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जनता के पैसे से पत्रकारिता

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लोग मुझसे अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि यह काम जो तुम कर रहे हो इसकी "फाईनेंसियल वायेबिलिटी" क्या है? फिर अगली बात होती है ऐसे कितने दिन चला सकोगे?

ठीक-ठीक जवाब तो अभी भी नहीं है मेरे पास. लेकिन मैं एक बात जरूर कहता हूं कि यह सब तब करता रहूंगा जब तक कर सकता हूं और इस काम के लिए मैं कभी बाजार के हाथ नहीं बिकूंगा.  इसमें अगली बात जोड़ता हूं कि पहले बाजार के वर्तमान मजबूरियों को खारिज तो करो, फिर देखेंगे कि और रास्ते क्या हो सकते हैं? इन और रास्तों के बारे में जब हम बात करते हैं तो बहुत ठीक-ठीक धारणा लोगों के मन में नहीं बनती. क्योंकि लोगों के ये 'और रास्ते' की धारणा ही बिगड़ चुकी है. 'और रास्तों' की बात करते हैं तो लोगों को धारणा धनकुबेरों की कृपा, सरकार की मदद और ऐसे पैसे से होती है जो फण्ड कहलाती है. मैं कहता हूं इन तीनों रास्तों पर भी नहीं जाना है. फिर रास्ता ही क्या बचता है?

वह जो आखिरी रास्ता बचता है वह है - जनता का रास्ता. जनता का पैसा और जनता की मदद. जीवन के दूसरे हिस्सों में जैसे खालीपन और दरिद्रता आयी है वैसे ही पत्रकारिता में एक खालीपन घर कर गया है. लोग पत्रकारिता में सरोकार और आम आदमी के हित के न होने की बात तो करते हैं लेकिन अखबार की कीमत 2 रूपये से बढ़ाकर 10 रूपये हो जाए तो शायद अखबार ही लेना बंद कर दें. एशियन एज ने यह प्रयोग किया था कि वे विशिष्ट अखबार निकालेंगे और एक दो रूपये की बजाय 5 रूपये का अखबार बेचेंगे. कितने लोग एशियन एज पढ़ते हैं इसका अंदाज आपको भी होगा. यानी, जनता ने अपना जुड़ाव खत्म कर लिया. अखबार और दूसरे समाचार माध्यम उपभोक्ता के भुगतान के दायरे से बाहर चले गये. ऐसे में समाचार माध्यमों का इंडस्ट्री हो जाना अखरना नहीं चाहिए. 

लेकिन क्या समाचार को इंडस्ट्री बन जाने का एकमात्र कारण जनता द्वारा खर्च उठाने से मना कर देना है? शायद नहीं. जनता प्रति अखबार 10 रूपये का भुगतान भी शुरू कर दे तो भी अखबार अपनी मार्केटिंग नीति में कोई बदलाव करने की बजाय उसे अपनी अतिरिक्त आय कहकर समेट लेंगे. अखबार का उद्योग में तब्दील हो जाना बाजार और समय का प्रभाव तो है ही यह मानसिक गिरावट का भी नतीजा है. जब समाज का मानस ही अपने धरातल पर नहीं है तो समाज के अंगों से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि अपने हिसाब से काम करेंगे. समाज का निर्णायक धड़ा तो गिरवी मानसिकता से काम करता है. जो अपने मानस में जी रहे हैं उनको व्यवस्था सिरे से ही खारिज करती है. फिर यह तो होना ही है कि आपकी पत्रकारिता भी कोई और चलाएगा और आपकी राजनीति भी किसी और के हाथों में रहेगी. समाज को अपने बीच से कुछ निहंग पत्रकार पैदा करने होंगे. निहंग और नागा भारतीय समाज के रक्षा पंक्ति रहे हैं. कालक्रम में आज भले ही वे अप्रासंगिक हो गये हैं लेकिन उनकी मांग आज सबसे ज्यादा है. आज निहंगों की सबसे ज्यादा जरूरत पत्रकारिता में है जो नश्वर पैसे और ईश्वर समाज के बीच भेद कर सकते हों.

अगर पैसा ही निर्णायक कारक है तो दुनिया में इतना पैसा दौड़ रहा है कि पूरी दुनिया को 100 बार खरीद सकता हैं. वे पैसा लेकर आपके पास आयेंगे. आपसे कहेंगे कि आप अपनी बोली लगाईये क्योंकि 'वो लोग' आपको मुंहमांगी कीमत देकर खरीदने की ताकत रखते हैं. तो क्या कीमत मिलने पर कुछ भी बेच देना चाहिए?

भारत के लोग अच्छी चीजों के लिए एक शब्द प्रयोग करते हैं - बेशकीमती. यानी जिसकी इतनी कीमत की कोई दे ही न सके. या फिर दूसरे अर्थों में इसको यह कह सकते हैं कि कुछ कामों की कोई कीमत नहीं होती. कुछ लोगों की कोई कीमत नहीं होती. ऐसे बेशकीमती कामों में सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता भी है. इसकी कोई कीमत नहीं हो सकती. सरोकार की बात करनेवाली पत्रकारिता गायब इसलिए भी हो गयी है कि जनता ने उनका खर्च उठाने का जिम्मा शायद छोड़ दिया है. हम दुखी तो होते हैं कि आम आदमी के हित में कोई काम नहीं कर रहा लेकिन मैं खुद आम आदमी के लिए काम क्यों नहीं कर रहा इस बारे में कभी नहीं सोचते.

हमारी यह मानसिकता क्यों हो गयी है, पता नहीं लेकिन हो गयी है. मीडिया में पत्रकार जब सेलेरी पर अपनी कीमत आंकते हैं तो सरोकार वगैरह की बातें वैसे ही खारिज हो जाती हैं. पत्रकार और वो भी सरोकार की पत्रकारिता करनेवाला पत्रकार तो बेशकीमती होता है. उसकी क्या कीमत कोई लगाएगा? और ऐसे समय में जब नश्वर पैसे से ईश्वर समाज को तौलने की कोशिश हो रही हो. ऐसे में समाज को अपने बीच से कुछ निहंग पत्रकार पैदा करने होंगे. निहंग और नागा भारतीय समाज के रक्षा पंक्ति रहे हैं. कालक्रम में आज भले ही वे अप्रासंगिक हो गये हैं लेकिन उनकी मांग आज सबसे ज्यादा है. निहंग पत्रकारों की सबसे ज्यादा जरूरत पत्रकारिता में है जो नश्वर पैसे और ईश्वर समाज के बीच भेद कर सकते हों. एक-एक निहंग पत्रकार अपने आप में एक इंडस्ट्री हो जाए. वह चले तो पूरी पत्रकारिता उसके साथ चले. वह समाज का स्वघोषित स्वामी होगा, पालक होगा, रक्षक होगा. चुपचाप यह काम करने की तीव्र इच्छा रखनेवाले निहंग पत्रकार नये मीडिया की धुरी होंगे. समाज और जनता दोनों ही इसके रास्ते तैयार करेगी.

नयी मीडिया में इस बात की संभावना है कि वह ऐसी निहंग पत्रकारिता को जगह दे सके. पिछले किसी भी माध्यम में ऐसा संभव था कि नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन नये माध्यम में यह संभव है. इसका सबसे बड़ा कारण है इसका कम पूंजी निवेश. यही वो मूलमंत्र है जो नयी मीडिया को जनता का औजार बनायेगी. जनता के पैसे से पत्रकारिता का नया दौर शुरू करेगी. ऐसा करने के लिए हमें कोई भारी-भरकम पूंजी निवेश नहीं चाहिए. बस चाहिए तो एक ईमानदार कोशिश. एक ऐसी कोशिश जो जेब भरने की मानसिकता से थोड़ा अलग हो. ऐसी पत्रकारिता ही समाज में वापस आत्मविश्वास को लौटाएगी, सरोकार का जुड़ाव पैदा करेगी और वह मिसिंग प्वाईंट भर सकेगा जिसके अभाव में पत्रकारिता पेशा हो गयी है. पहल हमें आपको ही करनी होगी. विस्फोट इसी अवधारणा और विश्वास पर काम कर रहा है और आगे भी करता रहेगा. चले तो ठीक. बंद हो जाए तो ठीक.

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Bhai on 24 July, 2008 18:05;41
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Sanjay ji, Ye sab kiyse hoga.
Koi Disha to honi chaahiye.
Kis disha me kaam kare ?
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munna jha on 25 July, 2008 18:05;40
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sangharsh aapki hai jaari rakhiye samaj ka pata nahin kuch ache log hai jo sayad mile...........
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Krishan on 10 August, 2008 18:08;50
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sanjay , maine kahi ek sabd suna tha "dheet sapne" kuchh log hi sansaar mai dheet sapne dekhne ki himmat juta paate hai, aur jab unke sapne saakar hote hai to puri duniya unehe maan deti hai, sach me tumara pryaas bhi kisi ko ek dheet sapna hi lagega, lakin tumhari ye koshsi shyad patrkarita ko ek nai disha de........ isi aasha ke saath

Krishan
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rajkumar singh on 22 August, 2008 06:25;32
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Priya Sanjai,

aaj pahalee bar aapkee site par aya.achcha laga.khas kar aapkee soch,aapka iradaa,aapka dhyeya.aur in sab se badh kar is baat ka saboot ki is irade me dhar bhee hai aur vichar samagree bhee.Aur net ka yahee saundarya hai,taakat bhee, ki janta ke liye janhit kee patrakarita ko badee poonjee ke bina bhee kiya ja sakta hai.Vishwas rahe dhyeya ho to JAN kya JANARDAN tak judenge.dhan,jaisa aapne hi kaha,chahata to hoga ki duniya sau bar khareed le.lekin duniya itnee bikaoo bhi nahin hotee.SAADHUVAD.
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Jagseer on 06 September, 2008 17:38;36
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Dear Sanjay,
The spirit that makes a man face every challenge has always been applaudable. There is no doubt that the men endowed with this type of quality also have been in so small number as can be counted at one's finger tips. They have been in minority in the beginning but the majority found itself identified with them in the last. So many other objective situations also count, scientific approach in understanding the situation and organizing in a revolutionary body is one of them. The present time is the time about whom they say 'the end of history'-it casts gloom over one's every thought and act. Every thing seems to have come to the standstill.But the most serious work of thinking takes place when the society is face to face with this type of situation-this positive aspect is the other side of the same coin.
Bravo !! Get along with your revolutionary zeal.
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santosh jha on 07 May, 2009 17:56;52
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sanjay Jee,
Aapka vichar baut hi accha laga.
Lekin meri samajh se agar aapka yah message kisi bhi tarah se aam janata tak pahunch jaaye to sambhav hai ki is disha men ummeed ki koi kiran nikle.

Santosh Jha
Sr. Sub Editor
Pratah Khabar
Guwahati (Assam)
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bimal kumar singhania on 25 October, 2009 20:18;20
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aapki baat men dam hai.yah prayog ekdam naya nahin hai.hamane padha hai ki aajadi ke purv ki patrakarita jo ki ganesh shankar vidyyarthi,lokamany tilak aur bangal men Vishvamitr kesampadak babu mulchand agrawal,Bharatmitra,aadi patronne ki thi vo luch aisihi thi jisme "nihang
patrakaron" ke lekh chhapte the.Jisase British samrajyavad ki nindharam ho jaati thi.tab patrakaritaek missionthi.Magar Aaj yah dhandha se bhi girakar "Kothe" par aagai hai. mere ek mitrto saafkahate hain ki aaj hampatrakaron ki stithi nagarvadhuon kisi ho gaeehai jo kiraatmen mukhada leep-potkar grahakon ke liyekaam karati hai.subah polish -valish utar jaane ke baadkoi unhe utna pasand karega?vaise hi ham log ratajaga krakeakhabar sajate hain.subah khabaren chhapane ke baad, koi hamara muh dekhana bhi pasandkarega? baat talkh jarur hai par yatharth hai.aajkal akhabaron kemuh page ke earpanel men jo auraton ki photo chhapati hai ya andaruni pejon men 4inch kedo kapadon ke pahane hasinon ki rangin photo chhapati hain vo kya ghar ke bachchon ,kishoron ke dekhane laayak hoti hain?prakashak ko isase kaya sarokar.use to apana prduct bechana hai.Copetition .ka market men chahae jaise bhi ho, bane rahana usaki majaburi hai.aise men aap jaise log leek se hatkar baat karate hain, to aisa lagata hai ki, abhi bhi asha ki kirane samaj men bachi hain.aapkaek ham vicharak.
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sushil Gangwar on 18 June, 2010 20:13;44
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Patrakarita ka sarokaar - sushil Gangwar--
Tarun Tejpal ji ne Tehelka ke jairye puri duniya me tehelka machaya tha. Tehelka ka naam aate hai Sarokaari Patrakarita saaf saaf jhalkti hai. Aaj kal ki patrakarita ka sarokaar hi nahi hai Jo man me aata hai likh dete hai . Patrakarita ko samya –samya par kowi na kowi patrakaar apni gandi soch se kalankit karta raha hai. Ambedkar Today patrika me Bhagwan Brahma ko gali likhi gayee, bahi Sahara akhbaar me betichod tak likh diya gaya . Sahara akhbaar ka Editor bhag khakar baitha th jo gaali ko sudhaar nahi kar saka . Us reporter ko daad deni hogi jisne bhaddi gali likhne ki himagat ki ?Mai pichhle 9 saal se likh raha hu. Kabhi kabhi apne aap ko kosh leta hu. Aakhir kyo journalism me career banya . Aaj Media ka sarokaar Aameerjaado or netaoo se hai . Media Rahisho – netaoo ki dehleej ki juthan ban chukka hai. Neta or ameerjade janta hai ki Patrakaar to juthan chatne ko taiyaar rahta hai. Kya media ka star etna gir gaya hai. Patrakarita ko choutha stambha kaha jata hai . Har news site or Blog Patrakaaro ki khul rahi hai . Esa mahsus hota hai ,Safal hone ki hod si mach gayee hai . Kown kitna ganda likh sakta hai, or Prasidhi pa sakta hai . Jab Veer sanghvi – Barkha dutt ka naam Neera radia se joda gaya to matha thank gaya . Kal tak jo aarop chhote chhote patrakaaro par lagte the. Vah Aarop hamare aadarsh Patrakaaro par lag rahe hai . Thoda sa bura laga . Fir socha chalo kowi baat nahi .Ensaan hai bahak jaata hai . Patrakarita ko barbaad- badnaam karne me hum patrakaaro ka haath hai. Kabhi hum kisi neta ko dosh dete hai to kabhi kisi Businessman ko nishana banate hai . Hame samya samya par apne garemaan me jhaak kar dekhna hoga . Tabi patrakarita ka sahi mayane me sarokaar ho sakta hai.
www.sakshatkar.com
www.sakshatkar-tv.blogspot.com
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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