पुणे विस्फोट: फिर वही जांच, फिर वही ढाक के तीन पात
यदि हमें ११/९, २६/११ और १३/२ जैसे आतंकी हमलों से बचना है तो सुरक्षा उपकरणों पर पानी की तरह पैसा बहाने, कसाब और अफजल गुरु पर करोड़ों रुपये खर्च करने और पाकिस्तान तथा अमेरिका के सामने रिरियाने की बजाय डायरेक्ट एक्शन लेना चाहिए. जब तक हमारी सुरक्षा एजेंसियां दाऊद इब्राहीम, हाफिज सईद, मसूद अजहर आदि को उनके बिलों में घुसकर नहीं मारतीं तब तक पुणे जैसे हमलों से इस देश को नहीं बचाया जा सकता.
पुणे में बम विस्फोट के बाद पूरे देश में एक बार फिर परम्परागत चर्चा शुरू हो गयी है.सुरक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे ख़ुफ़िया विभाग की विफलता करार दे रहा है जबकि खुफिया विभाग का दावा है कि उसने समय रहते चेतावनी दी थी। चेतावनी के बाद जर्मन बेकरी के बाहर सुरक्षा व्यवस्था भी तैनात की गयी थी. पुणे के पुलिस आयुक्त डॉ.सत्यपाल सिंह का कहना है कि बेकरी के संचालकों ने पुलिस द्वारा सुझाए गए उपायों पर अमल नहीं किया, इसके चलते विस्फोट हुआ. हर आतंकी हमले के बाद इसी तरह आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलता है. नए सिरे से सुरक्षा के उपाय सुझाए जाते हैं. नए सुरक्षा उपकरणों की खरीद फरोख्त की जाती है. लेकिन समय के प्रवाह के साथ सारी सतर्कताएं भुला दी जाती हैं. सब कुछ सामान्य हो जाता है और फिर किसी कोने में आतंकवादी अपनी योजना को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं. पिछले एक दशक से हम आतंकवाद से कुछ इसी तरह लड़ रहे हैं.
पुणे की घटना का हम पहले विश्लेषण कर लें. पुणे बम काण्ड के दो प्रमुख कारण बताये जा रहे हैं. पहला कारण बताया जा रहा है अफगानिस्तान में दक्षिणी हेलमंद प्रांत में मारजाह में अमेरिकी फौजों का तालिबान एवं अलकायदा विरोधी अभियान. दूसरा कारण बताया जा रहा है मुंबई में बमकाण्ड के अभियुक्तों के वकील शाहिद आज़मी की हत्या. पहला कारण ज्यादा दमदार है. मार्जाह पर हमलों के दौरान अमेरिका इस्लामाबाद से उम्मीद पालता है कि २००१ से २००३ के दौरान हुए अमेरिकी अभियान के दौरान जिस तरह तालिबान के लड़ाके भाग कर पाकिस्तान में शरण पा लिए थे उस तरह वे इस बार शरण न लेने पायें.याद करें २००१ में किस तरह पाकिस्तान ने जैश ऐ मोहम्मद के माध्यम से भारतीय संसद पर हमला कर भारत को भड़का दिया था. तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने इस हमले से चिढ कर अपनी सेना पाकिस्तानी सीमा पर तैनात कर दिया था.इस मौके का फ़ायदा उठाकर पाकिस्तान ने अपनी सेना अफगानी सीमा से हटाकर भारतीय सीमा पर तैनात कर दिया था.
आतंकवाद से लड़ने के चार संभावित तरीके हैं. १) आप हर संभावित आतंकी निशाने की चाक चौबंद सुरक्षा करें. २) आप अपने खुफिया बल को इतना समर्थ कर दें कि वो हर संभावित हमले का पता लगा लें और उन हमलों को नाकाम कर दिया जाए. ३) हर आतंकी हमले के बाद आप आतंकियों बेनकाब करने के लिए कृत संकल्प हो जाएँ. इससे आतंकी और उनके आका भयभीत हो जायें. ४) आतंकियों के खिलाफ खुफिया कार्रवाइयां की जाए. वे जहां भी मिलें उन्हें मार डाला जाए. उनकी तंजीमों को निशाना बनाया जाए. ये तंजीमें जिस देश में भी हों एन-केन-प्रकारेण उन्हें नेस्त नाबूद किया जाए. शुरु के दो तरीके जहां पूरी तरह से असंभव हैं वही बाद के दो तरीके आतंकवाद से लड़ने में कारगर हथियार साबित हो सकते हैं.
इससे तालिबान और अल कायदा के लड़ाके बड़ी आसानी से पाकिस्तान में घुस आये.इस बार अमेरिका सतर्क है,फिर भी पाकिस्तान किसी तरह भारत से पंगा मोल ले कर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई का ध्यान कश्मीर के मुद्दे की ओर मोड़ने के लिए बेताब है.ऐसे में पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के माध्यम से आतंकी तंजीमों को घुसपैठ कराने, आतंकी वारदातों को अंजाम देने और सीमा पर गोलीबारी कर तनाव पैदा करने के लगातार प्रयास करेंगे. भारत को पुणे की घटना पर स्यापा करने की बजाय आगामी हमलों को विफल बनाने के लिए सतर्क होना चाहिए. सवाल पैदा होता है कि क्या हम आतंकवाद से जिस शैली में निपट रहे हैं उससे हमें आतंकवाद पर निर्णायक जीत हासिल होगी?
उपर्युक्त चारों तरीकों में सबसे कारगर तरीका चौथा है.जब तक हम आतंकवादियों को उनके घर में घुसकर नहीं मारेंगे तब तक इस रोग का स्थायी इलाज नहीं होगा.पिछले महीने इजरायल ने जिस अंदाज में हमास के मिलिटरी कमांडर को मारा वह आतंक से निपटने के चौथे सूत्र का उत्तम उदाहरण है. इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने एक ११ सदस्यीय हिट स्क्वाड भेज कर दुबई में मुहम्मद-अल-मभौह कि हत्या करा दी. अल-मभौह हमास का मिलिटरी कमांडर था और इजरायल का 'मोस्ट वांटेड 'आतंकवादी था.वह हमास का संस्थापक सदस्य था और वह इजरायल के सैन्य अधिकारियों और नागरिकों का अपहरण और हत्याओं को अंजाम दे चुका था.इस काण्ड के लिए मोसाद ने ब्रिटिश नागरिकों के पासपोर्ट कि क्लोनिंग की. हत्यारे ब्रिटिश नागरिक बन कर गए और अपने दुश्मन का काम तमाम कर आये.ब्रिटेन में इस मुद्दे पर थोड़ा हंगामा इस बात को लेकर हुआ कि मोसाद को ब्रिटिश पासपोर्ट की क्लोनिंग करने की बजाय हमेशा की तरह फर्जी पासपोर्ट का इस्तेमाल करना चाहिए था. यूरोप और अमेरिका ने मान लिया कि इजरायली अपने दुश्मन की हत्या कहीं भी, किसी भी तरीके से करने के लिए स्वतंत्र है. वैसे भी ९/११ के बाद विश्व जनमानस इन विषयों को तूल देने के लिए तैयार नहीं है.
हर देश अपने दुश्मन देश के खिलाफ खुफिया ऑपरेशन को अंजाम देता रहा है.पाकिस्तान तो शुरू से ही इस नीति का अमल करता है. १९६० के दशक में पाकिस्तान ने जब मिजो और नागा आतंकियों की मदद शुरू की तो इंदिरा गांधी ने उसी दांव से बांग्लादेश को तोड़ कर ईंट का जवाब पत्थर से देने का काम किया था. इस सत्कार्य के लिए इंदिराजी का समर्थन पूरे देश ने किया था। इस देश के विपक्ष ने उन्हें 'माँ दुर्गा 'की उपाधि दी थी. खालिस्तान समर्थकों को हर संभव मदद जिया-उल-हक ने मुहैया कराई. जब जिया-उल-हक ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को जेल की सलाखों में ठेल दिया और कालान्तर में उन्हें फांसी दी तो भुट्टो परिवार की सबसे ज्यादा मदद भारत ने खुद दी और अफगानिस्तान से दिलवाई. लेकिन बेनजीर भुट्टो जैसे १९८० के दशक के आखिरी दिनों में पाकिस्तानी सत्ता में आयीं तो भारत के उस उपकार का बदला कश्मीर में आतंकियों की फ़ौज भेज कर उतारा. भुट्टो परिवार की बजाय अगर भारत सरकार ने सिंध और बलूचिस्तान में खुफिया ऑपरेशन कर वहाँ के अलगाववादियों की मदद की होती तो पाकिस्तान के अब तक एक-दो टुकडे और हो गए होते.
हम आज भी कानूनी मार्ग से ही आतंकवाद से लड़ रहे हैं. हम इंतज़ार करते हैं कि हाफ़िज़ सईद के खिलाफ पाकिस्तान कार्रवाई करेगा. हम दाऊद इब्राहीम के प्रत्यर्पण की मांग करते हैं. ओमर शेख़ और मसूद अजहर को हम कंधार तक छोड़ आते हैं. मसूद अजहर जब कंधार से पाकिस्तान पहुंचता है तो उसका भव्य स्वागत होता है. बावजूद इसके पाकिस्तान मसूद अजहर के खिलाफ भारत से सबूत मांगता है. हम भी सबूत जमा कर पाकिस्तान को विभिन्न वार्ताओं के दौरान पेश करते रहते हैं. आप फर्ज करें कि कोई अजहर मसूद इजरायल या अमेरिका के किसी विमान का अपहरण कर ले और पाकिस्तान में उसका सार्वजनिक सत्कार हो जाए तो वे क्या करेंगे? वे लोग मसूद को तो मारते ही मारते स्वागत करने वाले भी किसी कब्र में दफ़न हो चुके होते. आज भी अमेरिका तालिबानियों के खिलाफ सीक्रेट ऑपरेशन करता रहता है. एक ग्रुप के खिलाफ दूसरे ग्रुप की मदद की जाती है. बैतुल्ला मसूद को मारने के लिए उसके रिश्तेदारों को भी खरीदा जाता है. पाकिस्तान में अगर 'रॉ' सीक्रेट ऑपरेशन चलाए तो उसे निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी लेकिन हम तो 'गुजराल डाक्ट्रिन' में उलझे पड़े हैं. जब इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमन्त्री बने तो उन्होंने 'रा' के ऑपरेशन रुकवा दिए थे. आज भी नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर, बलूचिस्तान और सिंध में ऐसे कई ग्रुप हैं जो पाकिस्तानी जेहादियों को निपटाने के लिए भारत से मदद की दरकार रखते हैं. पर भारत सरकार जबानी जमाखर्च के अलावा कुछ और करने के लिए राजी नहीं.
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
keep it up
भुट्टो परिवार की बजाय अगर भारत सरकार ने सिंध और बलूचिस्तान में खुफिया ऑपरेशन कर वहाँ के अलगाववादियों की मदद की होती तो पाकिस्तान के अब तक एक-दो टुकडे और हो गए होते.
very good point excellent
अभी हाल में ही मुम्बई के आतंकवाद से बचाव और समाधान के एक सेमिनार में मैंने यही बात कही और कहा की दुनिया को आतंकियों के अड्डे दिखाने और रिरियाने के बजाय भारत को उन्हें मिसाईलों से नष्ट कर देना चाहिए.मेरे साथ पैनल में शिरकत कर रहे एक अति महत्वपूर्ण भूतपूर्व संपादक और स्तम्भ लेखक पत्रकार ने मुझे ही ' आतंकवादी ' करार कर दिया !
कब हम बदलेंगे ? या फिर गुलाम होंगे ?
आपके विचार विवेक और सहस दोनों पर खरे उतरते हैं.
lekin jo raste aapne sujhaye hain use amal me laane ke liye ek majbut icchashakti wale PM ka hona jaruri hai bharat me. aur "is tarah ki majbut icchashakti" wali PM shayad indirajee hi aakhiri thi bharat me, ab tak ke itihas aur vartmaan me.
baki aage dekhiye kya hota hai...
aapko aur aapki kalam ko naman
Post your comment