी। घटना स्थल पर नक्सलियों ने खुलेआम फ्रांसिस इनदवार की सरकटी लाश के साथ पर्चे भी छोड़ दिए, जिसमे साफ़ साफ़ शब्दों मे फ्रांसिस इनदवार की हत्या की जिमेवारी नक्सलियों ने ली है. गौरतलब हो की यह पूरा घटनाक्रम ३० सितम्बर को खूंटी के अडकी प्रखंड बाज़ार का है जब सुबह फ्रांसिस इनदवार को नक्सलियों ने अपने दल बल के साथ घेर कर उठा लिया था.इसके पीछे नक्सलियों ने अपने तीन साथियो कोबद गांधी, छत्रधर महतो तथा भूषन यादव को छोड़ने की राजनीति के तहत इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार का अपहरण कर लिया था। अपहरण के बाद से ही नक्सलियों द्वारा सरकार पर दवाब बनाया जा रहा था के वो उनके साथी को छोड़ दे नहीं तो नक्सली उनके साथी इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की हत्या कर सकते है जिसका जिम्मेवार उनका प्रसाशन होगा। लेकिन बीते सप्ताह से राज्य के पुलिस अधिकारियों की और प्रशासन की बैठकों मे इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार को बचाने के लिए कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया, और न ही नक्सलियों के खिलाफ किसी ऑपरेशन को अंजाम दिया गया.
नक्सलियों द्वारा इनदवार की हत्या न अकेली है और न अनोखी. पिछले नौ सालों में करीब तीन सौ पुलिसवाले नक्सली हमलों में मारे गये हैं. अकेले इसी साल अब तक कोई एक दर्जन नक्सली हमले पुलिसवालों पर हो चुके हैं. लेकिन प्रदेश को नक्सलवाद से सुरक्षित करने का दावा करनेवाली सरकारें अपने ही पुलिस के जवानों की सुरक्षा नहीं कर पाती हैं. जब भी कोई पुलिस का जवान किसी नक्सली हमले में मारा जाता है तो मुआवजे से अधिक कोई पहल नहीं की जाती है. पुलिस के निचले स्तर के जवानों के लिए दस लाख रुपये के मुआवजे की राशि के कारण अभी तक पुलिसवाले भी आधुनिकीकरण की मांग पर जोर नहीं दे रहे थे लेकिन इनदवार की हत्या के बाद यह परिस्थिति पलट गयी.
इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की मौत के बाद एक नयी बात निकल कर आई है पहली बार राज्य की ४५००० पुलिस जवानों ने अपना आक्रोश सरकार और ऊंचे पुलिस अधिकारियो के समक्ष प्रकट कर दिया है। यही वजह थी की मंगलवार को इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की लाश के साथ हजारों पुलिसवालों ने राज्य के पुलिस मुख्यालय मे कई घंटो तक प्रदर्शन करके अपनी सुरक्षा की मांग की। इस दफा इन जवानों ने मुवाजे की राशि पर हंगामा नहीं किया बल्कि इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की जान ना बचा पाने के लिए किया था। जवानों ने बेबसी के साथ अपनी 'ताकत' पहली बार जगजाहिर कर दिया। राज्यपाल को बुलाने की मांग को लेकर बैठे जवानों ने इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार के लाश के साथ पीडा प्रकट की है। पुलिस मुख्यालय पर पुलिस जवानों के प्रदर्शन और मांग को अब सरकार को गंभीरता से लेना होगा नहीं तो आने वाले समय मे ऐसा ना हो की कहीं पुलिस जवान अपनी नौकरी को अलविदा कहना शुरू दे. इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की पत्नी और तीनो बच्चों की दहाड़ मारकर रोने का दृश्य हृदय विदारक था। इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की पत्नी ने रोते रोते कई बार बेहोसी मे चली गयी और सिर्फ एक ही बात उनकी पत्नी कहती रही क्या किया मेरे पति ने जो उसे मार दिया. यह सब देखकर कौन पुलिस का जवान पुलिस में बना रहना चाहेगा? इस बारे में न केवल प्रदेश सरकार को बल्कि केन्द्र सरकार को भी गंभीरता से विचार करना होगा.
कल और आज तक मे देश भर के सारे अखबार और टीवी चैनल पर इंस्पेक्टर फ्रांसिस इनदवार की हत्या का खबर दिखया जा रहा है, और हर बार नक्सलियों को दोषी बताया जा रहा है,लेकिन क्या आज पहली घटना हुई है जब कोई पुलिस वाला झारखण्ड मे नक्सलियों के हत्थे चढा हो,अब तक सैकडो घटना हो चुकी है, लेकिन कब तक सरकार खुद को दोषी ठहराने की जगह नक्सलियों को दोषी ठहराती रहेगी? क्यों पिछले नौ सालो से नक्सली हमले हो रहे है? क्यों आज तक सिर्फ कागजों में और प्रेस कांफ्रेंस मे पुलिस की सुरक्षा की और पुलिस आधुनिकरण की बाते कही जाती है? इसके पीछे की राजनीति बड़ी है। नेता लोग ही नक्सलियों के हमराही नहीं हैं बल्कि अफसरशाही भी कहीं ना कहीं नक्सली हमले के पीछे के खेल को सुचारू रूप से चलते देना चाहती है। कारण साफ है नक्सलवाद से लड़ने के पीछे अरबो रूपये का खेल हर साल होता है.
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