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इस्लामी आतंक को सऊदी धन और समर्थन

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सऊदी द्वारा अहले इस्लाम की सुरक्षा के अपने संकल्प के साथ ही सऊदी अरब के सभी मस्जिदों, मदरसों, सुपर मार्केट्स में जकात के लिए बड़े-बड़े डब्बे लगा दिए गये. अल्जीरिया, बोस्निया, गज़ा और कश्मीर में जेहाद के लिए करोड़ों डालर जमा होने लगा. सऊदी चैरिटी में धन आ रहा था मदरसे खोलने, यतीमखाने बनवाने और अस्पताल बनवाने के लिए. पर वह धन असल में कहाँ खर्च हो रहा था इस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं था.

१९९४ में फ्रेंच आतंरिक सुरक्षा मंत्रालय ने शिकायत की कि सऊदी फंड का उपयोग अल्जीरिया के आतंकी संगठन कर रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी शिकायत की कि सऊदी धन से हमास मध्य-पूर्व के शान्ति अभियान को क्षति पहुंचा रहा है. फिलिप्पींस से आये समाचार ने पूरे पश्चिमी जगत को चौंका दिया. अल-कायदा द्वारा तैयार एक हत्याकाण्ड के पर्दाफ़ाश से ज्ञात हुआ कि सऊदी धन से पोप की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था. एक अमेरिकी एयरलाइंस के विमान को भी उड़ाने का प्रयास किया गया था. इस मामले की जांच में आगे ईरो की भूमिका नजर आई. उस समय ओसामा का रिश्तेदार मुहम्माद जमाल खलीफा ईरो का निदेशक था और वह अबू सय्याफ और मोरो इस्लामिक लिबरेशन फ्रंट  को आर्थिक मदद पहुंचा रहा था. अकेले १९९४ में सऊदी चैरिटी ने बोस्निया के इस्लामी लड़ाकुओं को १५० मिलियन डॉलर की मदद की थी. इसी दौरान अल-इस्लामिया के प्रमुख शेख उमर अब्दुल रहमान ने संयुक्त राष्ट्र के न्यूयार्क स्थित मुख्यालय को उड़ाने का षड्यंत्र तैयार किया. बाद में रहमान पकड़ा गया और उसे आजीवन कारावास की सजा मिली.

सी.आई.ए. की १९९६ की एक रिपोर्ट दावा करती है कि एजेंसी ने सऊदी के ऐसे ५० चैरिटी संस्थाओं की शिनाख्त की थी जो आतंकवाद को मदद पहुंचाने का काम कर रहे थे. सऊदी हाई कमीशन में काम कर रहे कुछ देशों में तैनात अधिकारी भी इस तरह की गतिविधिओं में संलिप्त पाए गए थे. चैरिटी संस्थाएं आतंकवादिओं के लिए सुरक्षित निवास, फर्जी परिचय पत्र, यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में भी सहायक साबित हो रहे थे. १९९० के दशक में मुस्लिम वर्ल्ड लीग के ३० देशों में शाखाएं खुल गयी थीं जबकि ईरो ने ९० देशों में अपना सांगठनिक विस्तार कर लिया था. सी.आई.ए. ने पाया कि ईरो अफगानिस्तान में आतंकवादिओं के ६ प्रशिक्षण शिविरों का खर्च वहन कर रहा था. रियाद ने खुलकर काबुल में तालिबान को मान्यता दे रखी थी. इसका मूल कारण था तालिबान की वहाबीवाद से वैचारिक निकटता. पकिस्तान सतही मुस्लिम वर्ल्ड लीग के ऑफिस से अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान के लिए खुले तौर पर हथियारों की आपूर्ति हो रही थी. पश्चिमी देश जिसे चैरिटी परिभाषित कर रहे थे, इस्लामी जगत की चैरिटी का उससे कोई लेना-देना नहीं था. मुस्लिम वर्ल्ड लीग और ईरो का प्रमुख उन दिनों सऊदी अरब के बड़े मुफ्ती हुआ करते थे. बड़े मुफ्ती सऊदी अरब के सबसे बड़े मजहबी अधिकारी हुआ करते हैं. बाद में अब्दुल्ला अल तुर्की को मुस्लिम वर्ल्ड लीग का सचिव बनाया गया था जो कभी सऊदी के मजहबी मामलों के मंत्री थे. मुस्लिम वर्ल्ड लीग और ईरो सऊदी अरब सरकार द्वारा शत-प्रतिशत आर्थिक अनुदान पाते रहे हैं.

१९९६ में लादेन फिर सूडान से अफगानिस्तान चला आया. उसे आतंकवाद को आर्थिक मदद पहुंचाने के बदले तालिबान ने सुरक्षा प्रदान कर दी. यहाँ पहुँच कर लादेन ने अमेरिका विरोधी रुख अख्तियार कर लिया. दरअसल लादेन चाहता था कि सऊदी शेख मक्का और मदीने की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसे सौंप दें . अमेरिका ने सऊदी राज परिवार को समझा दिया कि ऐसा करने से सऊदी साम्राज्य पर उस परिवार की पकड़ ढीली पड़ जायेगी.इसी मुद्दे पर लादेन का शासक परिवार से मतभेद हुआऔर लादेन सूडान चला गया. सूडान से भी उसे अमेरिकी और सऊदी दबाव के चलते हटना पडा, इसलिए लादेन अमेरिका को सबक सिखाने की तैयारी करने लगा. १९९६ में लादेन ने पहली बार फतवा जारी किया, हालांकि इस फतवे को उस समय व्यापक प्रचार नहीं मिल पाया. वैसे सी.आई.ए. ने लादेन की गतिविधिओं पर नजर रखने के लिए एक विशेष दस्ता तैनात कर रखा था. इसी दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने कुछ टेलीफोन टेप किये जिससे ज्ञात हुआ कि सऊदी शाही परिवार के लोग आतंकवादिओं से सम्बन्ध रखे हुए थे. सऊदी के शाही परिवार में लगभग ७००० सदस्य हैं. इसमें अधिकाँश अमीर व्यापारी हैं. अमेरिकी अफसरों ने पाया कि देश के अधिकाँश अमीर आतंकी गतिविधिओं को आर्थिक मदद पहुंचा रहे थे. यदि अमेरिकी इस तरह के सबूत किसी अन्य देश के खिलाफ पा जाते तो वे पूरी दुनिया सिर पर उठा लेते, लेकिन अब तक उन्हें ९/११ का झटका नहीं लगा था.

वैश्विक आतंकवाद में तब तक हर साल एकाध दर्जन अमेरिकी मारे जा रहे थे पर इससे अमेरिकी भयभीत नहीं हुए थे. बोस्निया, कश्मीर, गाज़ा पट्टी में आतंकवाद से अमेरिका का क्या नुक्सान? वाशिंगटन का प्रभावशाली तबका इसे तीसरे देशों की समस्या मान रहा था. अमेरिकी खुफिया अजेंसिओं में बैठे आला अफसर अभी तक कोल्ड वार की खुमारी से मुक्त नहीं हुए थे, वे सोविएत प्रणाली के विशेषज्ञ थे,उन्हें इस्लामी आतंकवाद की विशेषग्यता हासिल नहीं थी. मध्य पूर्व में अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के तत्कालीन प्रमुख पट लंग ने लिखा है कि उन दिनों अमेरिकी प्रतिशान के लिए इस्लामी जेहादी मंगल ग्रह के प्राणी नजर आते थे. पेंटागन के तत्कालीन आतंक विरोधी इकाई के प्रमुख पीटर प्रोब्स्त ने लिखा है कि 'जब कभी हम यह मुद्दा उठाते थे तो लोग हम पर हंस दिया करते थे.' सी.आई.ए. उस समय सऊदी के प्रति कितनी उदार थी इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उन दिनों सऊदी गतिविधयों के खिलाफ कोई भी रपोर्ट फाइल करने के लिए ५ स्टारों से मंजूरी प्राप्त करनी होती थी,तिस पर भी अधिकाँश मामलों में मंजूरी नकार दी जाती थी. इस मामले में एफ.बी.आई. का रिकॉर्ड सी.आई.ए. की तुलना में थोड़ा बेहतर था. एफ.बी.आई. ने शिकागो के एक आतंकी फंड रेजिंग अभियान की जांच में पाया कि आतंकियों ने एक केमिकल फर्म से १.२ मिलियन डालर की लूट की थी. यह धन बाद में हमास को भेजा गया था.

इसी दौरान पाया गया कि ईरो को सऊदी संस्थाओं के माध्यम से आतंकी गतिविधिओं के लिए धन प्राप्त हुआ था. उस मामले के जांच-कर्ता मार्क ने बाद में कबूल किया कि इस जांच को आगे न बढ़ाया जाए क्योंकि इससे सऊदी नाराज होंगे. सी.आई.ए. के एक जासूस बॉब बैर ने बाद में अपनी किताब 'स्लीपिंग विथ डेविल:हाउ वाशिंगटन सोल्ड आवर सोल फॉर सऊदी क्रूड' में लिखा कि सऊदी शेखों ने अमेरिकिओं को सीधा सन्देश दे रखा था कि जो चाहे ले लो हमारी ओर अपनी नजरें मत रखो. जो सऊदी कारगुजारिओं पर अपनी आँखें और जुबान बंद रखेगा. उसका पूरा ख़याल रखा जाएगा. पूर्व कैबिनेट सचिवों, राजदूतों, सी.आई.ए. के स्टेशन प्रमुखों पर सऊदी ने जमकर पेट्रो डालर बरसा दिया. सऊदी शासकों ने अमेरिकी वकीलों, जनसंपर्क संस्थाओं, अनुसंधान संस्थानों, पुस्तकालयों को भी आर्थिक लाभ पहुंचाकर चुप कर दिया. केनेडी सेंटर से लेकर राष्ट्रपति के पुस्तकालय तक सिर्फ सऊदी के गुणगान के साहित्य उपलब्ध थे. प्रख्यात कार्लाइल समूह तो सऊदी धन से ही इतना आगे बढ़ा. कार्लाइल ग्रुप के छोटी के सलाहकारों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति एच.डब्ल्यू.बुश, जेम्स बेकर, फ्रांक कार्लुच्ची जैसे लोग शामिल रहे हैं. इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था अमेरिका में सऊदियों ने ६०० बिलियन डालर का निवेश कर रखा था. इसी के चलते सऊदी शासन लादेन के बारे में अमेरिका द्वारा मांगी जानेवाली जानकारियाँ देने से साफ़ मुकर जाता था. फिर भी अमेरिकी चुप रहने में ही अपनी भलाई मानते थे. १९९६ में हिजबुल्लाह ने धहरान के खोबर टावर्स में ट्रक बम फोड़ कर १९ अमेरिकिओं की हत्या कर दी थी. सऊदियों ने इस मामले की जाँच से एफ.बी.आई. को जबरन बाहर कर दिया. सी.आई.ए. ने अपने रियाद स्थित स्टेशन प्रमुख को इस जांच से दूर रहने का निर्देश भेजा. सऊदी कहीं नाराज न हो जाएँ इसके लिए उन्हें इस्लामी आतंकवाद पर खुफिया जानकारी जमा करने से भी रोक दिया गया.

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ghakki on 04 March, 2010 23:23;05
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shukul ji isme bharat pak ka jikar nahi hai phir heading kyo di???
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Jabbar Patel on 06 March, 2010 02:36;14
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गहन विश्लेषण. आखिर अरब एनी मुस्लिम मुल्को को कहाँ ले जाकर खडा करना चाहता है?? अरबो के इस खूंखार जेहाद से भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान का मुसलमान क्या पाएगा? इसके बावजूद भारत जैसे मुल्को में जेहाद की पैरवी करनेवाले मानवाधिकारवादी, सेकुलर और बिके हुए मीडियाकर्मी और सेलिब्रिटी मिल ही जायेंगे.
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मिहिरभोज on 06 March, 2010 12:06;35
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शुक्ल जी हमेशा की तरह विचारणीय लेख है आपका....पर हमारी सरकार फिर भी सऊदी सरकार के तलुए चाटने मैं लगी है....इस्लाम को दरअसल इन लोगों ने ही बदनाम कर रखा है....ये बात हमारे सैक्यूलर वादियों को भी समझ आनी चाहिये..799783
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देव on 05 April, 2010 14:48;00
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एक और मनगढँत कहानी .
लगे रहो शुक्ला कौन पूछने जा रहा है सीमा पार

मिहिरभोज जी
और हिन्दू धर्म को इन अधर्मी ठाकरोँ और उसके मुर्गोँ ने बदनाम कर रखा है
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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