जम्मू कश्मीर बनाम हिन्दू मुसलमान
आजादी के तत्काल बाद नई दिल्ली आये शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने स्पष्ट शब्दों में कश्मीर की राजनीति और भारतीय संविधान के रिश्ते को उजागर किया था. अब्दुल्ला ने कहा था "कपूरथला, अलवर या भरतपुर में एक भी मुसलमान नहीं है, जबकि ये कभी मुस्लिम बहुमत वाले रजवाड़े हुआ करते थे. कश्मीरी मुसलमानों को इस बात का डर है कि उनके साथ भी कहीं ऐसा ही न हो." इस्लामी कट्टरपंथी नेताओं ने बहुत पहले से इस आशंका पर राजनीति करने की कला विकसित कर ली थी.
सैयद अली शाह गिलानी ने अपने भारत विरोधी अभियान को कुछ इस तरह से अभिव्यक्त किया है- "यह कलमा पढ़ने, नमाज अदा करने, जकात देने तथा हज पर जाने जैसा ही पवित्र कर्म है." श्रीनगर में 27 जून को आयोजित एक सभा में गिलानी ने श्राईन बोर्ड के मसले पर अपने यह विचार रखे थे. उन्होंने पूर्व राज्यपाल एस के सिन्हा पर राज्य के जनसांख्यिकीय चरित्र को बदलने के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए कहा था-" मैं अपने मुल्क (कश्मीर) को आगाह कर रहा हूं कि अगर अब नहीं जागे तो भारत और उसके एजेंट कामयाब रहेंगे और हम अपनी जमीन से हमेशा के लिए बेदखल हो जाएंगे." 20 जून की रैली में हुई सेक्स, हिंसा और अपहरण की घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा-"घाटी में ऐसे अपराधों के बारे में पहले कभी नहीं सुना जाता था. लेकिन जबसे यहां बाहरी लोगों की संख्या बढ़ी है अपराधों में भी इजाफा हो गया है. उन्होंने अपील की कि वे बाहरी लोगों को नौकरी में न आने दें और न ही कश्मीर में रहने के लिए जगह दें. उन्होंने बाहर से आनेवाले प्रवासी मजदूरों से अपील की कि वे घाटी छोड़कर चले जाएं.
गिलानी जो बोल रहे हैं यह भाषा महाराष्ट्र में कुछ हिन्दुवादी नेता भी बोलते रहते हैं. गिलानी के बयान इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच बहुत लंबे समय से कायम इस फोबिया का हिस्सा है कि कश्मीर में उनके अलावा किसी को भी जगह नहीं है. शिक्षाविद योगेन्द्र शिकंद बताते हैं कि कैसे आजादी के बाद के समय में जमात-ए-इस्लामी यह मानकर चल रहा था कि भारत कैसे कश्मीरी पहचान को बदलने की साजिश कर रहा है. यह आरोप लगाया गया था कि भारत सरकार ने एक कश्मीरी पण्डित (राज्य के गृहमंत्री) डीपी धर के नेतृत्व में एक टीम को अंदालुसिया इसलिए भेजा था कि वे यह पता लगाएं कि स्पेन में इस्लाम माननेवालों को कैसे भगाया गया था. फिर इस टीम से सलाह मांगी गयी थी कि स्पेन का प्रयोग कश्मीर में कैसे दोहराया जा सकता है.
इस काल्पनिक साजिश के प्रतिरोध की मानसिकता अक्सर हिंसा के रूप में सामने आती रही है. राजनीतिक लोग अक्सर इस कुएं से अपनी बाल्टी भरते रहते हैं. 4 मार्च 1987 को श्रीनगर की एक रैली में मुस्लिम युनाईटेड फ्रण्ट के उम्मीदवारों ने ऐलान किया कि इस्लाम एक धर्मनिर्पेक्ष राज्य के अंतर्गत कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकता. एमयूएफ के नेताओं ने गोहत्या बंदी जैसे कानूनों का पुरजोर विरोध किया. ऐसा नहीं है कि कट्टरपंथी ही इस तरह के तर्क दे रहे हों. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम रसूल कार ने भी लिखा था कि श्राईन बोर्ड को भूमि आवंटन मुस्लिम बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक बनाना है.
उधर पीर पंजाल पहाड़ियों के पार चेनाब नदी के दक्षिण में स्थित हिन्दू बहुल क्षेत्रों में हिन्दुओं की प्रतिक्रिया भी तीखी होती चली गयी. जब कांग्रेस के नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद को श्राईन बोर्ड को दी गयी जमीन वापस लेने के लिए मजबूर किया था तब बहुत कम लोगों को ही यह उम्मीद थी कि जम्मू में हिन्दुओं की प्रतिक्रिया इतनी तीखी हो जाएगी. नई दिल्ली में कुछ लोग यह तमाशा देख रहे हैं कि किस तरह 2003 के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ ही हिन्दुओं की प्रतिक्रिया भी लगातार तीखी होती जा रही है.
2002 के विधानसभा चुनावों के वक्त आतंकवाद पर काबू रखने में असफल रहने की वजह से भाजपा बदनाम हो चुकी थी. तब हिन्दुत्ववादी अधिकतर कार्यकर्ता नये संगठन जम्मू स्टेट मोर्चा के साथ चले गये थे जो जम्मू कश्मीर में एक अलग हिन्दु बहुमत वाले राज्य की मांग कर रहा था. चुनावों में भाजपा और जम्मू स्टेट मोर्चा दोनों का सफाया हो गया. इसके बाद हिन्दुवादी नेताओं की एक नयी पीढ़ी सामने आयी. इनमें से सशील सुदान और अनिल कुमार सबसे अधिक दिखाई देनेवाले चेहरे हैं. सुदान बजरंगदल के प्रमुख हैं और राजनीतिक रूप से सक्रिय सुंदरवानी परिवार के सदस्य हैं. उन्हें सड़कछाप राजनीति की ठीक-ठाक समझ है. इसी तरह अनिल कुमार पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक आरएसएस के प्रचारक रहे हैं. यहां ये दोनों एक दूसरे के अच्छे सहयोगी साबित हुए हैं.
कांग्रेस-पीडीपी सत्ता में आयी तो हिन्दुवादी ताकतों ने दावा किया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का असैन्यीकरण और स्वशासन का ऐलान हिन्दुओं के अस्तित्व के लिए खतरा है. जेहाद के पहले दौर की शुरूआत में ही कश्मीरी पण्डितों के निष्कासन की तरफ इशारा करते हुए दावा किया गया कि अब सईद जम्मू से भी हिन्दुओं को भगाना चाहते हैं. 2003 में हिन्दुवादी ताकतों ने गोहत्या को मुद्दा बनाया और अपनी एकजुटता दिखाना शुरू किया. हालांकि यह भी तथ्य है कि पहले भी हिन्दू उन गायों को कसाईयों के हाथ बेचते रहे हैं जो उनके लिए उपयोगी नहीं रह जाती थीं. लेकिन वर्तमान हिन्दुवादी नेता जानते थे कि गाय को किस तरह प्रतीक रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. मार्च 2005, दिसंबर 2007 जैसे वक्त भी आये जब हिन्दुवादी नेताओं ने गौहत्या को मुद्दा बनाकर जम्मू में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया. मार्च 2005 में तो जम्मू के परगवाल के आस-पास के गावों में तब दंगा फैल गया जब हिन्दुत्ववादियों ने अजीब सा दावा किया कि एक गाय के साथ बलात्कार किया गया है.
ऐसा संभव है कि पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला की सरकार ऐसे ध्रुवीकरण से नाखुश नहीं होते. क्योंकि उनकी सरकार भाषाई-धार्मिक आधार पर राज्य के विभाजन के फार्मूले पर काम कर चुकी है. नेशनल कांफ्रेस के नेताओं का मानना था कि हिन्दुवादी अभियानों के परिणामस्वरूप जम्मू के मुसलमान उनकी पार्टी के पीछे खड़े हो जाएंगे. अब तो एक ही सवाल है कि क्या जिस तरह से राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित होकर जम्मू कश्मीर में संकट को बढाया गया है उसका आनेवाले विधानसभा चुनावों में किसी को फायदा होगा? दुर्भाग्यवश इस सवाल का जवाब हां में ही है. अधिकतर विश्लेषक मानते हैं कि जम्मू के हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्रों में भाजपा को फायदा होगा जबकि ऐसा लगता है कि चिनाव के उत्तर में स्थित मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्रों और घाटी में नेशनल कांफ्रेस की स्थिति बेहतर हुई है. लेकिन इस पर भी ध्यान देना जरूरी है कि लोकतंत्र किसी विशेष राजनीतिक परिणाम की गारंटी भर नहीं है. जम्मू कश्मीर के भविष्य के लिए धर्मनिर्पेक्षता बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन यह भी सच्चाई है कि जम्मू-कश्मीर के गहरे सांप्रदायिक विभाजन को पाटने के लिए चमत्कार से भी आगे किसी चीज की जरूरत होगी.
(प्रवीण स्वामी फ्रण्टलाईन के एसोसिएट एडीटर हैं.)
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बेहद सारगर्भित और तथ्यपरक आलेख है।
कश्मीर से अब तक जो भी आवाज आती थी वह केवल और केवल अलगाववादी ही थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमरनाथ का मामला साम्प्रदायिक हो गया किंतु इस घटना के कई सामाजिक मायने भी हैं। पहला यह कि यह राज्य बहुध्रुवीय है और बहुत से क्षुब्ध स्वर अपनी कुंठाओं के साथ भरे पडे हैं। यह भी तय हो गया कि घाटी के तत्व पाकिस्तान-प्रायोजित हैं, बहुत हद तक पाकिस्तानी झंडे के नीचे आदम-झुंड को देशद्रोही ही कहा जायेगा..मैं सहमत हूँ कि धर्मनिर्पेक्षता मन भेद मिटा सकती है लेकिन एक गहरी राजनीतिक इक्छाशक्ति के साथ साथ देशद्रोहियों से निबटबे की रणनीति भी चाहिये..
***राजीव रंजन प्रसाद
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