मंहगाई का रोना आखिर क्यों रोएं?
मंहगाई पर जारी वर्तमान बहस को पूरी तरह से खारिज करते हुए बजरंग मुनि तर्क देते हैं कि पिछले एक वर्ष में पहली बार आम उपभोक्ता वस्तुओं की मंहगाई ने उत्पादकों के मन में आशा की जो किरण जगाई है उन किरणों के स्वागत में उपभोक्ता भी शामिल हो तो उनका स्वयं का ही हित है। विशेष कर कलम के सिपाहियों को तो अवश्य ही गम्भीरतापूर्वक सोचना चाहिये।
मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार दैनिक नवभारत दिनांक 31 दिसम्बर 2009 में बहुत बड़े बड़े अक्षरों में प्रचार छपा था जिसका शीर्षक था (मंहगाई मार गई)। अखबार ने निष्कर्ष को तात्कालिक समाचार के रूप में प्रकाशित न करके वर्ष की सबसे बड़ी समस्या के रूप में प्रचारित किया है। एक तुलनात्मक मूल्य सूची भी प्रकाशित की है जिसमें पांच वर्ष पूर्व चावल ग्यारह रूपये, पिछले वर्ष चौदह रूपये और अभी तीस रूपये प्रति किलो बताया है।
एक वर्ष पूर्व का यदि अखबार निकाल कर देखें तो उसमें भी मंहगाई का रोना इसी तरह रोया गया है। उसमें मंहगाई के लिए आकलन करते समय गेहूं चावल और प्याज गायब था। उसमें आंकड़ा था सीमेंट, लोहा का छड़ और टमाटर। वर्तमान में जिस मूल्य सूचकांक बारह प्रतिशत मूल्य वृद्धि का लिखा गया था विदित हो कि उस समय दूसरा सूचकांक बहुत कम था तो उसके स्थान पर तेरह प्रतिशत वाले सूचकांक का उपयोग किया गया और इस समय वह सूचकांक घटकर चार आ गया है तो सूचकांक ही बदल दिया गया। दोनों ही आंकड़े सरकारी हैं और दोनों ही आंकड़े मूल्य सूचकांक है। आम आदमी बेचारा इस बाजीगरी को क्या जाने।
तीन वर्ष पूर्व का अखबार निकाला तो उसमें भी मंहगाई से जन जीवन त्रस्त। डीजल पेट्रोल की भारी वृद्धि। उसमें आंकड़े देकर लिखा गया था कि किस तरह डीजल पैट्रोल की मूल्य वृद्धि का आम जन जीवन पर प्रभाव पड़ रहा है। इस मूल्य वृद्धि के प्रभाव से सभी वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ गई है, गैस के दाम बढ़ने से गृहणियों का मासिक बजट गड़बड़ा गया है, आवागमन मंहगा होने से वस्तुओं का आना जाना प्रभावित हो रहा है आदि आदि।
तीन प्रकार के समाचार तीन अलग अलग आधारों पर निष्कर्ष निकाल कर प्रचारित किये गये। तीनों में कुछ बातें समान रहीं (1)तीनों ही निष्कर्ष समाचार में प्रकाशित न करके प्रचार के रूप में प्रकाशित होते रहे। (2)तीनों ही समाचारों में निष्कर्ष का आधार जान बूझकर बदला गया। (3)तीनों समाचारों के निष्कर्ष एक निकाले गये कि (मंहगाई मार गई) अर्थात मंहगाई का सामान्य जन जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। निष्कर्ष निकालने में अभी खाद्य वस्तुओं को आधार बनाया गया तो पिछले वर्ष लोहा सीमेंट को और उससे पहले डीजल पैट्रोल का। चालाकी तो यहां तक की गई कि पिछले वर्ष के सरकारी आंकड़ों को भी इस तरह से बदला गया जैसे कि निष्कर्ष निकालने वाला किसी भी तरह समाज को इस निष्कर्ष तक पहुंचाना ही चाहता था। इस वर्ष तो हद ही हों गई टमाटर के भावों को छिपाया गया और गेहूं चावल के झूठे भाव प्रकाशित किये गये। चालाकी की गई कि गेहूं चावल के प्रकाशित आंकड़े सामान्य जन के अपयोग के गेहूं चावल से हटकर विशेष किस्म के गेहूं चावल के है और निष्कर्ष सामान्य लोगों के लिये निकाला जा रहा है।
प्रश्न उठता हैं कि ऐसा प्रयत्न कोई एक अखबार न करके सभी अखबार और चैनल कर रहे है और नि:शुल्क कर रहे है तो इसका कारण क्या है। मैनें पाया कि इसका सिर्फ एक ही कारण है कि भारत के आम नागरिक को ऐसे असत्य पढ़ने सुनने से राहत और सन्तोष मिलता है। प्रचार माध्यामों के दुष्प्रचार, राजनेताओं के तर्क और शासन की स्वीकृति के बाद कौन बचता है जो इस धारा के विपरीत शोध करे। यदि शोध भी करे तो वह कितनों तक पहुंचेगा और पहुंच भी गया तो कौन विश्वास करेगा। क्योंकि आम आदमी तो पूरी तरह आश्वस्त और विश्वस्त है कि (1) मंहगाई बढ़ रही है (2) मंहगाई से आम लोगों के क्रय शक्ति घट रही है मुद्रा स्फीति साठ वर्षों से बढ़ रही है यह पूरी तरह सच है किन्तु मुद्रा स्फीति का आम जन जीवन पर तब तक कोई प्रभाव नहीं पड़ता जब तक उसके सामान्य उपयोग की वस्तुओं के औसत मूल्य से उसकी औसत आय के तालमेल का सन्तुलन गड़बड़ न हो जावे।
आम आदमी तीन वर्गों में बांटे जा सकते हैं। (1) निम्न (2) मध्यम (3) उच्च। निम्न वर्ग पर पिछली मंहगाईयों का कोई विशेष प्रभाव नहीं होता था। क्योंकि जिस तरह वस्तुओं के मूल्य बढ़ते हैं उसी तरह उसका श्रम मूल्य भी बढ़ता है। तीन चार वर्ष पूर्व जब राष्ट्रीय रोजगार गांरटी योजना शुरू हुई थी तक उसका मूल्य साठ रूपये प्रतिदिन था। आज सौ रूपये रूपया है। इस सम्बंध में निठल्ले विचारकों के प्रश्न, कि काम नहीं मिलता या भ्रष्टाचार होता है, आदि इसलिये महत्वहीन है कि ये बातें सच होते हुये भी साठ स्पये के समय भी मौजूद थी और आज भी है। मध्यम वर्ग पर थोड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि उसी अनुपात में उनकी आय नहीं बढ़ती और उच्च वर्ग पर सर्वाधिक प्राभाव होता है क्योंकि उसका तो सारा का सारा ढांचा ही डीजल पैट्रोल बिजली या लोहा सीमेंट आवगमन पर टिका है। यदि इनकी मूल्य वृद्धि हो तो वह मंहगाई का हल्ला कराने की योजना बनाता है और उसके सबसे सफल आधार है वेतनभोगी कर्मचारी, राजनेता और मीडिया। बिना मंहगाई के मंहगाई सिद्ध करने के लिये ये तीनों ही तिकड़म करते रहते हैं।
इस सारी तिकड़म से सर्वाधिक प्रभावित होता है किसान। उस बेचारे की वस्तुओं का मूल्य स्वाभाविक रूप से भी बढ़ने नहीं दिया जाता। या तो सरकार उस मूल्य वृद्धि को कानून बनाकर रोक देती है या ऐसी वस्तुओं का आयात करकें। साठ वर्षों से उत्पादकों के विरूद्ध मंहगाई रूपी शस्त्र से लगातार आक्रमण किया गया। किसानों ने धीरे धीरे खेती कम कर दी और अन्य नौकरी अथवा छोटे उद्योग तलासने लगे। सम्पूर्ण भारत के गांवों के किसान या मजदूर स्वयं या उनकी सन्तानें लगातार शहरों की ओर पलायन कर रही हैं यह जग जाहिर है। कई किसान तो बेचारे स्वर्ग सिधार गये। खासकर महाराष्ट्र में क्योंकि वहां की सरकार ने उन्हें बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर रोक का एक तोहफा भी दे रखा है। खेती करना उनकी मजबूरी हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भी अब अपने किसानों को वैसा ही तोहफा देने का अध्ययन करा रही है। अभी दो तोहफे उसने दिये भी है। (1) अपने गन्ने के गुड़ बनाने पर रोक के रूप में और दूसरा जो उसने अभी अभी एक जनवरी को किसानों को दिया है कि उसके हर प्रकार के उत्पादन पर बिक्री कर सरकार चार प्रतिशत से बढ़ाकर पांच प्रतिशत वसूल करेगी। अभी अभी कृषि उत्पादों के मूलयों में जो वास्तविक वृद्धि हुई है किसानों के उस लाभ पर सरकार की बहुत तेज नज़र लगी है। कभी गेहूं चावल दाल खाद्य तेलों में वृद्धि इस तरह नहीं हुई थी जैसी इस बार है तो सरकार क्यों चूके।
साठ वर्षों में पहली बार हुआ है जब आम उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों में औसत से अधिक वृद्धि हुई है अन्यथा इसके पूर्व तो कृषि उत्पाद जमीन सूंघते रहते थे और औद्योगिक उत्पादन की मूल्य वृद्धि को ही मंहगाई कह कह कर राजनैतिक खेल चलता रहता था। इस खेले का सीधा प्रभाव पड़ा कृषि उत्पादन पर जिसे उपभोक्ताओं और उनकी व्यवस्था ने अनदेखा किया। बड़ी मात्रा में किसानी आत्महत्या से भी किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रभाव पड़ा तब जब किसानों ने खेती कम करके दूसरी राह पकड़नी शुरू की और ईश्वर ने सूखे का एक झटका दिया। अब सरकार के समक्ष भी किसानों के सामनें जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। विदेशों में भी कोई अच्छी स्थिति नहीं कि अधिक आयात कर लें। सरकारी खेती तो और भी अधिक नुकसान देह होती है। हार थक कर कृषि उत्पादों की स्वाभाविक मूल्य वृद्धि को चुपचाप होने को ही समाधान माना जा रहा है। सरकार राजनैतिक हानि से बचने के लिए मंहगाई के विरूद्ध नकली चिल्लाहट का ढोंग कर रही है अन्यथा उसे कुछ कुछ आभास होने लगा है कि उत्पादन वृद्धि ही समस्याओं का एक मात्र समाधान है और उत्पादन वृद्धि के लिए कृषि उत्पादों की वास्तविक मूल्य वृद्धि के अलावा कोई अन्य उपाय है ही नहीं।
इस वर्ष की मंहगरई किसी भी रूप में कोई समस्या न होकर समस्याओं का समाधान है। जो लोग खेती के अलावा अन्य कार्यों में बहुत कमाई करने में लगे है उनके चिल्लाने से न तो विदेश सस्ता अनाज दे सकता है न ही किसान खेती की ओर लौटने की मूर्खता कर सकता है। दूध की मूल्य वृद्धि का रोना वाले क्यों नहीं गाय-भैंस पालने का काम शूरू कर लेते है। कौन रोकता है उन्हें कीचड़ में जाकर खेती करने से। शब्दों के बीज बोकर मोटी मोटी तनखाहों की फसल काटने की खेती करने वालों को क्या पता है कि मंहगाई के हल्ले का उत्पादन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। वे तो सिर्फ दो चार सम्पन्न गुहणियों का इन्टरव्यू छाप कर पूरे भारत का दुख दर्द समझ जाया करते हैं। किसी किसान या दूध उत्पादक की पत्नी का इंटरव्यू लेकर देखते क्यों नहीं कि उसका दुख दर्द क्या है। मैंने स्वयं पैतीस वर्षों तक खेती करने के बाद सन पंचान्नवें में लुट पिटकर खेती को अलविदा कहा है और तब आज आपके समक्ष शब्दों के बीज बो रहा रहा हूं। और वह बीज भी वेतनों की फसल काटनें के लिए नहीं अन्यथा मैं भी वैसा ही मंहगाई का रोना रोता जैसे अन्य लोग रो रहे हैं।
मंहगाई के दुष्प्रचार के विरूद्ध मजबूती से कलम उठाने की जरूरत है। धारा के विपरीत चलने का खतरा तो है किन्तु सच को सच कहना तो पड़ेगा ही। रमण सिंह जी चुनावों के पूर्व तक तो पूरी तरह किसानों के पक्ष में थे क्योंकि उन्हें ज्यादा राजनैतिक तिकड़म नहीं आती थी। चुनावों के बाद भी वे एक वर्ष तक तो उत्पादन के महत्व को समझते रहें। किन्तु अब वे कुछ कुछ राजनैतिक तिकड़म समझने लगे है। किसानों को धान का भारी भरकम बोनस देना उनकी गलती थी। पूरे भारत से अलग चलकर आप थक जावेगें। उस भूल को उन्होंने सुधार लिया। किन्तु अब कृषि उत्पादों पर वेट बढ़ाना अथवा गन्ने की गुड़ बनाने की स्वतन्त्रता पर रोक आदि ऐसे आत्मघाती कदम है जो किसानों को निरूत्साहित करेंगे। वे जिस तरह किसानों द्वारा अपनी जमीन की बिक्री पर रोक लगानें की सोच रहे है वह भी उनकी स्वतन्त्रता पर कुठाराघात ही होगा। उत्पादक और उपभोक्ता ऐ दूसरे के पूरक है। किन्तु पिछले साठ वर्षों से व्यवस्था ने हमेशा उत्पादकों को उपभोक्ताओं का पूरक बनाकर रखने की कोशिश की है जिसके दुष्परिणाम आज दिख रहे है। अब भी व्यवस्था चेत जाये तो अच्छा होगा अन्यथा किसान अब कुछ कुछ समझना शुरू कर रहा हैं जो वर्ग विद्वेष का कारण बन सकता है।
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