बीटी बैंगन की कहानी
बीटी बैंगन को लेकर मच रहा है इतना शोर, पर अभी भी ज़्यादातर लोग समझ नहीं पा रहे की आखिर बैंगन को लेकर यह हो-हल्ला मचा और आखिरकार सरकार ने तात्कालिक तौर पर देश में बीटी बैंगन के उत्पादन को मंजूरी देने से मना कर दिया है. बीटी बैंगन क्या है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? इन सभी विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाल रही हैं वसुधा मेहता.
बीटी (Bt) असल में 'Bacillus thurigiensis' - बसिल्लस थुरिजिएन्सिस बैक्टीरिया (जीवाणु) के लम्बे वैज्ञानिकी नाम का छोटा रूप है. प्रकृति में 500 प्रकार के बीटी बैक्टीरिया पाए जाते हैं. यह जीवाणु खाद-मिट्टी में पाया जाता है. हर जैविक चीज़ - पेड़-पौधे, कीड़े-मकौड़े, जीवाणु-कीटाणु, इंसान-जानवर-मछली इत्यादि के अन्दर आनुवांशिक पदार्थ (Genetic material) अर्थात DNA होता है, जिसमे कि कई हजारों लाखों प्रोटीन-पदार्थों की रचना के लिए कोड छिप्पे होते हैं, जो कि समय-समय पर एक्सप्रेस या प्रकट होते रहते हैं. हर कोड को एक Gene (जीन) कहा जाता है.
बीटी बैक्टीरिया में ऐसा ही एक जीन होता है जो कि जब एक्सप्रेस होता है तो एक निष्क्रिय प्रोटीन बनाता है जिसे बीटी प्रो- टोक्सिन - Bt protoxin कहकर संबोधित किया जाता है. जब इस बीटी बैक्टीरिया का सेवन कुछ ख़ास प्रजातियों के कीड़ों द्वारा किया जाता है, तो यह उन कीड़ों के लिए घातक साबित हो जाता है. इन कीड़ों के आंत (gut) में पहुँचते ही यह बीटी प्रो टोक्सिन एक सक्रिय रूप में आ जाता है, जिससे बीटी टोक्सिन (Bt Toxin) कहा जाता है. यह बीटी टोक्सिन कीड़े की आंत में घर कर देता है जिससे कि कीड़े का हाजमा तुरंत खराब हो जाता है और वह घुट के मर जाता है. विभिन्न प्रकार के बीटी बैक्टीरिया तकरीबन 170 प्रकार के बीटी टोक्सिन बना सकते हैं जो कि अलग अलग प्रजाति के कीड़ों के लिए घातक साबित हो सकते हैं, इसी खूबी के कारण इन बीटी बैक्टीरिया का जैविक खेती में इस्तमाल किया जाता है, क्योंकि यह पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कीटनाशकों के मुकाबले फसलों पर लगने वाले कीड़ों को मारने का एक प्राकृतिक समाधान पेश करते हैं.
बीटी बैंगन कैसे बनाया जाता है?
बीटी बैंगन जीन संशोदन तकनीक (Genetic Engineering/Genetic Modification technology) के ज़रिये विकसित किया गया है. जिसका मतलब आम भाषा में यह है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करके बैंगन के आनुवांशिक पदार्थ में बीटी बैक्टीरिया के अन्दर से निकाले हुए Cry1Ac जीन को ड़ाल दिया गया. वैज्ञानिकों का मानना है कि जब बैंगन की फसलों पर धावा बोलने वाले 'बोरेर' कीड़ा (Brinjal Fruit and Shoot Borer) इस बीटी जीन वाले बैंगन की फसल पर आक्रमण करेगा तब इस बी टी बैंगन पौधे का सेवन करने पर बैंगन के अन्दर डाला हुआ बीटी जीन (Cry1Ac) एक्सप्रेस होगा और बी टी टोक्सिन बनाएगा जो कि इस बोरेर कीड़े के हाजमे को खराब करके इससे अपने आप बिना कीटनाशक छिडके मार डालेगा.
बीटी बैंगन को भारत में बनाने का कार्य सन 2000 में माहिको (महाराष्ट्र हाईब्रिड बीज कंपनी)- मोनसेंटो बायोटेक द्वारा शुरू किया गया. इस कंपनी में माहिको और अमरीकी मल्टीनेशनल कृषि बायोटेक कंपनी मौनसेंटो की 50:50 प्रतिशत की भागेदारी है.
भारत और बैंगन: माना जाता है कि बैंगन की मूल उत्पत्ति भारत में हुइ थी. पिछ्ले 4000 वर्षों से भारत से बैंगन की खेती की जा रही है. चीन के बाद बैंगन के उत्पाद में भारत दूसरे स्थान पर है. भारत में 5.5 लाख हेक्टेयेर ज़मीन पर बैंगन की फसल उगाई जाती है. बैंगन की खेती पूरे साल हर मौसम में की जाती है. बैंगन की सालाना उत्पत्ति लगभग 90 लाख मेट्रिक टन के आस पास है. पूर्वी भारत के राज्यों, जैसे कि पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा और बिहार लगभग देश का 60 प्रतिशत बैंगन उत्पाद होता है. अन्य राज्य जहाँ बैंगन की पैदावार होती है, वह हैं- उत्तर प्रदेश, कर्णाटक, उत्तराँचल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्णाटक.
भारत और जी एम (GM-Genetically Modified) फसल:
भारत कनवेनशन ऑफ़ बाइओलौजिकल डाईवेर्सिटी-1992 के अंतर्गत लिखित 'कार्तागीना बायोसेफ्टी प्रोटोकॉल' का हस्ताक्षरकर्ता है. इस प्रोटोकॉल के अनुसार हर हस्ताक्षरकर्ता देश को अपने देश में जीन अन्वेषण से बने जीवों के नियंत्रण के लिए विधिपूर्वक नियम बनाने होते हैं ताकि यह जीव, बीज इत्यादि नियंत्रण में रखे जा सकें. इसके लिए भारत के वन और पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के अंतर्गत जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्प्रोवल कमिटी (GEAC) का संगठन किया गया. भारत में 2002 में बी टी कपास के रूप में पहली फसल को व्यापारिक खेती कि अनुमति मिली. विश्व में भारत ऐसा पहला देश है जहाँ की बीटी बैंगन को सरकारी तौर पर खुले अग्रिम फील्ड ट्राईलस की अनुमति दी गई हैऔर GEAC भी पहली बार बी टी बैंगन के रूप में किसी खाद्य फसल को ऐसी अनुमति दे रही है.भारत में आज की तारीक में 56 फसलों के अलग अलग चरण पर फील्ड ट्राईलस चल रहे हैं.
बीटी बैंगन और GEAC:
मोनसान्टो ने बीटी बैंगन की जीन अन्वेषण तकनीक को USAID-द्वारा संचालित एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत भारत के तीन विश्वविद्यालयों को सब-लाईसेन्स कर दी थी. यह तीन विश्वविद्यालय हैं तमिल नाडू कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ स्तिथ कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय और वाराणसी स्तिथ भारतीय वनस्पति अनुसंधान केंद्र- जिन्हें बीटी बैंगन को विकसित करने, उत्पादन करने और बांटने की इजाज़त करता है.2007 में GEAC ने अग्रिम स्तर पर बीटी बैंगन के फील्ड ट्राईलस की अनुमति दी थी.
2002-2009 के दौरान महिको ने बीटी बैंगन के विभिन्न प्रकार के कुल मिलाकर 25 बाइओसेफटी परीक्षण करवाए, गैर सरकारी संघटनों और जनतांत्रिक आंदोलनों के दबाव के चलते महिको को इन सारे परीक्षण के नतीजे जनता के सामने रखने पड़े. इन परीक्षणों का किसी भी निस्वार्थ स्वतंत्र संघटन द्वारा जांच नहीं करवाई गई, ना की इंसानों-जानवारों पर इस फसल का परीक्षण किया गया है, यह ही है जनता की नाराजगी की वजह. पर फिर भी GEAC ने 14 अक्टूबर, 2009 बीटी बैंगन के बीजों को बाज़ार में बेचने और उसे खेतों में उगाये जाने की अनुमति देदी थी..पर जनता और गैर सरकारी संघटनों के द्वारा जताए गए आक्रोश के चलते पर्यावरण मंत्री श्री जैराम रमेश ने बी टी बैंगन पर सरकार के किसी भी निर्णय को फरवरी 2010 में देश के 7 राज्यों में होने वाली जनता के साथ होने वाले परामर्श के बाद तक टाल दिया था...जिसमें लोगों के सवालों का जवाब और उन्हें बीटी बैंगन की इंसानों के लिए हानिकारक ना होने पर किसी भी प्रकार का आश्वासन न दे पाने के कारण मंत्री साहब ने बीटी बैंगन पर अपने फैसले को और स्वतंत्र परीक्षण होने तक स्ताघित कर दिया.
बीटी बैंगन के समर्थन में रखे जा रहे महिको और अन्य वैयानिकों के द्वारा दिए जा रहे तर्क:
1. विदेशी वैज्ञानिक प्रोफेस्सर सेरालिनिं की बी टी बैंगन के खिलाफ दी गई रिपोर्ट पर्यावरण वादी-ग्रीनपीस संघटन के द्वारा दी गई मदद से बनाई गई है, वेह रिपर्ट सिर्फ बीटी बैंगन पर किये गए महिको के परीक्षण नतीजों का एक आंकलन है..क्योंकी प्रोफेस्सर सेरालिनी तक इन बीजों का निर्यात नहीं किया गया था और उनके विश्लेषण को एक स्वतंत्र परीक्षण का दर्जा देना गलत है.
2. महिको का कहना है कि बीटी बैंगन पर किये गए परीक्षणों से साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि इनसे बीटी बैंगन को खाने के बाद इंसानों को कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा.
3. महिको का कहना है कि बीटी बैंगन उगाने से किसानों का कीटनाशकों पर खर्चा कम होगा और बीटी बैंगन कि पैदावार भी बढेगी..इससे किसान को फायदा ही फायदा होगा.
4. महिको का कहना है कि बीटी बैंगन के बीज किसान को 'cost-recovery' मॉडल के तहत कम कीमतों पर उपलब्ध कराये जायेंगे जिससे किसान पर कोई आर्थिक बोझ नहीं बढेगा.
5. महिको का कहना है कि बीटी बैंगन की फसलों से पाए गए बीज को किसान अपने पास बचा कर रख सकता है और बैंगन की दूसरी फसल की खेती में इस्तमाल कर सकता
बीटी बैंगन के विरोध में कुछ तर्क:
1. महिको द्वारा किये गए बी टी बैंगन के इंसानों कि सेहत के लिए हानिकारक ना होने के सभी २५ परीक्षणों की किसी भी निष्पक्ष, स्वतंत्र अगेंच्य या वैज्ञानिकों द्वारा जांच नहीं कराई गई. सरकार ने बी टी बैंगन सम्बंधित फैसलों पर महिको के द्वारा करे गए परीक्षणों के तहत ही 14 अक्टूबर, 2009 को बी टी बैंगन के बीजों को बाज़ार में किसानों को बेचे जाने कि अनुमति दे दी थी.
2. क्युंकी, ज़्यादातर किसानों का यह मानना है कि बैंगन का मूल स्त्रोत भारत है, तो इसलिए किसानों को डर है के जीन अन्वेषण से बनाये गए बी टी बैंगन के नियंत्रित क्षेत्रो में ठीक तरह से सारे नियमों का पालन करे बिना करे उगाये जाने, या बी टी बैंगन के बीजों के अवैध खरीद-फरोड़ के चलते, प्राकृतिक तौर पर उगाये जाने वाले बैंगन की फसल भी दूषित हो जाएगी, जिससे कभी भी वापस ठीक नहीं किया जा सकता. किसानों और अन्य पक्षों का यह डर GEAC की बी टी कपास कि फसलों और बीजों पर सही तरह से नियंत्रण और नियम लागू न कर पाने कि असक्षमता के बाद और भी मज़बूत हो गए हैं, और जबकि कपास को इंसान नहीं खता, बैंगन तो इंसान के खाने वाली फसल है!
3. जी एम् फसलों के बीजों पर बहुरास्थ्रीय कंपनियों के पेटेंट हैं, इसलिए बीज महंगे मिलेंगे और हर बार फसल लगाने के लिए किसान को इन कंपनियों से बीज खरीदने पड़ेंगे..इससे गरीब किसान पर भोज बढेगा जो सालों से एक फसल से आने वाली फसल के बीज बचा कर रखता आया है.
4. भारत देश में अभी भी कोई भी जी.एम खाने की पहचान करने सम्बन्धी सूचक (लेबल) नियम या कानून नहीं हैं..ऐसे नियमों के आभाव के कारण आपके, मेरे जैसा कोई भी इन्सान्बैंगन या बीटी बैंगन की देखकर बाज़ार में पहचान नहीं कर पायेगा. यह एक उपभोक्ता के पसंद के अधिकार का उल्लंघन है.
5. स्वास्थय मंत्रालय, केंद्रीय सरकार ने अभी तक महिको द्वारा तैयार किये गए बीटी बैंगन के ऊपर कोई भी स्वतंत्र परीक्षण नहीं किये हैं, इसके बिना आम जनता को यह आश्वासन दिलाना कठिन है कि बीटी बैंगन में घुसाये गए जीवाणु के जीन से इंसानों की सेहत को कोई नुक्सान या हानि नहीं पहुंचेगी.
6. महिको द्वारा किये गए परीक्षण में जानवरों पर किये गए परीक्षण बहुत छोटी अवधि के थे, विरोध करनेवालों का कहना है कि जानवरों पर किये गए बीटी बैंगन के परीक्षण कम से कम 1 साल लम्बे होने चाहिए, उसके बाद ही सही असर नज़र आटा है. पहले भी बीटी कपास कि फसलों को खाने वाले भेद-बकरियों की हत्या का आरोप महिको पर लगाया गया है.
7. महिको, जो कि एक कंपनी है केवल अपने फायदे के बारे में ही सोच सकती है और भारतीय किसानों को अपने ऊपर निर्भर बनाना चाहती हैं. किसी भी कंपनी ने आजतक गरीब किसान के फायदे के बारे में ना ही कभी सोचा है और ना ही उनसे यह सोचने कि उम्मीद की जा सकती है.
8. बीटी बैंगन के अन्दर घुसाए गए Cry1Ac जीन केवल कुछ ही कीड़ों पर असरदार हो सकता है, बैंगन पर लगने वाले बाकी कीड़ों को मारने के लिए किसान को अभी भी कीटनाशक खरीदने पद सकते हैं...और बी टी बैंगन में घुसाए गए इस जीन का असर भी उस कीड़े की प्रतिरोधक क्षमता बाद जाने पर बेअसर हो सकता है, जैसा कि हर कीटनाशक के निरंतर इस्तेमाल के बाद देखा जाता है.
9. आखिर बीटी बैंगन बनाया ही क्यों गया? जब बैंगन पर लगने वाले कीड़ों का प्राकृतिक तरीके से उपचार करने के लिए कही प्रदेशों में कृषि केंद्र काम करते आ रहे हैं.
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किसानों की आर्थिक हालत सुधारने और मंहगाई कम करने के नाम पर जीएम बीजों को बाजार में उतारना उचित है?
कृषि मंत्रालय ने कहा है कि जेनेटिकेली मोडीफाईड बैंगन अर्थात बीटी बैंगन को स्वीकृति दी जा चुकी है.हालांकि अलग-अलग मंत्रालयों से भी अलग-अलग बयान आ रहे हैं. दुनिया में शायद भारत ही वह सबसे उत्सुक देश है जो अभी इसके सम्पूर्ण परीक्षण के बिना ही इसे बाजार में उतरने की अनुमति दे चुका है. आखिर इतनी व्यग्रता क्यों? यहां तक कि कई प्रदेशों में चोरी-छुपे इस बैंगन की खेती भी शुरू हो गई है. बीटी बैंगन के समर्थक निम्न तर्कों पर जोर डालते हुये कहते हैं कि
१-भारत में आने वाले समय में ऐसी फसलों की आवश्यकता होगी क्योंकि तेजी से बढ़ती हुई आबादी के लिये सामान्य तरह की प्रजातियों में फसल की मात्रा उतनी अधिक नहीं होगी जितनी कि जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों में होगी.
२-इस तरह की प्रजातियों से अधिक उत्पादन होगा जिससे कि मंहगाई पर काबू पाया जा सकेगा और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुये तथा बढ़ती हुई जनसंख्या को खाद्यान्न की आपूर्ति को सुचारू बनाने के लिये इनका अपनाना अपरिहार्य है.
३-इन प्रजातियों में स्वयं ही ऐसी क्षमता होगी जिससे कि किसी बीमारी के पनपने की स्थिति में पौधे के अन्दर खुद-ब-खुद एन्टी प्रोटीन उत्पन्न हो जायेंगे जोकि विषाणुरोधी/कीटनाशक का कार्य करेंगे और किसी भी कीटनाशक की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.
४-किसान कीटनाशकों का बिना सोचे-समझे अन्धाधुंध प्रयोग करते हैं तथा वेटिंग पीरियड पूरा हुये बिना ही उत्पादों को बाजार में उतार देते हैं जिससे कि यह कीटनाशक मनुष्य के शरीर में चुपचाप पहुंच जाते हैं और जिसका परिणाम भयंकर बीमारियों के रूप में सामने आता है.
अब इसके आफ्टर/साइड इफेक्टस देख लीजिये -
१-जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों से किसानों को बीज बनाना संभव नहीं होगा क्योंकि इसकी फसल का उपयोग बीज के रूप में नहीं हो सकेगा. यदि कोई किसान अपनी फसल से बीज लेकर बोयेगा तो उससे पैदावार नहीं होगी. लिहाजा बीज उत्पादकों की मोनोपाली हो जायेगी और उनके द्वारा निर्धारित मनमाने दामों पर ही बीज खरीदना होगा. भारत का छोटा और मझोला किसान पहले से ही मजदूर बनने के कगार पर है रही सही कसर इस तरह से पूरी हो जायेगी.
२-बीटी कपास पैदा करने वाले किसानों का हश्र तो सबको मालूम ही है. किस तरह से अधिक उत्पादन के सुनहरे सपने दिखाकर बीटी कपास उगाने के लिये प्रोत्साहित किया गया और बाद में जब इस पर कीड़ा लगा तो न जाने कितने किसान भुखमरी के कगार पर पहुंच गये और न जाने कितनों ने आत्महत्या कर इस जंजाल से छुटकारा पाया. और असंख्य अभी तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स को झेल रहे हैं.
३-बाजार में बढ़ती हुई कीमतों के पीछे किसान और उत्पादकता का हाथ नहीं होता है बल्कि इसके पीछे जमाखोरों, दलालों और वायदा कारोबारियों का हाथ होता है. जो अरहर किसान पहले ही अपेक्षाकृत काफी सस्ती दरों पर बेच चुका था उसी को जमाखोरों ने बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर सौ रुपये तक पहुंचा दिया तो इससे किस किसान का भला हो गया हालांकि जमाखोरों ने जरूर करोड़ों रुपये कमा लिये.
४-दर-असल छोटा और मझोला किसान तो मजबूर होता है अपनी फसल को जल्द से जल्द बेचने के लिये. कारण उसे अपने कर्जों को भी लौटाना होता है. कारण न तो उसके पास इतना पैसा होता है कि वह अपनी फसल को रोक सके, उसे तो अपने जीवन यापने के लिये फसल को तुरन्त बेचना होता है. कारण उसके गांव न तो सड़कों द्वारा शहरों से जुड़े हुये हैं और न ही उसके पास अपनी फसल को प्रोसेस कर स्टोर करने के साधन मुहैया कराये गये हैं जिससे कि वह अपनी सुविधानुसार मनमाफिक जगह पर अपने उत्पाद को बेच सके और न ही यह कि मन मुताबिक वक्त तक रोक कर बाजार में उतार सके. लिहाजा यह तर्क भी आधारहीन है कि उत्पादकता बढ़ने से कीमतों पर नियन्त्रण किया जा सकेगा. शोषित किसान को शोषण से बचाना कोई नहीं चाहता. मंहगाई कितना भी बढ़ जाये लेकिन किसान को उसका लाभ कभी नहीं होता.
५-जनसंख्या जिस गति से बढ़ रही है उसे रोकने का कोई उपाय वोट-बैंक की राजनीति के चलते नहीं किया जा रहा बल्कि इसके विपरीत यह कहा जा रहा है कि अधिक उत्पादन करने वाली बीटी/जीएम प्रजातियां उगाई जायें. यह तो वैसे ही है कि दर्द होने पर बीमारी का इलाज न किया जाये बल्कि दर्द से आराम देने वाली दवाई देने का उपक्रम किया जाये. अरे भाई जमीन तो पहले ही सीमित है, जंगल उजाड़े, खेत बनाये, खेत उजाड़े, बिल्डिंग बनाई, प्रकृति का आपराधिक दोहन कर रहे हैं हम लोग. जब यह जमीन भी खत्म हो जायेगी तो रहने के लिये चांद पर जायेंगे या फिर खेती मंगल पर जाकर करेंगे.
६-अभी तक फसलों में कीड़ा लगने पर नुकसान फसलों का होता आया है. अभी तक हमने मैड काऊ डिसीज, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू इत्यादि बीमारियों के नाम सुने हैं जो मनुष्यों में जानवरों के मांस खाने से हुई हैं. इन जेनेटिकेली मोडीफाईड फसलों के अन्दर पहले से इस तरह के जीन इन्सर्ट किये जाते हैं जो किसी बीमारी के होने पर स्वत: ही उस बीमारी फैलाने वाले वायरस के प्रोटीन के विरुद्ध एन्टीप्रोटीन का निर्माण करेंगे और इस तरह उस बीमारी को पनपने से पहले ही नष्ट कर देंगे. लेकिन इसका दूसरा पहलू देखिये कि हर उत्पाद के अन्दर एक चलता फिरता विषाणुरोधी तैयार मिलेगा जिसके गड़बड़ा जाने पर क्या हश्र होगा, भगवान ही मालिक है.
७-एक प्रमुख तथ्य और भी है जिस पर आप सबने गौर फरमाया होगा. हमारे यहां जो भी देसी फसलें पैदा होती हैं जिनमें दो प्रमुख चीजें जिनका उपयोग लगभग पूरे देश में होता है-खीरा और टमाटर. इन दोनों के देसी संस्करण एक ओर रखिये और दूसरी ओर हाइब्रिड, फिर दोनों की शक्ल सूरत पर गौर कीजिये. हाइब्रिड नस्ल में इनका लम्बाई चौड़ाई तो काफी बढ़ी हुई मिलेगी लेकिन जब इनका स्वाद लेंगे तो पता चलता हि कि देसी प्रजातियों के मुकाबले ये बिल्कुल बेस्वाद हैं. जो जायका देसी प्रजातियों में है वह इन हाइब्रिड प्रजातियों से गायब है लिहाजा अब इन हाइब्रिड प्रजातियों का जायका बढ़ाने के लिये कुछ जीव-जन्तुओं की जीन इनमें प्रविष्ट कर नयी प्रजाति उत्पन्न करने की कोशिश की जा रही है.
अधिकतर विकसित देशों में जेनेटिकेली मोडीफाईड प्रजातियों का प्रयोग प्रारम्भ नहीं किया गया है. जबकि भारत में यह उत्पादन के लिये बाजार में पहुंचाये जाने की कगार पर हैं. उन्नत किस्मों का प्रयोग करने में कोई हानि नहीं है और इस तथ्य में भी दम है कि यहां लोग कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करते हैं तथा वेटिंग पीरियड के देखते हुये पूरा हुये बिना ही फसलों को बाजार में उतार देते हैं. लेकिन इसके लिये क्या यह श्रेयस्कर नहीं होगा कि कीटनाशकों पर अधिक शोध किया जाये तथा ऐसे कीटनाशक बाजार में उतारे जायें जो मनुष्य के लिये हानिरहित हों. क्या यह शाकाहारियों के साथ धोखा नहीं है कि फल-सब्जियों में जीव जन्तुओं की जीन डालकर उन्हें बाजार में उतारा जा रहा है. क्या यह गरीब किसानों के साथ छल नहीं है कि उन्हें मजबूर किया जाये कि वह हर बार बीज कम्पनी से उसके द्वारा मनमाफिक ढंग से निर्धारित दाम पर बीज खरीदें. और विडम्बना देखिये कि किसान फसल तो उगा सकता है लेकिन दाम सरकार निर्धारित करती है, उसे फसल कहां बेचना है यह भी सरकारें ही निर्धारित करती हैं, क्योंकि कई दफा दूसरे प्रदेशों में फसल बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है. इन हालातों में किसानों की आर्थिक हालत सुधारने और मंहगाई कम करने के नाम पर जीएम बीजों को बाजार में उतारना क्या उचित है?
Posted by भारतीय नागरिक - Indian Citizen at 8:30 AM
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