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डेविड हेडली का हेडेक

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डेविड कोलमन हेडली के मुद्दे पर दुनिया के समक्ष भारत की ऐसी-तैसी हो गयी है. बावजूद इसके भारत सरकार, अधिकारी और मीडिया का एक हिस्सा इसे भारत पर अमेरिकी उपकार साबित कराने पर उतारू है. हमारे गृह सचिव जी.के. पिल्लई कहते हैं कि हम भले ही २६/११ के मामले में हेडली को प्रत्यर्पित करने के मामले में विफल रहे लेकिन अन्य मामलों में उसका प्रत्यर्पण संभव है.

२६/११ के अलावा हेडली के खिलाफ और दूसरा मामला कौन सा है? गृह मंत्री पी. चिदम्बरम का बयान आया कि हम हेडली के मामले में अपना प्रयास जारी रखेंगे. लेकिन कौन से प्रयास, कब तक और कैसे? आप कल्पना करें कि ९/११ के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के हमलों के मामले में कोई हिंदुस्थानी ठीक वही भूमिका निभाता जो २६/११ के मामले में हेडली ने निभाया,आप कल्पना कर सकते हैं कि हिन्दुस्थान में साम्यवादिओं की अमेरिका वरोधी सरकार के सत्तारूढ़ रहते हुए भी क्या हम उस अभियुक्त के प्रत्यर्पण को हिंदुस्थानी कानूनों का हवाला  देकर अमेरिका को टाल सकते थे?

अमेरिका तत्काल हमें आतंक वाद के खिलाफ जारी युद्ध में असहयोग का आरोप लगाकर दुनिया के समक्ष नंगा कर देता. हमारे खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए जाते. हमारी मीडिया की मुख्य धारा के अखबार तक हेडली के मामले में अमेरिकी शरारत पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से बच रहे हैं. 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' जैसे अखबार के 'विद्वान' समझा रहे हैं कि पहली बार किसी अमरीकी अदालत में लश्कर-इ-तोइबा का अल-कैदा से सम्बन्ध स्थापित हुआ है. अब इन 'विद्वानों 'को कौन समझाए कि २००३ में तोइबा की गतिविधियों से सम्बंधित कई लोग अमेरिका में गिरफ्तार हुए थे. तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के जमाने में तोइबा से संपर्क रखने के चलते कई अमेरिकी और पाकिस्तानी धरे गए थे और कईयों के खिलाफ अमेरिकी अदालतों में मुकद्दमे चले. कुछ लोगों पर अमेरिकी धरती से भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के मामले भी चलाये गए. ये 'विद्वान' तर्क दे रहे हैं कि अमेरिका में रह कर हेडली पर हमेशा मृत्यु दंड का ख़तरा मंडराता रहेगा. इन 'विद्वानों' को कौन समझाए कि अमेरिका में एक बार 'अपराध कबूलने' की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद नया मामला नहीं चलाया जा सकता. जोर-शोर से गृह मंत्रालय प्रचारित कर रहा है कि अब भी भारत के पास हेडली से पूछताछ करने का अधिकार है. गृहमंत्री यह बताने के लिए राजी नहीं कि हेडली से भारतीय अधिकारी क्या पूछेंगे? उन सवालों की सूची अमेरिकी अधिकारिओं को पहले सौंपनी होगी. अमेरिकी अधिकारी यह तय करेंगे कि भारतीय अधिकारी अमेरिकी कस्टडी में कौन सा सवाल पूछें. क्या ऐसी स्थिति में हेडली से कुछ हम हासिल कर सकते हैं. हेडली पर अमेरिकी पक्ष के पैरोकार बारम्बार कहते हैं कि इससे तोइबा के खिलाफ अमेरिका हिन्दुस्थान के पक्ष में आ जाएगा. इन सब से पूछा जाना चाहिए कि क्या अमेरिका प्रोफ़ेसर मोहम्मद हाफ़िज़ सईद को हमारे हवाले कर देगा? यदि हम हाफ़िज़ सईद को पा जाएँ तो हेडली को भुलाया जा सकता है.

हेडली को खो देने से क्या बिगड़ गया? हमारे पास तो अफज़ल गुरु भी है,उसे सर्वोच्च न्यायालय तक ने फांसी की सजा सुना रखी है.मुस्लमों के तुष्टिकरण के चलते उसकी सजा को गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति भवन के बीच लटकाए रखने में कोई अमरीकी भूमिका  तो नहीं न है.अफज़ल गुरु पर हमारी ढील ने निश्चित तौर पर अमेरिका समेत सारी दुनिया  को आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई में नरमी बरतने का प्रमाण दिया है. इसी के चलते अमेरिका समझ गया है कि हम हेडली पर कुछ नहीं बोल पायेंगे. हेडली यदि हमारे हाथ लग जाता तो २६/११ की घटना में पाकिस्तानी भूमिका को स्पष्ट करने में आसानी होती.आप फर्ज करें कि अजमल कसब मुंबई पुलिस के हाथ नहीं लगता तो क्या पूरी दुनिया पाकिस्ताम की २६/११ में भूमिका को साफ़ तौर पर स्वीकारती? अजमल कसब २६/११ के हमलों का एक पैदल सिपाही है. हेडली उस हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाला योजनाकार. १९९३ के बमकांड में जो भूमिका टाइगर मेमन और दाऊद इब्राहिम की रही है उस तरह की भूमिका हेडली ने २६/११ में निभाई है. हम अमेरिकी अदालतों में अमेरिकी एजेंसी एफ.बी.आई. द्वारा दायर शपथपत्र के आधार पर ही बात करें तो यह तय है कि १. हेडली ३१३ ब्रिगेड के इलियास कश्मीरी का साथी है. इलियास कश्मीरी अल-कैदा के प्रमुख ओसामा-बिन-लादेन का करीबी  रह चुका है.इलियास ने बीच के दिनों में आई.पी.एल. और राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आतंकी हमले की धमकी दी थी. २००९ के  शुरुआती दिनों में इलियास और हेडली मिले थे. २. हेडली तोइबा के कई पदाधिकारिओं को जानता था. अमेरिका ने निश्चित तौर पर इन पदाधिकारों के नाम ज्ञात कर लिए होंगे, लेकिन उनके बारे में आजतक हिन्दुस्थान को नहीं बताया है. हेडली पाकिस्तानी सेना के तमाम वर्तमान और पूर्व अधिकारिओं के संपर्क में रहा है .इन अधिकारिओं के बारे में हमें अवगत होना चाहिए. ४.हेडली ने भारत दौरों के समय तरह-तरह के लोगों से संपर्क बनाए होंगे। ऐसे लोगों की सूची हमारे पास होनी चाहिए. ५.भारतीय में मौजूद स्लीपर सेल्स की भी जानकारी हेडली से मिल सकती है. यदि एफ़्बीआयी ने समय रहते हमें इन जान्कारिओं से लैस कर दिया होता तो तय था कि पुणे बम काण्ड का हादसा टाला जा सकता  था. हेडली के न आने से हमें इस तरह की क्षति साफ़ तौर पर दिखाई दे रही है ,बावजूद इसके एक राष्ट्र के तौर पर हम अमेरिका के सामने खड़े होने की बजाय बुराई में भलाई इस अंदाज में तलाश रहे हैं मानों हम अमेरिका के कोई उपनिवेश हों.

बीच के दिनों में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमला हुआ,उस समय अमेरिकी अधिकारी होल्ब्रूक ने भारत के हितों के खिलाफ बयानबाजी की। उस मुद्दे पर भी हमारे राजनयिक मौन रहे. अफ-पाक मुद्दे पर अमेरिका बारम्बार भारतीय हितों पर प्रहार करता पाया गया है. हम जिस अमेरिकी क़ानून की दुहाई पर मौन साध रहे हैं उसी की दबाव नीति का एक उदाहरण हाल ही में सामने आया है. कुछ दिनों पहले अफगानी तालिबान का दूसरे नबर का आतंकी मुल्ला बरदार पाकिस्तान में पकड़ा गया.पाकिसानी आई.एस.आई. के अधिकारी उसे अमेरिकी और अफगान अधिकारिओं को पूछ-ताछ के लिए सौंपने को राजी नहीं थे,अमेरिक ने पाकिस्तान को धमका कर मुल्ला से अलग से पूछ-ताछ की. यह सच है कि डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार में अमेरिका को धमकाने का कलेजा नहीं है,लेकिन उसके विरोध का अधिकार तो है. सवाल पैदा होता है कि हेडली को बचाने के लिए अमेरिकी इतने आमादा क्यों हैं? क्योंकि हेडली डबल नहीं बल्कि चौबल एजेंट है. वह अमेरिकी ड्रग एन्फोर्समेंट एजेंसी, एफबीआई, सीआईए और तोइबा के लिए इकाट्ठे काम करता था. अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि उसके एजेंट के खिलाफ दुनिया के किसी अन्य देश में कोई सबूत हाथ लग जाए. इसलिए हेडली को हिन्दुस्थान के हवाले करना तो दूर उसे कभी पूछताछ के लिए भी भारतीयों के हवाले नहीं किया जाएगा. 'अपराध कबूलने' की प्रक्रिया के चलते अब हेडली के खिलाफ सबूतों को औपचारिक तौर पर अदालत में पेश नहीं किया जाएगा. उसका अदालत में cross -examination नहीं किया जाएगा. २६/११ में मारे गए १६६ लोगों के परिजन उस घटना में हेडली की भूमिका के बारे में विस्तार से पूछ-ताछ के लिए कोई अदालती कार्रवाई नहीं कर पायेंगे. अमेरिकी अजेंसिओं से हेडली के संबंधों की सारी जानकारी बंद फाइलों में सड़ जायेगी. चौथी और इन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हेडली के दो सह अभियुक्त इलियास कश्मीरी और अब्दुर रहमान सय्यद उर्फ़ पाशा भी कानूनी फंदे से बच जायेंगे.इस घटना से निश्चित तौर पर पाकिस्तानी आई.एस.आई. प्रसन्न होगी और पाकिस्तानी सीमा पर ड्रोन हमलों में अमेरिका की मदद जारी रखेगी. अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ भारत के हाथों किसी प्रकार का सबूत क्यों देना चाहेगा?

इस स्थिति में भारत को करना क्या चाहिए? हेडली की एक पूर्व पत्नी उसके साथ भारत आई थी। भारत सरकार को उसके प्रत्यर्पण का प्रयास करना चाहिए. इससे भी पाकिस्तान दबाव में आयेगा. यदि एफबीआई इस मामले में भी असहयोग करे तो साफ़ समझ लेना चाहिए कि वह आईएसआई की मदद के प्रति कहीं ज्यादा संकल्पबद्ध है. दूसरा महत्वपूर्ण विकल्प है कि भारतीय अधिकारी हेडली के साथी तहव्वुर हुसैन राणा से पूछ-ताछ और प्रत्यर्पण का प्रयास करना चाहिए. उसके खिलाफ अमेरिका में हेडली से हटकर अलग मामला दर्ज है। राणा को भी २६/११ के सम्बन्ध में लगभग उतनी ही जानकारी है जितनी हेडली के पास है. बल्कि २६/११ के हमलों के ठीक पहले हेडली की बजाय राणा ही भारत में मौजूद था. एफबीआई का कहना है कि नवम्बर के दूसरे सप्ताह में राणा भारत में था. २१ नवम्बर को वह अमीरात एयरलाइंस की उड़ान से मुंबई से दुबई गया था। २४ नवम्बर को इसी एयरलाइंस की उड़ान से वह दुबई से चीन गया. २६ नवम्बर को असिअना एयर लाइंस से उसने चीन से शिकागो की उड़ान भरी. २१ से २४ नवम्बर के बीच राणा की मुलाक़ात दुबई में पाकिस्तानी सेना के अधिकारी मेजर पाशा से हुयी,जहां से उसने इलियास कश्मीरी से भी बातचीत की. पाशा ने उसे भारत में संभावित हमले पर चर्चा भी कीथी. एफबीआई ने राना और हेडली के बीच भारत में भावी हमलों के सम्बन्ध में एक कार में हुयी बातचीत के सबूत भी अदालत में पेश किये हैं. ऐसे में यदि राणा से पूछताछ का भी अवसर भारत को मिलता है तो वह हेडली से पूछताछ जितना ही महत्वपूर्ण होगा.

हेडली की भारत में कोई रिश्तेदारी नहीं है, लेकिन राणा की ससुराल पक्ष के तमाम रिश्तेदार भारत में हैं. हेडली अमेरिकी नागरिक है, इस नाते अमेरिकी कानूनों के तहत उसे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जबकि राणा कनाडा का नागरिक है इसलिए वह हिन्दुस्थानियों को कम से कम पेंच के साथ उपलब्ध हो सकता है. राणा अमेरिकी खुफिया अजेंसिओं का कोई एजेंट भी नहीं है इसलिए उसके प्रति अमेरिका के मन में कोई असुरक्षा भाव भी नहीं रहेगा. यदि हम राणा को सौंपने की मांग करते हैं तो संभव है अमेरिका अपने किसी कानून अथवा कनाडा से किसी कानूनी पेंच खडा करा दे। उस स्थिति में भारत कम से कम अपनी सही औकात तो समझ लेगा. १९९३ के बमकाण्ड में क्लिंटन प्रशासन ने फोरेंसिक जांच में भारत का सहयोग दिया था, लेकिन जब भी पाकिस्तान के खिलाफ कोई सबूत की बात उठी तो अमेरिका भारत की बजाय पाकिस्तान की मदद पर उतारू रहा. ओबामा भी लगभग उसी नीति पर चल रहे हैं. राणा के मामले पर पहल से मामला साफ़ हो जाएगा.

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kalpesh on 22 March, 2010 17:00;39
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जानकारी अच्छी दी है प्रेम जी। नहीं मामा से तो काना मामा अच्छा। भारत अपने स्तर पर अच्छे से अच्छे प्रयास कर रहा है। प्रत्यर्पण नहीं तो पूछताछ तो हो और उससे सही हम जो हासिल कर सकें वह बेहतर। मेरा तो मानना है कि पूछताछ में भी पहले अमेरिकी एजेंसियों से क्लीनचिट लेनी होगी वही पूछताछ हेडली से भारत कर सकेगा।
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rajesh vikrant on 22 March, 2010 19:24;03
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dhanyavad premji and visfot.Is aisi-taisi kaa shreya ek hi mard? ko jata hai-manmohan singh ko. Is taraha ke vicharottejak lekh ke liye badhai-vikrant
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RAJ SINH on 27 March, 2010 05:05;12
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प्रेम आपका नमन .
सिर्फ इतना जोडूंगा की अमेरिका से ज्यादा स्वार्थी,तिकड़मी ,अवसरवादी और कुटिल प्रशासन दुनियां में कोई नहीं. यह मेरे 2५ साल का अनुभव है .अमेरिका में रह उसकी मानसिकता का कुछ अंदाज़ है.
स्वार्थ के अलावा उसका कोई भी सिद्धांत सिर्फ दिखावा है. संभव है की वह १० जनपथ को , जिसमे हजारों छेद हैं ,ब्लैकमेल भी कर रहा हो .मनमोहन सर्कार तो बस चाकर है.१० जनपथ की भी और अमेरिका की भी.कुछ नहीं होगा .
आप पत्रकारिता धर्म निभा रहे हैं इतना ही क्या कम है ?
राष्ट्रधर्म निभाते रहें .
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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