सऊदी से क्यों करते हो कश्मीर का सौदा?
प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह हज़रत मोहम्मद साहब के जन्मदिन के अवसर पर सउदी अरब के दरबार में भारत में जारी पाकिस्तानी जेहादी युद्ध में अमन बरपाने की गुहार लगाकर लौट आये हैं. जब से केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्तानशीं हुई है तबसे लगातार हमारा वैश्विक मंच पर व्यवहार एक हताश राष्ट्र की तरह रहा है.
हम महाशक्ति होने का निर्वीर्य दर्प जरूर पालते हैं पर हमारे बर्ताव में आत्मविश्वास की कमी साफ-साफ़ झलकती है. डॉ. सिंह की सऊदी यात्रा के पहले, उसके दौरान और उस दौरे के पश्चात की घटनाएँ और बयान यही साबित कर रहे हैं. डॉ. सिंह की यात्रा के पूर्व पाकिस्तान के विदेश सचिव भारत यात्रा पर आये. उस यात्रा के दौरान आतंकवाद पर पाकिस्तान का रुख नरम रखने की बजाय वे हमसे आतंकवाद पर उपदेश न देने की गुर्राहट भरी सलाह दे गए. हालांकि उनकी गुर्राने की अदा पर उन्हें औकात में रहने का इशारा दिया जाना जरूरी था. फिर भी हमारी विदेश सचिव निरूपमा राव पता नहीं किस दबाव में संकोच भरे भाव का प्रदर्शन करती रहीं. पाकिस्तानी सचिव की गुर्राहट से ज्यादा नपुंसकता हमारे विदेश नीतिकारों ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को दिल्ली में पाकिस्तानी सचिव से मुलाक़ात की खुली अनुमति प्रदान करके की. यदि पाकिस्तान के किसी अधिकारी को कश्मीरी नेताओं से मिलने देना था तो वे तो वही नेता हो सकते हैं जो भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास व्यक्त करते आये हैं. इस मापदंड पर फारूख अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद, महबूबा मुफ्ती, गुलाब नबी आज़ाद, सैफुद्दीन सोज़, कर्ण सिंह, भीम सिंह आदि नेता हो सकते हैं.भारत आकर पाकिस्तानी विदेश सचिव अलगाववादी हुर्रियत नेताओं से मिलता है. लेकिन आप कल्पना करें कि निरुपमा राव पाकिस्तान यात्रा पर जाएँ तो क्या पाकिस्तान उन्हें इस्लामाबाद में बलूच अलगाववादी नेताओं से मिलने देगा? यदि वैश्विक दबाव के चलते किसी बलूच नेता को निरुपमा राव इस्लामाबाद निमंत्रित भी कर लें तो पाकिस्तान उन्हें बलूचिस्तान से इस्लामाबाद पहुँचने नहीं देगा. इसलिए सवाल भारतीय प्रशासन से है. हमने गिलानियों जैसे गलिच्छ नेताओं को दिल्ली पहुँचने ही क्यों दिया? और वे पहुँचने के बाद अब तक ज़िंदा क्यों हैं? जब हम कश्मीर पर इतनी ढीली नीति अपनाएंगे तो विश्व मंच पर कोई कैसे विश्वास करेगा कि कश्मीर भारत का अंदरूनी हिस्सा है?
श्रीमती सोनिया गाँधी और १०,जनपथ के पण्डे पुजारी मानते हैं कि नरसिंह राव बड़े कमजोर प्रधानमंत्री थे। युवा राहुल चुनावों के समय दावा करते घूम रहे थे कि अगर उनके स्वर्गीय पिताजी यानी राजिव गाँधी ज़िंदा होते बाबरी मस्जिद नहीं गिरने पाती. राहुलजी, याद कीजिये कि कमजोर नरसिंह राव के समय भी इस देश की संसद में प्रस्ताव आया था कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर समेत अखंड कश्मीर भारत का अंदरूनी हिस्सा है और संप्रभु भारत उसे लेने के लिए कृतसंकल्प है. संसद में यह प्रस्ताव सर्वमत से पारित हो चुका है. कमजोर नरसिंह राव भी कश्मीर पर अड़ रहे थे आपके मजबूत डॉ. मनमोहन जब आतंकवाद पर पूरा विश्व जनमत पाकिस्तान के खिलाफ है तब भी आतंकवाद पर सीधी बात करने के लिए विवश करने की बजाय याचना की मुद्रा में खड़े हैं. हमारे विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर तो ऐसी हरकतें कर रहे हैं जैसे वे भारतीय समुदाय की बजाय "ट्विट्टर' समुदाय के प्रति शपथबद्ध हों.
डॉ. मनमोहन सिंह सऊदी अरब गए वहाँ तेल के भाव कम कराने पर वार्ता करने की बजाय पाकिस्तानी आतंक से बचने के लिए त्राहिमाम करते नजर आये. सऊदी अरब पिछले ३ दशकों से अखिल इस्लामी राजनीति का खलीफा देश है. अमेरिका १९७१ के बाद से लगातार भारत की बजाय पाकिस्तान का पक्ष लेता रहा है उसमें पाकिस्तानी कूटनीति की बजाय सऊदी धनशक्ति का ज्यादा योगदान है. 'इस्लामी बम' की माँ भले ही पाकिस्तान हो पर उसका बाप निश्चित तौर पर सऊदी अरब है. जेहाद का हरामी बच्चा चाहे जिस हरम में पलता हो उसका बीज डालनेवाला बाप सऊदी अरब है. डॉ. मनमोहन सिंह हो न हो अपनी सऊदी यात्रा के पहले बिना किसी शर्त के पाकिस्तान से वार्ता के लिए आतुर थे,तभी उन्होंने अलगावादी कश्मीरी नेताओं को दिल्ली आकर पाकिस्तानी विदेश सचिव से मिलने की अनुमति दी. सऊदी अरब जाने से पहले सोची समझी रन नीति के तहत शशि थरूर से सऊदी मध्यस्थता वाला सुर छिड़वाया. बावजूद इसके सऊदी का रुख वही रहा जो एक गो ह्त्या निषेध के उपदेश या गुहार पर एक खूंखार कसाई का होता है.
विशेष सीरीज : सऊदी-भारत-पाक संबंध का सच और संभावना-१
सऊदी अरब वह देश है जो जिहाद की विचारधारा के पोषण के बल पर अपनी चौधराहट चलता है. उसने अमेरिकी दबाव की कभी परवाह नहीं की तो भारतीय गुहार पर क्यों गंभीर होने लगा? सऊदी अरब जब तक समर्थ रहेगा वह आतंकवाद का पोषण करेगा. इसके पीछे इस्लामी सियासत की मजबूरी है. हमें इस तथ्य को समझाने के लिए सऊदी अरब का संक्षिप्त इतिहास समझना होगा.
सऊदी साम्राज्य का जन्म सऊद परिवार और वहाँ के वहाबी फिरके के समझौते का परिणाम है. वर्तमान शासक घराने के संस्थापक मोहम्मद इब्न सऊद ने अठारहवीं सदी के दौरान कट्टरवादी वहाब पंथ के कर्ताधर्ताओं से समन्वय स्थापित कर २०० वर्षों के शासनकाल में पूरे सऊदी साम्राज्य पर कब्जा जमा लिया. इस्लामी शुद्धता के नाम पर वहाबियों और सऊद परिवार ने मक्का और मदीना पर भी कब्जा जमा लिया. सऊदी शासकों की मदद में कुरान के आधार पर कट्टर इस्लाम का पालन अरब का राजधर्म बन गया. इस्लामी पोलिस ने आवाम को ५ वक़्त की नमाज और औरतों के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया. जो कोई अरब में अपराध करता उसे इस्लामी क़ानून के अनुसार सजा दी जाने लगी. अन्य धर्मों या इस्लामी पंथों के अनुयाइयों के सर कलम करने, पत्थर मारने औए सरे बाज़ार कोड़े मारने की सजा दी जाने लगी. १९७० के दशक तक इस्लाम के अन्य पंथों का भी कुछ प्रभाव होने के चलते कट्टरता में कुछ कमी रही। इसी दौरान सऊदी तेल भंडारों से मिले अकूत धन के बूते वहाबीवाद का प्रचार ही सऊदी किंगडम का मुख्य कार्य हो गया.
१९८० के दशक की शुरुवात की दो घटनाओं ने सऊदी राज्य को जिहाद का धर्मपिता बनाने का मौक़ा उपलब्ध करा दिया. पहली घटना थी शिया बहुल इरान द्वारा खोमैनी के नेतृत्व में अहले-इस्लाम के नेतृत्व का प्रयास.इरान ने इसी समय काबे पर शिया समुदाय के कब्जे के प्रयास को उकसाया,इससे वहाबी जमात की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गयी. अहले-सुन्नत ने वहाबिओं को अपना नेता कबूल करने में संकोच नहीं किया. इसी दौरान अफगानिस्तान में सोविएत कार्रवाई ने सऊदी अरब को जनरल जिया-उल-हक पर कृपा कर पाकिस्तान में जिहाद की खेती के लिए अमेरिकी प्रश्रय से खेती के लिए जमीन उपलब्ध करा दी. १९७५ के बाद वैश्विक स्तर पर इरानी नेतृत्व को समाप्त करने के लिए सऊदी अरब दुनिया बहर में वहाबिवाद के प्रचार पर पानी की तरह पेट्रो डालर बहाने लगा. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. का मत है कि १९७५ से २००१ के बीच सऊदी अरब ने वहाबीवाद के प्रचार पर लगभग ७० बिलियन डॉलर की रकम खर्च की. इस राशि का दो-तिहाई हिस्सा मस्जिद-निर्माण, मदरसों के निर्माण, वहाबी केन्द्रों के निर्माण और संचालन पर खर्च हुआ. सऊदी प्रचार का बजट कोल्डवार के चरम के दिनों में सोवियत बजट की तुलना में कई गुना होने के तथ्य को सी.आई.ए. के सलाहकार अलेक्स अलेक्सिएव भी कबूलते हैं. एक सऊदी साप्ताहिक' एन अल-यकीन ' का दावा था कि इस दौरान गैर इस्लामी मुल्कों में लगभग १५०० मस्जिदों, २१० इस्लामिक केन्द्रों, २०२ इस्लामी कॉलेजों और २००० मदरसों के निर्माण कराये गए. यह सारा काम चैरिटी के नाम पर सऊदी शासक परिवार और वहाँ के मजहबी नेताओं द्वारा संचालित 'मुस्लिम वर्ल्ड लीग' जैसी संस्थाओं के माध्यम से हुए. इंटरनेशनल इस्लामी रिलीफ ओर्गानिज़शन (ईरो) जैसी संस्था भी मुस्लिम वर्ल्ड लीग की ही सहयोगी संस्था है. ईरो ने अकेले इंडोनेशिया में ५७५ वहाबी मस्जिदों का निर्माण किया. सऊदी इस्लामी नेता केवल वहाबीवाद का प्रचार करते दुनिया में किसी को कोई आपत्ति नहीं होती,वहाबी प्रचारक जिहादिओं के लिए चन्दा जमा करने के फ्रंट बन कर खड़े हो गए.
अल-कैदा के नाम से वहाबी फंड जमा होने की प्रक्रिया १९८८ से प्रारम्भ हो गयी थी. संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की २००२ की रिपोर्ट में कहा गया कि सऊदी चैरिटी संस्थाओं और निजी दानदाताओं ने अल-कैदा को ३०० से ५०० मिलियन डालर की रकम चंदे के रूप में दी थी. ओसामा-बिन-लादेन केवल धर्म युद्ध का योद्धा भर नहीं है, बल्कि वह अधर्मी चंदे का सबसे बड़ा धन्धेबाज भी है. अफगान धरती पर सोवियत सेना से लड़ने के लिए मुजाहिदीनों को लगभग ३.५ बिलियन डालर की रकम मिली थी. इसी जिहाद ने दुनिया भर के इस्लामी लड़ाकों को पहली बार एक मंच पर ला दिया. अफगानिस्तान में मुजाहिदीन युद्ध के दौरान मुलिम वर्ल्ड लीग के पेशावर (पाकिस्तान) स्थित मुख्यालय का संचालन ओसामा का गुरु अब्दुल्ला आज़म कर रहा था. उसे पेशावर में सहयोग दे रहा था अल-कैदा की स्थापना में ओसामा का साथ देनेवाला वैल जुलैदन. जब अमेरिका में ९/११ की घटना हुई और अल-कैदा के खिलाफ विश्वव्यापी अमेरिकी अभियान छिड़ा तो सी.आई.ए. को बोस्निया के लिए चन्दा जमा करने की एक मीटिंग का मिनट बुक मिला जिसमें ईरो, मुस्लिम वर्ल्ड और सऊदी की रेड क्रेस्सेंट सोसाइटी के लैटर हेड पर बिन लादेन और जुलैदन के हाथ से लिखे पेपर मिले. जब सोवियत सेना ने अफगानिस्तान छोड़ दिया तो बिन लादेन ने भी अपना मुख्यालय सूडान में बना लिया. अफगानिस्तान में लड़ने वाले अरबों के प्रति इस समय तक विश्वव्यापी समर्थन खडा हो चुका था. सऊदी अरब के शासकों ने सोचा कि यदि इन लड़ाकों को कहीं लगाया नहीं गया तो वे उनकी सत्ता के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा सकते हैं. इसलिए अरब ने फिर से अहले इस्लाम की सुरक्षा का बीड़ा उठाने का ऐलान कर दिया.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
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kabhi saudi arab gaye ho?
kabhi sudaan gaye ho?
mumbai ke alavaa india me hi kabhi kashmir gaye ho?
ye sab batao pahle, haank to aise rahe ho jaise khud hi saudi se lekar USA tak saamne hi rahe ho saari baton ke....
i appreciate and respect your sentiment and writing skill.i hope in future whatever you will write that will be exclucive for reader and cntr gov. will be consider there policy.
excellent.thanks for excellent writing.
और हॉँ कहानियाँ बढिया लिख लेता है ।
लेख को चटपटा बनाने को और अपना अखबार बेचने के लिऐ बूढा गुन्डा और उसके चमचे नई नई स्टोरी बनाते हैँ ।
वैसे हिन्दी से घ्रणा करने वाले ठोकरी (ठाकरी) हिन्दी लेख की भूल कैसे कर बैठे
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